प्रश्न- नवयुवकों में प्रचलित है कि भगवान के प्रति मंत्रजप या भजन एक अंधविश्वास है। क्या यह सत्य है? आप इस पर प्रकाश डालें।
उत्तर- यह धारणा पूर्णत: असत्य है। यह कोई नयी बात नहीं है। नवयुवकों में ही नहीं अपितु मानवमात्र में यह प्रवृत्ति अनादिकाल से ही चली आ रही है। ऐसी ही सोच रावण की भी थी। वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड के सत्रहवें सर्ग में है कि एक बार रावण पुष्पक विमान से विचरण कर रहा था। जंगल में एक ब्राह्मण-कन्या वेदवती तपस्या कर रही थी। रावण ने दौड़कर उसके बाल पकड़ लिये और कहा– ‘‘ऐसा रूप, सौन्दर्य और यौवन! चलो, मैं तुम्हें लंका की महारानी बनाऊँगा। यह तपस्या तो बूढ़ों, अपाहिजों, लँगड़ों या अन्धों के लिए है। भजन से क्या होता है? स्वर्ग मिलेगा! स्वर्गिक देवता तो हमारे यहाँ विधिवत् सेवा करते हैं। चलो, लंका चलो!’’ अत: यह विचार तो लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व सृष्टि के आरम्भ से ही चला आ रहा है। हिरण्यकश्यप ने कहा– मैं भगवान और भगवान का नाम; दोनों को ही मिटा दूँगा। किन्तु भगवान ही एक सक्षम सत्ता है, उसने एक मासूम बच्चे प्रह्लाद का स्पर्श कर दिया तो हिरण्यकश्यप की सारी शक्ति व्यर्थ हो गयी। उसे हाथियों से कुचलवाया, समुद्र में फेंका, आग में झोंका, जलते स्तम्भ से बाँधा और अन्त में जो षड्यन्त्र प्रह्लाद के लिए निश्चित किया था, उसी में उलझकर स्वयं मर गया। भगवान का चारों ओर बोलबाला हो गया। भगवान ही एकमात्र अक्षय सत्ता है। यह निर्विवाद है।
नवयुवकों में ईश्वर और आध्यात्मिकता के प्रति अनास्था का प्रचलन सुशिक्षा के अभाव से है। केवल ‘खाओ-पीओ और मौज करो’ की शिक्षा का प्रचार विश्व के अधिकांश देशों में है; किन्तु उनके दु:खों की भी कोई सीमा नहीं है। अन्य देशों की तुलना में भारत में शान्ति अधिक है। यह धर्म की ही देन है। माताओं को चाहिए कि शैशवावस्था से ही बच्चों को संस्कारवान् बनायें।
अमेरिका की धर्मसभा में स्वामी विवेकानन्द जी ने पूर्व और पश्चिमी संस्कृति का अन्तर बताते हुए कहा कि भारत के किसान कृषिकार्य के उपरान्त आराम के क्षणों में भगवान की चर्चा करते हैं कि अमुक सन्त ने ऐसा कहा, फलाँ शास्त्र में यह लिखा है; लेकिन आपके यहाँ जब दो-चार व्यक्ति एकत्र होते हैं तो राजनीति की चर्चा करते हैं। इसलिए बाल्यकाल से ही शिक्षातन्त्र में आत्मदर्शन की विधि आनी चाहिए और मानवमात्र के लिए इस विधि का समग्र वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में उपलब्ध है जिसका यथावत् भाष्य ‘यथार्थ गीता’ का अनुशीलन प्रत्येक मानव को करना चाहिए; क्योंकि यह मूल धर्मशास्त्र है। यह न हिन्दुओं का है न ईसाइयों का, न मुसलमानों का और न यहूदियों का ही है। सृष्टि की परम्पराओं और रूढ़ियों से मुक्त यह शास्त्र म़जहबमुक्त, भेदभावमुक्त, सम्प्रदायमुक्त है। यह मानवमात्र को एक जैसी शान्ति, शाश्वत धाम और सदा रहनेवाला भगवत्स्वरूप प्रदान करता है (गीता, १८/६२) और सबको आत्मस्वरूप का दिग्दर्शन कराता है। गीतोक्त साधन पर आप चलकर देखें कि स्वल्प अभ्यास से ही भगवान उँगली पकड़कर चलाने लगते हैं। हाँ, जिन बच्चों में इस शिक्षा का अभाव है, वे अज्ञानवश कुछ भी कह सकते हैं।
