नारियों को समान अधिकार
प्रश्न– महाराजजी! आजकल नारियों के समान अधिकार की बड़ी चर्चा है। यह कहाँ तक उचित है?
उत्तर– हाँ, चर्चा तो बड़ी जोरदार है। स्त्रियों की एक सभा हो रही थी। अध्यक्षीय भाषण चल रहा था कि स्त्रियों के अधिकार भी पुरुषों के समान हैं। हमें पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर चलना चाहिए। इतना सुनते ही एक आधुनिका ने प्रश्न किया कि हमारे पतिदेव तो कुछ ऊँचे पड़ते हैं, कन्धे से कन्धा कैसे मिलाऊँ? अध्यक्षा ने व्यवस्था दी- बहनजी! आप ऊँची एँड़ीवाली जूती खरीद लीजिए! इस प्रकार बराबरी का प्रयास तो बहुत चल रहा है। बराबरी ही क्यों, कुछ महिलायें तो पुरुषों को नौकर तक बना लेना चाहती हैं। अभी उस दिन किसी पत्रिका में एक ‘कार्टून’ प्रकाशित हुआ था- आधुनिक सभ्यता में पली किसी लड़की ने अपने ‘रिंग लीडर’ से कहा कि मुझे एक ऐसे नौकर की आवश्यकता है जो भोजन बनाए, मालिश करे, घर की सफाई करे, कपड़े धोये, क्रोध आने पर मेरी मार तक सह ले। उत्तर मिला कि ऐसा नौकर तो शादी के बाद ही मिलेगा
स्त्रियों में ही एक सनक सवार हो, ऐसी बात भी नहीं। पाश्चात्य विलासिता में अनुरक्त पुरुषों का एक वर्ग इस माँग को नारियों के नाम पर उछालकर अपने को उनका हितैषी प्रमाणित करना चाहता है। एक भारतीय युवक को पाश्चात्य सभ्यता इतनी पसन्द आई कि देश, परिवार के लोग उसे असभ्य और गँवार प्रतीत होने लगे। पत्नी से उसने घूँघट उठाकर अपने साथ ‘डान्स’ करने को कहा; किन्तु भारतीयता में पली पत्नी ऐसा न कर सकी। युवक ने सोचा कि भारत में रहकर जीवन का भरपूर आनन्द नहीं लिया जा सकता। अतः वह अपनी पत्नी के साथ अमेरिका चला गया। वर्षों वहाँ रहकर अपना जीवन सफल करता रहा। यूरोप के विभिन्न देशों में घूमकर नयी सभ्यता के तौर-तरीकों से परिचित होता रहा। जेब हल्की हो गयी, तो सोचा अब वापस चलकर देखें कि भारत में कितनी प्रगति हुई। विदेशों में भारत के महात्माओं का बड़ा नाम सुना था। उनसे भी मिलने का शौक चर्राया।
जहाज से भारतीय भूमि पर कदम रखते ही युवक ने देखा कि बहुत से लोग प्रयाग के कुम्भ मेले में जा रहे हैं। युवक ने विचार किया कि मेले में महात्माओं के दर्शन भी होंगे। अतः वह पत्नी के साथ माघ मेले में चला आया। त्रिवेणी का तट महात्माओं के कैम्प और धूनियों से खचाखच भरा था। युवक अपनी पत्नी के साथ जहाँ-तहाँ घूमता-फिरता एक महात्मा के पास पहुँचा। कमर से दो इंच आगे झुककर प्रणाम किया, बोला- ‘‘महात्माजी! हमको भी थोड़ा उपदेश कर दीजिए।’’ महात्माजी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, सोचा इसे बतावें भी तो क्या? मुस्कराये, बोले- ‘‘रामायण पढ़ा करो।’’ युवक ने कहा- ‘‘वाह रे, महाराज! आपने तो विचित्र उपदेश दिया। विश्व का ऐसा कौन-सा शब्दकोश है जो हमें कण्ठस्थ न हो। बड़े-बड़े वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, साहित्यकारों की पोथियाँ हमने उलट डालीं। रामायण किस खेत की मूली है। बस हो गया कल्याण! आपने तो अच्छा उपदेश दिया।’’ पुनः दो इंच झुककर प्रणाम किया, यहाँ-वहाँ मेला देखा और ट्रेन पकड़कर अपने स्टेशन पर उतरा, किन्तु पत्नी कहीं दिखाई नहीं पड़ रही थी।
