जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।। (गीता, ४/९)
अर्जुन! मेरा जन्म, कर्म अलौकिक है। लौकिक का मतलब पिण्डरूप में आना- जो चर्मचक्षुओं से देखा जा सके, बुद्धि से समझा जा सके। अलौकिक का मतलब जो इन मन-बुद्धि से न देखा और न जाना जा सके। तत्त्वदर्शी महात्मा ही उसे देख पाता है। जो वास्तव में देख लेता है वह शरीर को त्यागकर पुनः आवागमन में नहीं आता है। वह मुझे (भगवान को) प्राप्त हो जाता है। तब तो जो लोग दृष्टि गड़ाए खड़े हैं कि अवतार होगा तो देखेंगे, वे बड़ी भूल में हैं। कारण कि करोड़ों में एक के तत्त्वदर्शी होने का विधान है।
नरसिंह अवतार– ‘नर’- यह मरणधर्मा मानव किस तरह स्वयं की उपलब्धि अर्थात् परब्रह्म के साथ ही हिरण्यगर्भ एवं काल को काटकर अदृश्य सत्स्वरूप सिंह हो जाता है, जो प्रकृति के जंगलों में सर्वत्र अभय है और शरणागत, दैवी सम्पद् से संचालित पुरुषों का अभयदाता है। प्रेम के द्वारा ऐसा होता है। इसी का रूपक यह प्राचीन कथानक है। यह अलख पुरुष के उपलब्धि का माध्यम है, इसलिए मनीषियों के द्वारा इसे अवतार कहा गया है। इसमें कहीं-कहीं नर का नारायण से वास्तविक सम्बन्ध होता है, अतः नर-नारायण संज्ञा भी दी गयी है। उसी कथानक की यहाँ पर नर से सिंह की सत्ता धारण से संज्ञा दी गई है।
प्रेम ही प्रह्लाद है। हिरण्याकुश – हिरण्य अंकुश। हिरण्यगर्भ कहते हैं ब्रह्मा की समूची सृष्टि अर्थात् चराचर जगत् को, अंकुश कहते हैं उस सृष्टि-क्रम के शूल को, जिसमें जन्म-मरण की असहनीय यातनाएँ हैं। इसी को दूसरे शब्दों में हम काल-क्रम कहते हैं। यह हिरण्यगर्भ का अंकुश (शूल) सदैव प्रकृति में ही विश्वास दिलाता है। यही भगवत् तत्त्वों से विमुख किया करता है। हिरण्यगर्भा अर्थात् ब्रह्मा के प्रपंच के साथ उत्पन्न अविद्या होलिका है, जो निरन्तर विषयाग्नि में गोता लगाती है। स्वयं तो अपने रूप को विषय-स्पर्श के साथ-साथ पुष्ट करती है और प्रभु पर विश्वास करनेवाले जीवों को जलाया करती है। इसी विधि-प्रपंच हिरण्यगर्भ में दैवी प्रवृत्ति भी है। देवर्षि नारद (कल्याण-पथ प्रशस्त करनेवाले सद्गुरु) के उपदेश से हिरण्याकुश द्वारा शासित दैवी प्रवृत्ति में प्रेम का प्रस्फुटन हुआ। प्रेम ही प्रह्लाद है। प्रेम के जागृत होते ही यह हिरण्य अंकुश काल-क्रम का बाधक बन खण्ड-खण्ड हो जाता है। ‘गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला।।’ (मानस, १/३७/८)- मोहयुक्त स्वजनों का जो जाल होता है, वही द्वैत का विशाल आवरण पैदा करता है। यही दुर्गम शैल है। हिरण्याकुश (काल-क्रम का बन्धन) इसी पर्वत से गिराता है। आज आप भजन शुरू करें, तो कल विघ्न ही विघ्न। उस चपेट में पड़कर प्रेम की डोरी टूट जाती है। सागर में फेंकता है- संसार ही सागर है, अतः संसृति के अथाह सागर में फेंकता है। अपनी बहन द्वारा बरबस पकड़वाकर अग्नि में रख छोड़ता है। होलिका अविद्या का प्रतीक है। एक ही अन्तःकरण में अविद्या व प्रेम का प्रसार है, इससे यह सदैव प्रेमी को पथ से अलग कर जलाया करती है। अविद्या बहुत पुरानी और प्रेम सत्पुरुषों के संसर्ग से नवीन प्रस्फुटन है।
यह अविद्या विषयाग्नि में प्रेम को समेट लेती है; किन्तु इष्ट के संरक्षण में प्रेम का सूत्रपात है तो अविद्या स्वतः जल जाती है; क्योंकि वास्तविक प्रेम जहाँ रहता है वहाँ अविद्याजन्य कृत्यों में आसक्ति नहीं। हाथियों से कुचलवाया जाता है- ‘मन मतंग माने नहीं।’ मन जब काम वासनाओं से युक्त होता है तो मदान्ध हाथी की तरह दुर्जय हो जाता है, असमंजस में डाल देता है जिसके मूल में वही हिरण्याकुश, हिरण्य अंकुरण है। मन में प्रस्फुटित होकर दुर्जय काम की चपेट में डालता है; किन्तु प्रेम के इष्ट का वरदहस्त भी है तो वह पार हो जाता है। अन्त में माया स्वयं खड़ी हो जाती है। जब ग्रन्थि छूटने का समय आता है तब माया विकराल रूप धारण करके खड़ी हो जाया करती है।
छोरत ग्रन्थि जानि खगराया।
बिघ्न अनेक करइ तब माया।। (मानस, ७/११७/६)
स्तम्भ प्रज्वलित है और बिल्कुल बारीक बाल-चींटी स्तम्भारूढ़ है। मार डालने की इच्छा से निशाचर अब भी खड़ा है। स्थिर श्वास ही स्तम्भ है। प्रेम से संचालित स्वर इष्ट के रूप में स्थायित्व प्राप्त कर लेता है, तब यही स्थायित्व स्तम्भ कहलाता है और चित्त नादान चींटी की तरह पूर्णतया विलीन की स्थितिकाल में सर्वदा सूक्ष्म हो जाता है। उस समय वही श्वासारूढ़ कहलाता है। स्तम्भारूढ़ अग्नि दो प्रकार की होती है- विषयाग्नि और ज्ञानाग्नि। ‘ज्ञानाग्नि दग्धकर्माणम्’ (गीता)- ज्ञानाग्नि ईश्वर में प्रवेश दिलाती है, कल्याण करती है और विषयाग्नि जलाती तथा ईश्वर से विमुख माया में उलझाती है। जिस समय यह चित्तरूपी चींटी स्थिर श्वास की स्थिति प्राप्त कर लेती है और स्वर योगाग्नि से प्रज्वलित हो जाता है, तत्क्षण वह परमात्मा जैसा है, जिन अलौकिक विभूतियों से युक्त है, प्रकट हो जाता है। उस परमात्म-स्वरूप के प्रकट होते ही आसुरी प्रवृत्तियों का मूल उद्गम हिरण्य अंकुशकाल की फाँस का क्रम ही टूट जाता है। हिरण्याकुश का मारा जाना इसी ओर संकेत करता है। इसी उपलब्धि को अवतार कहते हैं। श्वास के स्थितिकाल में जीवात्मा स्व-स्वरूप पाकर सिंह हो जाता है। कालक्रम व आसुरी प्रवृत्तियों में पीसनेवाला दुर्बल जीव प्रेम के द्वारा पूर्णत्व की मंजिल पाकर पूर्णतया हिरण्यगर्भ काल के क्रम को काटकर शाश्वत स्वरूप- जो सबको संरक्षण देनेवाला है उससे पूरित हो जाता है। यह अदृश्य सत्ता को प्रकट करने की युक्ति है; जिसमें हिरण्याकुश- ब्रह्मा की महद् योनियों में नियोजित शूल अर्थात् काल का क्रम अवतार-हेतु, उत्प्रेरक है। प्रेम द्वारा अवतार की स्थिति उत्पन्न होती है। भिन्न-भिन्न महापुरुषों ने विभिन्न समयों में वातावरण, स्थिति एवं परिस्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपक प्रस्तुत किया है।
‘नाद रंध्रः सः नारदः’- नारद एक सद्गुरु हैं। नादरंध्र की स्थितिवाले किसी महापुरुष की प्राप्ति करें और अपने हृदय में स्थित दैवी प्रवृत्ति (दैवी सम्पत्ति) को बलवती करें जिससे निर्दोष प्रेम उत्पन्न हो जाय। विरह-वैराग्य के उत्पत्तिकाल में आप उस सिंह-स्वरूप का पथ पकड़ सकते हैं। स्वर का प्रवाह ज्ञानाग्नि से ओतप्रोत, स्थिर हो जाय, चित्त के ऐसे पूर्ण निरोधकाल में दर्शन निश्चित है। यह स्थिति सदैव रहनेवाली है। योग्यता से सभी कालों में सम्भव है। बाह्य पिण्डों में अवतार न तो कभी हुआ था, न आज है। ऐसा कोई उल्लेख शास्त्रों में भी नहीं मिलता।
।। ॐ।।
(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)