गीतोक्त युद्धस्थल कुरुक्षेत्र कहाँ है?

गीतोक्त युद्धस्थल

प्रश्नमहाराजजी! कुरुक्षेत्र की स्थिति को लेकर आजकल मतमतान्तर, समाचार पत्रों में देखने को मिलते हैं। गीतोक्त कुरुक्षेत्र कहाँ है?

उत्तर देखिए, गीता एक यौगिक शास्त्र है। गीता पढ़ते सभी हैं, पढ़ना भी चाहिए। यह बात अलग है कि प्रारम्भ में अधूरी जानकारी मिलती है किन्तु अधूरी जानकारी ही पूरी जानकारी के लिए प्रेरणा देती है इसलिए पढ़ना आवश्यक है। गीता कोई विरला महापुरुष जानता है और उनके संरक्षण में कोई विरला अधिकारी साधक ही पढ़ता है। सब न पढ़ते हैं, न जानते हैं। आज गीता पर सैकड़ों टीकाएँ मिलती हैं, पचीसों मत हैं जिनकी आधारशिला गीता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने तो कोई एक ही बात कही होगी, फिर एक ही शास्त्र को लेकर इतना विचार-विभिन्नता क्यों? वस्तुतः मनुष्य जिस वातावरण में पलता है उसका प्रभाव बुद्धि पर पड़ता ही है। अपनी बुद्धि के अनुसार ही लोग शास्त्र का आशय लगाते हैं। राजनीतिज्ञ के हाथ में गीता पड़ी तो कहा, ‘‘स्वदेशी कपड़ा बेचो, यही निष्काम कर्म है। विदेशी कपड़ा बेचना सकाम कर्म है।’’ रूढ़िवादियों के अनुसार, ‘‘जिसका जो पैतृक पेशा है वही उसका कर्म है।’’- गीता यही कहती है। नेतागण कहते हैं, ‘‘जो कुछ हमारे सामने है उसे हम करें। यदि हम उसमें घूस लेते हैं तो सकाम कर्मयोगी हैं, नहीं लेते तो निष्काम कर्मयोगी हैं।’’ सेठ-साहूकार कहते हैं कि, ‘‘गीता में व्यवसाय को कर्म माना गया है।’’ यही कारण है कि शास्त्र तो एक ही उपदेश करता है परन्तु मनुष्य अपनी बुद्धि के अनुसार उसे अपने परिवेश में ढाल लेता है। श्रीकृष्ण ने जिस क्षेत्र में युद्ध का चित्रण किया है, यह केवल वही जान सकता है जो श्रीकृष्ण की स्थिति के समीप अथवा उन्हीं की स्थिति वाला हो। साधन के क्रमिक उत्कर्ष द्वारा श्रीकृष्ण के स्तर तक पहुँचा हुआ पुरुष ही अक्षरशः बता सकेगा कि जब गीता कही गयी थी, उस समय श्रीकृष्ण के मनोगत भाव क्या थे? घर बैठे लेख पढ़कर हिमालय के दृश्यों की केवल कल्पना की जा सकती है, वास्तविक आनन्द के लिए तो हिमालय पर चढ़ना होगा। वहाँ पहुँचने पर आपके समक्ष भी वही दृश्य होगा जैसा आपने पढ़ा था। इसी तरह गीता योगदर्शन है, क्रियात्मक पथ है। केवल अध्ययन करके किंवा उसे कण्ठस्थ करके भी कोई गीता के रहस्यों को जान लेने का दावा नहीं कर सकता।

आपका प्रश्न है कि जिस कुरुक्षेत्र में लड़ाई हुई थी वह कहाँ है? कुछ लोग कहते हैं कि काशी और प्रयाग के बीच कुरुक्षेत्र है तो कुछ लोग उसे हरियाणा में बताते हैं। किन्तु गीता में ऐसा कुछ भी नहीं है। प्रथम श्लोक में धृतराष्ट्र ने पूछा-

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।। (गीता, 1/1)

टीकाकारों ने इसका अर्थ बताया है कि संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? टीकाकार ने क्षेत्र का अर्थ भूमि कहा है जबकि शास्त्रकार का यह आशय नहीं था। जिन योगेश्वर श्रीकृष्ण ने क्षेत्र का वर्णन किया, उन्होंने यह भी बताया कि वह क्षेत्र है कहाँ? इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते (गीता, 13/1)- अर्जुन! यह शरीर ही क्षेत्र है ऐसा कहा जाता है। जो इसे जानता है वह क्षेत्रज्ञ है, इसका संचालक है।

इस प्रकार शरीर ही वह क्षेत्र है जिसमें लड़ाई हुई। इसमें धर्म एक क्षेत्र है। कुरु एक क्षेत्र है। अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र- मनुष्य में जब धृष्टता आ जाती है, वह देखते हुए भी नहीं देखता और जिनके हृदय में धृष्टता का राष्ट्र ही बसा हो उसे देखने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसीलिए धृतराष्ट्र अन्धा है। अज्ञान मोह को जन्म देता है। मोहरूपी दुर्योधन, दुर्बुद्धिरूपी दुःशासन, कर्मरूपी कर्ण, विकल्परूपी विकर्ण, भ्रमरूपी भीष्म, द्वैत का आचरणरूपी द्रोणाचार्य, आसक्तिरूपी अश्वत्थामा और संशयरूपी शकुनि इत्यादि सभी आसुरी सम्पद् हैं। कुरुक्षेत्र- ‘कुरु’ अर्थात् करो! आज करते हो और अनन्त सृष्टि में करते जाओ। इन्हीं के बीच जीवरूपी विदुर फँसा है। जो है तो कौरवों की ओर किन्तु उसकी सीधी दृष्टि पाण्डवों पर है।

दूसरी ओर है धर्मक्षेत्र, जिसमें पुण्यरूपी पाण्डु है, कर्तव्यरूपी कुन्ती है। जब तक पुण्य साथ नहीं देता, तब तक मनुष्य कर्तव्य समझकर जो कुछ भी करता है, उसके बन्धन का कारण होता है, क्योंकि पुण्य जागृत हुए बिना कर्तव्य-अकर्तव्य का निदान नहीं हो पाता। इसलिए पाण्डु के साहचर्य के पूर्व कुन्ती ने जो कुछ पैदा किया वह था कर्ण। आजीवन कुन्ती के पुत्रों से लड़ता रहा। पाण्डवों या दैवी सम्पद् के लिए सबसे बड़ा घातक यदि कोई था तो वह था कर्ण। पुण्य जागृत होते ही धर्मरूपी युधिष्ठिर, भावरूपी भीम, अनुरागरूपी अर्जुन, नियमरूपी नकुल, सत्संगरूपी सहदेव का आविर्भाव हो जाता है। जहाँ सद्गुरुरूपी श्रीकृष्ण आत्मा से जागृत होकर शरीररूपी रथ के सारथी बनकर साधक का पथ-संचालन करते हैं। वे हजारों मील दूर रहें किन्तु जागृति के पश्चात् साधक के इतना समीप रहते हैं जितना हाथ, पाँव, नाक इत्यादि; बल्कि इससे भी समीप, क्योंकि वे तो आत्मा में ही संचारित होते हैं।

यही है धर्म का क्षेत्र, और वह परमधर्म परमात्मा ही है। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘यह आत्मा ही परमसत्य, सनातन और शाश्वत है।’’ ब्रह्म की भी तो यही परिभाषा है। आत्मा अशोष्य है, अकाट्य है तो ब्रह्म की भी यही उपाधि है। तात्पर्य यह है कि दर्शन के पश्चात् आत्मा ही परमात्मा से अभिन्न हो जाती है किन्तु आत्मा को इस स्वरूप में सबने नहीं केवल तत्त्वदर्शियों ने देखा। अतः उस परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिला देनेवाली प्रवृत्ति ही धर्मक्षेत्र है। श्रीकृष्ण कहते हैं–अर्जुन! यह शरीर ही क्षेत्र है। जो इसका पार पा लेता है वह क्षेत्रज्ञ है। वह इसमें फँसा नहीं बल्कि इसका संचालक है। वह आपके अन्दर भी संचालन-क्रिया पैदा कर सकता है और स्वयं तो पूर्ण है ही।

