अहिंसा
अहिंसा योग–साधना का अंग है।
महाकुम्भ के अवसर पर चण्डीद्वीप हरिद्वार में दिनांक १९-०४-१९८६ की जनसभा में स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी का प्रवचन।
बन्धुओ!
संसार के प्रायः हर देश में, हर काल में अहिंसा के उपदेशक रहे हैं; किन्तु भारत में अहिंसा के जितने अधिक समर्थक और कट्टर पालक होते आये हैं, उतना संसार के अन्य किसी देश में नहीं हुए। आत्मा की ही भाँति अहिंसा की भी अवधारणा भारतीयों की विश्व को महानतम देनों में से एक है। वैसे तो मूसा, ईसा, मुहम्मद साहब, जरथुस्त्र, कनफ्यूशियस, लाओत्से तथा प्राचीन यूनानियों ने बुराई का बदला भलाई से देने को कहा; सबने प्रेम, शान्ति, दया, करुणा और सेवा का सन्देश दिया; किन्तु इन सबके मूल में है भारतीय ऋषियों का चिन्तन, जिसकी परम्परा वेद, उपनिषद्, महावीर, बुद्ध और गुरुनानक से लेकर अद्यावधि अविच्छिन्न है।
कितना विरोधाभास है कि जो भारत अनादिकाल से चिरन्तन प्रश्नों के शोध की स्थली रहा, विश्व के लिये आलोक-स्तम्भ रहा, विश्वगुरु कहलाया, वहीं के निवासी गुणों से हीन होते जा रहे हैं और इस पतन के कारणों में अहिंसा का नाम भी जुड़ा हुआ है। कितनी विडम्बना है कि अपने मूल देश में ही अहिंसा एक भ्रम बनकर रह गया है।
आज स्थिति यह है कि लोग बिच्छू या भौंरा मारने से डरते हैं, साँप मारने से डरते हैं; यद्यपि आये दिन सर्पदंश से मरने की घटनाएँ होती रहती हैं। लोग खटमल तक मारने से डरते हैं कि पाप हो जायेगा। इन भावनाओं ने देश को कायर बनाकर रख दिया, बुज़दिल बना दिया। हम पर आक्रमण होता है, दो-चार-पन्द्रह-पचीस लोग युद्ध में काम भी आ जाते हैं, तब तक हमें सुरक्षा का भान नहीं होता; जब भान होता है, तब तक हम बहुत नुकसान उठा चुके होते हैं। खेद का विषय है कि लोग माँस-मछली तो खाते हैं, अपने पड़ोसी का हक भी छीनने का प्रयास करते हैं; किन्तु जब सुरक्षा का प्रश्न आता है तो घरों में घुस जाते हैं। यह अहिंसा-पालन नहीं, कायरता है।
किसी भी जीव को न मारने की भावना के पीछे दो कारण हैं। एक तो मान्यता है कि जीवन तो दुःखमय है ही किन्तु कदाचित् इससे भी दुःखद मृत्यु है; क्योंकि घोर कष्ट पानेवाला भी मरना नहीं चाहता, इसलिए जहाँ तक हो सके मृत्यु से बचना चाहिए- अपना नुकसान उठाकर भी। कितना आश्चर्य है कि भारतीय भी मृत्यु से डरता है, जबकि संसार में भारतीयों को ही मृत्यु से सबसे कम डरना चाहिए; क्योंकि उन्होंने ही तो खोजा था कि आत्मा अमर है। और मृत्यु क्या है? जीर्ण वस्त्र की तरह नश्वर देह का परिवर्तन मात्र!
