अवतार – मत्स्यावतार

मत्स्यावतार

कथा-कहानी के माध्यम से जीव-जगत् के नाना सत्यों, रहस्यों एवं सिद्धान्तों को उद्घाटित करने की अति प्राचीन परम्परा है। सामान्य से लेकर बड़ी-बड़ी बातों तक को कथानकों का आधार बनाया गया है। कारण स्पष्ट है- कथा-कहानी का प्रभाव मानव-मस्तिष्क पर अधिक पड़ता है। सृष्टि-विकास के साथ-साथ मानव का कथा-साहित्य से सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। कहानी कहना-सुनना उसकी प्रवृत्ति रही है। अतः उसकी चेतना को प्रभावित करने का यह सशक्त साधन बनी हुई है और कहानी के स्वरूप में परिवर्तन होते रहने पर भी उसका प्रभाव अक्षुण्ण है।

आत्मतत्त्वदर्शी तपोधन महात्माओं ने भी गूढ़ातिगूढ़ तत्त्वों, सृष्टि के रहस्यों एवं ब्रह्म की सत्ता को स्वानुभूतियों के प्रकाश में इसी माध्यम से व्यक्त किया है। उन्होंने परमार्थ पथ को प्रशस्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के कथानक गढ़े और घटनाओं का मौलिक सृजन किया। रूपकों और प्रतीकों के सहारे अध्यात्म-तत्त्व को हमारे सामने रखा। गूढ़ बातों का विवेचन कथानक के माध्यम से होने पर सरल, सरस एवं हृदयग्राही हो जाता है, इसलिए महात्माओं ने अध्यात्म-क्षेत्र में इसे अपनाया।

जिन तपःपूत मनीषियों ने इन कथाओं का निर्माण किया, उनका लक्ष्य परमार्थ पथ को प्रशस्त करना था। उन्होंने अध्यात्म को सामने रखा था। कालान्तर में इन कथाओं का उपयोग लौकिक उपलब्धियों के लिए होने लगा और उनके भीतर का महानतम उद्देश्य दब गया अर्थात् उनके भीतर के रहस्यों की ओर ध्यान न गया।

मत्स्यावतार के रहस्य को समझने के पूर्व एक प्राचीन कथानक को उदाहरणरूप में ग्रहण कर उपर्युक्त बातों की जाँच तथा विषय-क्रम को स्थिर कर लेना उचित होगा। महाराज परीक्षित एक महात्मा के शाप से प्रपीड़ित हुए। व्यासपुत्र अवधूत शुकदेव का कृपा-प्रसाद ‘भागवत’ उन्हें सुनने को मिला। राजा का कल्याण हुआ। कालान्तर में भागवत-कथन पण्डितों का पेशा (पण्डिताई) बन गया और कथा का रहस्य गौण होकर रह गया। कुछ समय बाद एक अन्य राजा ने कल्याण की इच्छा की। सैकड़ों विद्वानों ने राजा के कल्याण-साधन के लिए कथा की व्यवस्था आरम्भ की। राजा ने कथा की सामग्री, द्रव्य आदि जुटाया और कथा सुनने लगा। कथा समाप्त हुई; किन्तु उसका कल्याण न हुआ- हर्ष, शोक, भय आदि बना ही रहा। आशा, तृष्णा का वेग यथावत् रहा। राजा को बड़ा क्रोध हुआ। उसे लगा कि पण्डितों ने उसके साथ षड्यन्त्र रचा। उसने पण्डितों को जेल में डाल दिया ताकि वे पुनः ऐसा षड्यन्त्र न करें और उसका प्रसार न हो। राजा ने बार-बार कथा सुनी; किन्तु कल्याण न हुआ। यह अवश्य हुआ कि जेल में विद्वान् पण्डितों की संख्या बढ़ने लगी। अन्त में अनिच्छा होते हुए भी राजा ने कुलगुरु (पुरोहित) से कथा सुनी। पुरोहित द्वारा कथा समाप्त किये जाने पर वह भी जेल के द्वार पर पहुँचाया गया। पुरोहित के पुत्र ने पिता का समाचार सुना। वह राजा के पास जा पहुँचा और बोला- ‘‘राजन्! मैं आपके कल्याण के लिये यत्न करूँगा। आप एक घण्टे के लिए अपना राज्य मुझे दे दीजिए।’’ राजा ने बालक की बात मान ली, अपनी राजपोशाक उतार दी तथा वह सिंहासन के नीचे अलग जा बैठा। अब सिंहासन पर पुरोहित-पुत्र विराजमान था। उसने मन्त्री से कहा- ‘‘इस भूतपूर्व राजा को स्तम्भ में बाँध दो।’’ मन्त्री ने आज्ञा का पालन किया। सिंहासनारूढ़ बालक ने दूसरा आदेश दिया- ‘‘अमुक नामवाले पण्डित (अपने पिता का नाम) को जेल से बाहर करो और राजा के बगलवाले स्तम्भ में बाँध दो।’’ वैसा ही किया गया। पुरोहित को बड़ा क्रोध आया कि राजा के पागलपन ने हम ब्राह्मणों को जेल में बन्द कराया, उसके पुत्र ने भी सनक में उसे बँधवा दिया। वह कुछ समय तक बड़बड़ाता रहा। जब शान्त हुआ, तब बालक बोला- ‘‘पुरोहितजी! राजा साहब की रस्सी खोल दीजिए।’’ ‘‘तू पागल हुआ है। देखता नहीं मैं बँधा हूँ, हाथ-पाँव भी हिला नहीं सकता, राजा की रस्सी कैसे खोल दूँ।’’- पण्डित झल्लाया।

