हवन
यज्ञ पर दृष्टि–क्रम
गीताशास्त्र के अनुसार बाहर अग्नि जलाकर यज्ञ करने का कहीं कोई विधान नहीं मिलता, फिर अग्नि में हवन कैसा और क्यों?- उलझे प्रश्न पर युक्तिसंगत विचार। – स्वामी अड़गड़ानन्द
कर्मकाण्ड में पूजा-भाग के हर श्लोक में परमपुरुष परमात्मा की विविध अवस्थाओं का चित्रण है। हर श्लोक के पश्चात् मांगलिक वस्तुओं को समर्पित किया जाता है। कर्मकाण्ड का दूसरा भाग है हवन, जिसमें वेदी बनाकर आम अथवा किसी सुगन्धित वृक्ष की लकड़ी में अग्नि आधान कर तिल, यव, अगरु इत्यादि का मिश्रण करते हैं। अनेक देवताओं और वस्तुओं का नाम लेते हैं कि यह वस्तु आपके लिये है मेरी नहीं, आप इसे स्वीकार करें; किन्तु यहाँ भी एक भूल न जाने कब से स्थान पा चुकी है कि श्लोक तो परम पुरुष की महिमा के पढ़े जाते हैं, जिसका अर्थ है कि उस प्रभु के अतिरिक्त सभी नाशवान् हैं; किन्तु स्वाहा के समय अनेकानेक तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का नाम समर्पण करने लग जाते हैं, जिनका कोई अस्तित्व नहीं है- चाहे वेद ही उठाकर क्यों न देख लें।
हवन में पचीस-तीस देवी-देवताओं तक नाम तो लिये जाते हैं; किन्तु इसके पश्चात् जड़-चेतन जीवों के नामों की गिनती शुरू हो जाती है; क्योंकि सभी देवताओं का नाम कोई नहीं जानता। कहते हैं- समुद्रेभ्यो नमः, तो साथ ही क्षीर-समुद्र, दधि- समुद्र, घृत-समुद्र, इक्षु(गन्ने के रस के)-समुद्र और सुरासमुद्रेभ्यो नमः। यह सब खाने-पीने की वस्तुएँ हैं। इतना ही नहीं, नदियाँ और छोटे-मोटे नाले तक को स्वाहा। फिर छः-सात प्रकार के सर्पों को गिनाया जाता है, जैसे- सहसनाग, वासुकी, कर्कोटकाय, तक्षकाय नमः स्वाहा। आगे वृश्चिकाय नमः, कृकलाय (गिरगिट को भी) स्वाहा। शरीर की इन्द्रियों के भी नाम हैं, जैसे- भगाय नमः। स्वर्ग की अप्सराओं के प्रति भी समर्पण कराया जाता है, जैसे- मेनकायै स्वाहा, उर्वश्यै नमः, तिलोत्तमायै नमः स्वाहा। इसी प्रकार मानव-निर्मित काल-गणना और ग्रह-नक्षत्रों के प्रति भी समर्पण कराया जाता है। जैसे- सोमाय नमः, भौमाय नमः, ध्रुवाय नमः, राहवे केतवे नमः। इसी क्रम में अस्त्र-शस्त्रों को नमन, जैसे- दण्डाय नमः, गदा-अंकुश-पाश-त्रिशूल-चक्राय नमः; जबकि ये आविष्कार हजारों वर्ष पुराने पड़ चुके। फिर कहते हैं- इन्द्र और उसके उच्छृङ्खल लड़के जयन्त के लिये स्वाहा। पीपल से लेकर पिपीलिका तक को समर्पण, भूत-भवानी तक को नमन सिखाया जाता है। सारांशतः प्रचलित हवन-पद्धति में शाश्वत एक परमात्मा के स्थान पर क्षणभंगुर कलेवरों के प्रति हमारी श्रद्धा को बाँट दिया जाता है- ऐसा क्यों?
देवता ‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति’ (गीता, ९/२१)- पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में गिर पड़ते हैं। देवताओं का राजा बननेवाला नहुष गिरा तो अजगर बना। तैंतीस करोड़ देवता तो न जाने कब के गिने गये थे, अब तक उनमें से कितने गिरे? चन्द्रयान से पृथ्वी की परिक्रमा करनेवालों ने क्या उस सहसनाग को देखा, जिसके फन पर पृथ्वी टिकी बतायी गयी है, जिसे आप स्वाहा बोलते हैं? जिन्हें आप हवि देते हैं, क्या वे हैं भी या नहीं?