अहिंसा के आत्यन्तिक प्रयोग का दूसरा कारण स्मृतियाँ हैं, जिनमें बताया गया है कि साँप अथवा चूहा मारने पर लोहे की छड़ दान दें। बिल्ली मारने पर सोने की बिल्ली दें। नेवला-मेढक-कौआ-कुत्ता अथवा शूद्र- इनमें से किसी को मारने पर एक सफेद बैल और दस गाय ब्राह्मण को दें। वैश्य और क्षत्रिय को मारने पर बीस गाय तथा ब्राह्मण मारने पर तीस गाय दान करें। बकरा मारने पर इतना और हाथी मारने पर इतना! जैसा जीव वैसा दान! बिना हड्डीवाले कीड़े-मकोड़े मारने पर भी गाय और एक बैल देना है। हिंसाजनित पाप की कहानी इतनी प्रचलित हुई कि पानी भरने तक में पाप है, दान दें। चूल्हा जलाने में हिंसा है, दान दें। ओखली या चक्की की तो बात ही छोड़िए, झाड़ू लगाने में भी हिंसा होती है, दान दीजिये! फाँसी लगानेवाला, मछली मारनेवाला और चिड़िया मारनेवाला व्याध जितनी हिंसा करता है उतना ही एक किसान लकड़ी के हल में लोहे का फाल लगाकर हल जोतने से करता है। इस हिंसा से मुक्त होने के लिये जो फसल का एक भाग ब्राह्मणों को दान नहीं करता, उसे ब्रह्महत्या का एक पाप और लग जाता है।
इस प्रकार जीवन की हर क्रिया में हिंसा घोषित करना और हिंसा की सम्भावना पर इतना अधिक मृत्युकर कि मनुष्य विवश और घायल हो गया। उसने देखा कि किसी भी जीव की ओर उँगली उठाने तक में मारने का कर लग रहा है, जिसे अदा न करने पर उससे भी भयावह सामाजिक बहिष्कार की यन्त्रणा झेलनी पड़ रही है, नरक का आतंक ऊपर से है, अतः लोगों का अन्तःकरण इतना दब गया कि अब वे चींटी मारने से भी कतराने लगे। इस मृत्युकर का आतंक इतना बढ़ा कि लोग ‘जीवहत्या है’-ऐसे विचारमात्र से काँपने लगे।
इसी मनोवृत्ति का परिणाम था कि तैमूर के थोड़े से सिपाहियों ने लाखों बन्दी हिन्दुओं को तलवार के घाट उतार दिया। दिल्ली में, आपके घर के भीतर पन्द्रह दिनों तक कत्लेआम चलता रहा। उस समय तक तोप या बन्दूक का आविष्कार नहीं हुआ था, केवल तलवारें थीं। लोग निहत्थे भी टूट पड़ते, तो इतिहास कुछ दूसरा होता। इस हीनभावना के पीछे भी स्मृतियाँ उत्तरदायी हैं, जिनमें लिखा है कि शस्त्र केवल क्षत्रिय ही उठा सकता है, अन्य जातियों के लिए शस्त्र उठाना पाप है। सौ में सात क्षत्रिय और उनमें भी स्त्री-बच्चे। लड़नेवाले बचे तीन। उन तीन पर अधिकार कर लें तो सौ को भेड़ की तरह हाँक ले चलें।
स्मृतियों में हिंसाजनित पाप के निवारण का विधान था दान। रामचरितमानस के अनुसार, ‘सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।’ (५/४३/२) पाप का निवारण भगवान के सम्मुख होने से होता है; किन्तु स्मृतियों की व्यवस्था के अनुसार कैसा भी जघन्य पाप हो, केवल ब्राह्मण को दान दे दो, छुट्टी मिल गयी। दान उस समय के बुद्धिजीवी वर्ग की जीविका थी। अतः अधिक से अधिक पर्वों और अवसरों पर अधिकतम दान लेने में अहिंसा उनकी सुरक्षा कवच बन गयी। वह उन मनीषियों की भूल नहीं, समय था।
परोपजीवियों ने एक ओर तो अहिंसा पर बल देकर दान के क्षेत्र को विस्तृत बताया और दूसरी ओर अपने लिये मांसाहार की भी आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये हिंसा को भी उचित ठहराया। उन्हें हिंसा अथवा अहिंसा से क्या मतलब, मतलब तो वस्तु से था- अहिंसा से मिले चाहे हिंसा से! मन्त्र पढ़कर पशु को काटा जाता है तो वह देव-भोजन है, अहिंसा है। बिना मन्त्र के काटा जाता है तो वह असुर-भोजन है, हिंसा है। मन्त्र से भी क्या मतलब, मतलब तो मन्त्र पढ़नेवाले का हिस्सा लगने से है। मन्त्र में पढ़ेंगे क्या? ‘स्वर्गम् गच्छेत्।’ इस सूत्र को पढ़ देने मात्र से क्या वह मरनेवाला जीव स्वर्ग में चला गया? (यही तो पोप भी करते थे।) ‘अच्छिद्रमस्तु’ कह देने से यज्ञ की हर कमी पूरी हो गयी? हिंसा को समर्थन देने के नशे में उन्हें वैदिक यज्ञों में भी हिंसा दिखायी पड़ी। उन्होंने व्यवस्था दी कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’– वेद में वर्णित हिंसा हिंसा नहीं है। तो क्या वेदों में हिंसा है? निर्णय हमसे नहीं, महाभारतकार से सुनें-