इस प्रकार इसी शरीररूपी क्षेत्र में दो प्रवृत्तियाँ अनादि हैं- एक दैवी सम्पद्, दूसरी आसुरी सम्पद्। इन्हीं को क्रमशः विद्या और अविद्या, कुरुक्षेत्र अर्थात् दूषित रूखवाला क्षेत्र और धर्मक्षेत्र अर्थात् परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिला देनेवाला क्षेत्र कहकर सम्बोधित किया गया। वस्तुतः शरीर ही एक क्षेत्र है। जब इसमें बहिर्मुखी प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है तब यही क्षेत्र कुरुक्षेत्र कहलाता है। इसी शरीर में जब परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिला देनेवाली प्रवृत्ति सबल हो उठती है तो यही शरीररूपी क्षेत्र उस धर्म से संयुक्त हो जाता है, तब यही धर्मक्षेत्र कहलाता है। उदाहरण के लिए वाल्मीकि का प्रारम्भिक जीवन! व्यक्ति वही है लेकिन सत्पुरुष का साथ हुआ तो बालमीकि भये ब्रह्म समाना। (मानस, 2/193/8) ब्रह्म के समानान्तर स्थितिवाले हो गये।

यह मन है तो अन्धा! अज्ञान से आच्छादित रहता है। (अज्ञान भी मन का एक स्तर है) अतः अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र! धृतराष्ट्र है तो अन्धा किन्तु संयमरूपी संजय के माध्यम से यह देखता और समझता है। अज्ञान इसका सहज है। इसलिए पूर्तिपर्यन्त मन में संस्कार मात्र भी जीवित है, इसकी दृष्टि सदैव कुरुक्षेत्र की ओर रहेगी। अयुक्त मन को एक ही इन्द्रिय घसीटकर पतित कर देती है- मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। (पंचदशी, 6।68) अतः पूर्तिपर्यन्त खतरा है-

हम जाने मन मर गया, मरा हो गया भूत।

मरते ही पुनि उठि लगा, ऐसा मना कपूत।।

मुएहु मन मनसिज जागा की उक्ति चरितार्थ होती है, ऐसा यह शत्रु है। इसलिए वह अन्धा अन्त तक दुर्योधन का पक्ष लेता रह गया। जबकि भली प्रकार जानता था कि पाण्डव सत्य पर हैं।

सैन्य निरीक्षण सैन्य निरीक्षण भी युद्धस्थल के आध्यात्मिक स्वरूप को उद्भासित करता है। कौरवों की सेना ग्यारह अक्षौहिणी और पाण्डव पक्ष में सात अक्षौहिणी सेना थी। दोनों पक्षों को मिलाने पर यह गणना साढ़े छः अरब के लगभग होती है। प्रायः उतनी, जितनी आज विश्व की जनसंख्या है। इतनी जनसंख्या कुरुक्षेत्र के सीमित मैदान में कट गयी, जानकर आश्चर्य होता है। किन्तु आध्यात्मिक जगत् में ठीक ऐसा ही है। कौरव पक्ष में दस इन्द्रिय और एक मन यही ग्यारह अक्षौहिणी सेना है। अक्ष दृष्टि को कहते हैं। मनसहित इन्द्रियमयी दृष्टि से जिसका संचालन है वही है कुरुक्षेत्र, अविद्या की पार्टी। मन और इन्द्रिय यदि अपने विषयों की ओर उन्मुख है तो मोहरूपी दुर्योधन, दुर्बुद्धिरूपी दुःशासन, काम, क्रोध, मद, लोभादि आसुरी प्रवृत्तियाँ रहेंगी ही। यही वह कुरुक्षेत्र है, इसी को आसुरी सम्पत्ति कहते हैं। दूसरी ओर योग की सात भूमिकामयी दृष्टि से जिसका गठन है वह है धर्मक्षेत्र, जिसमें अनुरागरूपी अर्जुन, कर्तव्यरूपी कुन्ती, भावरूपी भीम, धर्मरूपी युधिष्ठिर, सत्संग, नियम इत्यादि हैं। और सबके मूल में हैं सद्गुरुरूपी श्रीकृष्ण जो आत्मा से जागृत होकर रथी के रूप में पथ-संचालन करते हैं। इस प्रकार यह दैवी सम्पद् भी अनन्त हैं। दो दृष्टियों से सेनाओं का मूल्यांकन शास्त्रकार ने किया है, न कि वहाँ आमने-सामने कहीं कुछ खड़ा था।