बच्चों में अध्यात्म और संस्कृति के प्रति अरुचि का एक कारण और भी है। भगवान श्रीकृष्ण ने आदिशास्त्र गीता में बताया कि मनुष्य दो प्रकार का होता है– असुरों-जैसा और देवताओं-जैसा। जिस हृदय में आसुरी सम्पद् कार्य करती है वह असुर है और जिसमें दैवी सम्पद् कार्यरत है वह देवता है। ‘दैवी सम्पद् विमोक्षाय’ (गीता, १६/५)- दैवी सम्पद् परमकल्याण करने के लिए है। अर्जुन! तू शोक मत कर, तू दैवी सम्पद् को प्राप्त हुआ है, तू मुझे प्राप्त होगा। मेरे अविनाशी सहज स्वरूप, सदा रहनेवाली शान्ति, सदा रहनेवाला जीवन, मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त कर लोगे और जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-दु:ख-दोषों से सदा के लिए मुक्त हो जाओगे (१३/८; १४/२०)। दैवी सम्पद् शनै:-शनै: परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित कराती है और एक दिन परमात्मा का दर्शन, स्पर्श, उसमें प्रवेश दिला देती है।
आसुरी सम्पद् अनन्त योनियों में भटकाती है और जो कभी न पूर्ण हों, ऐसी अनन्त इच्छाओं और अनन्त वासनाओं में भरमाती है – एक अन्तहीन यात्रा जिसकी गति कभी न रुके, लक्ष्य तक पहुँचेंगे कभी नहीं। यह आवागमन का रास्ता है। यह है प्रवृत्ति मार्ग जिसमें सदा प्रवृत्त रहना है जबकि दैवी सम्पद् निवृत्ति मार्ग है, परमदेव का स्पर्श करके सदा के लिए निवृत्ति हो जाती है। सच पूछिए तो प्राणियों के स्वभाव दो प्रकार के होते हैं। दैवी सम्पद्वाला देवता है और आसुरी स्वभाववाला असुर। आसुरी स्वभाववाला कहता है कि भगवान अनावश्यक है। यह तो वृद्धों के समय काटने का एक तरीका है।
बच्चे तो कोरे कागज हैं, स्वच्छ हैं। संगत का जैसा ठप्पा लग जायेगा वैसा ही आचरण करने लगते हैं इसीलिए नवयुवकों में सद्संस्कारों के सृजन के लिए आदिशास्त्र गीता देनी चाहिए। गीता के अन्तर्गत विश्व के सभी शास्त्र आ जाते हैं; क्योंकि सर्वप्रथम गीता का ही उद्घोष है कि एक ईश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी का अस्तित्व नहीं है। आत्मा ही परम सत्य है। वही काल से अतीत, मृत्यु से परे परम पुरुष है, उसे प्राप्त करो। विश्व में जितने महापुरुष हुए हैं, सभी इसी सन्देश को दुहरा रहे हैं कि अल्लाह के सिवाय कोई पूज्य नहीं, कोई ईश्वर-जैसा नहीं, केवल उसकी शरण जाओ। बौद्ध, जैन, सिख इत्यादि कोई अलग सम्प्रदाय नहीं, गुरुघराने हैं, सद्गुरुओं का दरबार है। आधी दूरी चलने के पश्चात् भिन्न-भिन्न प्रतीत होने वाले ये सभी मत-मतान्तर सिमटकर एक इकाई बन जाते हैं। वह इकाई करनेवाली साधना-पद्धति केवल गीता है। इसलिए बच्चों को संस्कारवान् बनाने के लिए उन्हें सही शिक्षा, सही दिशा देना आवश्यक है।
भजन के सम्बन्ध में यहाँ एक स्पष्टीकरण आवश्यक है। आजकल प्राय: सभी तीर्थों में, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, दक्षिण भारत, बंगाल, असम इत्यादि सम्पूर्ण भारत में, देश-विदेश में यत्र-तत्र यही प्रचलन में है कि भजन माने महापुरुषों की वाणियों के रूप में ईश्वरीय गुणानुवाद के पदों का भावविभोर होकर गायन, ढोलक-मजीरे के साथ संकीर्तन, रात्रि-जागरण, सुधबुध खोकर और झूमकर नृत्य करना – इसी को भजन कहते हैं। इसके अतिरिक्त भी भजन की विधि है जिसका ज्ञान लोगों को नहीं है।
भजन के प्रति श्रद्धा जगाने के लिए महापुरुषों की वाणियों का पाठ, ईश्वरीय लीलाओं का गायन-संकीर्तन आवश्यक है। भगवत्-पथ में आधी दूरी तक यह गायन-कीर्तन साथ देते हैं; यह गुणानुवाद है जिसका समर्थन भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में किया है। अध्याय दस के आठ से बारहवें श्लोक में वे कहते हैं कि मुझे ही संसार का नियन्ता मानकर विवेकीजन निरन्तर मेरा भजन करते हैं। वे किस प्रकार भजन करते हैं? इस पर कहते हैं– वे सदैव मेरा ही गुणगान करते हुए मेरी लीलाओं का परस्पर बोध करते हुए भजते हैं। ऐसे श्रद्धालु भक्तों को मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं। आप बुद्धियोग किस प्रकार देते हैं? भगवान कहते हैं– मैं उनकी आत्मा से जागृत होकर उनके हृदय से सञ्चालित होकर अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को ज्ञानरूपी दीपक से प्रकाशित करता हूँ अर्थात् किसी महापुरुष द्वारा जब तक वह परमात्मा आपकी आत्मा से ही जागृत होकर रोकथाम नहीं करता, प्रकृति के द्वन्द्व से निकालते हुए स्वयं आगे नहीं ले जाता, तब तक वास्तव में यथार्थ भजन आरम्भ ही नहीं होता अर्थात् भजन एक जागृति है। अपनी ही आत्मा बताने लगती है कि ऐसे चल, ऐसे कर, अब जाग, अब भजन कर। इस विधि से भगवान जैसे-जैसे सञ्चालित करते हैं, उनके निर्देशों को समझना और उस पर चलना – यह ज्ञान की निम्नतम सीमा है, भजन की जागृति है। उन्हीं के निर्देशन में चलते हुए क्रमश: स्तर उठ जाने पर परमतत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन और दर्शन के साथ मिलनेवाली जानकारी ज्ञान है; सृष्टि में अन्य जो कुछ भी है अज्ञान है। यह ज्ञान की अधिकतम सीमा है, जिसे भगवान ने कहा कि उन्हें ज्ञानरूपी दीपक के द्वारा प्रकाशित करता हूँ।
जबसे भजन की यह जागृति आती है भगवान पढ़ाने, समझाने लगते हैं। तब आरम्भ होता है श्वास का भजन। शान्त बैठ जायँ; देखें, श्वास कब अन्दर गयी, इसे पहचानें। श्वास कब बाहर गयी, इसे देखें। बाहर श्वास कितना रुकी, इसे समझें। यह कब अंदर लौटकर आयी, इसको भी जानें; अन्दर कितना रुकी– इसे समझें। दो-चार बार जब मन भली प्रकार देखने लगे, विचारों से देखें और चिन्तन से ही नाम श्वास में ढाल दें। श्वास आयी तो ‘ओम्’, गयी तो ‘ओम्’। ‘ओम्…..ओम्…..’ धीरे-धीरे चिन्तन से ढालते जायँ। एक भी श्वास व्यर्थ न जाने पाये। थोड़ा अभ्यास और उन्नत होते ही आप पायेंगे कि श्वास नाम के अतिरिक्त अन्य कुछ कहती ही नहीं। आप देखा भर करें कि श्वास कब आयी, क्या कहा? कब गयी, क्या कहा? श्वास में मन की दृष्टि एकदम खड़ी हो जाय, वृत्ति श्वास में समाहित हो जाय। पहले मन कहाँ-कहाँ दौड़ता रहता था, मन की यह भागदौड़ शान्त हो जाय, इसी का नाम भजन है। भजना अर्थात् भाग ना – मन का भागना बन्द हो जाय। मन का स्थिर होना ही भजन है।