अब तो वह युवक प्रत्येक डिब्बे में ‘पुष्पा, पुष्पा’ पुकारने लगा परन्तु पुष्पा वहाँ हो तो बोले, वह तो इलाहाबाद स्टेशन पर ही छूट गयी थी। माघ के मेले में भीड़ ही इतनी अधिक होती है कि लम्बी भीड़ में धक्के खाते हुए ट्रेन तक पहुँच पाना सबके लिए सम्भव नहीं होता। युवक तो बन्दरों की तरह कूदता-फाँदता किसी प्रकार डिब्बे में पहुँच गया। उसकी पत्नी बेचारी नहीं चढ़ सकी थी। उस भीड़ में वह कैसे धक्के खाती? उधर युवक अपने स्टेशन पर ‘पुष्पा, पुष्पा’ जप रहा था। सोचा, पत्नी तो गयी। अमेरिका इत्यादि पाश्चात्य देशों में स्त्री खोने का अर्थ ही कुछ दूसरा है। पत्नी जब गायब होती है तो लौटकर वापस नहीं आती, दूसरा पति कर लेती है। दूसरा स्थान पसन्द न आने पर तीसरे स्थान पर दिखाई देती है और भूतपूर्व पति महोदय हाथ मलते रह जाते हैं। इन्हीं आशंकाओं से ग्रस्त युवक ने प्रत्येक डिब्बे में अपनी पत्नी को पुकारा। स्टेशन में जाकर कानूनी कार्यवाही की और जाड़े में भी पसीने से तर वह पुनः ट्रेन की ओर दौड़ने लगा, जो अब छूटने ही वाली थी।
रास्ते में ही प्रयाग वाले महात्मा हाथ में कमण्डल लिए दिखाई पड़े। वे डिब्बे से उतरकर धीरे-धीरे स्टेशन की ओर बढ़ रहे थे। युवक ने पहचाना, प्रणाम किया और बोला, ‘‘महात्माजी, हमारी ‘वाइफ’ गायब हो गयी।’’ महात्मा ने पूछा, ‘‘बेटा! वाइफ क्या होता है?’’ युवक ने बताया, ‘‘महात्माजी! पत्नी खो गयी। क्या करूँ?’’ महात्मा ने कहा, ‘‘बेटा रामायण पढ़ा करो।’’ युवक ने चिढ़कर कहा, ‘‘वाह! हमारा तो सर्वनाश हो गया और आपको अभी रामायण की सनक लगी है।’’ महात्मा ने समझाया, ‘‘बेटा यदि तूने रामायण पढ़ी होती तो आज यह दुर्घटना न होती। रामायण में लिखा है, ‘प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई’ (मानस, 2/150/3)- जब भगवान राम वनवास के समय नाव पर चढ़ने लगे, सीताजी का हाथ पकड़कर पहले उन्हें नाव पर बिठाया, फिर स्वयं बैठे। घर में स्त्रियों का कर्तव्य है कि पुरुषों की सेवा करें और घर से बाहर पुरुषों का कर्तव्य है कि पत्नी की सेवा, देखभाल करे। तू तो बन्दर की तरह ट्रेन में चढ़ गया। वह अबला, अपार भीड़ में कैसे ट्रेन में चढ़ पाती। तू अकेला क्यों चढ़ गया?’’ युवक ने कहा, ‘‘महात्माजी, विदेशों में स्त्रियों को समान अधिकार है। मैंने सोचा कि ट्रेन पर जितने अधिकार से मैं चढ़ गया, उतना ही अधिकार तो पुष्पा का भी है। इसलिए मैंने उसकी प्रतीक्षा नहीं की। सोचा था, वह भी चढ़ गयी होगी। महाराजजी! आपकी रामायण तो सचमुच दर्शनीय है। आज से मैं उसका पाठ अवश्य करूँगा। लेकिन, महाराजजी दया करें! वह मिलेगी कि नहीं?’’ महात्मा ने कहा, ‘‘पहले पाठ तो करो, वह तो मिली-मिलाई है।’’ युवक ने उसी दिन से पाठ प्रारम्भ कर दिया। उसकी पत्नी बेचारी कहाँ जाती। दो-एक दिन पश्चात् भीड़ कम होने पर ट्रेन में जगह मिलते ही वह भी चली आई। अब तो युवक की आँखें खुल गयीं और वह रामायण की शिक्षाओं पर सोत्साह चलने लगा। वैसे भी, रामायण परमकल्याणकारक ग्रन्थ है, विश्व में उसकी मान्यता है। यहाँ तो समान अधिकार के सन्दर्भ में उसका दृष्टान्त मात्र दिया गया है। स्त्रियों को आधुनिका बनाने में पुरुषों का दोष भी कम नहीं है।
समान अधिकार का आकर्षण नयी शिक्षा पानेवाले युवक-युवतियों में विशेष पाया जाता है। संयोग से एक दम्पति बी0ए0 थे। पति-पत्नी दोनों ही समान शिक्षित थे। दोनों को समान पद भी प्राप्त हो गया। दोनों साथ-साथ रहते-खाते थे। एक दिन प्रातः ‘बेड टी’ आयी तो पत्नी चाय में चीनी डालना भूल गयी थी। साहब ने चाय होठों से लगाया और फीकी लगते ही कप उठाकर फेंक दिया। अपनी बनायी चाय का अपमान देख पत्नी तमतमाकर अन्दर गयी और पूरा टी सेट उठाकर पटक दिया। साहब का होश तुरन्त ठिकाने आ गया, बोले- अरे, अरे! यह क्या कर रही हो? कप-प्लेट क्यों तोड़ डाला? पत्नी ने कहा- आपने क्यों तोड़ा? साहब ने सफाई दी कि चाय में चीनी नहीं थी। पत्नी ने कहा- तो आप न पीते। आपको कप फेंकने का अधिकार है तो मुझे भी समान अधिकार है, आप बी0ए0 पास हैं तो मैं भी बी0ए0 पास हूँ।
बात बढ़ती गयी। दोनों के पक्षपाती स्त्री-पुरुष एकत्र होते गये। विवाद का अन्त न होते देखकर किसी ने एक महात्मा से इस विवाद के निर्णय का प्रस्ताव रखा। सभी महात्मा के पास पहुँचे। अपना-अपना पक्ष रखा। महात्मा ने कहा कि समान अधिकार अवश्य होना चाहिए; किन्तु माताओं और बहनों, इसके लिए आपको एक कदम और आगे बढ़ना होगा। देखिए, आप नौ महीने पेट में बच्चे का भार वहन करती हैं। मिचलियाँ आती हैं। कभी-कभी प्रसव के समय मृत्यु भी हो जाती है। माताओं को असह्य दुःख झेलना पड़ता है, ‘ज्यों जुवती अनुभवति प्रसव अति दारुन दुख उपजै।’ (विनयपत्रिका, 89)- दारुण दुःख उठाना पड़ता है। जब समान अधिकार है तो यह दुःख अकेले ही क्यों झेलती हो? पतिदेव से कहो कि साढ़े चार माह तक इस दुःख में अपना भाग स्वयं वहन करें। प्लेट तो आपने एक के स्थान पर छः फोड़ डालीं! लेकिन इसे कैसे बाँटोगी? ईश्वरीय व्यवस्था में कोई उलट-फेर कैसे कर लेगा?
हाँ, जहाँ तक व्यावहारिक दृष्टि के समान अधिकार का प्रश्न है, भारत में सदैव समान अधिकार रहा। पार्वतीजी को शंकर की अर्धांगिनी कहा जाता है। अर्धांगिनी का तात्पर्य है समान अधिकार। भारतीय दर्शन में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार सदैव रहा है। अन्तर इतना ही है कि घर से बाहर का कार्य पुरुषों को सौंपा गया और घर के भीतर की व्यवस्था स्त्रियों का कर्तव्य माना गया। बाहर से धन कमाना, वस्तुओं का संग्रह करना पुरुषों पर भारित है और संग्रह की हुई वस्तु की साज-सँभार, सुव्यवस्था और सदुपयोग स्त्रियों पर आधारित है; क्योंकि घर से बाहर रहकर धनोपार्जन करना स्त्री-प्रकृति के प्रतिकूल है। मासिक धर्म या गर्भावस्था इत्यादि उनके कर्तव्य में बाधक हैं। स्त्रियाँ बाहर कार्य करें तो इन अवसरों पर कार्य स्थगित रखना पड़ेगा। सैनिक एवं प्रशासनिक कार्य भी उनके लिए सुविधाजनक नहीं है। पुरुषों द्वारा बलात्कार का भय अलग बना रहता है, यहाँ तक कि माता सीता चोरी चली गयीं। इसीलिए स्त्रियों को पुरुष के संरक्षण में घर के भीतर की व्यवस्था सौंपी गयी। यद्यपि शुभ कार्यों में वे सदैव साथ रहीं। सीता वन के कंटकाकीर्ण पथ में साथ गयीं। कैकेयी ने युद्ध में दशरथ का साथ दिया।
वस्तुतः जीवन के दो पहलू हैं- एक धनोपार्जन, वस्तु-संग्रह; और दूसरा संग्रह की हुई वस्तु का सुचारु रूप से उपयोग। इन दोनों दायित्वों में से संग्रह पुरुषों के हिस्से में है और सदुपयोग, सुव्यवस्था महिलाओं पर निर्भर हैं। इस तरह भारत में तो स्त्री और पुरुषों का समान अधिकार सदैव रहा है। इससे अधिक आप लोग कौन-सी समानता चाहते हैं? क्या दोनों को कुश्ती लड़ाना चाहते हैं? ‘बाक्सिंग’ कराना चाहते हैं? जिस क्षेत्र में ईश्वर ने ही असमान बनाया, वहाँ समानता कैसे होगी?
