शिक्षा और विद्या

शिक्षा और विद्या

प्रश्नमहाराजजी! आजकल बहुत से पढ़ेलिखे बेकार भटक रहे हैं, उनको नौकरी नहीं मिलती। लगता है कि विद्या अनावश्यक है। विद्यालयों में बच्चों का समय अकारण क्यों नष्ट किया जाय?

उत्तरदेखिए, शिक्षा का अर्थ नौकरी नहीं होता। आप जब एम0ए0 अथवा किसी क्षेत्र में ‘रिसर्च’ तक पहुँच गये तब देश को आपके जीवन की चिन्ता नहीं होनी चाहिए, इसलिए कि आप अब सक्षम हैं, अपनी जीविका का स्रोत स्वयं ढूँढ निकालेंगे। इसी का नाम तो शिक्षा है। पूर्ण शिक्षित होने के बाद भी यदि आप किसी की आशा करते हैं तो आपके पास शिक्षा कहाँ है। आप कोई व्यवसाय, कोई हुनर तुरन्त शोध निकालेंगे, ऐसी कला जिससे मनुष्य को ठेस न पहुँचे। यह नहीं कि डाका डालने लगे, नहीं तो चन्द दिनों में ही मारे जायेंगे। आजकल ऐसी उलटी खोपड़ीवालों की औसत आयु बीस से तीस वर्ष तक ही होती है; क्योंकि अठारह वर्ष के बाद ही उनका सिर घूमता है। पहले दो-चार वर्ष तो लड़कपन में बीतते हैं कि चलो लड़का है, भूल हो गयी फिर पचीस वर्ष तक आते-आते लोग सोचेंगे ‘सीरियस’ है, खतरनाक है, फिर तो वह अकेला छिपनेवाला और हजारों उसका पीछा करेंगे; कब तक बचेगा? अतः यह मानवता नहीं है।

अब यदि आप इधर देखें तो ये भेड़ चरानेवाले गड़ेरिये, इनके पास कोई शिक्षा नहीं है, लेकिन ये सुखी हैं। खाते-पीते परिवार आज के बुद्धिजीवियों से अधिक सुखी हैं; क्योंकि इनकी चिन्ताएँ, आवश्यकताएँ कम हैं। दण्ड-बैठक लगाया, भेड़ चराया, दूध पीया, जो मिला पेटभर खाया। केवल मटर मिला तो उसी की रोटी बनी। न इन्हें कभी अजीर्ण होता है न अरुचि होती है। साठ वर्ष की आयु हो गयी लेकिन इन्हें कभी भी वैद्य की आवश्यकता नहीं पड़ी। अभी कुछ दिनों पहले इन्होंने आश्रम के बगल में भेड़ रखा था। रातभर मूसलाधार वर्षा होती रही। सवेरे हमने इनसे पूछा कि रात तो तुमलोगों को बड़ा कष्ट रहा, रातभर पानी में भींगते रहे, तो वे बोले, ‘‘नहीं, महाराज! लोमड़ के जाड़ा और अहीर, गड़ेरिया के वर्षा हितात है। हम लोगों को कोई कष्ट नहीं रहा। रात को कपड़े भींग जाते हैं तो सुबह सुखा लेते हैं। दिन भर के भींगे वस्त्र शाम को सुखा लेते हैं। रातवाले कपड़े सुबह पहन लेते हैं। इसी क्रम से चलता रहता है।’’ हमने पूछा- ‘‘क्या कपड़े सूख जाते हैं?’’ वे बोले, ‘‘पानी चूना बन्द हो गया, बाकी शरीर पर सूखते रहेंगे।’’ न उनको शीत होती है, न गर्मी। यहाँ कोई भींगे वस्त्र पहनकर रहे या दो घण्टे भींग ले तो बीमार पड़ जाय, दवा खानी पड़ेगी लेकिन इनके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। इनमें प्रकृति को सहन करने की क्षमता है। हमने पूछा- तुम्हें कोई चिन्ता तो नहीं है? तो बोला- नहीं महाराज! कोई चिन्ता नहीं। हमने पूछा- कोई दुःख? तो सोचते-सोचते बहुत देर के बाद उनमें से एक बोला- हमको तो कोई दुःख समझ में नहीं आता महाराज! यही जब सबेरे आँख खुलती है तो सोचते हैं कि भेड़ इधर हाँके या उधर और जब भेड़ चल पड़ीं तब फिर चौबीस घण्टों के लिए कोई चिन्ता नहीं। हमने कहा- तुम्हें अपने स्त्री-बच्चों की चिन्ता नहीं सताती। मान लो, कोई बीमार पड़ जाय तो? वह बोला- घर में जो सयान होगा, देखेगा। अब हम भेड़ौं चराई और घरौं देखीं? बोलिये! कितने स्वस्थ हैं ये लोग, शरीर और मस्तिष्क से। कोई चिन्ता नहीं, कोई दुःख नहीं। इतने के लिए ही तो दुनिया तरसती है। इधर बुद्धिजीवी दिन-रात घुलता रहता है कि हमारी इज्जत, हमारी मर्यादा, हमारा ‘स्टैण्डर्ड’; इसे कैसे बनाये रखें?