सुरां मत्स्यान मधुं मांसमासवं कृसरौदनम्।
धूर्तै प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम्।। (शान्तिपर्व, २६५/९)
महर्षि व्यास का कहना है कि मांस-मदिरा की अनिवार्यता तो पीछेवालों ने चलायी। वेदों में ऐसी कल्पना भी नहीं है। उन ऋचाओं का आशय न समझ पाने के कारण अथवा शाकाहार के साथ मांसाहार प्राप्त करने के उद्देश्य से ही स्मृतिग्रन्थों में उन पशु-पक्षियों की लम्बी सूची मिलती है जिन्हें यज्ञों में काटना तो उचित है ही, श्राद्ध में भी उनके मांस से तर्पण को अधिक पुण्यदायक बताया गया।
इन्हीं कुरीतियों की भर्त्सना विशुद्ध सनातनधर्मी महात्मा बुद्ध ने की। अपनी जीविका का भण्डाफोड़ होते और तथागत का ही प्रभाव देख इन बुद्धिजीवियों ने उनको भी भगवान के दस अवतारों में एक मानकर उनकी गोल में मिल गये और ज्योंही इनका अपना संगठन मजबूत हुआ, बौद्धधर्म में कुरीतियाँ आयीं। ये कहने लगे कि बुद्ध अवतार तो हैं; किन्तु ऐसा अवतार, जिनकी शिक्षा असुरों के लिये है! कहा गया कि गौतम के अहिंसा-प्रचार से भारतीयों का शस्त्राभ्यास बन्द हो गया, मौर्य-साम्राज्य का पतन हो गया, बुद्ध की निवृत्तमार्गी शिक्षा से भारत अकर्मण्य हो गया। कितनी उल्टी बात है कि उसी महापुरुष की शिक्षा से भारत अहिंसक हो गया और चीन हिंसक, भारत अकर्मण्य हो गया और जापान कर्मठता का कीर्तिमान स्थापित करता चला जा रहा है।
अहिंसा आधुनिक समाज (भारत) का उलझा हुआ प्रश्न है। कोई कहता है- जीवों की हत्या न करना अहिंसा है। कोई नम्रता को अहिंसा कहता है तो कोई दया को, कोई समय नष्ट करना हिंसा मानता है तो कोई आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के संग्रह को अहिंसा की परिधि में ले रहा है। एक वर्ग श्वास में नष्ट होनेवाले अदृश्य कीटाणुओं की हिंसा से बचने के लिए मुँह पर पट्टी बाँध रहा है। इस प्रकार अहिंसा के मूल में जीवों को मारने अथवा न मारने की भावना अधिक दिखाई देती है और दिखता है उत्तरोत्तर इसके आयाम का विस्तार, अतिवादी प्रयोग।
प्रश्न उठता है कि अहिंसा का औचित्य क्या है? जीवों को क्यों न मारा जाय? इस प्रश्न पर भी मतभेद है। कोई कहता है- हर जीव में भगवान हैं। फिर तो कठिन हो जायेगा; भगवान कहाँ नहीं हैं? खायेंगे क्या? क्या दही अथवा शहद खाने में हिंसा नहीं है? करोड़ों कीटाणु एक कटोरी दही में खा जाते हैं आप! जब सबमें एक ही भगवान है, तो कोई जीव-हिंसा छोटी और कोई बड़ी क्यों? कम से कम मनुष्य-मनुष्य में तो अन्तर नहीं होना चाहिए था कि शूद्र मारने पर कुत्ता मारने के बराबर हिंसा लगती है और ब्राह्मण मारने पर शूद्र का तीन गुना! जान-बूझकर मारने पर तो कोई निस्तार है ही नहीं। विचारमात्र से किसी को पीड़ा न पहुँचायें, तो क्या अपने लड़के को पथ-भ्रष्ट होने से न रोकें? चोर, डकैत, बलात्कारियों और आततायियों को भी न रोकें? इनके सामने हाथ जोड़कर धरना दें? कष्ट को दूर करने के प्रयास में दिया जानेवाला कष्ट, उपचार में होनेवाली मौतें क्या हिंसा हैं?
