प्रश्न- क्या मंत्रजप सम्पूर्ण दु:खों के निवारण का सफल तरीका है?
उत्तर- दुनिया में सभी दु:खों से बचने का ही प्रयास कर रहे हैं किन्तु दु:ख बढ़ता ही जाता है (राजा दुखिया, परजा दुखिया…..।)। दु:खों का निवारण मात्र परमात्मा की प्राप्ति से है जिसकी साधना मंत्रजप से आरम्भ होती है। भगवत्पथ के चार क्रमोन्नत सोपान नाम, रूप, लीला और धाम हैं। आप जब नाम जपना आरम्भ करेंगे तब रूप का क्रमोन्नत स्तर मिल जायेगा– ‘सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।।’ (रामचरितमानस, १/२०/६)– विशेष स्नेह की डोर लग जायेगी तो हृदय में स्वरूप आ जायेगा, उसी का ध्यान करना है। जहाँ रूप पकड़ने की क्षमता आयी तहाँ लीला समझ में आने लगेगी कि भगवान कण-कण में कैसे व्याप्त हैं, कैसे ज्योतिर्मय हैं, कैसे योगक्षेम करते हैं, कैसे मनुष्यों की आपूर्ति करते हैं! इस प्रकार उनकी विभूतियों का प्रसारण होने लगता है। उस निर्देशन में चलते हुए जहाँ लीलाधारी का स्पर्श हुआ, जहाँ बैठकर वह संचालन कर रहे हैं, तहाँ धाम अर्थात् स्थिति प्राप्त कर भगवद्दर्शन और प्रवेश मिल जाता है। साधना के ये चारों क्रमोन्नत सोपान हैं जिनमें मंत्र-जप का सर्वप्रथम स्थान है। क्रमश: स्तर उठता जायेगा, दु:ख पीछे छूटते जायेंगे, सहज सुखराशि प्रभु हैं उनमें स्थान मिलता जायेगा। दुनिया ‘दु:खालयमशाश्वतम्’ (गीता, ८/१५)- दु:खों का घर है। कभी यह तो कभी वह सुखद प्रतीत होता है। वाह्य अन्य तरीकों से यह कमी कभी पूर्ण नहीं होगी।
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