प्रश्न – धर्म में प्रवेश का अधिकार किसको है?
उत्तर :- धर्म में प्रवेश का अधिकार मानव मात्र को है। भगवान कहते हैं- ‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्’ (गीता, ९/३३)- क्षणभंगुर किन्तु दुर्लभ मानव-तन को पाकर मेरा भजन कर- प्रवेश उसको है। जो समुद्र में डूब रहा हो, पार होने का अधिकार सर्वप्रथम उसी का है। जो जंगल में भटक गया है, उसका अधिकार है कि भटकाव समाप्त कर अपने घर पहुँच जाय। इसलिए अत्यन्त पाप करनेवालों से भी अधिक पापवाला है तब भी गीतोक्त ज्ञान के द्वारा निःसन्देह पार हो जायेगा, अमृतमय पद प्राप्त करेगा। भजन का अधिकार दो हाथ-पैरवाले मनुष्य को है।
लोग कहते हैं, मुझमें भजन के संस्कार नहीं हैं। निषादराज गुह में एक भी शुभ संस्कार नहीं था- ‘साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा।।’ (मानस, २/१८९/७)- भाग्य में राम-भक्ति की रेखा थी ही नहीं, किन्तु ‘राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें।।’ (मानस, २/१९५/२) जिसे रामजी ने अपना लिया वह तीनों लोकों में परम पवित्र हो गया। भक्त शिरोमणि हो गये निषादराज। भाग्य में नहीं लिखा है तो कोई क्षति नहीं, इतना तो लिखा है कि हम मनुष्य हैं। मनुष्य-तन पा गये, इतना पर्याप्त है। मनुष्य कर्मों का निर्माता है, संस्कारों का रचयिता है। इसी कुल का केवट था। बाल्यकाल से ही उसने विचार किया कि दादा-परदादा सभी नाव इस पार उस पार करते, खटते-खाते मर गये। इतना ही जीवन का लक्ष्य है या इससे आगे भी कोई सत्य है?- वह विचारों में डूब गया। समझ जब काम कर गयी तो चिन्तन में लग गया। प्रभु के विरह में नाव चलाना ही भूल गया। प्रभु को मार्ग बदलकर उसके पास आना पड़ा, बुलाना पड़ा। उसने प्रभु को पार किया, स्वयं भी पार हो गया। इस प्रकार भजन में प्रवेश मानव-तन को है।
कितना भी जघन्य प्राणी क्यों न हो, गीतोक्त साधन करते ही उसमें भजन जागृत हो जाता है। जो चार दिनों से भूखा है, रोटी की सबसे अधिक आवश्यकता उसे है, इसलिए पापियों का भजन में प्रवेश सर्वप्रथम है। जो लोग कहते हैं कि इनमें पाप अधिक हैं इसलिये अभी इन्हें धर्म में प्रवेश नहीं दिया जा सकता, भ्रम में हैं। पुण्यात्मा वह है जो पूर्णत्व की ओर अग्रसर है, पापी वह है जो जान-बूझकर आसुरी प्रवृत्तियों में लिप्त है; किन्तु बहुसंख्यक लोग न पापात्मा हैं न पुण्यात्मा। गीता में है कि ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी’ (२/६९)- जगत्-रूपी रात्रि में सभी निश्चेष्ट पड़े हैं। वे न पापात्मा हैं न पुण्यात्मा, वे निश्चेष्ट हैं, अनभिज्ञ हैं। संयमी पुरुष इनमें से जाग जाता है। शेष अचेत प्राणियों में से जिस किसी ने गीतोक्त साधना का ज्योंही स्पर्श किया, साधन समझकर चार कदम चलते बन गया, वह जाग गया। वह अपने शुद्ध स्वरूप शाश्वत धाम की ओर उन्मुख हो गया, जहाँ मृत्यु नहीं है। अतः धर्म में प्रवेश का अधिकार मानव-तन को है, भले ही वह सृष्टि में कहीं भी जन्मा हो।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *