क्या भगवान मिलते हैं?

प्रश्नमहाराजजी! क्या भगवान मिलते हैं?

उत्तरहाँ, मिलते क्यों नहीं! यदि वास्तव में कोई सच्चा अधिकारी है तो न मिलने पर वह जीवित ही न रह सकेगा। हमें मिलकर ही यह स्थिति दिये हैं। उसका निर्णय हम इस भौतिक बुद्धि से नहीं कर सकते। रिनिक धिनिक धुनि अपने से उठे– जब साँस में उठनेवाली ध्वनि पकड़ में आने लगती है अर्थात् जब साधक उस पर विचरने लगता है, तब भगवान ऐसे बोलते हैं, जिस तरह हम लोग परस्पर बातें करते हैं। जब शब्द और सुरति एक हो जाती है तब वह ऐसे ही देखने में आता है जैसे कि शीशे में स्वरूप; किन्तु वह अन्तर्दृष्टि अनुभव से देखने में आती है। तुम्हारा तो यह वाक्य-ज्ञान का झगड़ा है कि नहीं मिलते। जब वे हृदयदेश से पथ-प्रदर्शन करने लगते हैं तभी समझ में आता है।

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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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