वीरों का स्वरूप इस क्षेत्र में स्थित वीरों का स्वरूप भी आध्यात्मिक ही है। युद्ध आरम्भ होने के पूर्व दुर्योधन ने द्रोण से कहा कि अपने शिष्य धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की गयी पाण्डवों की सेना को देखिये! इन लोगों की यह सेना जीतने में सब प्रकार से सुगम है जबकि हमारी सेना सब प्रकार से अजेय है, जिसमें समितिंजय, कृपाचार्य इत्यादि हैं, जो अकेले ही सम्पूर्ण पाण्डवों को जीत सकते हैं। वस्तुतः कृपा का आचरण ही कृपाचार्य है। इष्ट और अपने बीच यदि सूत भर अन्तर है तो साधक को कृपा का एक आचरण ही पराभूत कर देगा। दया बिनु सन्त कसाई। दया करी तो आफत आई।। सीताजी न दया करतीं, न लंका में भोगना पड़ता। लक्ष्यप्राप्ति के पूर्व साधक कृपा के आचरण में उलझा तो कृपाचार्य समितिंजय बन जायेंगे, पूरे दैवी सम्पत्ति पर विजय पा लेंगे। किन्तु प्राप्ति के पश्चात् कृपा तो योगी का स्वरूप है। किन्तु अधूरी अवस्था में कृपा भी खतरा है।

उत्साहवर्धन करते हुए दुर्योधन ने निर्देश दिया कि भीष्म द्वारा रक्षित हमारी सेना सब प्रकार से अजेय है अतः हमलोग सभी मोर्चों पर भली प्रकार रहते हुए भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें। दुर्योधन संकेत करता है कि भीष्म चले गये तो फिर हमलोगों के लिए कोई चारा नहीं है। अतः भीष्म वह कौन-सी शक्ति है, जिसपर समग्र कौरव समूह निर्भर है? आप सब युद्ध न करें बल्कि भीष्म की रक्षा करें! वस्तुतः भ्रम ही भीष्म है। जब तक हमारे आपके भीतर भ्रम विद्यमान है, विकार अजेय हैं। जहाँ भ्रम का निदान हुआ तहाँ बन्धनकारक कर्म भी समाप्त हो जायेगा, मोह भी समूल नष्ट हो जायेगा।

भीष्म की एक विशेषता थी कि उनकी इच्छा-मृत्यु थी। इच्छा काया इच्छा माया, इच्छा जग उपजाया। कह कबीर जे इच्छा विवर्जित भ्रम नहीं तहँ भरमाया।। इच्छा ही काया और इच्छा ही माया है। इच्छा ने ही जगत् की उत्पत्ति की है। जब तक इच्छा है तब तक भ्रम तो जीवित रहेगा ही। इच्छा का अन्त नहीं दिखता किन्तु एक बिन्दु ऐसा भी है जहाँ जाकर इच्छा समाप्त हो जाती है और वह बिन्दु है- भगवत्प्राप्ति की इच्छा। भगवान अलग हैं और हम अलग हैं तो उन्हें प्राप्त करने की इच्छा स्वाभाविक है। किन्तु उनके प्राप्त होने पर उनसे श्रेष्ठ कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहता, ऐसी अवस्था में वह इच्छा, वह भ्रम निर्मूल हो जाता है। यह भीष्म की इच्छा-मृत्यु का रहस्य था। प्राप्ति के साथ ही इच्छा सर्वथा निर्मूल हो जाती है।

भीष्म उत्तरायण की प्रतीक्षा करते थे। सुरा की ऊर्ध्वरेता स्थिति ही उत्तरायण है। इंगला-पिंगला जिनमें क्रमशः चन्द्रमा और सूर्य का निवास है, ऐसी श्वास की गति सुरा है। वही जब प्रकृति से उपराम होकर ऊर्ध्व गमन करने लगती है, ईश्वर में प्रवाहित होने लगती है, उस स्थिति में भीष्म सदा-सदा के लिए मर जाता है; क्योंकि भगवान में भ्रम तो होता ही नहीं।

