अवतार – कबीर और अवतार

अवतार का अनन्त विधान एवं अधिकारी के लिए सम्भव

अवतार योगी के अन्तस्थल में ही होता है। देश, जाति एवं कालविशेष में प्रभु के अवतरण की परिकल्पना भ्रान्तिमात्र है। प्रक्रियाविशेष के द्वारा अनुभवी महापुरुष के माध्यम से योगी के अन्तःप्रदेश में परमात्मतत्त्व की अनुभूति होती है।स्वामी अड़गड़ानन्द

कबीर और अवतार

सन्तो! आवै जाय सो माया।।

है प्रतिपाल काल नहिं वाके, ना कहुं गया आया।।१।।

का मकसूद मच्छ कछ होना, शंखासुर संहारा।

है दयाल द्रोह नहीं वाके, कहहु कौन को मारा।।२।।

वै कर्त्ता नहिं बराह कहावे, धरणि धर्यो नहिं भारा।

सब काम साहेब के नाहिं, झूठ कहै संसारा।।३।।

सिरजनहार ब्याही सीता, जल पाषाण नहिं बंधा।

वै रघुनाथ एककै सुमिरै, जो सुमिरै सो अंधा।।४।।

वै कर्ता नहिं भये निकलंकी, नहिं कालिंगहि मारा।

छल बल सब माया कीन्हा, जत सत्त सब टारा।।५।।

दश अवतार ईश्वरी माया, कर्त्ता कै जिन पूजा।

कहहिं ‘कबीर’ सुनो हो संतो, उपजै खपै सो दूजा।।६।।

(बीजक, शब्द प्रकरण, शब्द ८)

उपर्युक्त पद पर दृष्टि पड़ते ही ऐसा आभास होता है कि इसमें अवतारों का पूर्णतः खण्डन किया गया है; किन्तु सन्त कबीर ने यथार्थ को परिलक्षित करते हुए यह स्पष्ट कह सुनाया कि दस अवतार ईश्वर नहीं, बल्कि ईश्वरीय तत्त्व की आरम्भ से पराकाष्ठापर्यन्त ईश्वर प्रसारिणी विशद धाराएँ हैं। दश अवतार ईश्वरी माया’– दस अवतार अधिकारी जनों को ईश्वर में प्रवेश दिलानेवाली माया है। उस ईश्वरीय तत्त्व के प्रवेश के साथ ही पुरुष उसी परमात्मस्वरूप से परिपूरित हो जाता है। इसका परमबोध पूर्णत्व प्रदायिनी परिणाम है।

कबीर के चिन्तन का नाम ‘राम’ था-

राम रमसि कवन दण्ड लागा।

मरि जइबे का करिबे अभागा।।

आपने प्रेरणा के शब्दों में कहा कि राम का भजन क्यों नहीं करते-

कबीर और जाने नहीं, एक राम नाम की आस।

अवतार का अनन्त विधान एवं अधिकारी के लिए सम्भव’- यह रचना अवतार-सम्बन्धी भ्रान्तियों का निराकरण, उनकी मौलिक अवधारणाओं का शास्त्रसम्मत विशुद्ध स्वरूप प्रस्तुत करती है। इस कृति का प्रतिपाद्य विषय अनन्त अवतारों की सम्यक् वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करना है। इस कृति की मौलिकता इस तथ्य का उद्घोष है कि अवतार योगी के अन्तस्थल में ही होता है। देश, जाति एवं काल-विशेष में प्रभु के अवतरण की परिकल्पना भ्रान्तिमात्र है। प्रक्रिया-विशेष के द्वारा अनुभवी महापुरुष के माध्यम से योगी के अन्तर्प्रदेश में परमात्म-तत्त्व की अनुभूति होती है। साधक के अन्तःकरण में ही प्रभु का प्राकट्य होता है। अधिकारी के लिए ही आज एवं सदैव अवतार का विधान है।

मनःदेश में अवतार की अवधारणा का पवित्रतम सन्देश लेकर यह आर्षग्रन्थ स्वयं में आत्मदर्शन की उपलब्धि यौगिक प्रक्रिया के सन्दर्भ में अभिव्यक्त करता है। आत्मा में परमात्मा की अनुभूति ही इस महानतम ग्रन्थ का मूल विषय है। मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह इत्यादि अनेकानेक अवतार इष्टदेव के संस्पर्श एवं अभिन्नता के समय हृदय-देश में अभिव्यक्त होते हैं। कृष्णावतार भी आत्मा की ही सत्, चेतन एवं आनन्दघन अवस्था का निर्देशक है। संक्षेप में, कृतित्व का विवेचन पाठकों के अन्तराल में प्रेरणात्मक स्रोत का सृजन मात्र है; क्योंकि विवेच्य वस्तु का सम्बन्ध तो मन-वाणी से सर्वथा परे है।

।। ॐ।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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