क्या ब्रह्म शून्य है?

प्रश्नमहाराजजी! ब्रह्म तो शून्य है, जिसका अभिप्राय कुछ भी नहीं होता। इससे भ्रान्ति हो जाया करती है कि क्या करें?

उत्तर यह किसी आडम्बरी या निशाप्रधान ने बता दिया कि ब्रह्म शून्य है। ब्रह्म ही एक ऐसी सत्ता है जो शून्य नहीं बल्कि परम चेतन है। उस ब्रह्म की चेतनता के अंश मात्र से यह सम्पूर्ण जगत् चेतन प्रतीत होता है। जैसा कि उसके बगैर कोई साँस नहीं ले सकता और यहाँ तक कि उसके स्फुरण के बिना पत्ता भी नहीं हिल पाता। यह तो किसी महापुरुष ने प्राप्ति की स्थिति का चित्रण किया है कि हमारा मन एवं चित्त सतत चिन्तन में प्रवृत्त होकर सूक्ष्म होते-होते सहअस्तित्व मिट जाने की स्थिति में पहुँच जाय, जिससे कि वह लक्ष्य प्रत्यक्ष होता है। जब तक चित्त का स्वरूप संस्कार मात्र शेष है तब तक वह ब्रह्म प्रत्यक्ष नहीं होता। चित्त के संस्कार एवं तरंग के सहअस्तित्व मिट जाने पर ही वह ब्रह्म प्रत्यक्ष होता है, जो हमारी मानसिक शून्यावस्था है। बस योगी या लक्ष्य में प्रवृत्त पुरुष चित्त की तरंगरहित ऐसी शून्य अवस्था के प्रवेशकाल में उस ब्रह्म को प्रत्यक्ष पा लेता है जो कि परम चेतन है। उस ब्रह्म की प्राप्ति के लिए हमारे मन और चित्त को शून्य होना है, न कि ब्रह्म शून्य है। किसी स्थितिप्राप्त महापुरुष से चिन्तन-क्रम समझो और करो। वस्तुतः हम चलना ही नहीं जानते। वह परम दयालु है। हम हृदय से समर्पण करके चलना प्रारम्भ करें तो वही स्रोत मिल जायेगा, जो दुःख से ऊपर उठा लेता है।

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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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