क्या हिन्दू–धर्म किसी जीवन–शैली का नाम है?
(भक्तों द्वारा एक पत्र के माध्यम से जिज्ञासा की गई कि क्या हिन्दुत्व किसी जीवन शैली का नाम है? इसी के सन्दर्भ में शक्तेषगढ़ आश्रम की सायंकालीन सभा में दिनांक २५ दिसम्बर, सन् २००५ को महाराजश्री द्वारा दिया गया समाधान)
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने ११ नवम्बर, सन् १९९५ ई. को एक निर्णय में घोषित किया कि हिन्दुत्व भारतीयों की जीवन-शैली है। कतिपय वरिष्ठ राजनेता भी इसी तरह के विचार समय-समय पर व्यक्त करते रहते हैं।
अभी इसी वर्ष (२००५ ई०) में भारत से कुछ लोग जर्मनी पुस्तक मेले में गये थे। उन्हें यह देखकर क्षोभ हुआ कि वहाँ के हवाई अड्डे पर ईसाई, यहूदी, पारसी, इस्लाम इत्यादि धर्मावलम्बियों के लिए पृथक्-पृथक् उपासना-स्थल नियत हैं किन्तु हिन्दुओं के लिए कोई स्थान निर्धारित नहीं था।
सचाई तो यह है कि धर्म को आपके आचार्यों ने बाहर निकलने ही कब दिया था? समुद्र पार करना जिन्होंने प्रतिबन्धित कर रखा हो, उनसे कैसे आशा की जा सकती है कि वे धर्म को विदेशों में जाने की अनुमति देंगे? हिन्दुओं में धर्म के नाम पर जो कुछ भी प्रचलित है उसे विवेकानन्द जी ने जीवन-पद्धति की संज्ञा दी। क्या गलत कहा उन्होंने? यहाँ धर्म के नाम पर जो कुछ भी प्रचलन में है, जीवन-शैली ही तो है। चार वर्णों में बँटा समाज, कौन मन्दिर जाय कौन न जाय? कौन अच्छा खाये कौन नहीं? कौन अच्छे वस्त्र पहने?- यह जीवन-शैली नहीं तो और क्या है?
जीवन-पद्धति देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप बदलती ही रहती है, जबकि धर्म अपरिवर्तनशील होता है। एक ओर जीवन-यापन की सांसारिक व्यवस्था और दूसरी ओर परमात्मा में प्रवेश, स्थिति! दोनों की क्या तुलना हो सकती है? किसी जीवन-शैली को धर्म के समकक्ष स्थान देने के लिए आप आहें क्यों भर रहे हैं? जब यह धर्म नहीं है, मात्र जीवन-शैली है तो धर्म से क्यों होड़ लगाते हैं?
धर्म का विशुद्ध रूप तत्सामयिक आचार्यों ने भारतीय जनमानस तक जाने ही नहीं दिया, विदेश की तो बात ही छोड़िये। शासन-सूत्र और सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए महापुरुषों के नाम से स्मृति-ग्रन्थों की रचना करके जीवन-पद्धति को ही धर्म-धर्म कहकर भावप्राण जनता के समक्ष रखा गया और जनता इस जीवन-पद्धति को ही धर्म समझ बैठी। शिक्षा को प्रतिबन्धित कर व्यवस्थाकारों ने इन स्मृतियों को भी छिपाकर रखा। इनमें लिखा है कि इन स्मृतियों को वही पढ़ सकता है जो गर्भाधान से चिता तक का मन्त्र जानता हो। केवल ब्राह्मण होना इसे पढ़ने के लिए पर्याप्त नहीं है, अधिकांश ब्राह्मण भी इसे नहीं जानते थे।
उन स्मृतियों की व्यवस्था थी कि जाति-पाँति में जीवन-यापन करना धर्म है, उसका उल्लंघन अधर्म है। शूद्र मन्दिर न जाय, शादी-विवाह में भी कमर से ऊपर वस्त्र न पहने। वह गाय का दूध पिये तो नरक जाय। अध्ययन-अध्यापन पर ब्राह्मणों का एकाधिकार, मन्त्रीपद ब्राह्मण को, न्याय ब्राह्मण के परामर्श से….। छोटे-मोटे न्याय ब्राह्मण ही करेगा, राजा करता है तो नरक जायगा। बड़े मामलों में ब्राह्मण राजा से भी परामर्श कर ले। धर्माध्यक्ष ब्राह्मण! अब रियासतों के ये कानून प्रभावी नहीं रहे, इन्हें माननेवाला कोई नहीं, इन पर चलनेवाला कोई नहीं और इस व्यवस्था पर उँगली उठानेवाले करोड़ों हैं तो इस व्यवस्था को धर्म कहने की भूल का सुधार क्यों न कर लिया जाय?
क्यों न धर्म के विशुद्ध स्वरूप की पहचान की जाय और उसे जन-जन तक, देश-विदेश में प्रसारित किया जाय? इस प्रयास में सर्वप्रथम धर्म को उन धर्माचार्यों से मुक्त कराना होगा जो रूढ़ियों को धर्म कहकर जकड़कर बैठे हैं, जिन्हें वे लम्बे समय से मनुष्यों पर थोपते आये हैं। हिन्दुओं के इतने पतन के बाद आज भी वे उन पर अपना विशेषाधिकार मानते हैं।
धर्म बचा था महापुरुषों के चिन्तन में, जो शान्त एकान्त जंगल में चिन्तनरत थे। उनके हृदय में धर्म तब भी सुरक्षित था, आज भी है। उनसे धर्म की परिभाषा लें, प्रसारित करें। ईसाई, यहूदी और इस्लामिक देशों में भी आपके लिये उतनी ही जगह है। पहले धर्म की परिभाषा प्रसारित तो करें।
धर्म गढ़ना नहीं है, वह तो अपौरुषेय है। धर्मशास्त्र भी परमात्मा के श्रीमुख की वाणी श्रीमद्भगवद्गीता ही है। उसे जन-जन तक पहुँचाना आपका दायित्व है।
गीता की बहुमान्य टीकाएँ समय-समय पर होती रही हैं, सबने विविध दृष्टिकोणों से इस धर्मशास्त्र को देखने का प्रयास किया, सबकी अपनी उपयोगिता है, अपना सौन्दर्य हैं; किन्तु इन सबके होते हुए भी लाखों-करोड़ों हिन्दुओं का धर्मान्तरण रुकने का नाम नहीं ले रहा है। आवश्यकता है गीता के ऐसे भाष्य की जो झोपड़ी से महलों तक सबको एक जैसा आश्वस्त कर सके, जिससे ऊँच-नीच, अमीर-गरीब सब एक थाली में खाने लगें, एक माँ की सन्तान के रूप में सबको पहचानने लगें। गीता की सहज, सरल व्याख्या जो कृत्रिम न हो, अक्षरशः वही भाव हो जो भगवान् श्रीकृष्ण के थे- ऐसी बोधगम्य व्याख्या के रूप में गीता भाष्य ‘यथार्थ गीता’ आप सबके अनुशीलन के लिए प्रस्तुत है। उसकी तीन-चार आवृत्ति मात्र से धर्म अपने विशुद्ध स्वरूप में उद्भासित होने लगता है।
धर्म आपको मन, कर्म, वचन से एक परमात्मा के प्रति समर्पण दिलाता है। भली प्रकार समर्पण सधते ही वह परमात्मा आपके अन्तःकरण से जागृत होकर उठाने-बैठाने, मार्गदर्शन करने लगते हैं, सद्गुरु का परिचय देते हैं। सद्गुरु के उपलब्ध होते ही मार्ग प्रशस्त होने लगता है, अन्तःप्रेरणा होने लगती है अन्यथा विश्व भर की जानकारियों का संग्रह करके भी कोई भाषा और बुद्धि-कौशल से धार्मिक निर्णय नहीं दे सकता। महापुरुषों के अभाव में समाज में भगवान् के प्रति श्रद्धा घट जाया करती है। बौद्धिक निर्णयों की देन है कि व्यवस्था, रीति-रिवाज ही धर्म का स्थान ले लेते हैं। सद्गुरुओं के अभाव में समाज नास्तिक हो जाता है। मनुष्य श्रद्धा का पुतला है। विकल होकर यह भगवान् को ढूँढ़ता है। व्यवस्थाकार इन्हें कुछ-न-कुछ पकड़ाते चले जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण के समय में भी भारत अनेकानेक कुरीतियों में उलझा था, भगवान् ने उन कुरीतियों का निवारण किया।
ठीक उसी प्रकार आज भारत शास्त्रविहीन भटक रहा है। जब शास्त्र विस्मृत हो गया, तो जिसने जो कह दिया धर्म बन बैठा। करोड़ों भगवान्, करोड़ों मंत्र, करोड़ों पूजा-पद्धतियों में श्रद्धा का पुतला, ऋषियों की संतान भारत भटक रहा है।
आपका सर्वोपरि धर्मशास्त्र गीता है। विश्व का आदि धर्मशास्त्र गीता ही है। मनुष्य के जन्म से भी पूर्व प्रसारित परमात्मा के श्रीमुख की वाणी गीता ही है। यह महाराज मनु को विरासत में मिली थी, जिसको उन्होंने स्मृति में धारण कर लिया इसलिए ‘मनुस्मृति’ गीता ही है।
गीता के होते हुए समाज में सम्प्रदाय, भ्रान्तियाँ, मत-मतान्तर, ऊँच-नीच, छूत-अछूत, सवर्ण-अवर्ण का गठन हो ही नहीं सकता। यह सब गीता के विस्मृत हो जाने का दुष्परिणाम है क्योंकि गीता के अनुसार हम सभी ईश्वर की सन्तान हैं, उतने ही पावन जितने भगवान्।
गीता के अनुसार एक आत्मा ही शाश्वत है, परम सत्य है, सनातन है। वे ही कण-कण में व्याप्त हैं। वह सर्वत्र से देखते और सुनते हैं। हम-आप संकल्प बाद में करते हैं, वह पहले से जानते हैं। उन एक परमात्मा की शरण जाना, उन्हें अपने श्रद्धापूरित हृदय में धारण करना धर्म है। जो उनके प्रति आस्थावान् है आस्तिक है, अस्तित्व का उपासक है इसलिये आर्य है।
उन परमात्मा के प्रति समर्पण से साथ उठना-बैठना, प्रत्येक कार्य समर्पण के साथ आरम्भ और सम्पन्न करना आर्यव्रत है, आर्य-संस्कृति है।
उन परमात्मा को देखना, स्पर्श करना, उनमें प्रवेश करना, उनमें स्थिति प्राप्त करना और उनकी समग्र विभूतियों से अवगत होना आर्य-विधि है। यही आर्य-विधि मानव-संहिता गीता है।
ओम् का जप आर्य-विधि की जागृति है। मात्र जीवन-शैली को ही धर्म की संज्ञा देना भयंकर भूल है। इसका सुधार अपेक्षित है। हमारा प्राचीन नाम ‘आर्य’ था। एक ईश्वर के दर्शन की विधि आर्य-विधि है। कालान्तर में इसका नाम ‘सनातन’ पड़ा क्योंकि आत्मा शाश्वत है, सनातन है। उसकी प्राप्ति की विधि होने के कारण ‘सनातन’ कहा गया। ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।’– इस जगत्-रूपी रात्रि में परमात्मा का क्षीण प्रकाश सदा हृदय में विद्यमान है इसलिये एक नाम ‘हिन्दू’ पड़ा। तीनों नामों का अर्थ एक ही है। तीनों परम पवित्र हैं। इसका आशय है कि जगत् के अन्धकार में होते हुए भी हृदय-देश में वह परमात्मा सदा विद्यमान है। गीता १३/१७ में है कि वह ज्ञेय ब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति है। तम से अत्यन्त परे पूर्ण ज्ञानस्वरूप है। ज्ञान द्वारा ही प्राप्त होनेवाला है। सबके हृदय में स्थित है। ‘हृदि सर्वस्य विष्ठितम्’ उसका निवास स्थान हृदय है। हृदयस्थ ईश्वर का उपासक होने से हिन्दू कहलाये। यह शब्द आर्य और सनातन का ही बोधक है। यही आशय गीता के ‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो’ (१५/१५) तथा ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।’ (१८/६१) में भी द्रष्टव्य है।
।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान् की जय।।
(‘अनछुए प्रश्न’ से उद्धृत)