अहिंसा के पक्ष में दूसरा तर्क दिया जाता है कि जिन वस्तुओं को आप पैदा नहीं कर सकते, उन्हें नष्ट करने का आपको कोई अधिकार नहीं है। यदि आप किसी को जीवन दे नहीं सकते, तो ले कैसे सकते हैं? अन्न और वनस्पतियों का उत्पादन आप बढ़ा सकते हैं, उनकी नस्ल बदल सकते हैं, अतः उनके प्रयोग की हिंसा क्षम्य है; किन्तु यही तर्क तो मत्स्य-पालन या कुक्कुट-पालन वाले भी देते हैं, अन्य सभी पशु-पक्षियों की नस्ल वे बढ़ा लेते हैं। खेती करनेवाले लोग जुताई-बुआई में होनेवाली हिंसा पर भले न ध्यान दें; किन्तु कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग करके दीमक इत्यादि दिखाई पड़ने और न दिखाई पड़नेवाले असंख्य कीटाणुओं के संहार का अधिकार उन्हें कहाँ से मिल जाता है? यह हिंसा तो उन्हें विचलित नहीं करती किन्तु उसी फसल की सुरक्षा के लिए उत्पाती बन्दरों अथवा चरती हुई गायों को भगाने के प्रश्न पर वे हिंसा और अहिंसा का शास्त्र लेकर बैठ जाते हैं। चेचक के कीटाणुओं और मलेरिया के उन्मूलन में असंख्य मच्छरों की हिंसा उन्हें नहीं दिखाई देती! जिन अदृश्य कीटाणुओं की हिंसा से बचने के लिये एक वर्ग नाक पर पट्टी बाँधता है (प्रयास अहिंसा का ही है), किन्तु उसी तरह के कीटाणुओं को मारने के लिये ‘एण्टीबायोटिक’ दवाओं को खाने में वह भी नहीं हिचकता। कोई सोचना भी नहीं चाहता कि चमड़े का उद्योग कैसे पनपाया जाता है? चमड़े की वस्तुओं का प्रयोग तो करते हैं किन्तु अहिंसा के लिए चिन्तित भी हैं! किसे मानते हैं आप अहिंसा?
फिर तो अहिंसा के समर्थन में एक ही तर्क बचता है- जो वस्तुएँ मानव-समाज के लिये उपयोगी हैं उनकी सुरक्षा अहिंसा है और जो कम उपयोगी हैं अथवा अनुपयोगी हैं उनकी उपेक्षा की जा सकती है। फिर तो उपयोगिता आधार बन गयी, अहिंसा नहीं। यदि उपयोगिता ही आधार है तो जो भिखारी, अन्धे-बहरे, विकलांग अथवा भयंकर संक्रामक रोगों के कारण जो समाज के लिये समस्या बन चुके हैं, उनका क्या किया जाय? वृद्ध माता-पिता को भी क्या अनुपयोगी समझ लिया जाय? कहते हैं- यदि डाक्टर की भावना अच्छी है तो उसकी हिंसा भी अहिंसा है। फिर तो महत्त्व हिंसा या अहिंसा का नहीं, उसमें निहित भावना का हो गया। फिर असाध्य रोग की पीड़ा से छटपटाते मनुष्यों तथा पशुओं को आसान मौत दी जाय अथवा नहीं? परिवार नियोजन या भ्रूण-हत्या अहिंसा के अनुकूल है अथवा प्रतिकूल? फाँसी उचित है कि अनुचित?- इत्यादि प्रश्न भी विवाद के घेरे में आ जाते हैं। अतः विचारणीय है कि अहिंसा को समझने में कहीं भूल तो नहीं हो रही है? अहिंसा है क्या? यदि यही अहिंसा है, तब तो किसान इससे वंचित हो जायेंगे। गृहस्थों के लिये इसका पालन असम्भव हो जायेगा। विदेशियों की तो बात ही छोड़िये, मांस-मछली खानेवाले हिन्दुओं को भी अहिंसा धर्म से निकालना होगा। फिर तो आपका यह धर्म विश्वव्यापी नहीं हो सकेगा। अहिंसा की यह प्रचलित धारणा क्या अहिंसा है?
सच्चाई तो यह है कि इनमें से किसी भी प्रश्न का सम्बन्ध अहिंसा से है ही नहीं। इसमें दोष अहिंसा का नहीं, अहिंसा का अर्थ परिवर्तन करनेवालों का है। अहिंसा जिनकी देन है, आइये देखें हमारे वे पूर्व मनीषी अहिंसा का प्रयोग किन अर्थों में करते थे।
अहिंसा शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है। इस उपनिषद् के तीसरे अध्याय के चतुर्दश खण्ड में बताया गया कि ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’- यह सारा जगत् निश्चय ही ब्रह्म है। उसे विदित करने के लिये इसी उपनिषद् के पंचदश खण्ड में प्राणापान का यज्ञ और सोलहवें खण्ड में समर्पण के साथ यज्ञस्वरूप महापुरुष की उपासना करने को कहा गया और सत्रहवें खण्ड में बताया गया कि ‘अथ यत्तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः।’ अर्थात् जो तप, दान, आर्जव, अहिंसा और सत्यवचन हैं, वे ही यज्ञ की दक्षिणा हैं।
यज्ञ की सम्पूर्णता के पश्चात् ही दक्षिणा का विधान है। अहिंसा इस आत्मयज्ञ की दक्षिणा है अर्थात् दान, अहिंसा, सत्य इत्यादि उसके क्षेत्र की वस्तु है जिसने आत्मयज्ञ कर लिया है, आत्मा को जिसने विदित कर लिया है, ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ जिसने देखा है, वही कह सकता है। ‘तत्त्वमसि’, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष वही कर सकता है। चराचर जगत् की अन्तिम एकता- आत्मिक एकता को जिसने स्वयं देखा है, अहिंसा उसके क्षेत्र की वस्तु है। जब वही सर्वत्र है, दूसरा है ही नहीं, तो विरोध किससे? हत्या किसकी? यही बात मानसकार कहते हैं-
उमा जे राम चरन रत, बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत, केहि सन करहिं बिरोध।। (मानस, ७/११२ ख)
वही शुद्ध अहिंसक है। किन्तु यह स्थिति मिलती है कब? जब ‘बिगत काम मद क्रोध’– काम, क्रोध, मद इत्यादि विकार विशेष रूप से गत हो चुके हों, सर्वथा शान्त हो गये हों। जिसे जगत् प्रभुमय दिखायी पड़ रहा है, अहिंसा उसके लिये है। अहिंसा पालन नहीं परिणाम है, दक्षिणा है। अतः जिसने काम, क्रोधादि विकारों को जीतकर आत्मा को विदित कर लिया, वही शुद्ध अहिंसक है। सदन कसाई मांसाहारी होकर भी अहिंसक थे और इसी प्रकार महाभारत के धर्म-व्याध भी आते हैं। जो काम-क्रोध का दास है, संसार को समेटने में लगा है, साथ ही अहिंसा की पूर्ति के लिए प्रतिदिन चींटियों को आटा खिलाता है, खटमल तक नहीं मारता, अहिंसा के लिए ही फलाहार करता है तब भी उसकी अहिंसा रूढ़िवादिता है, दिखावा है, दम्भ हो सकती है किन्तु आत्मज्ञान का सूचक तो कदापि नहीं है।
यही बात प्रकारान्तर से महाभारत के अनुशासन पर्व (११७/३७) में भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाया कि ‘अहिंसा परमो धर्मः’– परम धर्म परमात्मा है, उसी के परिवेश में अहिंसा है।
इसी की पुनरुक्ति गोस्वामी तुलसीदासजी करते हैं- ‘परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा।’ (मानस, ७/१२०/२२) श्रुति कहते हैं वेद को और परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ही वेद है। उस परमात्मा को सर्वत्र देखनेवाले ऋषियों का गुण है अहिंसा, उनकी रहनी है अहिंसा। ऐसे तत्त्वदर्शियों ने यजुर्वेद में कहा कि- ‘पशून पाहि। गां मा हिंसीः। अजां मा हिंसीः। अविर्मा हिंसीः। इमं मा हिंसी द्विपादं। मां हिंसी रेकशफं पशुम्। मा हिंस्यात् सर्वभूतानि।’ पशुओं की रक्षा करो। गाय को न मारो। बकरों को न मारो। भेड़ को न मारो। इन दो पैरवाले प्राणियों को न मारो। एक खुरवाले पशुओं को न मारो। किसी भी प्राणी की हिंसा न करो। अतः अहिंसा उनकी अनुभूति है, जिन्होंने इन सबमें अपनी ही आत्मा को व्याप्त पाया। एकत्व की अनुभूति और तज्जनित अहिंसा आत्मदर्शन के कारण है, शरीर के कारण नहीं। शरीर धारण करते रहना ही तो हिंसा है। शुद्ध अहिंसा वहाँ है जहाँ पहुँचकर इस आत्मा को पुनः शरीर धारण न करना पड़े।
वेदों में प्रतिपादित धर्म यज्ञ-प्रधान है। यज्ञ को वैदिक वाङ्मय में अध्वर भी कहते थे। ध्वर का शाब्दिक अर्थ है हिंसा, अध्वर अर्थात् अहिंसा। इस यज्ञ का आचरण ही अहिंसाचरण है। अब कौन-सा यज्ञ करते थे वे, जिसे करना ही अहिंसा है? महाभारत के अनुशासन पर्व में संकेत है-
श्रूयते हि पुरा कल्पे नृणां ब्रीहिमयः पशुः।
येनायजयन्त यज्वानः पुण्यलोकपरायणाः।। (११५/५६)
अर्थात् पहले के कल्पों में पुण्यलोकपरायण यज्ञकर्त्ता लोग ब्रीहिमय पशु से यज्ञ करते थे। यह ब्रीहि क्या है? ब्रीहि का एक अर्थ धान भी होता है। तो क्या तिल, जौ या धान से यज्ञ करते थे वे, वेदी बनाकर? नहीं, अथर्ववेद के ऋषि बताते हैं, ‘प्राणापानौ ब्रीहियवौ अनड्वान प्राण उच्यते।’ ब्रीहि और यव क्रमशः प्राण और अपान का नाम है, अनड्वान भी प्राण का नाम है अर्थात् वे यज्ञ प्राण और अपान अथवा श्वास और प्रश्वास की क्रिया पर आधारित थे। गीता में श्रीकृष्ण बताते हैं कि इसी यज्ञ के परिणाम में सनातन ब्रह्म है- ‘यज्ञशिष्टामृत भुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्’ (गीता, ४/३१) ब्रह्म को प्राप्त महापुरुष सर्वत्र अपनी ही आत्मा को देखकर अहिंसा की बात करता है तो आश्चर्य क्या? श्वास-प्रश्वास का यज्ञ करनेवाला ही वेद की भाषा में शुद्ध अहिंसक है।
अतः पराकाष्ठा की अहिंसा सर्वत्र आत्मदर्शन करनेवाले तत्त्वदर्शी के क्षेत्र की वस्तु है तथा इसका आंशिक उपयोग उसके लिए भी है जो प्राण-अपान के यज्ञ का कर्त्ता हो, पथिक हो, उस पथ का श्रद्धालु हो। जिसने अभी उस पथ पर विचार ही नहीं किया, उसके लिए अहिंसा का क्या उपयोग? जिसने डॉक्टरी में प्रवेश ही नहीं लिया, उसे आपरेशन बॉक्स सौंपने का जो परिणाम होगा कुछ वैसा ही अहिंसा को लेकर हो रहा है। जो नपुंसक है, उसके लिए विवाह मण्डप या मौर-मुकुट का क्या उपयोग?
यही निर्णय योगदर्शनकार का भी है। योग के नाम पर लोग न जाने क्या-क्या करते हैं; किन्तु भगवान श्रीकृष्ण का कहना है (गीता, अध्याय ६/२३) कि जो संसार के संयोग-वियोग से रहित अनन्त आनन्द है उसके मिलन का नाम योग है। इसी योग को महर्षि पतंजलि भी बताते हैं कि ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।’ (योगदर्शन, १/२)- चित्त की वृत्तियों का निरोध हो जाना ही योग है। निरोध होने से लाभ क्या है? इस पर कहते हैं, ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।’ (योगदर्शन, १/३)- उस समय द्रष्टा अपने ही शाश्वत स्वरूप परमात्मा में स्थित हो जाता है। उस परमात्म-तत्त्व तक जो दूरी तय की जाती है, वहाँ तक की साधना-क्रम के आठ अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इसे अष्टांग योग कहते हैं। इनमें से यम भी पाँच अंगोंवाला होता है- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। इस प्रकार योग के आठ अंगों में से एक अंग का उपांग है अहिंसा, तो जिसने योगपथ पर अभी कदम भी नहीं रखा, उसके लिये अहिंसा का क्या उपयोग?
