प्रश्न– आर्य क्या है?
उत्तर :- अंग्रेज इतिहासकार भारत के इतिहास को आर्यों का इतिहास तो मानते हैं, लेकिन उनका कहना है कि आर्य भारत के रहनेवाले नहीं थे बल्कि भारत के बाहर से, यूरोप की ओर से आये थे। आर्य गोरे थे, अंग्रेज भी गोरे हैं, अतः अंग्रेज ही शुद्ध आर्य हैं; म्लेच्छ नहीं।
यह देश सदैव विदेशियों द्वारा जीता गया, अतः अंग्रेज राज्य करने आये तो बुरा क्या है? अंग्रेज यह भी कहते हैं कि आर्यों के आने से पहले भारत में असभ्य काले लोग रहते थे, आर्यों ने उनको दक्षिण भारत की ओर खदेड़ दिया। सिन्धु नदी के किनारे सभ्य लोगों की पुरानी बस्तियाँ खुदाई में आयीं तो अंग्रेजों ने कहा कि अपवाद रूप में कुछ काले लोग सभ्य हो गये थे इसीलिए इस सभ्यता को आर्यों से भिन्न माना जाता है और इसे केवल ‘सिन्धु घाटी की सभ्यता’ कहते हैं। सिन्धु घाटी में कोई मंदिर नहीं मिला और जो कहते हैं कि लाखों शिवलिंग मिले हैं, वे वास्तव में मूसल, लोढ़े, सिल-बट्टे हैं- ऐसा अर्नेस्ट मैके ने लिखा है। आर्य और अनार्य का प्रश्न खड़ा करके दक्षिण भारत में राम का पुतला जलाया गया। अंग्रेज यह भी कहते हैं कि पहले के भारतीय इतिहास लिखना ही नहीं जानते थे। उसमें सन्-तारीख लिखा नहीं गया इसलिए पुराणों में वर्णित इतिहास गप्प है, जबकि भारतीय ग्रन्थों में लाखों वर्ष पहले का इतिहास लिखा गया है। बहुत से अंग्रेज संस्कृत को देवभाषा नहीं, गँवारू (डेड लैंग्वेज) कहते हैं। वेद को गड़ेरिये का गीत मानते हैं। मतलब वेद और बिरहे में कोई अन्तर नहीं है। ये शंकर जी नहीं, लोढ़े हैं। वे हमारी दृष्टि में हमारी संस्कृति को गिराना चाहते हैं।
भारतीय इतिहास के विषय में अनेक भ्रान्तियाँ हैं, इसमें सन्देह नहीं है। इतिहास लेखन की ही बात लीजिए। हमारा इतिहास वेद में है, पुराणों में है, जिसे अंग्रेज इतिहास मानने को तैयार ही नहीं हैं।
प्रश्न यह उठता है कि पहले का इतना अधिक हमारा लिखित इतिहास कहाँ है? तो आप जानते हैं कि शान्ति-प्रिय भारतीयों के साहित्य अनेकानेक आक्रमणों में जलाये जाते रहे। विश्वविख्यात नालन्दा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय तीन वर्ष तक लगातार जलता रहा। पहले पुस्तकें बड़े परिश्रम से लिखी जाती रहीं। आजकल की तरह प्रेस-साधन नहीं थे, अतः उनको पुस्तकालयों में सुरक्षित रखा जाता था। हूणों ने, मुसलमानों ने, आक्रमणकारियों ने सारा साहित्य ही समाप्त करने का प्रयास किया। वेद, पुराण, रामायण, महाभारत इत्यादि जो गिने-चुने ग्रन्थ बचे रह गये हैं, वे तो लोगों को याद रहने के कारण और घर में लिपि पड़ी रहने के कारण बच गये।
यह बात अलग है हमारे साहित्य को अंग्रेज इतिहास की संज्ञा नहीं देते। उनकी दृष्टि में जब तक किसी घटना की तारीख और सन् न हो तब तक इतिहास कैसा? तारीख लिखना तो अंग्रेजों ने दो हजार वर्ष से सीखा, यहाँ तो अरबों वर्ष का इतिहास है। हमारे पूर्वज इतने तुच्छ स्तर पर सोचते भी नहीं थे।
