धर्मान्तरण क्या है एवं क्या धर्म परिवर्तनशील होता है?

प्रश्नधर्मान्तरण क्या है? क्या धर्म परिवर्तनशील होता है?

उत्तर :- सबका धर्म एक है, अतः परिवर्तन का प्रश्न ही नहीं उठता। मनुष्य का स्वभाव दो प्रकार का होता है, देवताओं-जैसा और असुरों-जैसा। दैवी स्वभाववाला परिवर्तित होगा तो अधिक से अधिक आसुरी सम्पद् का शिकार हो जायेगा, अन्य कुछ भी नहीं होगा। कल्पना करें कि कोई दूसरा भी धर्म है तो यह सम्भव नहीं है; क्योंकि धर्म एक ही है। हाँ, आपकी अवस्थाएँ ऊँची-नीची आरंभिक पाठशालाएँ हैं। एक सीमा तक ये अलग-अलग प्रतीत होती हैं किन्तु साधना की एक निश्चित सीमा पार कर लेने पर महापुरुष के समक्ष लक्ष्य एक है। निरीक्षक-परीक्षक भी एक ही है। उसके निर्देशन में चलने का नाम ही धर्माचरण है। इस स्तर के साधक एक माँ की सन्तान के रूप में परस्पर स्नेहिल व्यवहार रखते हैं। धर्मान्तरण की बात वे नहीं कर सकते। धर्मान्तरण के झगड़े शिशु कक्षाओं के हैं, धर्म के नहीं।

धर्म का अन्तरण नहीं, ह्रास होता है। गीता के अनुसार, एक आत्मा ही सत्य है। इसे शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि जला नहीं सकती, वायु सूखा नहीं सकता, जल इसे गीला नहीं कर सकता, आकाश इसे अपने में विलीन नहीं कर सकता अर्थात् पंचभूतों (क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर) से निर्मित कोई भी पदार्थ इस आत्मा का स्पर्श ही नहीं कर सकता तो किसी के हाथ का दो घूँट पानी पीने से, दो ग्रास चावल खा लेने से सनातन धर्म नष्ट कैसे हो गया? अविनाशी का विनाश, यह भ्रान्ति गीता के विस्मृत हो जाने का दुष्परिणाम था। नित्य, सत्य, सनातन धर्म भी क्या परिवर्तनशील हो सकता है?

गीता के अनुसार, सत्य सनातन केवल आत्मा है। उसे विदित करने की विधि, योग-विधि यज्ञ है। चौदह प्रस्तरों में गीता में यज्ञ समझाया गया है, जैसे-यज्ञस्वरूप महापुरुष की शरण, उसके स्वरूप का ध्यान, इन्द्रियों का संयम, ॐ का जप, श्वास-प्रश्वास का यजन, प्राणायाम इत्यादि। इस यज्ञ का परिणाम है ज्ञानामृत अर्थात् अमृत का ज्ञान, अजर-अमर-शाश्वत तत्त्व परमात्मा का ज्ञान और उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला योगी सनातन ब्रह्म में स्थित हो जाता है। यज्ञ कोई ऐसी विधा है जो सनातन ब्रह्म में प्रवेश और स्थिति दिलाता है।

ये यज्ञ जिस उपाय से सम्पन्न होते हैं उसका नाम है कर्म। अब हल जोतने, सर्विस करने जैसे क्रिया-कलापों के परिणाम में परमात्मा मिलते हों तो करें; किन्तु ऐसा होता नहीं। यह कर्म शांत-एकान्त में चिन्तन द्वारा सचेतावस्था में करने से ही होता है।

सारांशतः सत्य, नित्य, सनातन है आत्मा। उसे विदित करने की योग-विधि यज्ञ है। इस यज्ञ को चरितार्थ करना कर्म है। कर्म की परिपक्व अवस्था में मृत्यु से परे अमृत तत्त्व का ज्ञान और स्थिति है। इस कर्म को करने की दृष्टियाँ दो हैं- ज्ञानमार्ग और निष्काम कर्मयोग।

ज्ञानमार्ग का यह अभिप्राय नहीं है कि हाथ पर हाथ रखकर बैठ जायँ और कहते रहें कि मैं आत्मा हूँ, ब्रह्म हूँ, पूर्ण हूँ, मैं शरीर नहीं हूँ। ज्ञानमार्ग में भी युद्ध करना है, विजातीय प्रवृत्तियों का पार पाना है। हानि-लाभ का निर्णय स्वयं लेकर जानकारी रखते हुए कर्म में प्रवृत्त होना ज्ञानयोग है। इसके दो परिणाम है- हारने पर देवत्व और जीतने पर महामहिम स्थिति- ‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।। (गीता, २/३७)

इसी को अब निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिससे तू कर्म-बन्धन का भली प्रकार नाश कर सकेगा। भगवान ने निष्काम कर्म की पहली विशेषता बतायी कि यह कर्मों का बन्धन – जन्म-मृत्यु का कारण जो बन्धन है, उसका अंत कर देता है। कर्म की दूसरी विशेषता बताते हुए भगवान ने ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग किया-

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।। गीता, २/४०

अर्जुन! इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं है। शुरू करें, दो कदम ही चल पायें फिर भी आपका कभी विनाश नहीं है। अगले जन्म में तीसरा ही कदम उठेगा और बढ़ेगा। प्रकृति केवल आवरण डालती है। वे भी आपके ही कभी के संस्कार हैं वही आवरण बन जाते हैं। कुछेक जन्मों के अनन्तर आप वहाँ होंगे जिसका नाम परमगति है, परमधाम है। जो मेरा निज स्वरूप है, अमृतमय पद है।

भगवान ने निष्काम कर्म की दूसरी विशेषता पर प्रकाश डाला कि इसमें आरम्भ का नाश नहीं है। तीसरी विशेषता, सीमित फलरूपी दोष नहीं है कि स्वर्ग, बैकुण्ठ या ऋद्धियों-सिद्धियों में आपको उलझाकर छोड़ दे। यह तो सीमित फल ही हुआ कि मार्ग में ही हम किसी प्रलोभन में रुक जायँ। इस धर्म का स्वल्प अभ्यास (आधा नहीं, चौथाई नहीं, मात्र स्वल्प अभ्यास) भी जन्म-मृत्यु के महान् भय से उद्धार करनेवाला होता है।

इस निष्काम कर्म की चौथी विशेषता है-

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।। गीता, २/४१

अर्जुन! इस निष्काम कर्मयोग में निश्चयात्मक क्रिया एक ही है। कुछ भी कर डालना धर्म नहीं है। जब उस कर्म को कार्यरूप देने का प्रश्न आया तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म शब्द का प्रयोग किया। इस धर्म के द्वारा हम उस परमात्मा को धारण करते हैं जिसमें निश्चयात्मक क्रिया एक है, बुद्धि एक है। जो बहुत-सी क्रियाएँ बताते हैं, क्या वह भजन नहीं है? भगवान कहते हैं, अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओं वाली होती है, इसलिए वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। वे दिखावटी शोभायुक्त वाणी में उसे व्यक्त भी करते हैं। उनकी वाणी की छाप जिन-जिन के चित्त पर पड़ती है, अर्जुन! उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, न कि वे कुछ पाते हैं। वे स्वर्गपराः— स्वर्ग को ही सर्वोपरि लक्ष्य मानते हैं कि ऐश्वर्य मिले, भोग मिले। जो इन वासनाओं में आसक्त हैं वही इसे सुनते हैं और फँस जाते हैं। सब न इन्हें सुनते हैं न फँसते हैं। वे जन्म-मृत्युरूपी फल देनेवाली अनन्त क्रियाओं में भटकते ही रहते हैं।

जब धर्म की निश्चयात्मक क्रिया एक है, दूसरा धर्म है ही नहीं तो धर्म-परिवर्तन कैसे हो जायेगा? हमारी साधना का स्तर हल्का, मध्यम और उन्नत हो सकता है, साधना से वासना की ओर विचलित हो गये तो ह्रास हो सकता है; किन्तु धर्म का विनाश नहीं होता। रूढ़ियाँ परिवर्तित होती हैं, परम्पराएँ-प्रथाएँ परिवर्तित होती हैं, धर्म का परिवर्तन नहीं होता। रहन-सहन बदलता है, धर्म नहीं।

संक्षेप में, धर्म परमात्मा एक, उसे धारण करने की विधि एक, उस विधि में नियत क्रिया एक, भजन जागृत हुआ तो सुविधा एक-जैसी, निरीक्षण-परीक्षण एक-जैसा, परिणाम एक परमात्मा में स्थिति, अमृतमय परमपद की प्राप्ति एक-जैसा ही है तो धर्मान्तरण कैसा?

साधनकाल में कभी-कभी साधक के मन में सुख-भोग की इच्छा प्रबल हो उठती है। वह माँग बैठता है- ‘प्रभु जन्नत चाहिए, स्वर्ग चाहिए’, भगवान कहते हैं कि मैं देता हूँ।

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। (गीता, ९/२१)

वह विशाल स्वर्ग का उपभोग करता है और पुण्य क्षीण हो जाने पर वहीं गिर जाता है जहाँ से चलना आरम्भ किया था। वह बेचारा कंगाल का कंगाल। स्वर्ग का भोग तो चला गया। आ गया फुटपाथ पर, सिंहासन लुप्त हो गया; किन्तु नश्वर तो माँगा ही था। उसे समाप्त होना ही था। भोग भले ही नष्ट हो जाय, उस भक्त का कभी विनाश नहीं होता; क्योंकि भगवत्पथ में बीज का नाश नहीं होता। जहाँ से छूटा है वहीं से पुनः आगे बढ़ना है तो धर्मान्तरण कैसा? अन्तरण परम्पराओं, प्रथाओं का होता है, धर्म का नहीं।

विश्वभर में एक ही धर्माचरण है- एक परमात्मा के प्रति समर्पण, उन्हें जो सम्बोधित करता हो ऐसे उनके किसी दो-ढाई अक्षर के नाम का जप, तत्त्वदर्शी महापुरुष की शरण एवं उनका सान्निध्य, जैसा कि धर्मशास्त्र गीता में निर्दिष्ट है।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

Q & A
×