दूसरी ओर दुर्योधन कहता है कि भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की सेना जीतने में सब प्रकार से सुगम है। भावरूपी भीम! भीम था तो सबसे बलवान्, किन्तु वह वृकोदर था। उसका स्थान था उदर। आज भरा है तो कल खाली। भाव का निवास भी तो हृदय ही रहता है। भाव सबसे शक्तिशाली भी है। भावे विद्यते देवा’- यदि भाव हो तो वह परमदेव परमात्मा भी विदित हो जाता है। भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।(मानस, 7/92)- भाव में वह महान् शक्ति है कि भगवान को भी वश में कर लेता है। अब इससे बड़ी कौन-सी शक्ति होगी? किन्तु यह इतना नाजुक है कि आज भाव है तो कल अभाव में बदलते देर नहीं लगती। इसलिए दुर्योधन कहता है कि भीम द्वारा रक्षित यह सेना जीतने में सुगम है। साधारण विघ्नों का धक्का लगते ही भाव मिट जाता है।

दोनों पक्षों की शंखध्वनि तत्पश्चात् दोनों पक्षों की शंखध्वनियाँ हुईं जिससे युद्धक्षेत्र की अलौकिकता की पुष्टि होती है। शंखध्वनि का तात्पर्य अपने लक्ष्य का उद्घोष करना है कि यदि हम सफल हुए तो क्या कर दिखायेंगे, कौन-सी सुख-सुविधा देंगे। कौरवों की ओर से एक ही शंखध्वनि होती है। पितामह भीष्म ने सिंहनाद के समान गरजकर शंख बजाया। जंगल से आप गुजरें और खुले में शेर की गर्जना सुनाई पड़ जाय तो रोंगटे खड़े हो जायेंगे। सिंह भय का प्रतीक है। भय प्रकृति में है, भगवान में नहीं। अतः भ्रमरूपी भीष्म यदि सफल होता है तो भय की और भी गहरी पर्तों पर आपको खड़ा कर देगा। संसार में तो आप पहले से हैं ही, जिसमें भय ही भय है। भ्रम प्रबल होते ही आप भय से और भी अधिक प्रभावित हो जायेंगे। इससे आगे कौरवों की गति नहीं है। माया के हजार बन्धन हैं तो लाख हो जायेंगे, अनन्त हो जायेंगे, भय की ओर ही मात्रा बढ़ती जायेगी। इसके आगे और कोई घोषणा नहीं है। फिर कौरवों की ओर से कई बाजे बजे, नगाड़े बजे; किन्तु शंखध्वनि नहीं हुई।

तदनन्तर पाण्डवों की ओर से शंखध्वनि हुई। अलौकिक रथ (वह लौकिक रथ भी नहीं था कि चार पहियों या चार घोड़ों वाला रहा हो) पर बैठे हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पांचजन्य नामक शंख बजाया। इन्द्रियों की पंच तन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, जो प्रारम्भ में विकृत थीं) को ‘जन’ की श्रेणी में नियुक्त कर देना अन्तर्यामी सद्गुरु पर निर्भर करता है। सद्गुरु आत्मा से जागृत होकर इन पाँचों के बहिर्मुखी प्रवाह को संयमित कर उन्हें जन की स्थिति में ढाल देता है, उन्हें सेवक बना देता है। इन्द्रियाँ बाधक नहीं, सहयोगिनी बन जाती हैं। यह स्थिति सद्गुरु-कृपा की ही देन है। श्रीकृष्ण भी एक योगी ही थे, सद्गुरु थे। अर्जुन प्रणत होता है, शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् (गीता, 2/7)- भगवन्! मैं आपका शिष्य हूँ, धर्म के विषय में मोहित मैं आपकी शरण हूँ। वही उपदेश कीजिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ। निःसन्देह अर्जुन एक शिष्य है और योगेश्वर श्रीकृष्ण सद्गुरु के स्थान पर हैं।

पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः’- अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया। ‘अनुरागरूपी अर्जुन’। यदि तीव्र अनुराग है तो साधक दैवी सम्पत्ति पर अधिकार प्राप्त कर लेता है, जो परमदेव परमात्मा में विलय करानेवाली है। इसीलिए अर्जुन का नाम धनंजय भी है। पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदरः। (गीता, 1/15)- वृकोदर भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया। भाव सफल होता है तो इष्ट में प्रीति और प्रवृत्ति होती है। यही पौण्ड्र है।

नकुल ने सुघोष नामक शंख बजाया। नियमरूपी नकुल। ज्यों-ज्यों आप नियम में प्रवृत्त होते जायेंगे, अशुभ का दमन और शुभ घोषित होता जायेगा। इसी प्रकार सहदेव ने ‘मणिपुष्पक’ शंख बजाया। सत्संगरूपी सहदेव! महर्षियों ने प्रत्येक श्वास को मणि की संज्ञा दी है- तेरी हीरा जैसी स्वाँस, बातों में बीती जाय रे।पत्थर की मणि तो कठोर है जो बाहर मिलती है लेकिन यह श्वासरूपी मणि कुसुम सदृश कोमल है। आज है तो कल के लिए निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते। श्वास टूट गयी तो सदा के लिए चली जाती है इसलिए बहुमूल्य है। अतः एक भी श्वास इष्ट के नाम से खाली न जाय। श्वास-प्रश्वास में गमन की क्षमता आ जाय, ‘रिनक-धिनक धुनि अपने से उठे’ तो एक-एक श्वास मणि की श्रेणी में आ जाती है। श्वास-प्रश्वास की यह क्रिया सत्संग द्वारा जागृत हो जाती है और एक भी श्वास व्यर्थ न जाय, यह सत्संग पर निर्भर करता है। यदि सत्संग कामयाब होने लगता है तो उस मणि पर, श्वास-प्रश्वास पर अधिकार दिला देता है।

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः (गीता, 1/16)- युद्धे स्थिर सः युधिष्ठिरः’- इस आत्मिक संघर्ष में वही स्थिर रह पाते हैं जिनके अन्तःकरण में धर्म का संचार हो। धर्मरूपी युधिष्ठिर। परमधर्म परमात्मा ही है। धैर्यपूर्वक अभ्यास करते-करते साधक जब परमधर्म का स्पर्श पा जाता है अर्थात् धर्म जब हृदय में कामयाब हो जाता है तो अनन्तविजयम्’- उस अनन्त, अखण्ड, व्यापक ब्रह्म पर विजय मिल जाती है। यह असम्भव से सम्भव हो जाता है।

लीजिए! कहीं ‘अनन्तविजय’, कहीं ‘देवदत्त’, कहीं ‘पौण्ड्र’, कहीं ‘पांचजन्य’ जैसे शंख बज रहे हैं और स्वयं सूत्रकार का कहना है कि सभी शंख, सभी घोषणाएँ दिव्य हैं, अलौकिक हैं, लौकिक नहीं। संसार के प्रति इनकी दृष्टि थी ही नहीं। अब आप ही बताइए कि यह कैसा युद्ध-क्षेत्र है?

अर्जुनविषाद युद्धस्थल में अर्जुन ने कहा- भगवन्! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए। मैं देख तो लूँ कि किनसे लड़ना है? श्रीकृष्ण ने रथ बीच में खड़ा किया तो अर्जुन काँपने लगा। उसे पिता के भाई, पितामह, आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र, ससुर और सुहृद् दिखाई पड़े। अठारह अक्षौहिणी सेना में अर्जुन को पिता का परिवार, मामा का परिवार और ससुराल का परिवार ही दिखाई पड़ा। क्या सब-के-सब अर्जुन के रिश्तेदार ही थे? नहीं, वस्तुतः भगवत्पथ में चराचर जगत् ही युद्ध के रूप में उपस्थित है। अतः यह कहना असम्भव है कि संख्या प्रमाण क्या है? दो दृष्टियों से सेना का विभाजन मात्र है। इनमें अर्जुन ने अपने परिवार और हितैषियों को ही खड़ा पाया। सबसे पहले अर्जुन ने उन्हें देखा और व्यग्र हो उठा। देखिए, अनुरागरूपी अर्जुन। अनुरागी जब इष्ट के पथ पर अग्रसर होता है तो पारिवारिक आसक्ति उसके समक्ष विकराल रूप लिये आती है। पूज्य परमहंसजी कहते थे, ‘‘मरब और साधू होब बराबर है।’’ मरना और साधू होना बराबर है। संसार में और कोई जीवित है भी किन्तु घरवालों के नाम पर कोई नहीं, कभी नहीं। यदि कुछ भी आसक्ति बनी है तो उसका कल्याण नहीं होता, जन्म लेना पड़ता है। इसीलिए इतना बड़ा प्रतिबन्ध है। मन से विस्मरण करना और मरना एक-जैसी ही बात है। सांसारिक बन्धन मन की कल्पना मात्र है। इन सम्बन्धों का विस्मरण भी मरण ही है। चेतनारहित होने पर सभी सम्बन्ध लुप्त हो जाते हैं। अतः साधक के लिए लौकिक स्नेह-सम्बन्धों का विस्मरण ही श्रेयस्कर है।

इस प्रकार साधक के समक्ष सर्वप्रथम यही समस्या रहती है कि अबोध बच्चों, मामा का परिवार, चाचा का परिवार, सगे-सम्बन्धियों का त्याग कैसे किया जाय? इनके प्रति भी तो कुछ धर्म होता है। इनका पालन-पोषण भी तो कर्तव्य है। यही तो सनातन कुलधर्म है। धर्म के नाम पर प्रायः ऐसी कुरीतियाँ सदा ही पनपती रही हैं। मुसलमानों के आगमन के साथ तथा अद्यावधि ऐसी ही भ्रान्ति है कि स्पर्श करने या उनका एक ग्रास चावल खाने से, एक घूँट पानी पीने से सनातन-धर्म नष्ट हो जायेगा। ऐसी ही एक कुरीति का शिकार अर्जुन भी था। वह भी इन्हीं की दुहाई देने लगा कि अपने ही परिवार का क्षय करने से वह कुलक्षय के दोष का भागी बनेगा और इस प्रकार सनातन-धर्म भी नष्ट हो जायेगा। वह यह नहीं कहता कि हम भूल कर रहे हैं बल्कि कहता है कि हमलोग महान् पाप करने को उद्यत हुए हैं अर्थात् श्रीकृष्ण पर भी आरोप लगाता है कि आप भी पाप करने जा रहे हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन इस विषम स्थल में तुझे अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हो गया? विषम अर्थात् जिसकी समता का कोई स्थल है ही नहीं। जिस युद्ध की बात मैं कर रहा हूँ उसके समानान्तर कोई युद्धक्षेत्र ही नहीं है। कुलधर्म नष्ट हो जायेगा, यह अज्ञान की बात कैसी, क्यों? अर्जुन सनातन धर्म के लिए विकल था। क्या सनातन-धर्म की रक्षा की बात करना अज्ञान है? श्रीकृष्ण कहते हैं- हाँ, अज्ञान ही है। न तो श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा इसका कभी आचरण किया गया, न संसार में कीर्ति बढ़ानेवाला है और न तो यह परमकल्याण ही करनेवाला है। सम्भावित पुरुषों ने जिसका आचरण नहीं किया, सिद्ध है कि वह अज्ञान ही है।

अर्जुन ने समर्पण कर दिया कि भगवन्! धर्म के विषय में मैं मूढ़चित्त हूँ। मैंने सुना है कि यही धर्म है। सत्य क्या है, मैं नहीं जानता। जो सत्य हो उसे आप मेरे प्रति कहिए, जिससे मैं परमकल्याण को प्राप्त हो जाऊँ। पृथ्वी अथवा त्रिलोकी के धन-धान्यसम्पन्न साम्राज्य के लिए भी मैं युद्ध नहीं करना चाहता। क्योंकि देवताओं का स्वामी होने पर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखानेवाले इस शोक को दूर कर सके। इससे भी श्रेष्ठ कोई वस्तु हो तो आप उसे मेरे प्रति कहिए। विलक्षण था वह युद्धक्षेत्र, जो भौतिक उपलब्धियों के लिए नहीं वरन् उससे भी श्रेष्ठ स्थिति के लिए आपका आह्नान करता है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि सत्य वस्तु का तीनों काल में अभाव नहीं है और असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है। अर्जुन! यह आत्मा ही परमसत्य है, यही सनातन है। अग्नि इसे जला नहीं सकती, वायु इसे सुखा नहीं सकता, जल इसे गीला नहीं कर सकता। शरीर के मरने पर भी यह मरता नहीं। यह अजर, अमर, अविनाशी, अपरिवर्तनशील है और यही सनातन है। भौतिक क्षेत्र में उत्पन्न होनेवाला कोई पदार्थ जिसका स्पर्श भी नहीं कर पाता, उसका नाम सनातन है, तो केवल खाने-खिलाने से, एक घूँट पानी पीने से वह सनातन नष्ट कैसे होगा? हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है, वह भ्रष्ट नहीं हो सकता। ऐसी ही शंकाओं का निराकरण श्रीकृष्ण ने गीतोक्त कुरुक्षेत्र में किया था और ऐसा ही था वह युद्धस्थल, जिसमें विकारों से लड़कर सनातन एवं अव्यय स्थिति की प्राप्ति का मार्ग सद्गुरु श्रीकृष्ण ने अनुरागी अर्जुन को बताया; केवल बताया ही नहीं, उस पर चला भी दिया।