जिस प्रकार सूर्य अनन्त है, पृथ्वी अनन्त है, उसी प्रकार समय भी अनन्त है। इस अनन्त समय को महीनों और वर्षों में गिनना उसी तरह हास्यास्पद है जैसे समुद्र की जलराशि को मापने के लिए लीटर की इकाई निर्धारित करना, इसीलिए हमारे पूर्वजों ने लाखों वर्षों के कलियुग, द्वापर, त्रेता और सतयुग इन युगों के पैमाने से काल-गणना की इकाइयाँ निश्चित कीं, युगों की कल्पना कीं, जो ब्रह्मा का एक दिन भी नहीं है। इसीलिए उन्होंने सन्, सम्वत्, तारीख जैसे छोटे पैमानों का उपयोग इतिहास लेखन में नहीं किया। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है कि इतिहास के अन्तर्गत पुराण, इतिवृत्त, आख्यायिका, उदाहरण, धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र सभी आते हैं। पुराण का अर्थ ही पुरानी घटनाएँ हैं। अतः भारतीय आर्षग्रन्थों में निहित हमारा इतिहास सर्वथा प्रामाणिक है।
इतिहासकारों का यह कहना भी ठीक नहीं है कि आर्य बाहर से आये और काले रंगवाले भारत के आदिम निवासी हैं। उनका यह कहना भी धूर्ततापूर्ण है कि आज भारतीय न तो आर्यों की तरह गोरे रह गये न द्रविड़ों की तरह काले, बल्कि देशी-विदेशी लोगों के मेल से पैदा होने के कारण अपने रक्त की शुद्धता का दावा नहीं कर सकते। वस्तुतः रंग का निर्धारण जलवायु से होता है। अक्षांश और देशान्तर के विपुल विस्तार के कारण भारत में तीन प्रकार की जलवायु पायी जाती है- शीत, उष्ण और समशीतोष्ण। ठण्डे प्रदेश कश्मीर के निवासी गोरे हैं। दक्षिण भारत में अधिक उष्णता है, इसलिए वहाँ के निवासी काले हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, जहाँ दोनों प्रकार की जलवायु का टकराव है, वहाँ रहनेवालों का रंग गेहुआँ है। वस्तुतः सभी प्रकार के ‘कलर’ भारत में पाये जाते हैं और सब के सब आर्य हैं।
जहाँ तक आर्यों के विदेश से भारत आने का प्रश्न है, आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व का विदेशी यात्री मेगस्थनीज लिखता है, ‘‘सिकन्दर से पहले न तो किसी देश ने भारत पर आक्रमण किया था और न भारत ने ही किसी देश को गुलाम बनाया। किसी भी देश ने भारत में अपनी बस्ती नहीं बसायी। भारत के सभी निवासी यहीं के मूल वंशज हैं।’’ मेगस्थनीज के समय में किसी को यह ज्ञात नहीं था कि भारतीय बाहर से आये हैं और ढाई हजार वर्ष बाद अंग्रेजों ने खोज की कि आर्य बाहर से आये हैं, जबकि अंग्रेज जाति स्वयं ढाई हजार वर्ष की भी नहीं है।
जो लोग यह कहते हैं कि ‘‘बाहर से आनेवाले आर्यों ने उत्तर भारत पर अधिकार कर काले द्रविड़ों को दक्षिण खदेड़ दिया और अपने एजेन्ट राम-लक्ष्मण को भेजकर दक्षिण भारत के नेता रावण को कटवाकर फेंक दिया।’’ उनका यह कथन भी राजनीति प्रेरित एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। राम से भी पहले सुग्रीव, बालि इत्यादि के पूर्वज तथा केरल-मद्रास तक विस्तृत उनके राज्य के निवासी भी आर्य ही थे। राम-रावण युद्ध हो रहा था। कुम्भकरण को देख जब बानरी सेना भागने लगी, तब अंगद भागकर सेना के मुहाने पर आया और उपदेश देने लगा, ‘‘बन्धुओ! हमलोगों के पूर्वजों ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीती हैं। हम लोग आर्य हैं, आज पीठ दिखाने पर अनार्य कहलायेंगे।’’ देखें, बालि और सुग्रीव का खानदान शुद्ध आर्य था। समुद्र तटवासी बानरी सेना आर्य थी। राम तो बाद में पहुँचे। आर्य का तात्पर्य है, जो सत्य से पीछे नहीं हटता, जो कर्तव्य से च्युत नहीं होता। कनक मृग के पीछे-पीछे जब राम चले गये, उसे मारा तो मृगरूपधारी कपटी मारीच ने राम के स्वर में लक्ष्मण को पुकारा। सीता सुनते ही विकल हो गयीं। बोलीं, ‘‘कपटी लक्ष्मण! तू भाई की भक्ति जता कर पीछे लग गया, अयोध्या से ही मैं तेरे स्वभाव को ताड़ रही थी। तू सोचता था कि वनवास में राम कहीं मारे गये तो सीता को मैं प्राप्त कर लूंगा। कपटी लक्ष्मण! तूझे धिक्कार है। अनार्य लक्ष्मण! तुझको धिक्कार है।’’ स्पष्ट है कि वह पुरुष अनार्य है जो सत्य-पथ से विचलित हो जाता है। जो सत्य पर आरूढ़ रहता है उसे ही आर्य कहते हैं। जहाँ-जहाँ सत्य से च्युत होने का प्रश्न आया, वहाँ अनार्य शब्द का प्रयोग हुआ है।
वाल्मीकि रामायण का ही प्रसंग है कि एक बार रावण ने अपनी वेधशाला में राम का कृत्रिम सिर बनवाया, लाकर सीता के सामने फेंक दिया, बोला- ‘‘ले अजेय राम! मर्यादा राम! यह ले अपना राम! देख हमारा सेनापति प्रहस्त गया और सिर काटकर ले आया। अब तो मानोगी हमको!’’ सीता ने खून से लथपथ राम का सिर देखा, विलाप करने लगीं, ‘‘मुझ अनार्या को धिक्कार है जो आपको न प्राप्त कर सकी। सिद्ध है कि मेरे सत्य में कोई कमी थी।’’ सिद्ध है कि आर्य वह है जो सत्य पर आरूढ़ रहता है। आर्य एक निष्ठा है, एक गुणवाचक कसौटी है। प्रत्येक मानव इस कसौटी पर पहुँच सकता है।
महाभारत का प्रसंग है। जब दुर्योधन की जाँघ टूट गयी, तब बड़ी कठिनाई से लम्बी साँस खींचते हुए दुर्योधन बोला, ‘‘ओ कंस के दास के बेटे छली कृष्ण! तुमको धिक्कार है। तुम्हीं ने छल करके द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और मुझ दुर्योधन को मरवाया है, अन्यथा पाण्डव तो क्या, विश्व की कोई भी शक्ति हमारी सेना को जीत नहीं सकती थी। शिखण्डी को आगे करके तुमने भीष्म की हत्या करायी। क्या मैं इसे नहीं जानता? ताल ठोंककर भीम को मेरी जाँघ पर प्रहार करने का संकेत तुमने किया, क्या यह भी मुझसे छिपा है? अनार्य कृष्ण! तुमको धिक्कार है।’’
यहाँ दुर्योधन ने कृष्ण के लिए ‘अनार्य’ शब्द का प्रयोग किया। स्पष्ट है कि सत्य से हटकर असत्य के आश्रित होनेवाला ही अनार्य है। आर्यत्व गुण है, जाति नहीं। आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ होता है। यह शब्द संस्कृत के ‘ऋ’ धातु से निकला है, जिससे ऋत् शब्द बना है। ‘ऋ’ का अर्थ तीक्ष्ण तथा काटने वाला तथा ‘अर’ हठपूर्वक काटने को कहते हैं। जो चिन्तन-पथ की बाधाओं को हठपूर्वक काटता है, उसे आर्य कहते हैं। ‘अरः यम’ अर यम को भी कहते हैं। पातंजल योगदर्शन में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इस यम-पालन में आने वाली रुकावट को काटने में जो सक्षम है वही आर्य है।
इस प्रकार आर्य शब्द गुणवाचक है, जातिवाचक नहीं है। यह रंग-भेद पर आधारित नहीं है। जो लोग यह कहते हैं कि ‘उत्तर भारत के निवासी आर्य बाहर से आये, दक्षिण के काले द्रविड़ भारत के मूल निवासी हैं।’- ऐसा केवल समाज में दरार डालने के लिए, भारत में फूट डालने के लिए कहते हैं।