अब देखा जाय तो प्रकृति-पुत्र गड़ेरिये इत्यादि अधिक स्वस्थ, चिन्ताविहीन और सुखी दिखाई देते हैं, हैं भी; लेकिन नहीं, ऐसे रहने से दुनिया जीने नहीं देगी। अशान्त प्रकृतिवाले शान्तिप्रिय लोगों को जीने नहीं देते। चीन ने तिब्बत को हड़प लिया। भारत में भी शस्त्रविद्या किसी समय बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। भारत सम्पूर्ण विद्याओं में निपुण था किन्तु महाभारत के पश्चात् शस्त्र-विद्या में न्यूनता आ गयी। स्वाभाविक रूप से जो शस्त्र उपलब्ध थे उसी से लोग काम चलाने लगे। जब बाबर इत्यादि की लड़ाई हुई तो बाबर के पास तोपखाना था, जो भारतीयों के पास नहीं था। इधर केवल भाला और तलवार चलानेवालों की भीड़ थी। इसलिए राजपूतों को हारना पड़ा। यह तोपखाना भी भौतिक शिक्षा की ही देन है। इससे भी उन्नत शिक्षा अंग्रेजों के पास थी। जिसके बल पर उन लोगों ने एक बार तो सम्पूर्ण विश्व पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया। गड़ेरिए की तरह शान्त-प्रकृतिजीवियों को उन्होंने जीने नहीं दिया, जैसा अंग्रेजों ने आस्ट्रेलिया में किया। या तो उन्हें प्रकृतिप्रिय पशुओं की तरह गुलाम बनाकर अन्य देशों को सप्लाई कर बेच दिया अथवा अपने फार्मों पर उनसे बेगार कराया। यह मात्र शिक्षाहीनता का कुपरिणाम था। संसार में यदि हमें कुशलतापूर्वक जीना है तो शिक्षा अपरिहार्य है। इतना ही नहीं, अपितु शिक्षा के अभाव में हम अपनी अध्यात्म विद्या को सँजोकर रख नहीं सकेंगे। कोई आचार्य-पद्धति से कुछ भी सुझाव देगा, हम शिक्षा के अभाव में उसे स्वीकार कर लेंगे। इसीलिए आज पीने से, खाने से, नदी-नाला पार करने से सनातन-धर्म नष्ट होने लगा है, जो एक भ्रम है। इस प्रकार धर्म की जानकारी को सँजोकर रखने के लिए भी शिक्षा परम आवश्यक है।

शिक्षा से लाभ चाहे जितना हो किन्तु वह विद्या नहीं है। विद्या कुछ और ही है। आजकल भ्रमवश भौतिक जानकारी को विद्या और उसके जानकार को विद्वान् कहा जाता है किन्तु वस्तुतः विद्या और शिक्षा में महान् अन्तर है। दुनिया में जीवन की दो धारायें हैं- एक तो जीवनयापन और दूसरी परमतत्त्व परमात्मा की प्राप्ति। कुशलतापूर्वक जीवनयापन के लिए शिक्षा आवश्यक है; किन्तु यह आत्मा जिसका अंश है उस परमात्मा तक पहुँचानेवाली तथा उस अमृततत्त्व को प्राप्त करा देनेवाली युक्ति-विशेष का नाम विद्या है। आजकल के विद्यालयों, विश्वविद्यालयों में दी जानेवाली शिक्षा वह विद्या नहीं है।

मुण्डकोपनिषद् (प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड) में कथा आती है कि शौनक नामक एक प्रसिद्ध मुनि थे, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता थे। पुराणों के अनुसार उनके ऋषिकुल में अट्ठासी हजार ऋषि पढ़ते थे; किन्तु वास्तविक विद्या का ज्ञान उन्हें भी नहीं था। अतः एक बार वे उस समय की परम्परा के अनुसार हाथ में समिधा लेकर महर्षि अंगिरा की शरण में गये। विनयपूर्वक पूछा-

कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति?।।3।।

भगवन्! किसके जान लेने पर यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है? कृपया बताइए, उसे कैसे जाना जाय?

महर्षि अंगिरा ने बताया-

द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च।।4।।

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते।।5।।

विद्याएँ दो प्रकार की हैं। इन दोनों में से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष इत्यादि अपरा विद्या के अन्तर्गत आते हैं किन्तु जिस विद्या से वह अविनाशी परमात्मा जाना जाता है वह परा विद्या है। अंगिरा की मान्यता है कि वेद, व्याकरण, ज्योतिष कोई चाहे जितना पढ़ ले, इतना पढ़े कि रट ले; फिर भी अविनाशी परमात्मा को नहीं जान सकता। जिस विद्या से परमात्मा का साक्षात्कार होता है वह विद्या ही दूसरी है। उस विद्या के लिए अंगिरा की सलाह है-

 तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्। (मुण्डक 1, खण्ड 2/12)

उस परब्रह्म की प्राप्ति करा देनेवाली विद्या के लिए हाथ में समिधा लेकर, वेद को भलीभाँति जाननेवाले ब्रह्म में स्थित सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए, इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।

इसी से मिलता-जुलता आख्यान छान्दोग्य उपनिषद् (प्रथम अध्याय/प्रथम खण्ड) में मिलता है। एक बार नारदजी ने सनत्कुमार से उपदेश करने की प्रार्थना की। सनत्कुमार ने उनसे कहा, ‘‘तुम जो कुछ जानते हो उसे बताओ तो मैं तुम्हें उससे आगे बताऊँ?’’ नारद ने बताया कि भगवन्! मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद जानता हूँ। मैंने इतिहास-पुराण भी पढ़ा है जिसे पाँचवाँ वेद कहा जाता है। वेदों के वेद व्याकरण, श्राद्ध, कल्प, गणित, उत्पात ज्ञान, निधि शास्त्र, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या (निरुक्त), ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्र विद्या, सर्पविद्या, देवजनविद्या, नृत्य तथा संगीत इत्यादि का भी मैंने अच्छी तरह अध्ययन कर लिया है। भगवन्! यह सब जानकर भी मैं केवल मन्त्रों का जाननेवाला ही हूँ। आत्मा को नहीं जान सका। मैंने आप-जैसों से सुना है कि आत्मवेत्ता शोक को पार कर जाता है किन्तु मैं तो शोक करता हूँ। अतः भगवन्! मुझे शोक से पार कर दीजिए। सनत्कुमार ने उपर्युक्त शिक्षा को वाणी का विलास मात्र माना और इससे आगे क्रियात्मक उपासना पर जोर दिया।

बृहदारण्यक उपनिषद् (चौथे अध्याय, चौथे ब्राह्मण की 21वीं ऋचा) में भी निर्देश है कि बहुत से शब्दों का अध्ययन न करें; क्योंकि वह तो वाणी का श्रममात्र है। वाणी के श्रम से वह ब्रह्म मिल ही नहीं सकता। तैत्तिरीयोपनिषद् की श्रुति है-यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। (ब्रह्मानन्दवल्ली, नवम अनुवाक्)।

मनसमेत वाणी इत्यादि इन्द्रियाँ जिसे न पाकर लौट आती हैं- मन समेत जेंहि जान न बानी। (मानस, 1/340/7)

पुस्तकीय ज्ञान को तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली/2) में शिक्षा की संज्ञा दी गई है-

शिक्षां व्याख्यास्यामः। वर्णः स्वरः। मात्रा बलम्।

साम सन्तानः। इत्युक्तः शिक्षाध्यायः।।1।।

आचार्य कहते हैं कि अब हम शिक्षा का वर्णन करेंगे। जिसमें वर्ण, स्वर, ह्रस्व-दीर्घादि मात्राएँ, वर्णों के उच्चारण में लगाए गये बल, उनकी गेयता एवं सन्धि इत्यादि के नियमों की शिक्षा दी जायगी। तत्पश्चात् लौकिक विद्या, नक्षत्र विद्या, प्रजनन विद्या, आयुर्वेद, धनुर्वेद, व्यायाम आदि शारीरिक संहिताओं का वर्णन, किन्तु साथ ही अधिविद्यम्’- विद्या के विषय में भी जानकारी दी गयी है।

उल्लेखनीय है कि तैत्तिरीय उपनिषद् के तीन भाग हैं- शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली। शिक्षावल्ली में दी गयी शिक्षा के अनुसार अपना जीवन बना लेनेवाला मनुष्य इस लोक और परलोक के सर्वोत्तम भोगों को पा सकता है तथा ब्रह्मविद्या ग्रहण करने योग्य बनता है। इस वल्ली में विद्वान् मनीषी ने शिक्षा द्वारा लौकिक एवं पारलौकिक ऐश्वर्य की प्राप्ति का शास्त्रानुमोदित मार्ग तो बताया किन्तु इन भोगों को नश्वर बताते हुए उनकी मुख्य दृष्टि ब्रह्मविद्या पर ही है। द्वितीय वल्ली में उन्होंने ब्रह्मानन्द की महत्ता पर प्रकाश डाला और अन्तिम भाग में उन्होंने उस क्रियात्मक विद्या का वर्णन किया जिस पर चलने का निर्देश वरुण ने अपने पुत्र भृगु ऋषि को दिया था।

उपनिषदों का निर्णय है, सा विद्या या विमुक्तये’- विद्या वह है जो मुक्ति दिला दे। इसी भाव को शंकराचार्य ने प्रश्नोत्तरी में व्यक्त किया है-

विद्या हि का ब्रह्मगति प्रदाया।

बोधो हि को यस्तु विमुक्तिहेतुः।।

बोध वही है जो पूर्ण मुक्ति का हेतु है। यह नहीं कि सब कुछ सुन लिया तो ज्ञानी बन गये। सब कुछ सुन लेने के बाद भी चलना तो शेष ही रहता है। वह दूरी बातों से नहीं; चलकर ही समाप्त की जा सकती है। इसीलिए भगवत्पथ में हजार शास्त्रों को पढ़ने की अपेक्षा उस पथ पर एक कदम चलनेवाला भी अधिक महत्त्व रखता है। इसी प्रकार विद्या उसे कहते हैं कि जिसके पास आवे उसे घसीटकर ब्रह्मगति प्रदान कर दे। जो विद्या ब्रह्म से इंच भर भी दूरी रखती हो, उसके अन्तराल में अविद्या भी कार्यरत है। आजकल की पढ़ाई से क्या ब्रह्मगति मिलती है? अधिक से अधिक अच्छा खाने-पहनने की व्यवस्था हो जाती है। अतः आज की पढ़ाई को विद्या माननेवाले या कोरे पुस्तकीय ज्ञान का ढिंढोरा पीटनेवाले वस्तुतः भ्रम में हैं। ऐसे ही लोगों को लक्ष्य करके मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है-

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः।

जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः।। (1/2/8)

अविद्या में स्थिर होकर भी अपने आप को बुद्धिमान् और पण्डित माननेवाले मूर्ख लोग बार-बार कष्ट सहते हुए वैसे ही भटकते रहते हैं जैसे अन्धे के निर्देशन में चलता हुआ अन्धा भटकता रहता है।

कबीर साहब का भी यही विचार है-

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पण्डित होय।।

इसी वेदना को पूज्य परमहंसजी महाराज प्रायः व्यक्त करते थे- हो! का कहीं, कैसे कहीं, दो-दो पैसे में वेदान्त बिकत है। सार पढ़तौ जात हैं; लिखतौ जात हैं; लेकिन साधन एक ऐसी वस्तु है जो कभी लिखने में नहीं आती।

उस विद्या को सभी पढ़ भी तो नहीं सकते। कठोपनिषद् में प्रसंग आता है कि महर्षि उद्दालक की आज्ञा शिरोधार्य कर उनका पुत्र नचिकेता यमराज के समक्ष उपस्थित हुआ। यमराज ने नचिकेता से वर माँगने को कहा। नचिकेता ने उनसे ब्रह्मविद्या का रहस्य जानना चाहा तो यमराज ने उसे पृथ्वी के दुष्प्राप्य भोगों तथा स्वर्ग के दिव्य भोगों का प्रलोभन दिया, किन्तु नचिकेता उन सबको ठुकराता गया। यमराज उसके वैराग्य की प्रशंसा करते हुए उसे विद्या का अधिकारी घोषित करते हैं-

दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता।

विद्याभीप्सितं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवो लोलुपन्तः।। (द्वितीय वल्ली, 4)

विद्या और अविद्या ये दोनों परस्पर अत्यन्त विपरीत और भिन्न फल देनेवाली हैं। नचिकेता! तुम्हें मैं विद्या का ही अभिलाषी मानता हूँ; क्योंकि तुमको बहुत से भोग भी लुभा न सके। सिद्ध है कि विद्या का अधिकारी वही जिज्ञासु बन सकता है जिसने पुत्र-पौत्र, सम्पत्ति-प्रतिष्ठा एवं स्वर्गिक सुखालयों के चिरभोग सुख तक को भी तिलांजलि दे दी हो। अनधिकारी को विद्या देने पर गुरु और शिष्य दोनों को ही पश्चाताप करना होता है। ‘मानस’ में कागभुशुण्डिजी की अनुभूति है-

अधम जाति मैं बिद्या पाएँ।

भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ।। (मानस, 7/105/6)

दूध पीकर पुष्ट हुआ सर्प सबसे पहले दूध पिलानेवाले को ही काटता है। कागभुशुण्डिजी के पूर्व जीवन में इसकी परिणति गुरु अवमानना के रूप में हुई थी।

उपनिषदों में विद्या का फल परमात्मा बताया गया है। ईशावास्योपनिषद् का मन्त्र है, विद्ययामृतमश्नुते– विद्या से अमृत स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति का प्रमाण मिलता है। गीता के नवम अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण भी कहते हैं-

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।

ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। (9/1)

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।

प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।। (9/2)

अर्जुन! अब मैं तेरे प्रति उस ज्ञान को विज्ञानसहित कहूँगा जिसको जानकर तू इस संसार-बन्धन से भलीभाँति मुक्त हो जायगा। यह ज्ञान सभी विद्याओं का राजा है, राजविद्या है। स्पष्ट है कि विद्या कोई ऐसी वस्तु है जिसे जानकर व्यक्ति दुःखरूपी संसार से मुक्त हो जाता है। यह विद्या अव्यक्त है, स्लेट पर लिखी जानेवाली नहीं है। बल्कि अव्यक्त से प्रवाहित एक धारा विशेष है जो परम कल्याण करनेवाली है।

परमगति प्रदायिनी विद्या को सोलह साल नहीं पढ़ना पड़ता-

गुर गृहँ गये पढ़न रघुराई।

अलप काल बिद्या सब आई।। (मानस, 1/203/4)

अल्पकाल में बिद्या सब आई’- सम्पूर्ण विद्या आ जाती है। गुरुओं के घर की विद्या बहुत थोड़े समय में आनेवाली है। यह नहीं कि जन्मभर वेद-शास्त्र रटना पडे़। यह विद्या इष्टप्रेरित है, अनुभवगम्य है जो अनुभवी महापुरुषों के सान्निध्य से ही हृदय में जागृत होती है।

‘मानस’ में प्रसंग आता है कि दस हजार जन्म भोगकर कागभुशुण्डि मानव-तन में आये। इसके पूर्व भी वे साधु ही थे, लेकिन दम्भी थे। मूर्ख नहीं थे, उग्र बुद्धि थी- उग्र बुद्धि उर दम्भ बिसाला।(मानस, 7/96/3) गुरु हितकर उपदेश देते थे, विद्या ही देते थे किन्तु थोड़े समय में उसे रट लेने के बाद उनके अन्दर यह भाव उठा कि अब गुरु महाराज में क्या रखा है, जो था वह सब हमें आ गया। गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम। (मानस, 7/105 ख)- गुरुदेव नित्य ही वास्तविक प्रबोध करते थे। मेरे आचरणों को देखकर दुःखी होते थे (यहाँ भी गुरुओं के घर की शिक्षा और आजकल की शिक्षा में अन्तर है। आजकल के शिक्षक कक्षाओं में सामूहिक व्याख्यान देते हैं, छात्रों के पल्ले जितना पड़ता है ग्रहण करते हैं। इसके पश्चात् शिक्षक छात्रों को प्रारब्ध पर छोड़ देते हैं, जबकि सद्गुरु अपने शिष्य को तब तक समझाते रहते हैं जब तक शिष्य हृदयंगम न कर ले। वे शिष्य को उसके भाग्य पर नहीं छोड़ते, वे जब बनाते हैं तो गुरु ही बना देते हैं। शिष्य को भी उसी गुरुत्व में स्थिति दिला देते हैं, चाहे इसके लिए शिष्य को हजार जन्म लेना पड़े; किन्तु गुरुदेव की विद्या उसमें सदैव रहती है, आज की शिक्षा की तरह ‘आज पढ़े, कल साफ’ नहीं होती- कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना।) अस्तु, गुरुदेव मुझे समझाते रहते थे, मेरे आचरण को देखकर दुःखी थे; किन्तु मोहि उपजइ अति क्रोध दम्भिहि नीति कि भावई।(मानस, 7/105ख) मुझे अत्यन्त क्रोध होता था, भला कहीं दम्भी को नीति अच्छी लगती है।