यह होता है चिन्तन से, सूरत के लगाने से (मन की दृष्टि का नाम सूरत है), संयम से। सतत अभ्यास से ही यह भजन अपनी कसौटी पर शनै:-शनै: खरा उतरता है। एक दिन मन भली प्रकार अचल स्थिर ठहर जाता है।
भजन के इस उन्नत स्तर की शुरुआत होती है धारणा, ध्यान और समाधि से। आरम्भ में धारणा मूर्ति में होती है। शील, शौच, अन्त:करण की शुद्धि, वाह्य शुद्धि, तप और स्वाध्याय की धारणा होती है। साथ ही साधक धारण करता है अिंहसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। जब संयम सध गया तब साधक धारण करता है श्वास को, नाम को, इष्ट के स्वरूप को। वह सचेतावस्था में बैठकर श्वास को देखने लगता है, श्वास में विचरनेवाली वायु को सम करके नाम और रूप को धारण करता है और जब धारण करने की क्षमता आ गयी तो–
‘तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।’ (पातंजल योगदर्शन, ३/२)
जहाँ चित्त को लगाया जाता है वहीं वृत्ति का एक तार चलना, क्रम न टूटना ध्यान है और ‘तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि:।’ (पातंजल योगदर्शन, ३/३) – जहाँ चित्त को लगाया जाय वहाँ लक्ष्य मात्र का आभास रह जाय, चित्त का निज स्वरूप शून्य हो जाय, जैसे चित्त है ही नहीं, मन था ही नहीं, ॐ जपते हैं तो ॐ मात्र रह जाय। स्वरूप देखते हैं तो ‘पद नख जोति’– पद का नाखून मात्र रह जाय, अन्य दृश्य न रह जाय, देखनेवाले चित्त का स्वरूप शून्य हो जाय, यह समाधि है। सम और आदि! आदि तत्त्व, अनादि तत्त्व जो परमात्मा है उसमें समत्व दिला देनेवाली अवस्था आ गयी, जो सम है जिसमें विषमता नहीं है, उसका दर्शन, स्पर्श और प्रवेश मात्र शेष है। इस प्रकार एक सेकेण्ड में सृष्टि का चक्कर लगाकर लौट आनेवाले मन को शून्य, शान्त करके सम में स्थिर करना भजन की पराकाष्ठा है।
इस भजन की जागृति सद्गुरु से है। यह बहुत सुगम है। इसके लिए पहले आप एक प्रभु में श्रद्धा स्थिर करें, उनके परिचायक किसी एक नाम ‘ओम्’ या ‘राम’ का जप करें। खाते-पीते, चलते-फिरते, उठते-बैठते नाम स्मृति-पटल पर बना रहे। प्रात:-सायं आधा घण्टा समय नाम-जप में अवश्य दें। सब भूल जायँ, यह नाम-जप कभी न भूलें। सन्तों की सेवा करते रहें। भगवान जानते हैं कि यह मुझे पुकार रहा है, यह भी जानते हैं कि यह क्या चाहता है; लेकिन व्यवस्था वही देंगे जिसमें आपका हित है। आप पायेंगे कि जहाँ कोई नहीं देखता, भगवान वहाँ भी आपको देख रहे हैं। योगक्षेम की इस संरक्षा के लिए साधक को सदैव सद्गुरु के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। सन्त कबीर कहते हैं–
बलिहारी गुरु आपने, द्यौहाड़ी कै बार।
जिन मानुष ते देवता, करत न लागी बार।।
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(‘नवयुवकों की जिज्ञासाऍं एवं भजन से लाभ’ से उद्धृत)