प्रश्न– महाराजजी! अनेक धार्मिक ग्रन्थों में अवतार का वर्णन पाया जाता है। क्या अवतार का यही रूप है अथवा कोई और? उदाहरण के लिए गीता को लें–
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
उत्तर– हाँ, अवतार सत्य है परन्तु उसका रूप कुछ और ही है। भला उसका समर्थन कौन नहीं करेगा? वही कल्याण का यथार्थ मार्ग है; किन्तु वह अवतार किसी योगी के हृदय में होता है बाहर नहीं। सभी शास्त्रों में अवतार का वास्तविक रूप यही है। किसी अनुभवी महापुरुष के द्वारा वह विशेष प्रक्रिया जागृत होती है जो अवतार का कारण है। जैसा कि अभी आपने गीता की चर्चा की कि-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। (गीता, 4/7)
जब-जब धर्म के विषय में ग्लानि उत्पन्न हो जाती है (परमात्मा ही परमधर्म है, उस परमात्म-धर्म के पालन के विषय में ग्लानि बढ़ जाती है।), तब-तब अधर्म को नष्ट करने के लिए मैं अपने स्वरूप को रचता हूँ। यह ग्लानि मन में होती है और उसके प्रकट होने का स्थान हृदय है।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।। (गीता, 4/8)
‘साधूनाम्’– साध्य वस्तु में एकता दिलानेवाले विवेक, वैराग्य, निरन्तर चिन्तन-प्रवृत्ति एवं भाव-श्रद्धा इत्यादि को निर्विघ्न संचालित करने के लिए तथा ‘दुष्कृताम्’– (दूषित कृत्यों के माध्यम) जिनसे दूषित क्रियाएँ होती हैं, जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अनन्त आशा एवं तृष्णा इत्यादि को समाप्त करने के लिए और धर्म की स्थिति को दिलाने के लिए हर युग में प्रगट होता हूँ।
यह युग-धर्म मन की स्थिति पर अवलम्बित है। अब अपने प्रगट होने का तरीका बताते हुए कहते हैं कि- मैं योग की पूर्ति से प्रगट होता हूँ। मैं अजन्मा, भूतों के श्वास में स्थित होने पर भी आत्मिक प्रक्रिया से सम्पूर्ण माया को वश में करके प्रगट हो जाता हूँ। ‘आत्ममायया’– आत्मा को दिलानेवाली माया अर्थात् यौगिक प्रक्रिया (जिसकी पूर्ति में ईश्वर का वह स्वरूप है) के द्वारा प्रगट होता हूँ। अब प्रश्न उठता है कि जब ऐसे प्रगट होते हैं तो देखने में कैसे आयेंगे? अन्त में श्रीकृष्ण का भी यही निर्णय है-
जन्मकर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नेति मामेति सोऽर्जुन।। (गीता, 4/9)
मेरा वह जन्म व कर्म दिव्य (अलौकिक) है, जिसको तत्त्वदर्शी ही जानता है। इस जानकारी का नाम तत्त्वदर्शन है। इसे जानकर जन्म-मरण के चक्कर में नहीं आता बल्कि मुझमें स्थित हो जाता है।
प्रत्येक योगी का यही उद्देश्य रहा है कि ‘आत्ममायया’– भजन की प्रक्रिया के द्वारा माया को स्वाधीन कर उस परमतत्त्व परमात्मा की स्थिति पा ले। वही तत्त्वदर्शी एवं स्थितिवाला है। श्रीकृष्ण के शब्दों में वह अवतार तत्त्वदर्शी के सामने प्रत्यक्ष रूप में है, जिसको पाकर वह भी वही हो जाता है। इस स्थितिवाले महापुरुष ही कल्याणस्वरूप हैं। उनका सान्निध्य प्राप्त करो।
***
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)