क्या राम एवं श्रीकृष्ण अन्य अवतारों की अपेक्षा विशेष थे?

एक भाविक का प्रश्न

प्रश्नमहाराजजी! इस पुस्तक में आपने बताया है कि अवतार पिण्डों में नहीं हो सकता, बल्कि किसी शरीर को ग्रहण कर लेता है इसलिए पिण्डवाला है। चौबीस अवतारों में से अधिकांश महापुरुष हैं, जिन्होंने साधना के माध्यम से अवतार की स्थिति प्राप्त की; किन्तु भगवान राम एवं श्रीकृष्ण के जीवन में तो बाल्यकाल से ही अलौकिक लीलाओं का समावेश मिलता है, जिसमें साधन माध्यम नहीं है। क्या राम एवं श्रीकृष्ण अन्य अवतारों की अपेक्षा विशेष थे?

उत्तरदेखिये, महाभारत-युद्ध के प्रारम्भ में युधिष्ठिर जय-पराजय की चिन्ता में युद्ध से कतराने लगे। तब अर्जुन ने उन्हें समझाया- राजन्! यह श्रीकृष्ण जिधर रहते हैं, उधर ही विजय है- ऐसा नारदजी ने कहा है। श्रीकृष्ण गत छः जन्मों से महापुरुष रहे हैं। एक जन्म में इन्होंने प्रभास क्षेत्र की स्थानीय जनता को उपदेश किया। एक कल्प में वे ‘यत्र सायं-गृह’ मुनि के वेश में विचरण करते रहे, अर्थात् दिन भर चलते-चलते जहाँ भी शाम हो जाती थी, रात्रि वहीं निवास करते थे। कल्प का आशय यहाँ जन्म से है। एक कल्प में आप पुष्कर तीर्थ में बारह वर्षों तक एक पैर पर खड़े रहकर यज्ञ कराते रहे। एक पग का तात्पर्य एक टेक, एक लक्ष्य पर दृढ़ रहना है। एक कल्प में आप बद्रिकाश्रम में घोर तपस्या में संलग्न रहे और इस कल्प में आप साक्षात् परमात्मा के रूप में हैं। राजन्! श्रीकृष्ण आपके पक्ष में हैं अतः आपकी विजय अवश्यंभावी है।

इस प्रकार श्रीकृष्ण पिछले छः जन्मों से साधना कर रहे थे। वस्तुतः अनेकजन्मसंसिद्धः ततो याति परां गतिम्– योगी लगातार प्रयत्न करता हुआ अनेक जन्मों की सिद्धि के अनन्तर परमगति को पा जाता है (गीता, ६/४५)। बहुत से महात्मा भजन करते-करते महाविदेहावस्था में पहुँच जाते हैं; किन्तु अपने अन्तःकरण में उस परम चेतन की अनुभूति प्राप्त करने के पूर्व ही शरीर का समय समाप्त हो जाता है तो वे मुक्त नहीं हो जाते, उन्हें जन्म लेना पड़ता है। उनकी उपलब्धि में साधन माध्यम नहीं होता बल्कि जन्म लेना ही माध्यम होता है। ऐसे योगी ‘भव प्रत्यय योगी’ कहलाते हैं- भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्। (पातंजल योगदर्शन, समाधिपाद, १९) विदेह और प्रकृतिलयों को जन्म से ही उपलब्धि होती है। श्रीकृष्ण ठीक इसी स्तर के महापुरुष थे। राम का भी यही स्वरूप है।

न केवल भारत अपितु विश्व में जिन्हें अवतार माना गया, सब-के-सब मनुष्य ही थे। साधारण मनुष्य की तरह उन्होंने जन्म लिया, उसी तरह उनका भी पालन-पोषण हुआ; किन्तु भजन के क्रियात्मक पथ पर चलकर उन्होंने लक्ष्य प्राप्त कर लिया तो समाज ने उन्हें अवतार के रूप में पहचाना। गौतम बुद्ध राजा के लड़के थे, ईसा एक गड़ेरिया के लड़के थे, तो हजरत मुहम्मद साधारण व्यापारी थे। राम-कृष्ण से वे किन अर्थों में न्यून थे? आज अकेले बौद्धों की संख्या राम-कृष्ण के अनुयायियों से डेढ़ गुनी है। गौतम को वे उतना ही सम्मान देते हैं जितनी मान्यता राम या श्रीकृष्ण को कुछ हिन्दू देते हैं; किन्तु सुविज्ञ हिन्दू एक ही दृष्टि से देखता है। वैसे बुद्ध भी चौबीस अवतारों में से एक तथा हिन्दूधर्म की ही शुद्ध विभूति हैं।

साधना के सही दौर में पड़कर यह जीवात्मा क्रमशः उत्थान करते-करते उस परम का स्पर्श पा जाता है जिसका यह अंश है। वस्तुतः भगवान जब अपनाते हैं, तो अपने में विलय दे देते हैं। प्रत्येक अवतार इसी तरह होते हैं। तत्त्वस्थित जितने महापुरुष अवतार कहलाये, सभी को साधन-पथ से गुजरना पड़ा है। श्रीकृष्ण इत्यादि ने इस जन्म में श्रम नहीं किया किन्तु साधन-क्रम उनके पूर्वजन्मों में पाया जाता है। उपलब्धि और क्षमता की दृष्टि से सभी अवतार और तत्त्वदर्शी महात्मा एक ही स्तर के होते हैं; क्योंकि वह परमात्मा एक ही है, इसीलिए प्राप्तिकाल में सभी महापुरुषों को एक-जैसी अनुभूति हुई और सभी उस सत्ता से समान अलंकृत हुए। तुम्हें महापुरुष का सतत सान्निध्य मिलना चाहिए जिससे क्रियात्मक पद्धति को हृदयंगम कर सको, फिर सन्देह नहीं होगा।

।। ॐ।।

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतोऽर्जुन।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।

हे अर्जुन! सुकृतिनः– उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम में श्रेय की प्राप्ति हो, उसको) करनेवाले, अर्थार्थी अर्थात् सकाम, आर्तः अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, जिज्ञासुः अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और ज्ञानी अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में हैं- ये चारों प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं।

यथार्थ गीता : श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ७, श्लोक १६)

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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