प्रश्नमहाराजजी! कुरुक्षेत्र को आप विजातीय पार्टी कहते हैं लेकिन उस कुरुक्षेत्र में तो कौरव और पाण्डव दोनों ही सेनाएँ एकत्र हुई थीं।

उत्तर कौन कहता है कि आध्यात्मिक कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ एकत्र हुईं। श्रीकृष्ण कहते हैं ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’- धर्मक्षेत्र में और कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छावाले एकत्र हुए थे; इसे क्यों नहीं याद रखते? धर्म एक क्षेत्र है, कुरु एक अलग क्षेत्र है।

प्रश्नक्या महाभारत युद्ध की ऐतिहासिकता सन्दिग्ध है?

उत्तर ऐसी बात नहीं है कि महाभारत युद्ध नहीं हुआ। युद्ध अवश्य हुआ। महापुरुषों ने उस संघर्ष को दृष्टान्त बनाकर उसी के माध्यम से हृदय-देश में प्रकृति और पुरुष के बीच संघर्ष का चित्रण किया। घटना घटी न होती तो उदाहरण कहाँ से आते? महाभारत, गीता इत्यादि मात्र ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं हैं। श्लिष्ट एवं यौगिक शब्दों में लिखे गये इन ग्रन्थों में आध्यात्मिक रहस्य अनुस्यूत हैं जिनपर चलकर विश्व का कोई भी मानव परमकल्याण की अनुभूति कर सकता है। यही मानव-तन की चरम उपलब्धि भी है।

वस्तुतः प्रत्येक शास्त्र की रचना दो दृष्टियों से हुआ करती है। तत्त्वज्ञ मनीषियों का यही चिरन्तन विधान रहा है। शास्त्रों की संरचना में उनके दो अभिप्राय रहे हैं, एक तो इतिहास को जीवित रखना, जिससे भावी पीढ़ी को संसार में जीवनयापन का मर्यादित मार्गदर्शन मिल सके। पिता-पुत्र, भाई-बहन, माता-पिता, सुहृद, मित्र तथा पूज्य गुरुजनों के प्रति आदर्श व्यवहार का प्रशिक्षण इन शास्त्रों के माध्यम से प्रदान करना मनीषियों का प्राथमिक लक्ष्य रहा है किन्तु कुशलतापूर्वक जी-खा लेने मात्र से हमारे कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाती। इससे कल्याण की भूमिका अवश्य तैयार होती है किन्तु इतने से ही वह परमकल्याण सम्भव नहीं जो परमतत्त्व की उपलब्धि से होता है। आत्मिक पथ को प्रशस्त करना, यौगिक प्रक्रिया का सम्यक् जागरण कराना तथा उस पर मानव-मात्र को चलाना शास्त्र-रचना का मूल हेतु है। इस पहलू के निरूपण में उस घटित घटना को महापुरुष उदाहरण के लिए ले लेते हैं, जिसे साधक सरलता से हृदयंगम कर लेता है। यही कारण है कि तत्त्वज्ञ मनीषियों ने रोचक, भयानक कथानकों के बीच-बीच में यथार्थ का भी संकेत किया जिससे अधिकारी उसे ग्रहण कर सकें और उस पर चलकर जन्म-मृत्यु की असह्य यातनाओं से छुटकारा पाकर परमश्रेय को प्राप्त कर सकें।

।। ओम्।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

Q & A
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