स्त्रियाँ कहती हैं- हम नौकरी करेंगे, गोली चलाएँगे, फुटबाल खेलेंगे और आवश्यकता पड़ने पर पुरुषों को चपत भी लगायेंगे। बात तो ठीक है, लेकिन चपत मारने का साहस उनमें आयेगा कहाँ से? जीव जगत् पर दृष्टिपात करने पर ज्ञात होता है कि पचास गायें मिलकर भी एक साँड़ का सामना नहीं कर पातीं। पचासों बन्दरियाँ एक बन्दर की बराबरी नहीं कर पातीं। पशु समाज में स्त्रियों का सम्मान यहीं तक सीमित है। मनुष्यों में भी जिनका जीवन पशुओं की तरह ‘खाने-पीने और मौज करने’ तक ही सीमित रहा, नारियों का स्थान पशु-समाज जैसा ही था। मुहम्मद साहब के समय में अरब निवासी कई-कई स्त्रियाँ रखते थे। मुहम्मद साहब ने इसका बड़ा विरोध किया और व्यवस्था दी कि एक व्यक्ति चार पत्नी रख सकता है। समान अधिकारवालों को यह व्यवस्था खटक सकती है; किन्तु अरब निवासियों को यह संख्या इतनी कम प्रतीत हुई कि उन्होंने मुहम्मद के विरुद्ध तूफान खड़ा कर दिया। वे लोग स्त्रियों का वैसा ही प्रयोग करते थे, जैसा पशुओं का करते थे। पिता के मरने पर पुत्र माँ को रख लेता था और उसके भी मरने पर स्त्री को नाती रख लेता था। पुत्र-वधू का उपभोग पत्नी की तरह करते थे। मुहम्मद साहब ने व्यवस्था दी कि कम से कम दूध बचाकर शादी विवाह करना चाहिए। पशुवत् समाजों में सर्वत्र ऐसा ही था और आज भी समान अधिकार को लेकर जिन देशों का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है, उन देशों में बलात्कार, तलाक, हत्या, आत्महत्या, पागलपन, स्त्रियों के अपहरण जैसी घटनाएँ भारत से हजारों गुना अधिक हैं। आज भी विश्व में भारत ही एकमात्र देश है जहाँ सतीत्व का मूल्य है और सतीत्व आज भी यहाँ सुरक्षित है। माताओं के प्रति पुरुषों में सम्मान और गौरव की धारणा है।
सच कहा जाय तो स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार देने का विचार भारतीय मनीषियों के मस्तिष्क की उपज है। किन्तु इस अर्थ में नहीं, जैसा कि आज प्रचलन है। महर्षियों ने अभ्यास करते-करते जब उस परमतत्त्व परमात्मा का दिग्दर्शन पाया, उस पथ पर भली-भाँति दृष्टिपात किया, उस पर सभी को चलाकर देखा तो पाया कि स्त्री और पुरुष कहलानेवाली आत्माएँ समान हैं। भगवत्पथ पर चलने की समान क्षमता रखती हैं। इसीलिए भजन के क्षेत्र में उन्होंने स्त्री को भी पुरुषों के समान अधिकार दिया।
समानता ही नहीं, मनीषियों ने माता को पिता और स्वर्ग से भी ऊँचा स्थान प्रदान किया। प्राचीन भारत में पुत्र को माता के नाम से सम्बोधित करने की प्रथा थी। अन्धे धृतराष्ट्र को अम्बिकानन्दन कहा जाता था। चित्रांगदनन्दन किसी ने नहीं कहा। चार-पाँच सौ वर्ष के वयोवृद्ध भीष्म पितामह गांगेय सम्बोधन में अपना गौरव मानते थे। कुन्तीपुत्र अर्जुन को कौन्तेय कहा जाता था। इस तरह माताओं का आदर सदैव रहा है और आज भी सौभाग्य से भारत में है।