बालक पुनः बोला- ‘‘अच्छा राजन्! आप ही पुरोहितजी को खोल दीजिए। आप राजा रह चुके हैं, कोई युक्ति लगाइये।’’

‘‘विप्र बालक! मैं भी तो बँधा हूँ, भला मैं कैसे खोल दूँ?’’- राजा ने उत्तर दिया।

अन्त में बालक ने मन्त्रियों को दोनों की रस्सी खोल देने की आज्ञा दी। समय से कार्य हो गया। राजा पुनः अपने सिंहासन पर जा बैठा। तदुपरान्त ब्राह्मण बालक ने कहा- ‘‘राजन्! जब पण्डित स्वयं मोह के बन्धन में बँधे हैं, रात-दिन भले-बुरे कर्म घर-परिवार के लिए करते हैं, माया के फन्दे में जकड़े हुए हैं, तब भला तुम्हें कैसे बन्धन-मुक्त कर सकते हैं। जिन शुकदेव से कथा सुनकर राजा का कल्याण हुआ था, वे परम विरक्त महापुरुष थे। आप भी किसी विरक्त महापुरुष से कथा सुनें और कल्याण के पात्र बनें।’’ उसी समय राजा विरक्त महापुरुष की खोज में लग गया।

इस कहानी से ‘पूर्ण प्राप्तिवाले महापुरुष’ के खोज की प्रेरणा मिलती है और इसी बात का इसमें निर्देश है; किन्तु विरले ही इस पक्ष पर विचार करते हैं। यह एक कथा मात्र बनकर रह गई है। इसी प्रकार अवतार-सम्बन्धी कथानक भी हैं। उस परमप्रभु को किस प्रकार प्राप्त किया जाय, व्यापक ब्रह्म का अवतार कैसे अपने भीतर हो?- इनसे सम्बन्धित उपायों तथा साधनों को मनीषियों ने कथानकों में बाँधा है।

मत्स्यावतार भी एक शुद्ध रूपक है। समुद्र से एक छोटा-सा मत्स्य निकलकर स्वायंभुव मनु से बोला- ‘‘हमारे कुल की मर्यादा है कि बड़े और सबल मत्स्य छोटे और निर्बल मत्स्य को खा जाया करते हैं। आप मेरी रक्षा करें।’’ चराचर के राजा मनु ने उसको घट में रखा। थोड़े ही समय में वह स्थान तंग हो गया। तत्पश्चात् मनु ने उसे विस्तृत तालाब में व्यवस्था के साथ डलवाया और पालन किया। वहाँ भी मत्स्य की सतत बाढ़ से स्थान की कमी स्पष्टतः दृष्टिगोचर हुई, तब मनु ने मत्स्य को गंगाजी की विस्तृत धारा में प्रवाहित किया। गंगा-स्थान भी तंग पड़ते ही महाराज मनु ने उसे समुद्र में जा छोड़ा और व्यवस्था में संलग्न रहे।

समुद्र-प्रवेश के बाद मत्स्य बोला- ‘‘राजन्! अब मैं निर्विघ्न रहूँगा। महाप्रलय का समय आ गया, आप एक नाव में सृष्टि के कल्याणकारी बीज तथा सप्तर्षियों को लेकर सब प्रकार की चिन्ता छोड़ बैठ जायँ। आप नाव की मजबूत रस्सी मेरे मस्तिष्क के श्रृंग में बाँध दें। चराचरसहित त्रैलोक का नाश करनेवाले उस महाकाल के प्रकट होने पर मैं आपको निर्दोष, अजर, अमर, शाश्वत स्थिति प्रदान कर पूर्णता में स्थित कर दूँगा।’’

मनु ने ऐसा ही किया। तब वह मत्स्य हजार वर्षों तक मनु को परमार्थ का उपदेश देता हुआ निरन्तर चलता रहा। कथानक में निर्दिष्ट है कि उस मत्स्य की गति प्रकृति के तीव्रतम गतिवाले प्राणियों या माध्यमों से भी अधिक थी अर्थात् वायु, प्रकाश इत्यादि की गति से भी उसकी चाल अधिक थी। उस गति से चलकर मत्स्य ने नाव को हिमालय तक पहुँचाया और मनु ने उस नाव को हिमालय के उत्तुंग श्रृंग में बाँध दिया। मत्स्य ने राजा को पुनः आश्वस्त किया और अदृश्य हो गया। थोड़े समय में महाप्रलय का वह दृश्य शाश्वत शान्ति में बदल गया। मनु ने पुनः परम कल्याणकारी उन बीजों को जहाँ-तहाँ फेंका और वे अंकुरित हो गये।

मनु मन ही मनु है, जो स्वयं सृष्टि का रचयिता है। जिन महापुरुषों ने इस मन को वश में कर लिया, उन्होंने संसार के क्रम को रोक लिया।

मन ही आके जगत बना के, ऊँच नीच तन पाया रे।’

यह संसार समुद्र है, जिसमें अनन्त योनियों का सिलसिला है। मन और इन्द्रियों की अधोमुखी अनन्त प्रवृत्तियाँ हैं। ये ही अथाह खंदक तथा खाड़ियाँ हैं। मन एवं इन्द्रियों की ऊर्ध्वमुखी प्रवृत्तियों से निर्मलता, निवृत्ति सम्भव है। अधिकांश प्रवृत्तियाँ संसार-सागर में ही फँसाव लेनेवाली हैं, किन्तु किसी काल में राम भगति जल मम मन मीना।’वाली इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति का प्राकट्य होता है, जो भक्तिरस में सुख माननेवाली है। यही मानसिक प्रवृत्ति मत्स्य है। भजन की अल्प प्रवृत्ति को मायिक प्रवृत्तियाँ खा लिया करती हैं, मिटा दिया करती हैं। तभी तो दुर्बल मत्स्य ने मनु से अपनी रक्षा का निवेदन किया। ठीक इसी प्रकार की स्थिति भक्त के हृदय की होती है। इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति के जागृत होते ही भावविभोर भक्त निज मन से ही अपने बचाव के लिए निवेदन करता है- ‘‘हे मन! अनन्त मायिक मनोवृत्तियों (बहुमत्स्यों) से बचकर यह थोड़ी-सी यथार्थ लगन जागृत हुई है। इस मन्तव्य (मत्स्य) की रक्षा-व्यवस्था करो।’’

रक्षण कार्य के प्रथम चरण में मनु इस इष्टमयी प्रवृत्ति को घड़े में रखता है। घट कहते हैं हृदय को! अर्थात् वह इस प्रवृत्ति को हृदय में ही व्यवस्थित ढंग से प्रवाहित कर देता है। हृदय में दीर्घकाल तक सफल प्रयोग से यह मत्स्य (मनोवृत्ति) पुष्ट हो जाती है और तब त्यागरूपी तालाब में पड़कर त्याग की पूर्णता प्राप्त करा देती है और पुरुष को त्याग-प्रधान बना देती है। त्याग-पालन की प्रक्रिया ठोस हो चुकी, उसमें अब कोई अपूर्णता नहीं है। जिसका संकेत- ‘मत्स्य ठसाठस तालाब के कोने-कोने में भर गया।’ से मिलता है।

प्रयोगात्मक प्रवेश से मनस्थल में ज्ञान का प्रस्फुटन हो जाता है। ‘ज्ञान गंगा नहा ले प्यारे मना!’ मनु के सहयोग से अर्थात् मन के पूरे सहयोग से, बिना ‘लीकेज’ यह मत्स्यरूपी मनोवृत्ति ज्ञान में प्रवाहित हो जाती है और ज्ञान की व्यापकता के साथ क्षीरसागर में प्रविष्ट हो उसी का रूप ले लेती है। यह क्षीरसागर ईश्वर का विहार, निवास-स्थान है। याद रखें, इधर संसार-सागर है, उधर क्षीरसागर ईश्वर का स्वरूप ही है। संसार-सागर का तो पैमाना है; किन्तु ईश्वरमय सागर का नहीं, वह तो अनन्त है। ईश्वर के निवास की व्यापक उपलब्धि में मनोवृत्ति भी पूर्णता को प्राप्त कर अचल हो जाती है। इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति उस सागर के संयोग से ईश्वरमयता की लहरों में परिवर्तित हो जाती है, जिसमें तीनों लोकों का सामान्य आधार एवं प्रसारण केन्द्र पृथ्वी डूब जाती है। अर्थात् संस्कारों के अंकुरण की हृदयस्थली डूब जाती है।

मत्स्य के कृपा-प्रसाद प्रेरणा से उपलब्ध नाव में सप्तर्षियों को बैठाकर मनु स्वयं बैठ गये। क्रमशः सातों भूमिकाओं में ऋषित्व की उपलब्धि ही सप्तर्षि है। योग-चिन्तन की सातों भूमिकाओं में ऋषित्व प्राप्त करनेवाला पुरुष ही नियम की कसौटी पर चढ़ता है। नियम ही नौका है। शुभाशुभ का अन्त करनेवाले इस नियम पर चलना तथा योग की सातों अतिसूक्ष्म भूमिकाओं में ऋषित्व प्राप्त करना ‘उर प्रेरक’ उन प्रभु की देन है। मन की इष्ट चिन्तनमयी प्रवृत्ति में प्रेरक के स्थान में स्वयं भगवान ही अवतरित होकर खड़े हैं। भजन कोई लाख करे; किन्तु जब तक परमात्मा इष्टमयी प्रवृत्ति का संचालन नहीं करता तथा अपनी स्थितियों में ढालने नहीं लगता तब तक उस ब्रह्म को समझा नहीं जा सकता। अर्थात् मानसिक प्रवृत्तियों में सर्वत्र प्रेरक के रूप में इष्ट का अवतरित होना अनिवार्य है तथा वही मत्स्य है। मानसिक प्रवृत्ति का प्रतीक वह मत्स्य परमात्मस्वरूप में संचालित है, इसलिए अवतार कहलाता है।

प्रेरक के रूप में अवतरित वह प्रभु किसी अनुरागी को लेकर चलता है, तो हजारों मानसिक प्रवृत्तियों में जो रस-संचार है, जब तक उसका अंत नहीं हो जाता तब तक वह चलता है। यात्राकाल में वह इष्ट मत्स्य निरन्तर ब्रह्म का उपदेश देता गया अर्थात् वह इष्ट ही अनुरागी को बराबर उपदेश देते जाते हैं, तभी समझ में आता है- वही यथार्थ उपदेश है। प्रायः श्री महाराजजी इसी पर बल दिया करते- ‘‘हो! भगवान पढ़ाया करत हैं, मोके भगवान पढ़ावत हैं, तोहूँ के पढ़इहैं।’’ अर्थात् अपनी स्थिति समझाया करते हैं। मानसिक हजारों प्रवृत्तियों का अंत करके उस आराध्य ने उस नाव को हिमालय की चोटी पर बँधवा दिया अर्थात् मानसिक शुभाशुभ में संचारित सम्पूर्ण प्रवृत्तियों की यात्रा पार कर लेने पर जो अचल, शाश्वत ब्रह्म है उसी के अंक में आकर बँध जाते हैं। हिमालय ब्रह्म का द्योतक है। इस हिमालय को अचल देखकर ब्रह्म को वास्तविक अचलता की ओर इंगित किया गया है। हिमालय शान्त और शीतल ब्रह्म का प्रतीक है। सर्वत्र ब्रह्ममयता तो आयी थी, दिखाई देती थी; किन्तु देखनेवाला वह साधक अलग खड़ा है, इसलिए विलीनता की अन्तिम स्थिति हिमालय का अन्तिम स्पर्श और उसमें बँध जाना है। हिमालय अचल, शान्त, शीतल एवं स्थिर कोई सत्ता है जिसे ब्रह्म कहकर सम्बोधित किया गया है- उसमें पूर्ण विलय होना है। वास्तव में उस अचल ब्रह्म में पूर्ण स्थिति बन जाने पर अर्थात् उसमें समाहित हो जाने पर वह प्रेरक भी अदृश्य हो जाता है, कारण कि अब कोई भिन्न सत्ता है ही नहीं, इसलिए किसे प्रेरणा दे?

सुरसरि मिलें सो पावन जैसें।

ईस अनीसहि अन्तरु तैसें।। (मानस, १/६९/२)

इस एकत्व में द्रष्टा भी विलग नहीं रह गया, इसलिए वह प्रलयकालीन दृश्य भी समाप्त हो गया। याद रखें, ब्रह्ममयता ही जड़-चेतन सहित सम्पूर्ण सृष्टि को नष्ट करनेवाला महाप्रलय है। ब्रह्म में स्थित होने के बाद सृष्टि और ब्रह्म दोनों नहीं रहते। वह कैवल्यस्वरूप महापुरुष ही मात्र शेष है, जिसमें –

ईश्वर ब्रह्म जीव अरू माया, फूँक दिए संसार।’

बिना ईंधन के परकासी।….’ (बारहमासी)

जिसमें वह स्वयं प्रकाश स्वरूप और प्रकाशक है। ऐसे महापुरुष के पास सृष्टि के कल्याणकारी बीज रहते हैं, जो परमकल्याण करनेवाले हैं; पतन के बीज उनके पास नहीं रहते। कल्याण का विधान सदैव इस परम की स्थितिवाले पूर्ण सद्गुरुओं से सम्भव होता आया है, जिसका प्रतिपादन इस कथानक में है। हिमालय में बँध जाने के बाद अर्थात् अन्तिम स्थिति में मनु महाराज ने कल्याणकारी निर्दोष बीजों को फैलाया- ऐसी ही मान्यता है। जो स्वयं ही कल्याण स्वरूप में स्थित है अपना कल्याण कर लिया है, वही अन्य पुरुषों का कल्याण-सम्पादन कर सकता है।

नोट – . इस कार्य के प्रवृत्तिकाल में मनु का नाम सत्यव्रत हो गया था। कारण कि मन की असत्य एवं सत्य दोनों प्रवृत्तियाँ मन के अन्तराल में हैं; किन्तु साधक जब इष्ट की ओर बढ़ने लगता है तब उसकी असत्य प्रवृत्तियाँ दब जाती हैं और सत्यव्रत की प्रवृत्तियाँ सबल हो जाती हैं।

. नियम ही नौका है, जो सुरति की रस्सी तथा श्वासों के तारों से इष्टमयी मनोवृत्ति (मत्स्य) में बँधी है। ऐसी प्रवृत्ति के अन्तराल में इष्ट स्वयं अवतरित होकर गतिमान प्रवाह प्रदान करता है, इसलिए अवतार है। यह अवतार का निम्नतम स्वरूप है – आरम्भ का बिन्दु- जिसमें संचालित होकर अवतार को पूर्णत्व मिलेगा। जब कभी किसी ने पाया तो इसी रूप में पाया।

. अवतार वास्तव में परमकल्याणकारी मनोवृत्ति तब समझी जाती है जब ईश्वर का अवतार हो जाये।

तुलसिदास (मन) बस होइ तबहि, जब प्रेरक प्रभु बरजै।’ (विनय०, पद ८९)

भजन कोई लाख करे, वह कल्याणकारी भजन होता नहीं; जब तक कि उस प्रभु का आविर्भाव नहीं हो जाता। उस प्रेरक से संचालित होने के साथ-साथ अनुरागी पथिक की गति सबसे तेज और सबसे पहले पहुँचनेवाली, सीधे लक्ष्य पर पहुँचनेवाली हो जाती है जिसकी मान्यता सदैव रही है। हम सब के लिए आज भी विद्यमान है।

।। ॐ।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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