वास्तविकता यह है कि दक्षिण भारतवाले रावण की वंश-परम्परा में नहीं हैं। वे अंगद और सुग्रीव की संतानें हैं, जो आर्य थे। स्वयं रावण के पिता, पितामह सभी आर्य थे; किन्तु आर्यगुण से च्युत होने के कारण रावण असुर बन गया। इसी प्रकार देखा जाये तो दक्षिणवालों ने ही रावण को मारा। उत्तर भारत की तो एक चुहिया तक नहीं मरी थी, एक सैनिक भी उत्तर भारत का नहीं था। राम को तो सीता की शोध में जाना ही था।
दक्षिण के लोग रावण से त्रस्त हो चुके थे। राम ने केवल उनका संगठन खड़ा कर दिया। वस्तुतः उत्तरी और दक्षिणी भारत के निवासी आर्य-परम्परा के ही हैं। इतना ही नहीं बल्कि जापान, चीन, मध्येशिया, अमेरिका इत्यादि जिन देशों में गौतम बुद्ध की परम्परा गई, गुरु नानक के उपदेश गये, आर्य-संस्कृति का प्रचार-प्रसार हुआ, सब के सब आर्य हैं, सत्य की ओर अग्रसर हैं। यह अवश्य है कि सर्वत्र सभी आर्य ही नहीं हैं, आसुरी विचारधारा के लोगों का अस्तित्व भी सदैव रहा है।
वस्तुतः दैवी प्रकृति हमारी थी। दूसरी संस्कृतियों को, दूसरे देशों को यह गौरव कभी किसी ने नहीं दिया। अतः यह मानने का प्रश्न ही नहीं उठता कि हम बाहर से आये। आर्य-संस्कृति का गढ़ तो भारत है। विश्व ने जो कुछ सीखा है वह भारत की ही देन है। साधना के प्रारम्भ में ईसा भी योग सीखने भारत आये थे- ऐसा तिब्बत के पुस्तकालय की प्राचीन पुस्तकों से प्रमाणित हुआ है। बाइबिल में ‘चिलचिलाती धूप में खेलनेवाले नंगे बच्चे’, ‘पानी भरती पनिहारिनें’, आम की अमराई का वर्णन है, जिसे इंग्लैण्ड या जेरुसलम में पले लोग स्वप्न में नहीं सोच सकते। स्वयं ‘ईसा’ शब्द भारतीय शब्द ईश, ईश्वर की नकल है। ईसा को मसीहा कहा जाता है। मसीहा वैद्य को कहते हैं। गुरु ही सबसे बड़ा वैद्य है जो भवरोग से बचा लेता है, इसीलिए मिशनरियों में गाया जाता है- ‘ईसू मसीह मेरे प्राण बचैया।’ वस्तुतः यह सभी भारतीय दर्शन से प्रभावित हैं और कहा तो यहाँ तक जा सकता है कि विश्व में जो कुछ श्रेष्ठ है, वह आर्यभूमि भारत की ही देन है। सही आत्मिक उपलब्धि के लिए भारत जगद्गुरु था और रहेगा। यह बात अलग है कि भारतीय शान्तिप्रिय दैवी सम्पत्ति में जीवन बितानेवाले थे, जबकि विदेशी आक्रमणकारी क्रूर और हिंसक थे। इसीलिए समय-समय पर भारत को गुलाम बनना पड़ा, न कि विदेशी शक्ति में अधिक थे। यही कारण है कि भारत और उसकी विरासत सर्वथा नष्ट कभी नहीं हुई। जब भी अपने शौर्य का स्मरण हुआ, भारत पुनः जागा और पुनः अपने उसी स्थान पर पहुँच गया इसीलिए भारत आज स्वतंत्र है। विदेशियों की अनेक चालों के बावजूद भारतीय संस्कृति, आर्य-संस्कृति अक्षुण्ण है। वैसे तो आर्यजन सर्वत्र विद्यमान हैं लेकिन आर्यगुणधारी मनुष्यों की बाहुल्यता के कारण समग्र भारतभूमि को ही मूल आर्यभूमि के रूप में जाना जाता है। इस आर्यत्व की उपलब्धि के लिए महर्षियों का सत्संग आवश्यक है। इस प्रकार, जो सन्मार्ग पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ है, वही आर्य है। इसीलिए हमारे पूर्वज महापुरुषों की घोषणा थी कि ‘कृण्वन्तु विश्वमार्यम्’– पूरे विश्व को आर्य बना डालो।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *