आर्य – जीवनादर्श

आर्य

प्रश्न- महाराजजी! अंग्रेज इतिहासकार भारत के इतिहास को आर्यों का इतिहास तो मानते हैं, लेकिन उनका कहना है कि आर्य भारत के रहनेवाले नहीं थे बल्कि भारत के बाहर से, यूरोप की ओर से आये थे। आर्य गोरे थे, अंग्रेज भी गोरे हैं; अतः अंग्रेज ही शुद्ध आर्य हैं, म्लेच्छ नहीं। यह देश सदैव विदेशियों द्वारा जीता गया, अतः अंग्रेज राज्य करने आये तो बुरा क्या है? अंग्रेज यह भी कहते हैं कि आर्यों के आने से पहले भारत में असभ्य काले लोग रहते थे। आर्यों ने उनको दक्षिण भारत की ओर खदेड़ दिया। सिन्धु नदी के किनारे सभ्य लोगों की पुरानी बस्तियाँ खुदाई में आयीं तो अंग्रेजों ने कहा कि अपवाद रूप में कुछ काले लोग सभ्य हो गये थे। इसीलिए इस सभ्यता को आर्यों से भिन्न माना जाता है और इसे केवल ‘सिन्धु घाटी की सभ्यता’ कहते हैं। सिन्धु घाटी में कोई मन्दिर नहीं मिला, और जो कहते हैं कि लाखों शिवलिंग मिले हैं, वास्तव में मूसल, लोढ़े, सिल-बट्टे हैं- ऐसा अर्नेस्ट मैके ने लिखा है। आर्य और अनार्य का प्रश्न खड़ा करके दक्षिण भारत में राम का पुतला जलाया गया। अंग्रेज यह भी कहते हैं कि पहले के भारतीय इतिहास लिखना ही नहीं जानते थे। उसमें सन्-तारीख लिखी ही नहीं गयी, इसलिए पुराणों में वर्णित इतिहास गप्प है। जबकि भारतीय ग्रन्थों में लाखों वर्ष पहले का इतिहास लिखा गया है। ‘बाइबिल’ में मानव-सृष्टि चार हजार वर्ष पहले की बताई गई है। इधर मुसलमान कहते हैं, चौदहवीं शताब्दी के बाद यहाँ प्रलय हो जायेगा।- इन विचारों में कहाँ तक सत्यता है?

उत्तर- भारतीय इतिहास के विषय में अनेक भ्रान्तियाँ हैं, इसमें सन्देह नहीं है। इतिहास लेखन की ही बात लीजिए। हमारा इतिहास वेद में है, पुराणों में है; उसे अंग्रेज इतिहास मानने को तैयार ही नहीं हैं। महाराज हर्ष के समय में चीन का एक यात्री ‘ह्वेनसांग’ भारत आया था, उसने लिखा है कि प्रत्येक गाँव में एक कर्मचारी होता था जो अच्छी-बुरी सभी घटनाओं को लिखता था। इतिहास और कैसा होता है? उससे भी हजार वर्ष पहले चाणक्य के अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में प्रत्येक गाँव में ‘अक्ष पटल’ विभाग होता था जो गाँवभर के धर्म, व्यवहार, चरित्र और अच्छी-खराब घटनाओं को रजिस्टर में दर्ज करता था। सिकन्दर के जहाजी बेड़े के एडमिरल नियार्कस ने लिखा है कि भारतीय कपड़े पर भी लिखते थे। अतः भारत में लिखने की परम्परा थी, यह निर्विवाद है।

प्रश्न उठता है कि पहले का इतना अधिक हमारा लिखित इतिहास कहाँ है? तो आप जानते हैं कि शान्ति-प्रिय भारतीयों के साहित्य अनेकानेक आक्रमणों में जलाये जाते रहे। विश्वविख्यात नालन्दा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय तीन वर्ष तक लगातार जलता रहा। पहले पुस्तकें बड़े परिश्रम से लिखी जाती रहीं। आजकल की तरह प्रेस-साधन नहीं थे। अतः उनको पुस्तकालयों में सुरक्षित रखा जाता था। हूणों ने, मुसलमानों ने, आक्रमणकारियों ने सारा साहित्य ही समाप्त करने का प्रयास किया। वेद, पुराण, रामायण, महाभारत इत्यादि जो गिने-चुने ग्रन्थ बच रहे हैं, वे तो लोगों के याद रहने के कारण और घर में लिपि पड़ी रहने से बच गये। भारत में श्रुतिधरों में कमी कभी नहीं रही और आज भी इन शास्त्रों को कण्ठस्थ करनेवाले विद्वान् भारत में भरे पड़े हैं। वेद, पुराण, रामायण, महाभारत की सामग्री आध्यात्मिक दृष्टि से इतनी बहुमूल्य थी कि लोगों ने उसे कण्ठस्थ करना ही श्रेयस्कर समझा और इन्हीं के माध्यम से प्राचीन गौरवशाली इतिहास की भी एक झलक हमें मिल जाती है। यह बात अलग है हमारे साहित्य को अंग्रेज इतिहास की संज्ञा नहीं देते। उनकी दृष्टि में जब तक किसी घटना की तारीख और सन् न हो तब तक इतिहास कैसा? तारीख लिखना तो अंग्रेजों ने दो हजार वर्ष से सीखा, यहाँ तो अरबों वर्ष का इतिहास है। हमारे पूर्वज इतने तुच्छ स्तर पर सोचते भी नहीं थे।