कुछेक कहते हैं कि जड़-चेतन सबको नमस्कार इसलिए कराया जाता है कि मनीषियों को इन सबमें परमात्मा दिखायी पड़ा। किन्तु यह तो प्राप्ति के समय महापुरुष की अपनी निज अनुभूति है, दूसरों के लिए उसका क्या उपयोग? अग्नि तो प्रत्येक काष्ठ में है, किन्तु बिना जलाये क्या भोजन पक जायेगा? जिसने कभी देखा नहीं, जलाने की विधि सीखी नहीं, क्रिया करता नहीं तो लकड़ी में रहते हुए भी आग उसके लिए नहीं है।
इसी प्रकार, परमात्मा कण-कण में है- ऐसा भगवत्-प्राप्ति के समय दिखायी अवश्य पड़ता है, फिर भी महापुरुष जड़-चेतन सबको समर्पण करने नहीं लग जाता, बल्कि उसका हृदयस्थ इष्ट ही बाहर भी सर्वत्र दिखायी पड़ने लगता है। वह सर्वत्र अपने इष्ट को ही प्रणाम करता है, अन्य को नहीं। अपनी विभूतियों को गिनाते-दिखाते योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि बहुत कुछ जानने-सुनने से तेरा क्या प्रयोजन! इतने में समझ ले कि संसार में जो कुछ भी तेजयुक्त है, मेरे ही तेजांश प्रभाव से है, तो क्या अर्जुन उन सबको पूजने लगा? क्या उसने सूर्य और चन्द्रमा की पूजा की? वह श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित रहा। केवल भक्त के लिए प्राप्तिकाल में सृष्टि खो जाती है, भगवान ही सर्वत्र दिखायी पड़ते हैं। शेष सबको कण-कण में संसार ही दीखता है, भगवान कहीं नहीं। सर्वत्र भले ही हों; किन्तु साधनात्मक जागृति के बिना वह हमारे और आपके लिए नहीं हैं। भगवान सर्वत्र हैं- यह योग-साधना से चलकर देखने के लिए है, मानकर बैठ जाने के लिए नहीं।
यह भी कहा जाता है कि जिन उपयोगी वस्तुओं का हम प्रयोग करते हैं, उनके प्रति कृतज्ञताज्ञापन के लिए इन मन्त्रों से समर्पण कराया जाता है। फिर तो उपयोगी आधुनिक आविष्कारों के प्रति भी समर्पण क्यों नहीं करते कि- पम्पसेटाय स्वाहा। फाउण्टेनपेनाय नमः, टेलीविजनाय स्वाहा। उर्वरकाय स्वाहा। ट्रैक्टराय नमः। कम्प्यूटराय नमः स्वाहा। नम्बर दो की कमाई नमः स्वाहा। स्टेनगनाय नमः इत्यादि। परमाणु पिस्टल कहें! अब दण्ड-मुग्दर का क्या उपयोग?
सन्तोष के लिए कुछ लोग मान लेते हैं कि देवी-देवता भगवान के ही विभिन्न नाम हैं; किन्तु जिन नामों से आप हवन करते हैं, क्या उनसे एक परमात्मा का बोध होता है? लोग छोटे-बड़े देवताओं की कल्पना कर उनके पीछे दौड़ने लगते हैं। कुछ मानते हैं कि देवता भी भगवान के अंग या सेवक हैं, उन्हें मिलाये रखना जरूरी है। कोई काम लेना है तो भगवान को कष्ट क्यों दें, इन्हीं से काम करा लें! किन्तु वस्तुतः ऐसा है नहीं। उपनिषदों में कहा गया है कि देवताओं की उपासना करनेवाला अर्थात् भगवान के एक अंग, एक आँख या एक कान की पूजा करनेवाला यथार्थ नहीं जानता। वह एक-एक देवताओं का पशु है। देवता उसका शोषण ही करते हैं। अर्थात् इनमें उलझकर वह एक परमात्मा के चिन्तन में समय नहीं दे पाता, परमश्रेय से वंचित रह जाता है।
वस्तुतः देवता और असुर हृदय के अन्तर्गत दैवी और आसुरी गुणों के नाम हैं। परमदेव परमात्मा की ओर बढ़ानेवाले शम-दम, यम-नियम, धारणा-ध्यान अथवा समाधिपर्यन्त गुण ही देवता हैं। अपने भीतर इन गुणों को विकसित करना कठिन जानकर, बाहर इन गुणों की आकृति पूजकर सन्तोष कर लेना ही भ्रान्ति का मूल है, जैसे कि बुद्धि की देवी, क्रोध का देवता, प्रेम का देवता, समृद्धि का देवता, भोजन की देवी, बीमारियों की देवी, उनके स्त्री-बच्चे, निवास, वाहन इत्यादि कल्पित कर लिए गये हैं। ये मात्र गुण हैं और जिसमें जितनी मात्रा में प्रस्फुटित होते हैं, उसी मात्रा में शक्ति प्रदान करते हैं। इन गुणों की पराकाष्ठा परमदेव परमात्मा में है। अस्तु, पूजन इन गुणों की कल्पित आकृतियों की नहीं, बल्कि इन सबके एकमात्र आश्रय परमात्मा का ही पूजन तथा एक उन्हीं के प्रति समर्पण उचित है।
पूजा के श्लोक क्लिष्ट संस्कृत में होने, शिक्षा में ह्रास तथा सर्वसुलभ न होने के कारण जनसमाज उन्हें कम समझता था; किन्तु हवन के मन्त्र सरल संस्कृत में होने तथा हिन्दी भाषा से मिलते-जुलते शब्दों के कारण और शिक्षा के प्रचार के कारण भी प्रायः सबकी समझ में आने लगे हैं। जिन घरों में कर्मकाण्ड के ये उत्सव होते हैं, वहाँ बैठी माताओं और बच्चों के निर्मल मन पर इन अस्तित्वहीन कलेवरों के संस्कार घर कर जाते हैं, जो आजीवन उनका पिण्ड नहीं छोड़ते। वे परमात्मा का नाम तो लेते हैं; किन्तु उसी के साथ मिलाकर वे पन्द्रह-पचीस देवी-देवताओं को भी बचपन से विरासत में पा जाते हैं। लाख समझाने पर भी वे सत्य को अपनाने से हिचकते हैं कि कहीं पहलेवाले देवता महाराज नाराज न हो जायँ। हजारों खर्च करके लोग इन आयोजनों को क्या इसीलिए कराते हैं कि उन्हें शाश्वत से हटाकर नश्वर के पीछे गुमराह कर दिया जाय?