खेद का विषय है कि विलासिता के नशे में आज कुछ लोग पाश्चात्य अर्थों में स्त्री-पुरुष को समरूप बनाने के लिए आन्दोलन करते रहते हैं किन्तु माताओं और बहनों को इससे सतर्क हो जाना चाहिए अन्यथा ठोकर खाने पर अपने आदर्शों से च्युत होकर उन्हें पाश्चात्य पशुवत् रहन-सहन का शिकार बनना पड़ेगा। अतः माताओं को चाहिए कि वे पूर्व महर्षियों द्वारा अनुमोदित अपनी चिरसंचित मर्यादा के अनुरूप आचरण करें। इसी में उनका कल्याण है।
भौतिक दृष्टि से देखा जाय, तब भी भारत में स्त्रियों के अधिकार उनकी सुख- सुविधा का विधान पुरुषों की अपेक्षा अधिक ही है। यदि पुरुष के ऊपर सौ रुपये का वस्त्र है तो माताओं के वस्त्र हजारों में आते हैं। पुरुष के हाथ में अँगूठी भी न हो किन्तु माताओं की पेटियाँ वस्त्राभूषणों से भरी मिलेंगी। अमेरिका इत्यादि देशों की तथाकथित प्रगतिशील महिलाओं के पास आभूषणों के नाम पर आपको निराशा ही हाथ लगेगी।
एक कनेडियन दम्पति पूज्य महाराजजी के आश्रम में अनुसुइया पहुँचे। महाराजजी ने पूछा, ‘‘क्यों आए?’’ तो बोले- ‘‘योग सीखने आये हैं। दर्शनशास्त्रों में भारतीय योग के बारे में पढ़कर हम बहुत प्रभावित हुए। सोचा, भारत चलकर देखें कि वास्तविकता क्या है?’’ महाराजजी ने पुनः प्रश्न किया, ‘‘अच्छा यह बताओ कि अमेरिका अच्छा है या भारत?’’ दोनों एक स्वर में बोल पड़े- ‘‘भारत!’’ महाराजजी ने कहा, ‘‘अमेरिका तो बहुत समृद्ध है?’’ कनेडियन ने उत्तर दिया कि ‘‘समृद्ध तो है, लेकिन अशान्ति बहुत है। यदि हम पति-पत्नी पूरे अमेरिका से गुजरते तो कम-से-कम दो-चार बार हमारी पत्नी का अपहरण हो गया होता। इसे कोई ले जाता और फिर यह मुझे तीन-चार दिनों बाद ही मिलती। लेकिन जब से हमने भारत में कदम रखा तब से किसी ने भी हमारी पत्नी को ‘सिस्टर’ छोड़कर अन्य दृष्टि से नहीं देखा। इससे भी हमको बड़ी शान्ति मिली। अब हमारा पासपोर्ट समाप्त होने को है किन्तु सन्त-महात्माओं का सान्निध्य लाभ लेने के लिए ‘डेट’ बढ़वाने की सोच रहे हैं।’’
देखिए, पाश्चात्य आदर्शों से अनुप्राणित शिक्षा-प्रणाली मे ढलने के कारण ही नारियों में यह विचार पैदा हो रहा है। वैदिक एवं शास्त्रीय आदर्शों को शिक्षा में स्थान न मिलने के कारण ही मस्तिष्क विलासिता में विकृत हो रहा है। आपके मन का वेग सत्संग-अभाव के कारण ही है। अतः सत्संग करें। यदि सत्पुरुष उपलब्ध न हो, तो राम, शिव, ओम् इत्यादि नामों के जप से भी आपको सत्पथ का सही निर्देश मिलेगा और इनमें से किसी नाम रूप की साधना में कुछ भी समय देते बन गया तो पाँच-सात साल में ही आपको लगेगा कि काम, क्रोध अथवा कोई भी ऐसा शत्रु नहीं है जिसका आप पार न पा सकें। वस्तुतः विकारों का उतार-चढ़ाव तन पर नहीं बल्कि मन पर है। मन यदि साधना के सही दौर में आ जाय तो विषयों का भान कौन करेगा? मन स्वतः नियंत्रित हो जाता है।
सीता, सावित्री, मीरा, गार्गी, अनुसुइया, मदालसा सभी आपकी पूर्वज हुई हैं। सभी ने इसी क्रियात्मक पथ का अनुसरण किया और उन्हीं के पदचिन्हों पर चलकर आप भारत ही नहीं, विश्व के लिए उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत कर सकेंगी।
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)