हनुमान एवं हनुमान-चालिसा

प्रश्न-  भगवन्! हनुमान के विषय में कुछ बतायें। उनका धर्म में क्या स्थान है?

उत्तर- वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस इत्यादि ग्रन्थों में महावीर हनुमान का विशद चरित्र उपलब्ध है। उनका जन्म त्रेतायुग में हुआ था। वह केशरी नामक वानर जातीय नरेश के पुत्र थे। भगवान शंकर के आशीर्वाद और पवनदेव के सहयोग से उनका जन्म हुआ था। उनकी माँ का नाम अंजनी था। बाल्यकाल से ही वह भगवान शिव के कृपापात्र थे। प्रकारान्तर से वह शिव के ही अंश थे। पूर्वजन्म से उनकी साधना शिवतत्त्व तक थी। वह आजीवन अखण्ड ब्रह्मचारी और भगवान के अंतरंग सेवक थे। जो भी उनके सान्निध्य में आया उसे उन्होंने भगवान राम की सेवा में लगा दिया।

किष्किन्धा नरेश बालि के अनुज सुग्रीव के वह प्रधान सचिव थे। बालि ने उन्हें अपने राज्य से निष्कासित कर दिया था। सुग्रीव मारे-मारे फिर रहे थे। हनुमान ने उन्हें पुन: किष्किन्धा का राज्य दिलाया।

लंका में रावण के अनुज विभीषण की भी यही दशा थी। हनुमान से उन्होंने कहा कि वह लंका में वैसा ही जीवनयापन कर रहे हैं जैसे दाँतों के मध्य जिह्वा रहती है। क्या मेरे जैसे अधम पर भी भगवान कृपा करेंगे? हनुमान ने उन्हें प्रोत्साहन दिया–

कहहु कवन मैं परम कुलीना।

कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।

प्रात लेइ जो नाम हमारा।

तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।

अस मैं अधम सखा सुनु, मोहू पर रघुबीर।

कीन्ही कृपा सुमिरि गुन, भरे बिलोचन नीर।।

(रामचरितमानस, ५/७)

हनुमान बोले– विभीषण जी! मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ। मैं कपि हूँ, चंचल हूँ और हर प्रकार से हीन हूँ। प्रात: कोई हमारा नाम ले ले तो उसे दिनभर भोजन नसीब नहीं होगा। मैं इतना अधम हूँ फिर भी प्रभु ने मेरे ऊपर कृपा की है। आप तो राजकुल के हैं। चलें राम की शरण! उन्हें राम की शरण में भेज दिया, लंकेश बना दिया। लंकाधिराज रावण को भगवान के धाम भेज दिया। उनका सम्पूर्ण जीवन परमात्मा राम के प्रति समर्पण है। जो भी हनुमान की शरण में आया, उन्होंने उसे मुक्ति नहीं दी अपितु राम जी के चरणों में लगा दिया।

बड़भागी अंगद हनुमाना।

चरण कमल चापत बिधि नाना।।

(रामचरितमानस, ६/१०/७)

अंगद ने हनुमान का अनुसरण किया तो उन्होंने भी भगवान के चरण-कमलों की सेवा प्राप्त कर ली। मानस जिनके हृदय की उपज है उन भगवान शंकर का निर्णय है–

हनूमान सम नहिं बड़भागी।

नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।।

(रामचरितमानस, ७/४९/८)

उन प्रभु के चरणों में अनुराग के कारण ही हनुमान भाग्यशाली कहे गये।

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।

अपने बस करि राखे रामू।।

(रामचरितमानस, १/२५/६)

पावन राम नाम का स्मरण करके भगवान् श्रीराम को भी अपने वश में कर लिया।

सुनहु उमा ते लोग अभागी।

हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।।

वे लोग अभागे हैं जो एक परमात्मा को छोड़कर विषयों में अनुरक्त होते हैं। हनुमान ज्ञानिनामग्रगण्यं– ज्ञानियों में अग्रगण्य थे।

हनुमान बन्दर थे। बन्दर मनुष्यों की प्रजाति थी न कि पशु! प्राचीन जातियों में पशु-पक्षियों के चिह्न राष्ट्रीय ध्वजों पर अंकित रहते थे। उदाहरण के लिए नाग क्षत्रियों की एक प्रजाति थी। नागकन्या से अर्जुन का विवाह हुआ था। ऋक्षराज जाम्बवान की कन्या से श्रीकृष्ण का विवाह हुआ था। समुद्रगुप्त ने नौ नागवंशीय राजाओं को परास्त किया था। इन राजाओं के मुकुट पर नाग अंकित रहता था। अस्तु नाग, मण्डूक, हैहय, गज, वानर, ऋक्ष इत्यादि प्राचीन भारत की मानव प्रजातियाँ थीं। इसी क्रम में हनुमान भी आपके सम्मानित पूर्वज थे।

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प्रश्न- हनुमान चालीसा क्या है?

उत्तर- चालीसा चालीस चौपाइयों की काव्य-प्रस्तुति है जो किसी की प्रशंसा में कही जाती है। किसी महापुरुष की वन्दना साठ पंक्तियों में होने से उसे साठा या साठिका कहते हैं। किसी प्रकरण को सौ पदों में कहने से उसे शतक कहा जाता है। हनुमान चालीसा हनुमान जी की जीवनी है, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का विवरण है कि उनका जन्म किससे हुआ, किस प्रकार उन्होंने सबको राम की शरण में भेज दिया, दीन-दु:खी व्यक्तियों को सुख और दुष्टों का अन्त किया। उनके ओज और भक्तिपूर्ण गौरवगाथा के इस गायन से हम सबमें शौर्य, पराक्रम और भगवद्भक्ति की लहर दौड़ जाती है। संतों के चरित्र से ही भक्ति का उदय होता है।

जो महापुरुष भगवान के स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं वह सूक्ष्म शरीर से सृष्टि में सदैव विराजमान रहते हैं। श्रद्धा से जो भी उनका स्मरण करता है वे आज भी उनका मार्गदर्शन करते हैं। इसीलिए शिव आज भी हैं, लीला-संवरण के पश्चात् गुरु महाराज (श्री परमहंस जी) आज भी हैं। उनका आशीर्वाद भली प्रकार मिलता है। वह आपको वर्तमान में जो महापुरुष हैं उनके पास पहुँचा देंगे, जिससे आपका भी पथ प्रशस्त होगा। उन महापुरुष का यशोगान है हनुमान चालीसा!

कालक्रम से चालीसा पाठों की परम्परा-सी बन गयी है। दुर्गा चालीसा, शिव चालीसा, गणेश चालीसा, नेता चालीसा तक लोग लिखते ही जा रहे हैं। चालीस चौपाई और उसके आरम्भ और अन्त में दो दोहा लिख दें, चालीसा बन गया। इन सभी चालीसाओं में हनुमान चालीसा सबसे प्राचीन कहा जाता है, हनुमान जी की तपस्या है, एक सन्त का गुणानुवाद है। इससे प्रभु में श्रद्धा जागृत होती है, सन्त-सेवा में मन लगता है और जब मन लग जाय तो भजन एक परमात्मा का, जो हनुमान ने किया, जिसकी समग्र विधि क्रमबद्ध रूप से ‘यथार्थ गीता’ में उल्लिखित है।

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(‘नवयुवकों की जिज्ञासाऍं एवं भजन से लाभ’ से उद्धृत)

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