आपका प्रिय मंत्रजप क्या है?

प्रश्न- आपका प्रिय मंत्रजप क्या है?

उत्तर- सृष्टि में जप का एक ही नियत विधान है इसलिए सबका प्रिय एक ही जप है– एक परमात्मा के प्रति श्रद्धा और उनको जो सीधा पुकारे, उस किसी एक नाम का जप! ईश्वर-पथ की आधी दूरी तक प्रभु का कोई भी नाम ठीक है किन्तु अन्त में जप के लिए केवल एक नाम ‘ओम्’ है। ‘ओ’ अर्थात् वह अविनाशी परमात्मा, ‘अहं’ अर्थात् आप स्वयं! इस प्रकार ‘ओम्’ से वह प्रभु ध्वनित होते हैं जिनका निवास आपके हृदय में है। ‘ओम्’ जप का आदि नाम है और भगवान के श्रीमुख से सीधा प्रसारित हुआ है–

तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत:

ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता: पुरा।। (गीता, १७/२३)

अर्जुन! ओम्, तत् और सत् परमात्मा के नाम हैं जो परब्रह्म परमात्मा के मुख से प्रसारित हुए हैं। इसी के द्वारा यज्ञ, वेद और ब्राह्मण रचे गये। ब्राह्मण जन्मता नहीं, ब्राह्मण एक संरचना है। ओम् भी परमात्मा के मुख से प्रसारित हुआ है। आदि मंत्र वही है। सृष्टि में प्रथम प्रकट होनेवाला शास्त्र गीता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– इस अविनाशी योग को मैंने सृष्टि के आदि में सूर्य से कहा। सूर्य ने महाराज मनु से कहा। मनु महाराज ने स्मृति-परम्परा से इसे इक्ष्वाकु से कहा। इक्ष्वाकु से राजर्षियों ने जाना। वह लुप्त हो चला तो मैं इसे तेरे प्रति कह रहा हूँ (गीता, ४/१)। इस आदिशास्त्र गीता में भी भगवान ने ओम् जपने का निर्देश दिया।

मनु दीर्घजीवी थे। उन्होंने एक प्रलय देखा था। भगवान ने उनकी परीक्षा ली। संतुष्ट होकर उन्होंने कहा– मनु, तुम्हारी सृष्टि को मैं बचा लूँगा। एक नौका में सृष्टि के बीज रख लो। प्रलय आने पर मैं मत्स्यरूप में आऊँगा। मेरे सिर पर एक सींग होगा। उस सींग से नाव को सुदृढ़ रस्सी से बाँध देना। नाव उत्ताल तरंगों पर चलने लगी तो मत्स्य भगवान के रूप में परिवर्तित हो गया और उससे वेद उच्चरित होने लगे। प्रलय का अन्त होते-होते मनु ने चार वेदों को एकत्र कर लिया जिसे सुनने के कारण मनु ने उनका नाम ‘श्रुति’ रखा। ये वेद गीता के ही विस्तार हैं और ओम् शब्द पर आधारित हैं। इस प्रकार ओम् आदि नाम है। तत् का अर्थ है वह परमात्मा और सत् अर्थात् वही एक सत्य है, अन्य कुछ नहीं। तीनों नामों का अर्थ एक ही है। इससे आप समझ ही गये होंगे कि हमने भी ओम् का ही जप किया है।

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(‘नवयुवकों की जिज्ञासाऍं एवं भजन से लाभ’ से उद्धृत)

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