अवतार – वराह अवतार

वराह अवतार

हिरण्याक्ष प्राचीन वैदिक भाषा में हिरण्य कहते हैं सूक्ष्म शरीर को। ब्रह्मा से लेकर यावन्मात्र जगत् हिरण्यगर्भ कहलाता है। इसमें जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों की ‘रील’ है, जो कि मन के अन्तराल में स्थित संसार है। तुलसिदास कह चिद-बिलास जग बूझत बूझत बूझै।’ (विनय०, पद १२४)- तुलसीदासजी कहते हैं कि चित्त का विलास ही जगत् है। अक्ष कहते हैं दृष्टि को; इस प्रकार संसारमयी दृष्टि ही हिरण्याक्ष है। यही समस्त माया का मूल, आसुरी प्रवृत्तियों का उद्गम है इसीलिए हिरण्याक्ष राक्षस है, जिसने इस शरीररूपी पृथ्वी को मल-मूत्र, रक्त-मवाद से संयुक्त चराचर में स्थित इन गर्भवास की योनियों में फेंक रखा है। इस जीवात्मा का दुर्गन्धपूरित पतन-कुण्ड से तब तक उद्धार नहीं होता, जब तक उस ब्रह्म का पथ प्रशस्त नहीं होता। इसलिए पूर्व महापुरुषों द्वारा समझाये गये कई तरीकों में से एक तरीका प्रस्तुत है- वराह अवतार।

वराह ‘व’ का अर्थ है वह परमात्मा और ‘राह’ का अर्थ होता है रास्ता। ब्रह्म की राह ही वराह है। वह भगवान जब तक हमारी साधना में नहीं उतर आते, तब तक उस ब्रह्म में स्थितिवाले पथ एवं भजन आरम्भ नहीं होता। पूज्य परमहंस महाराजजी का उपदेश है- ‘‘जहाँ साधक खड़ा है, वहीं पर जब तक वह प्रभु द्रवित होकर उतर नहीं आता, मन को पकड़कर नियन्त्रित नहीं करता, तब तक भजन (ब्रह्म-पथ) का आरम्भ ही नहीं होता। भजन भगवान कराते हैं।’’ क्रमशः चलकर अपने अनुरूप खड़ा कर देते हैं, जहाँ पर मल-मूत्र आवरण नहीं होता। मल-मूत्रवेष्ठित यह शरीर तथा अनन्त योनि-खानि प्रकृति पुरुषत्व में विलीन हो जाती है- जिसे स्पष्ट किया गया है कि वराह ने उस मल-मूत्र, रक्तपूरित योनियों में विस्तृत प्रकृति को उदरस्थ कर लिया और केवल निर्मल प्रकाश के विकसित होते ही अन्तर्धान हो गया। वह परमात्मा साधना में ढलकर सर्वरूपेण ‘लगने’ और आज्ञापालन में तत्पर भाविक को बराबर अपने में ही समाहित करते रहते हैं। जिस क्षण भाविक पूर्णतया समाहित हो जाता है, ठीक उसी क्षण उस निरुद्ध चित्त में परमात्मा- सनातन कहलानेवाला परंब्रह्म विकसित हो जाता है। यह जीवात्मा परमात्मा ही हो जाता है। प्राप्त होने योग्य कोई परमात्मा लेशमात्र शेष नहीं रहता, न स्वयं में लेशमात्र की कमी है। उसे सनातन, शाश्वत, सर्वत्र व्यापक, अजर, अमर, अपरिवर्तनशील सत्ता ही प्राप्त होती है, इस प्रकार वह शाश्वत सत्ता पूर्ण प्रत्यक्ष हो जाती है, इसलिये यह अवतार और अवतार का उपाय है। श्रद्धालु, विरह-वैराग्य से युक्त और सद्गुरु कृपाश्रयी प्रत्येक मानव के लिए अवतार का विधान है।

नोट – प्राप्ति के बाद वह भिन्न नहीं है, स्वयं में प्रविष्ट है। कै जाने जिउ आपना कै रे जानै पीव’– या तो वह जानता है जिसमें यह जागृति आयी और दूसरा भगवान। वह जानता अवश्य है किन्तु दिखा नहीं सकता। यह स्थिति अनुभवगम्य है। वह अनिर्वचनीय और अलख है। जिसे अपनाता है उसे अपनाकर अन्तर्धान हो जाता है। सो केवल भगतन हित लागी।’ (मानस, १/१२/५) होता है।

प्रयत्न जारी रहे। सफलता सदैव सम्भव है। इसमें यह सुविधा भी है कि थोड़ा-सा भी साधन अनेक जन्म चलकर परमकल्याण में स्थित करता है। जो चलता रहता है वही अवश्य पहुँचता है।

।। ॐ।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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