एक बार मैं मन्दिर में बैठकर शिव-नाम जप रहा था। उसी समय गुरु महाराज पहुँचे तो अभिमानवश उठकर प्रणाम नहीं किया। गुरुदेव तो परम दयालु थे, उन्होंने कुछ नहीं कहा; लेकिन अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस। (मानस, 7/106ख)- गुरुदेव का अपमान बहुत बड़ा अपराध था जिसे भगवान शंकर ही सहन नहीं कर सके। जिन शंकरजी का मैं भक्त था वे इष्ट ही शत्रु हो गये। तुरन्त शाप दिया कि, रे अधम! अजगर की तरह बैठा ही रह गया। जा! आज से अजगर हो जा और एक हजार जन्म इसी तरह भोग! लेकिन सद्गुरु कभी नाराज नहीं होते हैं, वे तो शिष्य के कल्याण के लिए होते हैं, न कि उसके पतन के लिए। कुम्हार घड़े को इसीलिए पीटता है कि वह अपना सही आकार-प्रकार पा जाय, न कि फोड़ देने के लिए। ठीक ऐसे ही गुरुदेव का नियम है कि वे ताड़ना भी देते हैं तो शिष्य के कल्याण के लिए। गुरु महाराज ने हाहाकार किया। भगवान शंकर ने कहा कि एक हजार जन्म तो यह अवश्य भोगेगा, उसके बाद मानव-तन पायेगा लेकिन आपके द्वारा दिया गया उपदेश इसे कभी भूलेगा नहीं-

कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना।

सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।। (मानस, 7/108/8)

जब मानव-तन प्राप्त हो गया, हजार जन्म पूर्व गुरु ने जिस विद्या का उपदेश किया था उसका स्फुरण हो आया, उस पर ‘सुरत’ टिक गई और भगवान के चरणों में मन लगने लगा। अस्तु विद्या एक बार जागृत हो गई तो फिर वह कभी नष्ट नहीं होती।

प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा।

समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा।। (मानस, 7/109/5)

प्रौढ़ हो जाने पर पिता ने शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था कर दी। मैं मूर्ख नहीं था, समझता था, सुनता था, चिन्तन करता था, लेकिन नहिं भावा’- रुचिकर नहीं लगता था। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।(मानस, 7/109/8) अन्ततः पिता पढ़ा-पढ़ाकर हताश हो गये लेकिन मैंने नहीं पढ़ा। तब गरुड़ का सन्देह स्वाभाविक था कि अरे! ज्ञान से बढ़कर तो कुछ नहीं है। आपके लिए शिक्षा की व्यवस्था भी थी। आप सीखे क्यों नहीं? महर्षि काग उत्तर देते हैं-

कहु खगेस अस कवन अभागी।

खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी।। (मानस, 7/109/7)

गरुड़जी! जब मनचाहा दूध देने के लिए कामधेनु उपलब्ध है तो ऐसा कौन अभागा है जो छटाँक भर दूध देनेवाली गदही की सेवा करता फिरे? इसीलिए गरुड़जी! हम नहीं पढ़े। सिद्ध है कि वह शिक्षा विद्या नहीं थी; विद्या कुछ और ही है। यद्यपि कागभुशुण्डि निरक्षर थे फिर भी वे उस युग के सर्वोपरि विद्वान् थे। यहाँ तक कि उनके यहाँ पढ़नेवाले हंसों का अर्थात् अनुरागियों का जमघट लगा रहता था-

बर तर कह हरि कथा प्रसंगा।

आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा।। (मानस, 7/56/7)

सुनहिं सकल मति बिमल मराला।

बसहिं निरन्तर जे तेहिं ताला।। (मानस, 7/56/9)

त्यागरूपी तालाब में जो तैरते थे, वही वहाँ निरन्तर कथा सुनते थे। यहाँ तक कि शंकर, जिनके डमरू से विद्याएँ निःसृत हैं, वे भी वहाँ सत्संग सुनने जाया करते थे। सिद्ध है कि भगवत्पथ में भौतिक शिक्षा का कोई उपयोग नहीं है और न यह शिक्षा विद्या ही है।

तो फिर विद्या है क्या? एक बार लक्ष्मण ने पंचवटी में प्रश्न किया कि भगवन्! ईश्वर क्या है? जीव क्या है? माया क्या है? इस प्रकार पाँच-सात प्रश्न लक्ष्मण ने किये, तो भगवान राम बोले-

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई।

सुनहु तात मति मन चित लाई।। (मानस, 3/14/1)

तात! मैं थोड़े में ही समझाकर कह देता हूँ तुम बुद्धि, चित्त और मन लगाकर सुनो-

मैं अरु मोर तोर तैं माया।

जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।। (मानस, 3/14/2)

यह मैं हूँ, मेरा है, तूँ है, तेरा है- बस यही माया है। इसी ने चराचर जीवों को अपने वश में कर रखा है। उन्हें अपने लक्ष्य से च्युत कर रखा है।

तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ।

बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।। (मानस, 3/14/4)

इस माया के दो भेद हैं, एक विद्या और दूसरी अविद्या।

एक दुष्ट अतिसय दुख रूपा।

जा बस जीव परा भवकूपा।। (मानस, 3/14/5)

इनमें से अविद्या अत्यन्त दुष्ट है, उसके अधीन होकर यह जीवात्मा भवकूप में पड़ता है, और दूसरी शाखा विद्या के लिये कहते हैं-

एक रचइ जग गुन बस जाकें।

प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।। (मानस, 3/14/6)

विद्या वह है जिसके वश में गुण हैं। गुण माया में कहीं हैं ही नहीं। जो नश्वर है अशाश्वतं दुखालयम्’- जो दुःख का आगार और नश्वर है उसमें गुण एवं सुख कहाँ? कल्याणकारी गुणधर्म तो एकमात्र ईश्वर में हैं। तो माया का दूसरा भेद विद्या, जिसके आश्रित गुण हैं, स्कूलों में पढ़ने से वह नहीं आती। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।’- वह विद्या प्रभुप्रेरित है। जब प्रेरक के रूप में स्वयं प्रभु उतर आते हैं, आत्मा में जागृत होकर पथ-प्रदर्शक के रूप में खड़े हो जाते हैं, उनकी प्रेरणा से ही वह विद्या हमारे अन्दर उतरती है और कार्य करने लगती है।

अतः यदि हमें विद्या (जो भवसागर से पार करनेवाली है, परम कल्याणकारी है) की आवश्यकता है तो उर-प्रेरक की प्राप्ति नितान्त आवश्यक है। किसी अनुभवी महापुरुष का सान्निध्य प्राप्त करने, उनके संरक्षण में रहकर टूटी-फूटी सेवा करने और उनके द्वारा निर्दिष्ट साधन-पथ पर साल-छः महीने अभ्यास करने से आत्मा जागृत हो जाती है और उस ईश्वरीय प्रेरणा का स्रोत उपलब्ध हो जाता है, जिसके द्वारा मिलनेवाला उपदेश अथवा आदेश ही विद्या है। ज्यों-ज्यों साधक ऊपर उठता जायेगा, त्यों-त्यों यह आदेश, ईश्वरीय स्रोत, ईश्वरीय गुणधर्मों का प्रसार घना होता जायेगा। मायिक द्वन्द्व क्षीण होता जायगा। सर्वथा ईश्वर के निकट की अवस्था आ जायेगी तो हृदय ईश्वरीय गुणधर्मों का ही केन्द्र बन जायगा किन्तु यह सब उन्हीं की प्रेरणा से ही सम्भव होगा; अन्य कोई रास्ता नहीं है। इसलिए जो आत्मा को पकड़ चुके हैं, उनके स्वरूप को पकड़कर आत्मा की आवाज पकड़ने का उपाय करें। जब तक आत्मा की आवाज पकड़ में नहीं आती तब तक वह विद्या ‘विद्या’ नहीं है। तब तक उसके लिए हम जो कुछ आहें भरते हैं, उस दिशा में अग्रसर होते हैं, वह प्रयास मात्र है जो विफल कभी नहीं होगा।

प्रश्नमहाराजजी! विद्या के पश्चात् भी क्या विवेक की आवश्यकता रह जाती है?

उत्तर देखिए, विद्या जब हरि-प्रेरित है तो विवेक इतना ही रखना पड़ता है कि हरि कहते क्या हैं?- उसको पकड़ो और उसके अनुसार चलो। उस आदेश पर आरूढ़ रहने की क्षमता ही विवेक है। यदि उस पर आरूढ़ रहने की क्षमता नहीं है तो विद्या कार्य नहीं करेगी, भगवान भी रुष्ट हो जायेंगे-

मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं।। (मानस, 1/51/6)

पूज्य परमहंसजी महाराज ने इस विवेक को बड़े सरल ढंग से समझाया कि, ‘‘हो! आज्ञापालनै भजन है। तुम मत सोचो कि आज्ञा गलत है कि सही।’’ लेकिन हमसे उन्होंने यह आठ साल बाद कहा। प्रारम्भ में नहीं बताया था। प्रारम्भ में साधक के पास आज्ञापालन करने की क्षमता और आज्ञा ही कहाँ है? जब हृदय में ईश्वरीय आदेश का सूत्रपात हो गया, उसके बाद ही महाराजजी ने कहा कि आज्ञापालन ही भजन है। उस आज्ञा में मिलनेवाली वस्तु ही विद्या है। विवेक का इतना ही स्थान है कि उस आज्ञा पर दृढ़ता से चलें। भगवान आदेश देते हैं कि इस रास्ते से आगे बढ़ो, तो यह मत सोचो कि वहाँ पर सर्प है। सर्प होगा भी तो हार बन जायेगा। मीरा के लिए हार बन गया था। विष होगा तो अमृत बन जायगा, मीरा के लिए अमृत बन गया था; क्योंकि उरप्रेरक के संकेत पर ही उसने विषपान किया था-

    राणा जी! मैं तो गिरिधर रंगवा राती।

    कोई के पिया परदेश बसत हैं, लिख लिख भेजै पाती।

    मेरे पिया मेरे हिय बसत हैं, ना कहुं आती जाती।।

मीरा के परम पिया परमात्मा उसके हृदय में जागृत थे, प्रत्यक्ष रूप में बैठे थे, इसलिए वह निर्भय थी।

प्रश्नमहाराजजी! तब तो जो संकेत हृदय के भीतर से मिलता है, क्या वही विद्या है?

उत्तरहाँ, वही विद्या है। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें’- वह विद्या प्रभु प्रेरित ही होती है। यही कारण है कि विश्व के अनेक तत्त्वज्ञ महापुरुष पार्थिव शिक्षा में निरक्षर थे। सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार पाँच वर्ष के बच्चे ही तो थे, कहाँ पढ़े? शुकदेव बचपन से ही भाग खड़े हुए; किन्तु वे अनेक जन्मों से चलनेवाले योगी थे। विद्या स्वाभाविक रूप से जन्म के साथ ही उनके हृदय में प्रवाहित थी। उनके पिता व्यास अपने समय के बहुत बड़े विद्वान् थे। चार वेद, छः शास्त्र, अठारहों पुराण, महाभारत और भागवत इत्यादि के रचयिता थे, संकलनकर्ता थे; किन्तु वास्तविक जानकारी में शुकदेव उनसे कहीं आगे थे। यदि लिखने-पढ़ने का नाम ही विद्या होता तो व्यास बहुत पढ़े थे। निरक्षर थे कागभुशुण्डि, हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।जड़ भरत पढ़े-लिखे नहीं थे। बचपन से ही उनकी दृष्टि इष्ट पर थी, लोगों ने समझा पागल हैं।

ठीक इसी प्रकार ‘महामानव बुद्ध’ भी सांसारिक शिक्षा के प्रति उदासीन रहे। वे राजपुत्र थे। उनके शिक्षा की भी उत्तम व्यवस्था थी; किन्तु उनका मन पढ़ाई में न लगा। यद्यपि बौद्धग्रन्थ, ‘ललितविस्तर’ के अनुसार सिद्धार्थ को बचपन में तत्कालीन कलाकौशलों की शिक्षा कपिलवस्तु में मिली थी तथा दूसरे ग्रन्थ ‘महावस्तु’ के अनुसार यशोधरा के स्वयंवर में पाँच सौ शाक्य कुमारों के बीच आयुध कौशल-प्रदर्शन में उन्हें अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करनी पड़ी; किन्तु जिस विद्या के स्पर्श से सिद्धार्थ बुद्ध बने, उनके लिए उस शिक्षा का कोई उपयोग नहीं था। चिन्तनशील होने के कारण बालक सिद्धार्थ का मन इन सांसारिक विषयों में अनुरक्त नहीं होता था। बहुधा लोगों ने उन्हें महल से दूर एक जम्बूवृक्ष के नीचे ध्यानस्थ देखा था। साधनावस्था में सिद्धार्थ की घुड़सवारी, तीरन्दाजी, मल्ल-कला और धनुर्वेद की सिद्धहस्तता काम न आयी। इन पर सिद्धार्थ हँसे और इन्हें छोड़कर वास्तविक विद्या सीखने योग्य गुरु की खोज में राजगृह आये, जहाँ आलार एवं उद्रक नामक ऋषियों से उन्होंने आर्य साधना-पद्धति का ज्ञान प्राप्त किया। ध्यान की क्रमिक भूमिकाओं के उपरान्त गया में वटवृक्ष के तले उन्हें विद्या की अनुभूति हुई। ईश्वर की प्रेरणा से वे विद्वान् बन गये। उन्हें ‘बुद्ध’ की पदवी मिली। तथ्य से अवगत होने के कारण उन्हें ‘तथागत’ कहा गया।

आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व यातायात की कठिनाइयों को झेलते हुए, महासागरों की उत्ताल तरंगों को अपनी छोटी-छोटी नौकाओं से चीरते हुए भारतीयों ने चीन, जापान, मिस्र और यूनान तक बुद्ध की उसी विद्या का सन्देश सुनाया, जिसे वहाँ की जनता ने न केवल आदर के साथ सुना बल्कि हाथों-हाथ उठा लिया, जो आज भी विश्व की अधिकांश जनता का कल्याण-स्रोत बना हुआ है। कलिंग को ध्वस्त करते समय रणोन्मत्त अशोक के कर्णकुहरों में बुद्ध की इसी विद्या का स्वर पड़ते ही तलवार उसके हाथ से सदा-सदा के लिए गिर गयी। जहाँ-जहाँ भी यह विद्या पहुँची, भेरी का घोष बन्द होता गया। चतुर्दिक धर्मघोष ही सुनाई पड़ने लगा। इसी विद्या का प्रचार करने के लिए अशोक ने अपने पुत्र एवं पुत्री को लंका भेजा और अपना सारा जीवन इसी विद्या पर निछावर कर दिया। भारत पर आक्रमण करनेवाले यूनानियों, शकों, पह्लवों, कुषाणों और हूणों को इस विद्या ने न केवल आकर्षित किया बल्कि उन्हें आत्मसात् कर लिया, भारतीयता के रंग में रंग दिया। ईश्वर-प्रेरित विद्या से महिमान्वित इस मनीषी ने जहाँ टट्टी-पेशाब भी कर दिया, ‘तीर्थ’ बन गया। संसार के कोने-कोने से प्रतिवर्ष लाखों तीर्थयात्री लुम्बिनी, कपिलवस्तु, सारनाथ, श्रावस्ती, गया और कुशीनगर का दर्शन करके असीम शान्ति का अनुभव करते हैं; करते रहेंगे।

अरब के हजरत मुहम्मद कहाँ पढ़े थे? महात्मा कबीर ने तो मसि कागद छूयो नहीं, कलम गहि नहीं हाथ’- लेखनी का स्पर्श भी नहीं किया था। गुरु नानक को हिन्दू या मुसलमान कोई भी शिक्षक नहीं पढ़ा सका। पिता ने उन्हें खेती की देखभाल में नियुक्त किया। वहाँ भी वे असफल रहे। व्यापार से धन बढ़ाने की अपेक्षा ‘सत नाम’ का अर्जन करना ही उन्होंने श्रेयस्कर माना। लोकनायक तुलसी ने भी यद्यपि काशी में शेष सनातन के पास रहकर वेद-वेदांग का पन्द्रह वर्षों तक अध्ययन किया; किन्तु मानस की कथावस्तु का आधार उन्होंने उस विद्या को ही बनाया जिसे उन्होंने अपने गुरु नरहर्यानन्दजी से सुना था-

मैं पुनि निज गुर सन सुनी, कथा सो सूकर खेत। (मानस, 1/30 क)

भाषाबद्ध करबि मैं सोई।

मोरें मन प्रबोध जेहिं होई।। (मानस, 1/30/2)

गोस्वामी तुलसीदासजी ने उसी हरिप्रेरित विद्या का निरूपण ‘मानस’ में किया जिसका प्रस्फुटन हृदय-देश में होता है-

 तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें। (मानस, 1/30 ख/3)

स्थान-स्थान पर गोस्वामीजी ने इसी स्रोत की ओर इंगित किया है-

जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी।

कबि उर अजिर नचावहिं बानी।।

प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा।

बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा।। (मानस, 1/104/6-7)

यदि लौकिक शिक्षा-दीक्षा का महत्त्व विद्या जैसा ही होता तब तो तुलसी से भी अधिक पढ़े-लिखे व्याकरणाचार्य काशी में थे किन्तु आज उनका कोई नाम तक नहीं जानता। क्या उनमें से एक भी तुलसी के समकक्ष बन सका? ब्रह्म-विद्या होने के कारण ही तुलसी-साहित्य नित नूतन कलेवर धारण करता जा रहा है। इसी विद्या की शोध में देश-विदेश के लाखों जिज्ञासु, विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चित्रकूट के रामायण मेले में आते हैं और देखते-देखते संसार भर में इसी वाङ्मय का प्रचार-प्रसार अबाध गति से होता जा रहा है।

मीरा पढ़ी-लिखी नहीं थीं किन्तु उस प्रेम-योगिनी के भाव प्रकाशन में भाषा बाधक नहीं बनी। उनके आत्म-निवेदन में ललित पदावलियों की ऐसी स्रोतस्विनी प्रवाहित हुई कि राजस्थान की मरुभूमि एवं साहित्य महारथी दोनों ही एक समान उससे आप्लावित हो उठे। रामकृष्ण परमहंस के समक्ष पढ़ाई-लिखाई का प्रश्न ही नहीं था। सोलह वर्ष की आयु में पागलों की तरह थे तो भला शिक्षा कब हुई? इसी क्रम में काशी के हरिहर बाबा भी हुए। पार्थिव शिक्षा में निष्णात न होने पर भी ये सभी अपने युग के सर्वोपरि विद्वान् माने गये।

गोरखपुर के ‘सत्संगी महाराज’ को, जिन्होंने एक सौ पचीस वर्ष की आयु में महाप्रयाण किया, आजीवन लोग पागल समझते रहे। लेकिन पुण्यात्माओं को आकाशवाणी हुई कि ये महापुरुष हैं, मेरे स्वरूप की स्थितिवाले हैं। उनकी शरण में जाओ, उनसे शिक्षा लो। पूज्य परमहंसजी को भी आकाशवाणी हुई। मन्दिर में जाकर देखा तो वही पागल बाबा दिखाई पड़े जो रोज इधर-उधर घूमते थे। चरणों पर गिरे, अल्प अवधि में उस साधन को पकड़ा और ठीक चार महीने में हरिप्रेरित विद्या का स्रोत हृदय में प्रवाहित हो गया। पूज्य परमहंसजी महाराज भी पढ़े-लिखे नहीं थे, केवल तीन दिन पाठशाला गये थे। तीसरे दिन पण्डितजी ने एक छड़ी मार ही तो दिया। वे रोते-रोते घर आ गये। फिर तो माँ ने कहा- भाड़ में गयी ऐसी शिक्षा! और पार्थिव शिक्षा का पाठ उसी दिन से बन्द हो गया। एक समय अनुसुइया आश्रम में उनके हस्ताक्षर की आवश्यकता पड़ी तो एक सज्जन ने महाराज जी से तीन दिन तक हस्ताक्षर करने का अभ्यास कराया। प…र…मा…न…न्द… के प्रत्येक अक्षर को महाराजजी ने बड़े मनोयोग से सीखा। ‘द’ के नीचे महाराजजी ने लकीर एक इन्च खींच दी थी। संकोच और भयवश उन सज्जन ने कुछ नहीं कहा। हमने देखा तो कहा- महाराजजी, यह लम्बाई कुछ कम कर दी जाय, तो वे मूँछों पर ताव देते बोले- ‘हूँ! तूँ का जानिहै, मैं जो पढ़े हूँ!’ वे जानते थे कि यह ठीक कह रहा है, लेकिन नहीं माने।

अनुसुइया आश्रम में विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर, विद्वान् पहुँचते ही रहते थे। साथ आनेवाले उनका परिचय देते कि महाराज ये डाक्टर साहब हैं। इन्होंने ‘फिलासफी’ या कई विषयों से ‘रिसर्च’ किया है। तहाँ महाराजजी कहे- ‘‘हो! हम जंगल में पड़े हैं, कहाँ सुनने का पावें। कुछ हमहुँ के सुनावो।’’ तब वे सुनाने लगते। पहले कुछ देर तक वह प्रोफेसर साहब अपनी कहते; तत्पश्चात् वे महाराजजी से कुछ सुनाने का आग्रह करते कि महाराजजी! हम सुनाने नहीं, सुनने के लिए आये हैं। जब महाराजजी का उपदेश आरम्भ हो तो वे सभी विस्मय में कहा करते थे कि, भगवन्! साधना कुछ और ही है। पढ़ना कुछ और है, करना कुछ और है। इस प्रकार निवेदन कर, आशीर्वाद लेकर चले जाते थे। विद्वानों की शिक्षा का उपयोग पूज्य महाराजजी की प्रत्यक्षदर्शिनी वाणी के समक्ष नहीं रह जाता था।

अतः इस भगवत्-पथ पर यदि आप पढ़े-लिखे हैं तो ठीक है और नहीं पढ़े-लिखे हैं तब भी आपके लिए कोई हानि नहीं है; क्योंकि यह विद्या केवल हरिप्रेरित और सद्गुरुओं के घर की विद्या है, उसकी पाठशाला ही दूसरी है। परमहंसजी कहा करते थे, ‘‘हो! मोके भगवान पढ़ावत हैं। संसार की चाहे जवन भाषा बोलो, भगवान मोके सब समझावत हैं।’’

।। ओम् ।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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