जिस प्रकार सूर्य अनन्त है, पृथ्वी अनन्त है, उसी प्रकार समय भी अनन्त है। इस अनन्त समय को महीनों और वर्षों में गिनना उसी तरह हास्यास्पद है, जैसे समुद्र की जलराशि को मापने के लिए लीटर की इकाई निर्धारित करना। इसीलिए हमारे पूर्वजों ने लाखों वर्षों के कलियुग, द्वापर, त्रेता इत्यादि युगों की कल्पना की, जो ब्रह्मा का एक दिन भी नहीं है। उन्होंने सन्, सम्वत्, तारीख-जैसे छोटे पैमानों का उपयोग इतिहास लेखन में नहीं किया। मनीषियों की सारग्राहिणी दृष्टि में घटनाओं का महत्त्व होता था, तारीख का नहीं। किसी महापुरुष के जन्म-मृत्यु की तारीख क्या लिखी जाय, जबकि आत्मा का न तो जन्म होता है, न मृत्यु होती है? यह तो विराट् प्रभु तक की यात्रा के विभिन्न पड़ाव हैं। यात्री की दृष्टि लक्ष्य पर ही रहती है, पड़ाव पर नहीं। आजकल के भौतिकवादी अपने नाम का प्रचार करने के लिए सड़क, पार्क, गार्डेन, शहर के नाम अपने से जोड़ देते हैं, पर महर्षियों ने अपना स्मारक सितारों पर बनाया जो युगों तक मानवता को अनुप्राणित करते रहेंगे। विक्टोरिया पार्क से गांधी पार्क भले ही बन जाय, किन्तु ध्रुव तारा, सप्तर्षि मण्डल, अगस्त्य तारा युगों तक उनकी उपलब्धियों का स्मरण कराता रहेगा। तुच्छ स्मारकों अथवा पैमानों में पूर्वजों की कोई रुचि नहीं थी। जिन महापुरुषों के इतिवृत्त से जीव का वास्तविक कल्याण सम्भव है केवल उन्हीं आख्यानों को मनीषियों ने संकलित किया, साथ ही लोक-शिक्षणहेतु दुर्जनों का उदाहरण भी संग्रहीत कर लिया। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है कि ‘इतिहास के अन्तर्गत पुराण, इतिवृत्त, आख्यायिका उदाहरण, धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र सभी आते हैं।’ (अर्थ. 1/5) पुराण का अर्थ ही पुरानी घटनाएँ हैं। अतः भारतीय आर्षग्रन्थों में निहित हमारा इतिहास सर्वथा प्रामाणिक है। महाभारत की घटना आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले की है- ऐसा शिलालेखों तथा पंचांगों की परम्परा से प्रमाणित है। महाभारत में रामायण की घटना का संकेत है। रामायण पुराण, शास्त्र, उपनिषद् और वेदों का सारांश है। जिससे स्पष्ट है कि उक्त ग्रन्थ और भी प्राचीन हैं। अतः यदि आज कोई विश्व की सभ्यता को चार-छः हजार वर्ष पहले तक ही सीमित कहे तो उसका केवल यही आशय है कि वह अपने चार-छः हजार वर्ष पहले से सभ्य होने का दावा कर रहा है। रही प्रलय और महाप्रलय की बात! तो पूज्य महाराजजी का कहना था कि सृष्टि अनादि है और रहेगी। प्रलय न हुआ है, न होगा।

वस्तुतः ‘प्रलय’, ‘महाप्रलय’ योग के शब्द हैं। प्रलय के चार रूप होते हैं- नित्य प्रलय, नैमित्तिक प्रलय, प्रलय और महाप्रलय। नित्य प्रलय वह है जिसमें आप सो जाते हैं। आपके लिए सृष्टि डूब गई और सृष्टि के लिए आप अदृश्य हैं। नैमित्तिक प्रलय वह है जब आप नियम में ढल जाते हैं। नियम में बँधकर जब श्वास की डोरी लग जाती है, मन सब ओर से सुध-बुध खोकर इष्ट के चरणों में केन्द्रित होने की क्षमता पा लेता है, उस समय संसार और संसार की लहरें आप में नहीं रह जातीं। प्रलय वह है जब आपके जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों की रील का शमन हो जाता है तथा महाप्रलय तब होता है जब संस्कारों से परे शाश्वत सत्ता का दिग्दर्शन और उसमें स्थिति मिलती है। प्रकृति पुरुषत्व में विलीन हो जाती है, यही ‘महाप्रलय’ है। न सृष्टि है, न हम हैं, न होंगे। सेवक खो जाता है और स्वामी ही शेष बचता है। ईश्वर की स्थिति और विलयवाला स्तर जब आता है तो ईशावास्यमिदं सर्वम्’- ईश्वर ही सर्वत्र दिखाई पड़ता है। यह स्थिति कहने में नहीं आती। इसीलिए बुद्ध आदि ने मूक प्रेरणा से इसे व्यक्त किया। शंकराचार्य के गुरु गोविन्दपाद इस स्थिति पर पहुँचे, तो उन्होंने कहा- सृष्टि हुई ही नहीं; जब कि उन्हीं के हजारों शिष्य कल्याण के लिए साधन ही कर रहे थे। हाँ, जिसने पाया उसके स्वरूप में सृष्टि नहीं रह गई। जो भी ईश्वरमयी स्थिति पाता है, उसी में फना हो जाता है, मिट जाता है, उसके लिए सृष्टि मिट गई। इसी को कबीर ने अपने शब्दों में समझाने का प्रयास किया- अवधू! बेगम देश है मेरा’- वह बेगम है, अगम्य है। वहाँ न ईश्वर है, न जीव है, न माया है। प्रलय और कैसा होता है? कहत कबीर सुनो भाई साधो, नहिं तहँ द्वैत बखेड़ा’- वहाँ द्वैत का बखेड़ा ही नहीं है। काला-गोरा वहाँ कुछ भी तो नहीं है, वह स्थिति अनिर्वचनीय है। यही है महाप्रलय। बाहर दुनिया में न प्रलय हुआ है, न होगा। सृष्टि अनादि है और रहेगी। अंग्रेजों ने सृष्टि प्रारम्भ होने की तारीख को खोज निकाला, तो मुसलमानों ने प्रलय की तारीख निर्धारित कर दी। असल में महापुरुषों की ओट में आज के लोगों को तारीख खोजने का नशा है।

भारत में एक अंग्रेज ट्रेन से यात्रा कर रहा था। वह संस्कृत साहित्य पर शोध करने भारत आया था। समय बिताने के लिए उसने सहयात्री की किताब ले ली और पढ़ने लगा। संयोग से वह पुस्तक गीता थी। दो-तीन घंटे में वह पूरी गीता पढ़ गया। भारतीय साथी से उसने प्रश्न किया कि, आप रोज गीता पढ़ते हैं। क्या आप बता सकते हैं कि अर्जुन किस तारीख को पैदा हुआ था? भारतीय सज्जन भौंचक्के रह गये। उन्होंने कभी ऐसे प्रश्न की कल्पना ही नहीं की थी। अतः बोले- गीता में ऐसा कहाँ लिखा है? अंग्रेज ने छाती फुलाते हुए कहा, ‘‘यही तो भारतीय और अंग्रेजों में अन्तर है। आप रोज पढ़ते हैं लेकिन जान नहीं सके। मैंने एक घंटे उलटा-पुलटा और अर्जुन के जन्म की तारीख खोज निकाली।’’ भारतीय सज्जन ने उससे गीता में ऐसा दिखाने का आग्रह किया तो अंग्रेज ने अध्याय चार का पाँचवाँ श्लोक दिखाया- बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।’ श्रीकृष्ण कहते हैं कि- अर्जुन! मेरे जन्म को तो बहुत दिन बीत गये। हाँ, तुम्हारा जन्म चार जून को हुआ था। ‘चार्जुन’ स्पष्ट लिखा है। ऐसे अंग्रेज विद्वान् शिवलिंग को मूसल, लोढ़ा, सिलबट्टा कह दें तो आश्चर्य क्या? यह तो तोड़-फोड़ की गर्हित कला है।

मैकाले का विचार था कि किसी देश को नष्ट करना हो तो पहले उसकी भाषा और संस्कृति को नष्ट कर दो। इसीलिए बहुत से अंग्रेज संस्कृत को देवभाषा नहीं, गँवारू (डेड लैंग्वेज) कहते हैं। वेद को गड़ेरियों के गीत मानते हैं; कहते हैं, इससे अधिक उनका महत्त्व नहीं है। मतलब, वेद और बिरहे में अन्तर नहीं है। ये शंकरजी नहीं, लोढ़े हैं। वे हमारी ही दृष्टि में हमारी संस्कृति को गिराना चाहते हैं। वे कहते हैं कि शिवलिंग किसी मन्दिर में स्थापित नहीं है। वस्तुतः शिवलिंग सदैव मन्दिरों में स्थापित नहीं होते। गणेश चतुर्थी को अभी इसी बरैनी गाँव में सवा लाख मिट्टी के शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा की गई। अपनी शक्ति के अनुसार कोई मिट्टी का तो कोई पत्थर का, कोई सोना-चाँदी का शिवलिंग बनवाता है। यदि इस तरह की परम्परा प्राचीनकाल में घर-घर में रही तो विस्मय की बात नहीं है।

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में जो खुदाई हुई है, उसी प्रकार की खुदाई राजस्थान, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश में भी हुई है। वैसा ही रहन-सहन गंगा के किनारे, नर्मदा के किनारे भी मिला है। यदि सिन्धु के किनारे रहने से ‘सिन्धु घाटी की सभ्यता’ नाम दिया जाय फिर तो गंगाघाटी की सभ्यता, नर्मदा की सभ्यता, लोथल की सभ्यता अनेकों सभ्यताएँ निकल आयेंगी। वस्तुतः यह सभ्यता भारत की सभ्यता थी। आर्यों की सभ्यता थी। किसी एक प्रदेश अथवा किसी भिन्न जाति की आकस्मिक सभ्यता नहीं थी।

लगे हाथ अंग्रेजों के ‘ह्नाइट मेन्स बर्डेन’ के दावे पर भी विचार कर लिया जाय कि उन्होंने भारतीयों को सभ्यता सिखाई। हम उन्हीं की बात मान लेते किन्तु प्राचीन खुदाइयों में अंग्रेजी सभ्यता का नामोनिशान भी नहीं मिलता। एक भी मूर्ति कोट, पैण्ट, हैट, टाई लगाए नहीं मिली। एक भी क्रास नहीं मिला। इसके विपरीत विदेशों में होनेवाली खुदाइयों में हमारी सभ्यता की वस्तुएँ चूड़ियाँ मिली हैं, हमारे देवताओं के चित्र मिले हैं, हमारी गाथायें उत्कीर्ण हैं। कोलम्बस से भी हजारों वर्ष पूर्व भारतीयों ने अमेरिका को शोध निकाला था। इसी वर्ष अमेरिका में हुई खुदाई से यह तथ्य उद्भासित हुआ है। वहाँ की खुदाई में वही वस्तुएँ, वही संस्कृति निकल रही हैं जो सिन्धुघाटी में मिली हैं। उनकी भाषा तमिल से मिलती-जुलती है इसलिए भारतीय भाषाविद् वहाँ बुलाए गये हैं। स्पष्ट है कि भारत वहाँ से लेकर यहाँ तक एक था। सर्वत्र भारतीय सभ्यता थी। अभी ढाई हजार वर्ष पहले यूनान, मिस्र, चीन, जापान आदि जिन-जिन देशों में गौतम बुद्ध की परम्परा गई; सभी आर्य हैं। हम तो यह कहते हैं कि विश्व को भारत ने सभ्यता सिखाई। सिन्धुघाटी की खुदाई में कांसे की नर्तकी मिली है जिसका पूरा हाथ चूड़ियों से भरा है। आज भी सिन्धु प्रदेश के समीपवर्ती राजस्थान में स्त्रियाँ कलाई से लेकर गले तक चूड़ियाँ पहनती हैं। वैसा ही सिंगार-पटार आज भी है, जैसा सिन्धुघाटी में मिला है। अतः सिन्धुघाटी की सभ्यता विशुद्ध आर्य सभ्यता है और यही सभ्यता घूम-फिरकर विश्व के कोने-कोने में पहुँची। भारतीय सभ्यता ही विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है। स्वयं अंग्रेज भी वेद को विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ स्वीकार करते हैं।

इतिहासकारों का यह कहना भी ठीक नहीं है कि आर्य बाहर से आये और काले रंगवाले भारत के आदिम निवासी हैं। उनका यह कहना भी धूर्ततापूर्ण है कि आज भारतीय न तो आर्यों की तरह गोरे रह गये न द्रविड़ों की तरह काले, बल्कि देशी-विदेशी लोगों के मेल से पैदा होने के कारण अपने रक्त की शुद्धता का दावा नहीं कर सकते। वस्तुतः रंग का निर्धारण जलवायु से होता है। अक्षांश और देशान्तर के विपुल विस्तार के कारण भारत में तीन प्रकार की जलवायु पायी जाती है- शीत, उष्ण और समशीतोष्ण। ठण्डे प्रदेश कश्मीर के निवासी गोरे हैं, दक्षिण भारत में अधिक उष्णता है, इसलिए निवासी काले हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जहाँ दोनों प्रकार की जलवायु का टकराव है वहाँवालों का रंग गेहुवाँ है। दूसरा कारण भी है, भारत को पहले सोने की चिड़िया कहा जाता था। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने लिखा है कि भारतीय सोने की थाली में भोजन करते थे। गीतों में प्रसिद्ध है- ‘सोने की थाली में जेवना परोस्यों।’ घरों में सोने की थालियाँ होती थीं। बार-बार आक्रमण होने से वह सोना-चाँदी-जवाहरात विदेशों में खिंचता गया। भोलीभाली जनता खोखली होती गई। फिर तो जनता को जीवन-निर्वाह के लिए अथक परिश्रम करना पड़ा। धूप में अधिक परिश्रम करने से रंग प्रायः काला हो ही जाता है। मल्लाहों के यही लड़के जब तक पढ़ते रहते हैं गोरे रहते हैं; किन्तु धूप में जहाँ नाव चलाना पड़ा कि काले पड़ जाते हैं। यह तो ताप की देन है। ऐसी बात नहीं है कि गोरे रंगवाले कहीं बाहर से आये हैं। वस्तुतः सभी प्रकार के ‘कलर’ भारत में पाये जाते हैं और सब-के-सब ‘आर्य’ हैं।

जहाँ तक आर्यों के विदेश से भारत आने का प्रश्न है, आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व का विदेशी मेगस्थनीज लिखता है, ‘‘सिकन्दर से पहले न तो किसी देश ने भारत पर आक्रमण किया था और न भारत ने ही किसी देश को गुलाम बनाया। किसी भी देश ने भारत में अपनी बस्ती नहीं बसाई। भारत के सभी निवासी यहीं के मूल वंशज हैं।’’ मेगस्थनीज के समय में किसी को यह ज्ञात नहीं था कि भारतीय बाहर से आये हैं और ढाई हजार वर्ष बाद अंग्रेजों ने खोज लिया कि आर्य बाहर से आये हैं जबकि अंग्रेज जाति स्वयं ढाई हजार वर्ष की भी नहीं है।

जो लोग यह कहते हैं कि- ‘‘बाहर से आनेवाले आर्यों ने उत्तर भारत पर अधिकार कर काले द्रविड़ों को दक्षिण खदेड़ दिया और अपने एजेण्ट राम-लक्ष्मण को भेजकर दक्षिण भारत के नेता रावण को कटवाकर फेंक दिया।’’ उनका यह कथन भी राजनीति प्रेरित एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। राम से भी पहले सुग्रीव, बालि इत्यादि के पूर्वज तथा केरल-मद्रास तक विस्तृत उनके राज्य के निवासी भी आर्य ही थे। राम-रावण युद्ध हो रहा था। रावण के अनेक सेनापति मारे जा चुके थे, तब कुम्भकर्ण को जगाने का उपक्रम किया जाने लगा। बहुत प्रयास के बाद कुम्भकर्ण जागा। कुछ खा-पीकर अकेला ही युद्ध करने निकल पड़ा। भयंकर आकृतिवाले इस निशाचर को देखते ही वानरों में भगदड़ मच गई। बहुत से छटपटाकर गिर पड़े। बहुतों की हृदय-गति रुक गयी। बहुत से भालू, वानर दलदल में दुबक गये। भाग-दौड़ में लाखों समुद्र में गिर गये। बहुत-सी सेना पुल से लौटने लगी। राम ने विभीषण से पूछा, ‘‘यह कौन है? हमारी पूरी सेना इसके आतंक से विचलित हो गयी है। अब लड़ाई कैसे होगी?’’ विभीषण ने कहा, ‘‘यह हमारा बड़ा भाई तथा रावण का छोटा भाई कुम्भकर्ण है। लंका नगरी में इससे शक्तिशाली और बलवान् कोई नहीं है। आपकी सेना वास्तव में नहीं रुक सकेगी। सेना को धैर्य बँधाइये कि यह कोई जीवधारी मानव नहीं है बल्कि यन्त्र है। यदि इन्हें आभास होगा कि यह जीवधारी है तो कभी नहीं रुकेंगे।’’ यह कार्य अंगद को सौंपा गया। अंगद भागकर सेना के मुहाने पर आया और उपदेश देने लगा, ‘‘बन्धुओ! हमलोगों के पूर्वजों ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीती हैं। हम लोग आर्य हैं। आज पीठ दिखलाने पर अनार्य कहलायेंगे।’’ देखें, सुग्रीव और बालि का खानदान शुद्ध आर्य था। समुद्र तटवासी वानरी सेना आर्य थी। राम तो बाद में पहुँचे। आर्य का तात्पर्य है, जो सत्य से पीछे नहीं हटता, जो कर्त्तव्य से च्युत नहीं होता।

कनक-मृग के पीछे जब राम चले गये, उसे मारा तो मृगरूपधारी कपटी मारीच ने राम के स्वर में लक्ष्मण को पुकारा। सीता सुनते ही विकल हो गई। बोली- ‘‘लक्ष्मण शीघ्र जाओ। तुम्हारे भ्राता संकट में हैं।’’ लक्ष्मण ने कहा, ‘‘नहीं! वे कभी संकट में नहीं पड़ सकते। आपकी रक्षा का भार मुझ पर है। वे आपको मुझे सौंपकर गये हैं। यह राम की आवाज नहीं, किसी कुटिल निशाचर की करतूत है।’’ सीता बिगड़ पड़ीं, ‘‘कपटी लक्ष्मण! तू भाई की भक्ति जताकर पीछे लग गया। अयोध्या से ही मैं तेरे स्वभाव को ताड़ रही थी। तू सोचता था कि वनवास में राम कहीं मारे गये तो सीता को मैं प्राप्त कर लूँगा। कपटी लक्ष्मण! तुझे धिक्कार है। अनार्य लक्ष्मण! तुझको धिक्कार है।’’ स्पष्ट है कि वह पुरुष अनार्य है जो सत्य से विचलित हो जाता है। जो सत्य पर आरूढ़ रहता है उसे ही आर्य कहते हैं। जहाँ-जहाँ सत्य से च्युत होने का प्रश्न आया, वहाँ अनार्य शब्द का प्रयोग हुआ है।

वाल्मीक रामायण का ही प्रसंग है कि एक बार रावण ने अपनी वेधशाला में राम का कृत्रिम सिर बनवाया। लाकर सीता के सामने फेंक दिया, बोला, ‘‘ले अजेय राम! मर्यादा राम! यह ले अपना राम! देख, हमारा सेनापति प्रहस्त गया और काटकर ले आया। अब तो मानेगी हमको?’’ सीता ने खून से लथपथ राम का सिर देखा तो विलाप करने लगी, ‘‘मुझ अनार्या को धिक्कार है जो मैं आपको प्राप्त न कर सकी। सिद्ध है कि मेरे सत्य में कोई कमी थी।’’ सिद्ध है कि आर्य वह है जो सत्य पर आरूढ़ रहता है। आर्य एक निष्ठा है, एक गुणवाचक कसौटी है। प्रत्येक मानव इस कसौटी पर पहुँच सकता है।

महाभारत का प्रसंग है। जब दुर्योधन की जाँघ टूट गई, तब भीम ने आक्षेपयुक्त वचन कहते हुए उसके सिर पर पाँव रखा, तब योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भीम को सान्त्वना देते हुए कहा, ‘‘भीम! यह तो पहले से ही मरा हुआ है। अब इसे मत मारो। इसने झूठे जुए का स्वांग करके धर्मात्मा युधिष्ठिर को वनवास में भेजा था। यह तभी से मरा हुआ है। इसे अब कुछ मत कहो।’’

कठिनाई से लम्बी साँस खींचते हुए दुर्योधन बोला, ‘‘ओ कंस के दास के बेटे! छली कृष्ण! तुमको धिक्कार है। तुम्हीं ने छल करके द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और मुझ दुर्योधन को मरवाया है, अन्यथा पाण्डव तो क्या, विश्व की कोई भी शक्ति हमारी सेना को जीत नहीं सकती थी। शिखण्डी को आगे करके तुमने भीष्म को मरवाया, क्या मैं इसे नहीं जानता? ताल ठोंककर भीम को मेरी जाँघ पर प्रहार करने का संकेत तुमने किया, क्या यह भी मुझसे छिपा है? अनार्य कृष्ण! तुमको धिक्कार है।’’

यहाँ दुर्योधन ने श्रीकृष्ण के लिए ‘अनार्य’ शब्द का प्रयोग किया। स्पष्ट है कि सत्य से हटकर असत्य के आश्रित होनेवाला ही अनार्य है। आर्यत्व गुण है, जाति नहीं।

आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ होता है। यह शब्द संस्कृत के ‘ऋ’ धातु से निकला है, जिससे ऋत् शब्द बना है। ‘ऋ’ का अर्थ तीक्ष्ण तथा काटने वाला तथा ‘अर’ हठपूर्वक काटने को कहते हैं। जो चिन्तन-पथ की बाधाओं को हठपूर्वक काटता है उसे आर्य कहते हैं। ‘अरः यम’ अर यम को भी कहते हैं। पातंजल योगदर्शन में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इस यम-पालन में आनेवाली रुकावट को काटने में जो सक्षम है वही आर्य है, वही सत्यान्वेषी है। जो इनका पालन नहीं करता, उसके लिये यही यम दण्डधारी यमराज बन जाते हैं। इनका पालन करनेवाला आर्य है, भले ही वह मध्य एशिया का हो अथवा यूरोप, भारत या विश्व के किसी कोने का रहनेवाला ही क्यों न हो।

इस प्रकार ‘आर्य’ शब्द गुणवाचक है, जातिवाचक नहीं है। यह रंग-भेद पर आधारित नहीं है। जो लोग यह कहते हैं कि ‘उत्तर भारत के निवासी आर्य बाहर से आये, दक्षिण के काले द्रविड़ भारत के मूल निवासी हैं’- केवल समाज में दरार डालने के लिए, भारत में फूट डालने के लिए ऐसा कहते हैं।

वास्तविकता यह है कि दक्षिण भारत वाले रावण की वंश-परंपरा में नहीं हैं। वे अंगद और सुग्रीव की सन्ताने हैं, जो आर्य ही थे। स्वयं रावण के पिता, पितामह सभी आर्य थे; किन्तु आर्य गुण से च्युत होने के कारण रावण असुर बन गया। इसी प्रकार, देखा जाय तो दक्षिण वालों ने ही रावण को मारा। उत्तर भारत की तो एक चुहिया तक नहीं मरी थी, एक भी सैनिक उत्तर भारत का नहीं था। राम को सीता की शोध में जाना ही था। दक्षिण के लोग रावण से त्रस्त हो चुके थे। राम ने केवल उनका संगठन खड़ा कर दिया। वस्तुतः उत्तरी और दक्षिणी भारत के निवासी आर्य-परम्परा के ही हैं। इतना ही नहीं बल्कि जापान, चीन, मध्येशिया, अमेरिका इत्यादि जिन देशों में गौतम बुद्ध की परम्परा गई, गुरु नानक के उपदेश गये, आर्य-संस्कृति का प्रचार-प्रसार हुआ, सब-के-सब आर्य हैं, सत्य की ओर अग्रसर हैं। यह अवश्य है कि सर्वत्र सभी आर्य ही नहीं हैं। आसुरी विचारधारा के लोगों का अस्तित्व भी सदैव रहा है।

प्रायः प्रत्येक देश में, प्रत्येक समाज में आर्य-अनार्य, दैवी-आसुरी प्रवृत्तियों का प्रचलन रहा है। यह बात अलग है कि कभी दैवी प्रतिशत अधिक रहा है तो कभी आसुरी प्रवृत्तियों का बोलबाला हो जाता है। शास्त्रों को उठाकर देखें, पुराणों के पृष्ठ पलटें, इतिहास साक्षी है कि समय-समय पर देवता पहाड़ों में जाकर छिप जाते थे और सर्वत्र असुरों का आतंक छा जाता था। यही हिरण्यकशिपु ने किया, यही रावण ने किया तथा यही समय-समय पर दानवों ने भी किया। परमदेव परमात्मा से विलग प्रकृति में विश्वास रखनेवाले असुर कहलाये और परमदेव परमात्मा की प्राप्ति में प्रयत्नशील पुरुष देवता एवं आर्य कहे गये। दोनों में केवल इतना ही अन्तर है। ‘छान्दोग्य उपनिषद्’ के आख्यान से इसी अन्तर पर प्रकाश डाला गया है। एक समय इन्द्र और विरोचन प्रजापति ब्रह्मा से आत्मा के विषय में जानने के लिए गये। प्रजापति ने कहा, ‘‘आत्मा को शरीर में खोजो।’’ दोनों लौट आये। प्रजापति ने इन्हें लौटता देखकर कहा-‘‘दोनों आत्मा का साक्षात्कार किये बिना ही जा रहे हैं। ‘यह शरीर ही आत्मा है।’- ऐसा मानकर जो बैठ जायगा, वह देवता हो अथवा असुर उसका पतन हो जायगा।’’ असुर विरोचन शरीर को ही आत्मा मानकर उसे अलंकृत करके सुख देने में लगा रहा, जबकि इन्द्र ने बार-बार विचार करके सकलेन्द्रिय संयम, ब्रह्मचर्य का पालन करके अन्त में आत्म-तत्त्व का साक्षात्कार कर लिया। ‘खाओ, पीओ और मौज करो।’- यही असुरों का मत है। आज भी ऐसा प्रचार संसार में न्यूनाधिक हो रहा है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि आज दैवी प्रकृति के पुरुषों को गुफाओं में छिपना नहीं पड़ रहा है। भारत की आर्य-संस्कृति विश्व में फैल चुकी है, न्यूनाधिक मात्रा में आर्य विश्व में सर्वत्र हैं। लोग केवल फूट डालने के लिए ऐसा कहते हैं कि आर्य बाहर से आये। अनेक भारतीय विद्वान् भी उसी लकीर के फकीर हो रहे हैं; क्योंकि उन्हें भी बचपन से वही पढ़ाया गया है। वास्तविकता लिखने पर उन्हें ‘डिग्री’ ही न मिले, नौकरी या कुर्सी भी न मिले, भारत और उसकी सभ्यता से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं है। वे भी अंग्रेजों के स्वर में स्वर मिलाकर आँख मूँद लेते हैं। कुछ अंग्रेजों ने वास्तविकता के प्रतिपादन का साहस भी किया; किन्तु विरोधियों के नक्कारखाने में तूती (शहनाई) की आवाज कौन सुनता है?

बरैनी निवासी श्री ओंकारनाथ सिंह ने प्रश्न किया, ‘‘महाराजजी! यदि संसार भर के निवासी आर्य हो सकते हैं तो यह मानने में क्या आपत्ति है कि आर्य बाहर से आये?’’ महाराजजी ने कहा- दो बातें हैं। यदि ईसाई भी आर्य ही हैं तो वे अपने को आर्य ही क्यों नहीं कहते? ‘आर्य’ शब्द ईसा से पहले का है अतः इन्हें आर्य कहलाने में हिचकना नहीं चाहिए। आपकी बात मानने में दूसरी आपत्ति यह है कि भारत में सदा से ही धर्म का अनुष्ठान एवं महापुरुषों का अवतरण अन्य देशों की अपेक्षा अधिक रहा है। आज के ही विश्व को लीजिए। संसार के अनेक देशों में जीवन की सुविधाएँ भारत से अधिक हैं। मोटर, बंगला, और विलासिता में अनेक देश भारत से आगे हैं; परन्तु अशान्ति, कलह, पागलपन और आत्महत्या की घटनाएँ वहाँ पर भारत से कई गुना अधिक हैं। आबादी भारत की अधिक है, किन्तु दुर्घटनाएँ उन देशों में अधिक हैं। भारतीय गरीब भले हो गये परन्तु सन्तुष्ट हैं, मानसिक अशान्ति नहीं है। विवाह की स्थिरता भारत में ही है। विदेशों में सातवाँ-आठवाँ तलाक सामान्य है। स्त्रियों का सतीत्व भारत में ही मर्यादा की वस्तु है। कम्युनिस्ट अथवा पूँजीवादी तथाकथित उन्नत देशों में यह शारीरिक भूखमात्र है। इतना सदाचरण तो भारत में आज भी सर्वत्र है।

प्राचीनकाल में भारत का सदाचरण कितना ऊँचा था?- इसे एक विदेशी के मुख से सुनिये। आज से लगभग साढ़े तेरह सौ वर्ष पहले चीन का पर्यटक ह्वेनसांग भारत आया था। पन्द्रह वर्षों तक उसने सम्पूर्ण भारत का पैदल भ्रमण किया। लौटने पर उसने यात्रा-वृत्तान्त लिखा- ‘‘भारतवासी बड़े सत्यवादी और प्रतिष्ठावान् होते हैं। वे पाप-पुण्य का सदैव ध्यान रखते हैं। उनका व्यवहार मधुर और नम्र होता है। पवित्रता इतनी अधिक है कि देश में मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का प्रयोग नहीं होता। केवल चाण्डाल लोग ही इनका प्रयोग करते हैं, जो नगर के बाहर ही रहते हैं। कहा जाता है कि इस देश की भाषा को ब्रह्मा ने बनाया है। सम्भवतः इसीलिए भारतीयों की भाषा बड़ी शुद्ध है, उनका उच्चारण बड़ा मधुर है। उनकी भाषा देवताओं-सी प्रतीत होती है, जबकि भारत से बाहर रहनेवालों की भाषा और उच्चारण अशुद्ध है। इस देश को हिन्दुस्तान कहा जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि ‘हिन्दू’ शब्द सिन्धु नदी से बना है। कुछेक कहते हैं यह इन्दु से निकला है, जिसका अर्थ यहाँ चन्द्रमा होता है; किन्तु मेरे विचार से इस देश का वास्तविक नाम ‘देवभूमि’ होना चाहिए; क्योंकि यहाँ आदमी नहीं, देवता रहते हैं।’’

वस्तुतः दैवी प्रकृति हमारी थी। दूसरी संस्कृतियों को, दूसरे देशों को यह गौरव कभी किसी ने नहीं दिया। अतः यह मानने का प्रश्न ही नहीं उठता कि हम बाहर से आये। आर्य-संस्कृति का गढ़ तो भारत है। विश्व ने जो कुछ सीखा है, वह भारत की ही देन है। साधना के प्रारम्भ में ईसा भी योग सीखने भारत आये थे- ऐसा तिब्बत के पुस्तकालय की प्राचीन पुस्तकों से प्रमाणित हुआ है। बाइबिल में ‘चिलचिलाती धूप में खेलनेवाले नंगे बच्चे’, ‘पानी भरती पनिहारिनें’, ‘आम की अमराई’ का वर्णन है जिसे इंग्लैण्ड या जेरूसलम में पले लोग स्वप्न में भी नहीं सोच सकते। स्वयं ‘ईसा’ शब्द भारतीय शब्द ईश, ईश्वर की नकल है। ईसा को मसीहा कहा जाता है। मसीहा वैद्य को कहते हैं। गुरु ही सबसे बड़ा वैद्य है, जो भवरोग से बचा लेता है। इसीलिए ईसाई मिशनरियों में गाया जाता है- ‘ईसू मसीह मेरे प्राण बचैया।’ वस्तुतः यह सभी भारतीय दर्शन से प्रभावित है और कहा तो यहाँ तक जा सकता है कि विश्व में जो कुछ श्रेष्ठ है, वह आर्यभूमि भारत की ही देन है। सही आत्मिक उपलब्धि के लिए भारत जगद्गुरु था और रहेगा। यह बात अलग है कि भारतीय शान्तिप्रिय दैवी सम्पत्ति में जीवन बिताने वाले थे, जबकि विदेशी आक्रमणकारी क्रूर और हिंसक थे। इसीलिए समय-समय पर भारत को गुलाम बनना पड़ा, न कि विदेशी शक्ति में अधिक थे। यही कारण है कि भारत और उसकी आर्य विरासत सर्वथा नष्ट कभी नहीं हुई। जब भी अपने शौर्य का स्मरण हुआ, भारत पुनः जागा और पुनः अपने उसी स्थान पर पहुँच गया। इसीलिए भारत आज स्वतन्त्र है। विदेशियों की अनेक चालों के बावजूद भारतीय संस्कृति, आर्य-संस्कृति अक्षुण्ण है। आर्य गुणधारी मनुष्यों की बहुसंख्या के कारण समग्र भारत ही मूल आर्यभूमि है। वैसे है सर्वत्र। इस आर्यत्व की उपलब्धि के लिए महर्षियों का सत्संग आवश्यक है।1

।। ओम् ।।

1.            भगवान गौतम बुद्ध के अनुसार, मनुष्यों के दो विभाग हैं। जो सन्मार्ग पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ हैं उन्हें आर्य कहते हैं तथा जो सन्मार्ग पर आरूढ़ नहीं हैं, पृथग्जन कहे जाते हैं। वे भी जन ही हैं क्योंकि आर्य बनने की क्षमता उनमें प्रसुप्त है।

               ‘मज्झिम निकाय’ के पासरासि सुत्त (1-3-6) में कथा आती है कि एक बार भगवान श्रावस्ती में अनाथ पिण्डिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। पूर्वाह्न के समय पात्र-चीवर लेकर श्रावस्ती में भिक्षाटन करते हुए वे रम्यक ब्राह्मण के आश्रम में पहुँचे, जहाँ धर्म-कथा हो रही थी। तथागत ने सम्बोधित किया, ‘‘तुम्हारे बीच कौन-सी गाथा चल रही थी?’’ उन लोगों ने बताया, ‘‘भगवान की ही कथा हमारे बीच में उठी थी, इतने में भगवान पहुँच गये।’

               साधुवाद देते हुए शास्ता ने कहा, ‘‘श्रद्धापूर्वक घर से प्रब्रजित तुम कुल-पुत्रों के लिए यही शोभनीय है। भिक्षुओ! तुम्हारे लिए दो ही कर्तव्य हैं- (1) भगवान का चिन्तन, (2) आर्यत्व के गुणों का मनन अर्थात् उन गुणों का चिन्तन जिन पर चलकर जातिधर्मा, व्याधिधर्मा, शोकधर्मा, संक्लेशधर्मा और मरणधर्मा पुरुष अजात, व्याधिरहित, अशोक, असंक्लिष्ट एवं अमृत बन जाता है। भिक्षुओ! वही आर्य है। जो पूर्णत्व प्राप्त कर चुका है, वह आर्य है।’’

* * *

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

Q & A
×