पूजा में प्रयुक्त पुरुष-सूक्त के मन्त्रों द्वारा एक परमात्मा के प्रति समर्पण तो सही है; किन्तु स्वाहा के समय शाश्वत का यही शिक्षक नश्वर के पीछे भटक जाता है, जिसका कलंक हवन-पद्धति में चली आ रही इस छोटी-सी भूल से है। क्यों न इसका सुधार किया जाय?
पहले अधिकांश समाज अनपढ़ था। धर्म के नाम पर कुछ भी कह देना सरल था। अब लोग साक्षर हैं, समझते जा रहे हैं। यदि वे पूछें की पुश्त-दर-पुश्त को एक परम सत्य से हटाकर नश्वर के पीछे लगा देने का आपको क्या अधिकार है?, तो कठिन हो जायेगा। अतः अभी से (जैसा कि वेद की मूल ऋचायें कहती हैं) उस एक परमात्मा के नाम का सेवन करें।
भगवान महावीर, गौतम बुद्ध, गुरु नानक इत्यादि भी परमात्मा को भली प्रकार मानते हैं। परमात्मा के अनन्त नामों में से आठ-दस का वे भली प्रकार प्रयोग करते हैं। जैसे, बुद्ध का कहना है कि साधना के पूर्तिकाल में रात्रि के चौथे प्रहर में मैंने उस अविनाशी पद को पाया, जिसे पूर्व महर्षियों ने पाया था। मैंने सर्वज्ञता प्राप्त की। फिर बुद्ध का धर्म नया कैसे हो गया? उनके पहले के महर्षि भी उसी सत्य को पा चुके थे। गीता में भी है कि वह आत्मा अविनाशी है, शस्त्र उसे काट नहीं सकते, वायु सुखा नहीं सकता, वह आत्मा ही सर्वज्ञ है; फिर बुद्ध ही कौन कुल्हाड़ी मार रहे हैं? इन नामों में से ही तो किसी का प्रयोग कर रहे हैं।
महावीर स्वामी भी उसी परमात्मा के नाम को बार-बार दुहराते हैं कि आत्मा ही सत्य है। बहुत से नामों का प्रयोग उन्होंने नहीं किया कि कहीं लोग इन नामों को ही अलग-अलग देवी-देवता का रूप न दे दें। उन्होंने केवल ‘आत्मा’ को ही लिया। गीता (अध्याय २/१६) में भी है कि असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत्य वस्तु का तीनों कालों में अभाव नहीं है। अर्जुन! यह आत्मा ही सत्य है। इसकी प्राप्ति ही परम सिद्धि है। ठीक इसी स्वर में सर्वसिद्धि, सर्वसमर्थ, आत्मा-जैसे पर्यायों का प्रयोग महावीर ने परमात्मा के लिए किया है।
गुरु नानक ने कहा कि एक ओंकार ही सत्य है। हरि के अनन्त नाम हैं, जिनमें राम-नाम सर्वोपरि है। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थसाहिब में छब्बीस हजार सात सौ बार भगवान का नाम आया है, जैसे- राम, हरि, ॐ, प्रभु, कर्त्ता पुरुष, अकाल पुरुष इत्यादि। गीता में है कि मैं काल से परे हूँ। ठीक वही बात, जो ग्रन्थसाहिब में है। आपके रामचरितमानस, पातंजल योगदर्शन, उपनिषद्, वेद इन सबका एक ही निर्णय है, जिनका समर्थन नानक भी करते हैं।
सुखमनि साहिब
‘सिमिरहु सिमिरि सिमिरि सुख पावहु। कलि कलेस तन माहिं मिटावहु।।’ तो किसका सुमिरन करें? ‘सिमिरहु जासु बिसम्भर एके। नाम जपत अनगनत अनेके।।’ उनके नाम अनगिनत और अनेक हैं, किन्तु ‘वेद पुरान सिमृति सुधाखर। कीन्हें राम नाम इक आखर।।’ राम-नाम सर्वोपरि है- ‘किनका एक जासु जिय बसावै। ताकी महिमा गनी न जावै।।’- राम-नाम का एक कण भी जिसके जिय में बस जाता है, उसकी महिमा अपार है। ‘काँखी एकै दरस तुम्हारो। नानक उन संग मोहि उधारो।।’- जिन्हें नाम जपते हुए एक ही आकांक्षा रहती है कि मैं आपका दर्शन पाऊँ, बस मुझ नानक को भी उन्हीं में से एक जानकर उद्धार कर देना।
अतः जैन, बौद्ध, सिख इत्यादि सनातन के ही अनुयायी हैं। परमात्मा की ओर उन्मुख विश्व का प्रत्येक व्यक्ति सनातनधर्मी है, भाषा उसकी चाहे जो हो। इन्हें अपने से भिन्न देखना भ्रम-विशेष की उपज है और सत्य से पलायन करना है। विद्वान् पुरोहित वर्ग को चाहिये कि वेद, उपनिषद्, गीता इत्यादि शास्त्रों से अनुमोदित परमात्मा के उन्हीं नामों का हवन करें, जो एक परमात्मा के ही परिचायक हों। जैसे- ‘सर्वसुखाय सच्चिदानन्दात्मने नमः।’- सभी सुखों को देनेवाला वही है, सत्-चित्-आनन्दघन वही है। ‘सर्व उरालये स्थितये नमः।’- वह सबके हृदय में वास करता है। ‘अगोचराय अचिन्त्याय नमः।’- वह इन्द्रियों और चित्त का निरोध करने से शनैः-शनैः क्रमशः सुलभ होता है। ‘परम पुरुषाय नमः।’- परम पुरुष वही है। ‘शाश्वताय अमृताय अकालपुरुषाय नमः।’- अमृत वही है, मृत्यु से परे अकाल पुरुष वही है। इस प्रकार सबको बोध करा देने से कर्मकाण्ड की सभी रस्में पूरी हो जाती हैं कि परमात्मा ही लोक में समृद्धि, परलोक में शाश्वत शान्ति और परमधाम के दाता हैं। मानव को और चाहिए ही क्या? यदि आपको लोक में समृद्धि और परलोक में मुक्ति चाहिये तो परम पुरुष परमात्मा की ही आराधना करें। अन्यत्र कहीं कल्याण है ही नहीं, तो पायेंगे कहाँ से? अतः निष्ठा को हर ओर से समेटकर एक परमात्मा में दृढ़ करें-करायें, अपना उद्योग करें।
यज्ञ का वास्तविक स्वरूप
देवी-देवताओं के स्थान पर एक परमात्मा का नाम लेकर यज्ञ करने से नाम का सुधार तो हो गया; किन्तु बहुत बड़ी भूल फिर भी जीवित है; क्योंकि हमें वह अग्नि उपलब्ध नहीं है, जिससे हवन होता है। यज्ञ के लिए ‘जोग अगिनि करि प्रगट तब, कर्म सुभासुभ लाइ।’ (मानस, ७/११७ क) अनुकूल अग्नि चाहिए।
अन्य शास्त्रों के साथ गीता (अध्याय ४, श्लोक २५ से ३० तक) में यज्ञ का भली प्रकार वर्णन है। बहुत से योगी यज्ञस्वरूप महापुरुष को माध्यम बनाकर ब्रह्मरूपी अग्नि में यज्ञ का हवन करते हैं अर्थात् सद्गुरु के स्वरूप का ध्यान करते हैं। यहाँ ब्रह्म एक अग्नि है। बहुत से योगी इन्द्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को ‘संयमाग्निषु जुह्वति’ (गीता, ४/२६)- संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं। यहाँ संयम एक अग्नि है। बहुत से योगी शब्दादिक विषयों को ‘इन्द्रियाग्निषु जुह्वति’ (गीता, ४/२६)- इन्द्रियरूपी अग्नि में हवन करते हैं अर्थात् दर्शन, श्रवण इत्यादि द्वारा जो विषय मिलता है, उसका आशय साधनापरक बदलकर ग्रहण करते हैं। यहाँ इन्द्रिय एक अग्नि है। ‘आत्मसंयमयोगाग्नौ’ (गीता, ४/२७)- यहाँ योग एक अग्नि है। अन्तःकरण का परमतत्त्व से संयोग करानेवाली अग्नि है। बहुत से योगी प्राण को अपानाग्नि में तथा अपान को प्राण में हवन करते हैं। बहुत से प्राण को केवल प्राण में हवन करते हैं अर्थात् सुरत को केवल प्राण पर ही केन्द्रित करते हैं, जब-जब श्वास लेते हैं ॐ का स्मरण करते हैं। अन्तिम स्थिति में कहते हैं कि बहुत से योगीजन प्राण और अपान की गति का निरोध कर प्राणायामपरायण हो जाते हैं। न तो भीतर से कोई संकल्प उठता है और न बाह्य वायुमण्डल का संकल्प भीतर प्रवेश कर पाता है। ऐसी दशा में प्राणों का आयाम अर्थात् निरोध हो जाता है। यही मन की विजेतावस्था है। मन (चित्त) के प्रसार का नाम ही तो जगत् है। जहाँ मन संकल्प-विकल्प से रहित हुआ, तहाँ इस मन में स्थित जगत् का ही हवन हो जाता है। इस मानस-यज्ञ में पूरा जगत् अर्थात् सांसारिक सम्बन्ध ही हवन-सामग्री के रूप में है। यही बात भगवान अपने शब्दों में कहते हैं-
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।। (गीता, ५/१९)
उस पुरुष के द्वारा जीवित अवस्था में ही सारा संसार जीत लिया गया, जिसका मन समत्व में स्थित है। क्यों? मन के समत्व और संसार जीतने में सम्बन्ध? जगत् जीत ही लिया, तो जीतनेवाला रहा कहाँ? इस पर योगेश्वर कहते हैं, ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’- वह ब्रह्म निर्दोष और सम है और इधर उसका मन भी समत्व की अवस्थावाला हो गया। ‘तस्मात् ब्रह्मणि ते स्थिताः’– इसलिये वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। इसी स्थिति को यज्ञ-प्रकरण में कहते हैं- प्राणायाम की स्थिति, जहाँ प्राणों का व्यापार (मन की भागदौड़) शान्त हो गयी हो। यह मन की विजेतावस्था है। इसके साथ ही यज्ञ का परिणाम निकल आता है।
‘यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्’- पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी संरचना करता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला योगी शाश्वत सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है और जो यज्ञ नहीं करता, उस यज्ञरहित पुरुष के लिये ‘नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम’ (गीता, ४/३१)- यह मनुष्य शरीर भी सम्भव नहीं है तो भला परलोक कैसे सम्भव होगा? इस प्रकार के यज्ञों से जिनका पाप नष्ट हो चुका है, वे सभी पुरुष यज्ञ के जानकार हैं। अतः आप भी इन्हीं यज्ञों में से अपनी श्रेणी चुन लें और करें। यह चिन्तन-क्रम सबके लिये सुलभ है।
संसार में द्रव्य-यज्ञ भी प्रचलित है, जिसमें धर्मशाला, कुआँ, तालाब इत्यादि का निर्माण और मानव सेवा में द्रव्य लगाया जाता है; किन्तु गीता के अनुसार ये अत्यल्प हैं। योगेश्वर द्वारा बताया गया यज्ञ अपने सभी स्तरों पर मन और इन्द्रियों की क्रिया द्वारा ही सम्पन्न होनेवाला है। भौतिक जगत् की एक पैसे की भी वस्तु यज्ञ में नहीं लगती और यही मानसिक यज्ञ वेद के पुरुष-सूक्त में है, जिसमें वसन्त ऋतु आज्य है, ग्रीष्म ईंधन है, शरद् हवि है अर्थात् सभी कालों में सतत यह यज्ञ करने का विधान है।
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रि: सप्त समिधः कृताः।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवध्नन् पुरुषं पशुम्।।
दैवी सम्पद्युक्त लोगों ने यज्ञ करते समय यज्ञ की सात भूमिकाओं में प्रकृति, महत्तत्त्व (बुद्धि), अहंकार, पंच स्थूलभूत, पंच सूक्ष्मभूत, पंच ज्ञानेन्द्रिय तथा तीन गुण- इन इक्कीस समिधाओं का हवन करके उस पुरुषरूपी पशु को बाँध लिया। इन सबके हवन हो जाने पर जो शेष बचा रहता है, उसी को जानो। वही है परम आराध्य, वही है परमात्मा।
यही श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि जगत् के सम्पूर्ण संस्कारों के हवन के साथ मन की साम्य स्थिति के बाद ईश्वर की जानकारी ही शेष बची रहती है, जिसका नाम ज्ञान है। ‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ (गीता, ४/३८)- ज्ञान के समान पवित्र करनेवाला इस संसार में निःसन्देह कुछ भी नहीं है। ‘तत्स्वयं’- उस ज्ञान को तू स्वयं ‘योगसंसिद्धः कालेन’- योग की सिद्धि के समय (आरम्भ में नहीं, मध्य में नहीं, परिपक्व अवस्थाकाल में) ‘आत्मनि विन्दति’- अपनी अन्तरात्मा में ही देखेगा, अनुभव करेगा। ज्ञान अनुभव की वस्तु है, पढ़ने की नहीं। इसी ज्ञान को योगेश्वर अग्नि कहते हैं, जिसमें समस्त कर्म, कर्म-संस्कार और कर्मकाण्ड भी जल जाते हैं।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।। (गीता, ४/१९)
‘यस्य सर्वे समारम्भाः’- जिस पुरुष के द्वारा दैवी सम्पद् का अर्जन इत्यादि सम्पूर्णता से आरम्भ की हुई क्रिया इतनी उन्नत हो गयी कि ‘कामसंकल्पवर्जिताः’- कामना और मन के संकल्प-विकल्प से ऊपर उठ गई (कामना और संकल्प का निरोध होना मन की विजेतावस्था है)। कामना और संकल्प से जहाँ पुरुष ऊपर उठ जाता है, तहाँ ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्’- जिसे जानने के लिये हम इच्छुक थे, वह तत्त्व विदित हो जाता है, उसकी प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है। उस ज्ञानाग्नि में सभी कर्म जल जाते हैं। ऐसी स्थितिवालों को बोधस्वरूप महापुरुषों ने ‘पण्डित’ कहकर सम्बोधित किया है।
इस प्रकार आपके वेद, जिनकी ऋचाएँ आप कर्मकाण्ड में पढ़ते हैं और उपनिषदों का सारांश गीताशास्त्र के अनुसार बाहर अग्नि जलाकर यज्ञ करने का विधान कहीं नहीं मिलता। फिर अग्नि में हवन कैसा और क्यों?
गीता के अनुसार सृष्टि में जो जीव धारण करनेवाला प्राणी है, भूत है। ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ (गीता, १८/६१)- वह ईश्वर सम्पूर्ण भूतों (प्राणियों) के हृदय-देश में निवास करता है। संसार के ये समस्त भूत जिससे उत्पन्न होते हैं उसका नाम पंचमहाभूत है- क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर। इनमें मन, बुद्धि और अहंकार मिलकर अष्टधा मूल प्रकृति कहलाती है। यदि हम इनमें से किसी की पूजा करते हैं तो भूत की ही पूजा करते हैं।
इन पंच महाभूतों से ही संसार की वस्तुओं का, शरीर का सृजन होता है और अन्त में अस्तित्वविहीन सभी भूत इन्हीं पंच महाभूतों में विलीन हो जाते हैं- अग्नि जलाकर अपने में आत्मसात् कर लेती है, पृथ्वी अपने में मिला लेती है, जल अपने में प्रवाहित कर लेता है, आकाश अपने में समाहित कर लेता है। ये अग्नि इत्यादि तो मुँह खोलकर खड़े ही हैं- सब कुछ अपने में आत्मसात् करने के लिये, इनमें आहुति देकर आप किसको तृप्त कर रहे हैं? यह भी एक रूढ़ि की पुनरावृत्ति मात्र है। आप उस एक परमात्मा को जानने का प्रयास करें, जिसकी शक्ति के बिना आग एक तिनके को भी नहीं जला सकती। अभी तक जड़-चेतन कलेवरों का नाम लेकर, कल्पित देवी-देवताओं का नाम लेकर हम स्वाहा समर्पण बोलते थे, अब उनके स्थान पर हमलोग एक ईश्वर के परिचायक नाम का सुमिरन कर उसी अग्नि में हवन करें- यह भी एक भूल है; क्योंकि उन नश्वर पंचमहाभूतों में ही पूजन करते हैं।
प्रत्येक पूजन के आरम्भ में ‘श्री गणेशाय नमः’ कहने की परम्परा है। कहते हैं कि गणेश का काम ही है प्रत्येक कार्य में विघ्न करना। उनकी पूजा कर दें, तो वे ही आपके लिये विघ्ननाशक बन जाएँगे।
यह भी दान लेने की योजना मात्र है। जिस नाम के जप से गणेश सर्वश्रेष्ठ माने गये, उस नाम-जप में कोई समय नहीं देता, केवल गणेशाय नमः कहकर हाथ जोड़ देने से क्या मिलेगा? ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’ (गीता, १०/२५)- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ जपयज्ञ है उसमें मैं ही स्थित हूँ, तो हम सबको उस परम पुरुष के परिचायक नाम ॐ अथवा राम का जप करना चाहिए। विभिन्न पर्वों और उत्सवों पर भी उसी ईश्वर के नाम का जप करना चाहिए, जिससे मनुष्य विविध आकांक्षाओं की पूर्ति का साधन-स्रोत तथा परमश्रेय पा सके, पहचान सके।
कहते हैं कि अग्नि में हवन करने से वृष्टि होती है- यह भी युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि सबसे अधिक यज्ञ राजस्थान की धर्मप्राण जनता करती है- चाहे धर्म के लिये युद्ध में प्राणों का होम करना हो, चाहे अग्नि में हवन- किन्तु वर्षा के आँकड़ों में परिवर्तन नहीं हो सका। राजस्थान रेगिस्तान है, जबकि भारत में ही एक स्थान चेरापूँजी है तथा हवाई द्वीप के वायअले अले नामक पर्वत प्रदेश में, जहाँ यज्ञ के लिये कभी सोचा भी नहीं जाता, विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती ही रहती है। वस्तुतः ये सभी यज्ञ जिन-जिन अग्नियों में और जिस-जिस प्रकार होते हैं, वे सभी मानसिक हैं, चिन्तन की विधि-विशेष हैं। ज्यों-ज्यों आप इस मानसिक यज्ञ में प्रवेश पायेंगे, ईश्वरीय विभूतियों की वृष्टि होगी और आप शनैः-शनैः ब्रह्मपीयूष से आप्लावित होकर तृप्त हो जायेंगे। वह अन्न पा जायेंगे जिससे हमेशा के लिये क्षुधा-निवृत्ति हो जायेगी। ऐसे महापुरुषों की इच्छाशक्ति से कोई भी रूप बन सकता है- कहीं पानी भी बरस सकता है; किन्तु बाहरी यज्ञ और अग्नि को योगेश्वर नहीं बताते, तो बाह्य वृष्टि कैसे सम्भव है? फिर भी हम अगरबत्ती जलाते हैं, दसांग का हवन करते हैं, धूप-दीप जलाते हैं क्यों? किसलिये? केवल वायुमण्डल शुद्ध करने के लिये, विषाक्त कीटाणुओं का नाश करने के लिये। प्राचीनकालीन यज्ञ में हवन का प्रचलन वायुमण्डल के शुद्धीकरण का अभियान मात्र था, जिसको एक आध्यात्मिक रूपक भी दिया गया कि, जिस प्रकार अग्नि सभी वस्तुओं को अपना स्वरूप प्रदान करती है, उसी प्रकार परमात्मा हमें अपना रूप दे दे, आत्मसात् कर ले।
वर्तमान वैज्ञानिक युग में कीटाणुओं का नाश करने के लिये कम खर्च में रसायनों का प्रयोग होने लगा है, अतः हवन का औचित्य नहीं रह जाता। कीटाणुनाशक दवाएँ भी अधिक मात्रा में होने पर प्रतिकूल परिणाम प्रदान करती हैं। इसी प्रकार कोई भी वस्तु अधिक मात्रा में जलकर, जैसा कि आधुनिक शोध है, आक्सीजन को कम कर कार्बन-डाई-आक्साइड को बढ़ावा देती है, जो मनुष्य के अनुकूल नहीं है। केवल सीमित क्षेत्र में गृहशुद्धि या वायुशुद्धि का सौम्य नुस्खा है हवन। मात्र इतने के लिए पाँच-सात बार गुगुल-घृत-शक्कर इत्यादि की आहुति दी जा सकती है, देनी भी चाहिये, वह भी मोक्ष के लिए नहीं। भौतिक सुख तथा मोक्ष के लिए वही अग्नि चाहिए, जिस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण बल देते हैं। परमश्रेय उसी में है। उस संयमाग्नि में, योगाग्नि में, प्राण-अपान की अग्नि में, श्वास-प्रश्वास की अग्नि में संस्कारों का हवन करने के लिए जप-यज्ञ ही करना चाहिए, जिसमें सभी यज्ञ प्रतिष्ठित हैं।
यदि कोई पुरोहित इतना करता है अर्थात् एक परमात्मा के परिचायक मन्त्रों का बोध कराता है कि परमात्मा के शोध की स्थली आपका अपना हृदय-देश ही है, उसी परमात्मा के नाम से अग्नि में पाँच-सात बार हवन कर सीधे उसी मंगल की याचना करता है फिर पन्द्रह-पचीस मिनट उसी परमात्मा के दो-ढाई अक्षर के नाम का मानसिक जप का अभ्यास कराता है और प्रतिदिन नियमित रूप से सुबह-शाम उस नाम को एकान्त में जपने के लिए प्रोत्साहित करता है, तो ऐसा सिखानेवाला पुरोहित श्रद्धा का पात्र है; क्योंकि उसने एक परमात्मा की अमिट छाप छोड़ी है, सत्य के प्रति उसने हमारी आँखें खोल दी, पूर्वजों से सम्पादित कर्मकाण्ड को सही उतारा है और इस अमूल्य मानव-तन को नष्ट होने से बचा लिया। ऐसे पुरोहित कल्याण के बीजारोपणकर्त्ता बनेंगे और संसार भर में इस विधि-विधान के प्रति कोई उँगली भी नहीं उठा सकेगा।
घर-घर, कोने-कोने, झोपड़ी-झोपड़ी में प्रवेश करनेवाला पुरोहित एक शिक्षक है। अव्यक्त के, शाश्वत के इन शिक्षकों का आदर करना चाहिये। इस पाठशाला को तोड़ना नहीं है, इसे कायम रखना है। इस कल्याण-पथ में जो कुछ त्रुटियाँ आ गयी हैं, अवरोध आ गये हैं, उन्हें हटाना है। इसी से हम अपनी पूर्व प्रतिष्ठा को फिर से अर्जित कर सकते हैं। एशिया, यूरोप और नयी दुनिया के नाम से विख्यात अमेरिका तक में प्राचीन भारतीय संस्कृति के अवशेष प्राप्त हो रहे हैं। पारसी, यहूदी, ईसाई और इस्लाम विचारधाराओं का उत्स भारतीय मनीषा ही है। जब तक शाश्वत का यह शिक्षक सही था, भारत विश्वगुरु कहलाया, भारतीय संस्कृति सर्वत्र फैली और जब भ्रान्ति आयी तो यह सिमटकर रह गयी।
यह नहीं सोचना चाहिए कि इस सुधार से पुरोहितों की वृत्ति या उनकी जीविका में कोई व्यवधान आयेगा। इस प्रस्तावित सुधार से तो उनकी बुनियाद और सुदृढ़ हो जायेगी अन्यथा पहले से रूढ़िजर्जर हिन्दू-समाज से उपेक्षित लोग उनकी ओर आकर्षित होते जायेंगे जो उन्हें सही बताकर गले लगाते जा रहे हैं। फिर तो आप मुट्ठी भर ही बचेंगे। किससे करायेंगे कर्मकाण्ड? किसे सिखायेंगे?
अतः पूर्वाग्रह और लकीर पीटने की जड़ता को छोड़कर पुनः वैसा ही, जैसा कि वेद के पुरुषसूक्त इत्यादि पाठों का संदेश है, उसको ज्यों-का-त्यों प्रदान करें, तो निश्चय ही आप अपनी ख्याति पा जायेंगे। जो आपसे घृणा करते हैं, आदर और श्रद्धा से भर जायेंगे। जो आपको छोड़ गये हैं, लौट आयेंगे। यही पुरोहित परम श्रद्धा का पात्र होगा। किन्तु एक बात ध्यान में रखें कि जिनका ज्ञानाग्नि में सम्पूर्ण कर्म जल गया हो, जो पूर्ण ज्ञाता हों, ऐसे किसी महापुरुष से परामर्श लेना न भूलें; क्योंकि शिक्षकों का भी तो कोई प्रशिक्षण स्थल होना चाहिये और वह स्थल यही महापुरुष हैं। यह प्रश्न अलग है कि महापुरुष है कौन? महत्ता देखकर सर्वत्र गुरुओं की होड़ लगी है। पहचान कठिन तो है फिर भी ऐसे महापुरुषों का कभी अभाव नहीं होता। उनसे परामर्श लेते रहें तो भूल की संभावना नहीं रहेगी। यदि बहुमत से या केवल डिग्रीधारियों की गोष्ठी या संस्था बनाकर निर्णय लेते रहेंगे, तो ‘अन्धे अन्धन्ह ठेलिया, दोउ कूप परन्त।’ अतः अपने वंश को, अनुयायियों को, विश्वभर के मानव मात्र को आप अपना संदेश- एक परमात्मा का संदेश दें।
विशेष
कर्मकाण्ड में सर्वतोभद्र इत्यादि बहुत से चक्र बनाने की प्रथा भी है। सर्वतोभद्र का अर्थ है सर्वत्र सुख, सर्वत्र सफलता, दशों दिशाओं में कल्याण। इसमें भिन्न-भिन्न देवताओं की पहचान के लिये नीले, पीले, काले इत्यादि रंगों में चावल रंगकर अलग-अलग खानों में देवताओं का आवाहन कर उनसे कल्याण की याचना की जाती है। जो स्वयं काल से आबद्ध है, अपना कलेवर बदलकर चला जानेवाला है, वह आपको कैसे रख लेगा? स्वयं अधूरा आपको पूरा कैसे करेगा? फिर वही भूल यहाँ भी दुहराई जा रही है कि देवताओं और वस्तुओं से हम सुख की कामना करने लगते हैं।
अच्छा तो यह होगा कि कर्मकाण्ड की उपर्युक्त सरल विधि को जटिल और खर्चीला न बनाया जाय। मनोवैज्ञानिक प्रभाव के लिए एकाध चक्र बनायें, तब भी रंग देवताओं का नहीं, सफलताओं का प्रतीक होना चाहिये, जैसे- हरा रंग जीवन का, पीला रंग समृद्धि का, श्वेत रंग बुद्धि का इत्यादि। बल, बुद्धि, आयु अथवा यश की प्रार्थना सीधे परमात्मा से करें, किसी देवता से नहीं। ‘सर्वसमृद्धिप्रदे परमात्मने नमः, आयुवर्धकाय परमात्मने नमः।’*- इन आशयों से परमात्मा की स्तुति करें, तभी वास्तविक सर्वतोभद्र सम्भव है। एक परमात्मा में निष्ठा सुशान्ति और समृद्धि का मूल है। हम दरिद्र हैं तो इसका कारण यही है कि हम एक परमात्मा को नहीं मानते। हमारी श्रद्धा अनेक देवी-देवताओं में बिखरी है। यही हमारे-आपके दुःख-दैन्य का कारण है और यही फूट का भी कारण है। इससे बचें और एक परमात्मा में श्रद्धा को केन्द्रित कर कल्याण के भागी बनें।
।। ॐ ।।
* ये नाम हरि के गुणानुवाद मात्र हैं। ‘जब बोले तो हरि गुन गावै, मौन रहे तो नाम जपावै।’ कर्मकाण्ड का उद्देश्य केवल इतना ही है कि प्रत्येक कर्म में प्रभु का स्मरण होता रहे। वस्तुतः वह स्वयं में अनाम है। स्तुति से श्रद्धा जागृत होती है, अस्तु सर्वतोभद्रादि चक्रों के लिए आर्षग्रन्थों से कुछ नामों का चयन किया जा सकता है, जैसे- सहस्रशीर्ष्ण नमः (वेद), योगेश्वराय नमः, क्षेत्रज्ञाय नमः (गीता), णमो सर्वसिद्धानाम्, आत्मने नमः (जैनग्रन्थ), सर्वज्ञाय नमः, अविनाशिने नमः (बौद्धग्रन्थ), एक ओंकाराय नमः, अकाल पुरुषाय नमः (ग्रन्थसाहिब से), अनुभवगम्याय नमः, स्वान्तःस्थमीश्वराय नमः, प्रणत प्रतिपालकाय नमः, नरतनधारकाय नमः (रामचरितमानस से) इत्यादि।
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(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)