यही गीता (२/१६) में भगवान श्रीकृष्ण का कहना है कि अर्जुन! असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत्य वस्तु का तीनों कालों में अभाव नहीं है। आत्मा ही सत्य है, परम सत्य है, अशीर्य है, शाश्वत और सनातन है, सदा रहनेवाला है, इसका कभी अभाव नहीं है और भूतादिकों के सम्पूर्ण शरीर नाशवान् हैं, जिनका अस्तित्व है ही नहीं।
आगे अध्याय दो में ही कहते हैं कि ‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय’ (गीता, २/२२)- पुराने वस्त्र को त्यागकर मनुष्य जैसे नया वस्त्र धारण कर लेता है, ठीक इसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी यह जीवात्मा शरीररूपी वस्त्र को त्यागकर दूसरा शरीर धारण कर लेता है। शरीर एक वस्तु है। अब यदि आप पर कोई हमला हो और कोई आपका वस्त्र बचाकर रख ले तो क्या आपकी रक्षा हो गयी? कभी नहीं! हममें जो नश्वर है, अस्तित्वविहीन है, ऐसे वस्तु की रक्षा करने पर भी वह रक्षित नहीं है, उसको तो चला ही जाना है। मान लें, बर्फ का टुकड़ा हथेली पर है, थोड़ी देर में पानी हो जायेगा, जमीन में मिल जायेगा, उसका नामोनिशान तक नहीं रह जायेगा, तो आप बचा क्या रहे हैं? यह तो आपस में दया और सहृदयता का आदान-प्रदान है, संगठित और सुरक्षित रहकर जीने-खाने का एक व्रत है, सामाजिक नियम है, अमूल्य मानव-शरीर की सुरक्षा है- अहिंसा नहीं। अध्याय तीन में तो योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह मूढ़बुद्धि और अविवेकी है, पापायु और व्यर्थ जीनेवाला है जो केवल शरीर के लिए पचता है।
तब अहिंसा है क्या? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! इस निष्काम कर्मयोग का आचरण किये बिना उस शाश्वत सत्य को न किसी ने पाया है और न भविष्य में कोई पायेगा। किन्तु जिसने आत्मा को विदित कर लिया है, जो आत्मा में ही स्थित और उससे ओतप्रोत है, उस पुरुष के लिए कर्म किये जाने से न कोई लाभ है और न छोड़ देने से उसकी कोई हानि ही है, फिर भी वह महापुरुष पीछेवालों के हित के लिए भली प्रकार क्रिया में बरतता है। निष्काम कर्म माने चिन्तन, आराधना- इसे करके वह आत्मदर्शन की ओर ही तो बढ़ रहा था।
कर्म करते-करते साधना इतनी सूक्ष्म हो गयी कि मन के निरोध के साथ वह आत्मा विदित हो गया, उसी से तृप्त और उसी में भली प्रकार स्थित है, आत्मभाव से परिपूर्ण है, ऐसे महापुरुष के लिए अब कर्म किये जाने से न कोई लाभ है और न छोड़ देने से कोई हानि ही है; क्योंकि आगे कोई ऐसी सत्ता नहीं, जिसकी वह शोध करे। अब कर्म करके ढूँढ़े भी तो किसको? वह कर्म न करे तब भी उसका कोई नुकसान नहीं; क्योंकि जो पाना था पा लिया- सदा-सदा के लिए पा लिया, फिर भी ऐसी स्थितिवाले महापुरुष पीछेवालों के हित के लिये भली प्रकार क्रिया में बरतते हैं।
ऐसे महापुरुष से अपनी तुलना करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण अपना परिचय देते हैं- अर्जुन! मुझे भी तीनों लोकों में किंचित् कर्त्तव्य शेष नहीं है, प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्य नहीं है; फिर भी मैं पीछेवालों के हित की इच्छा से भली प्रकार क्रिया में बरतता हूँ। यदि सावधान होकर न बरतूँ तो सारी प्रजा का हनन करनेवाला बनूँ, मारनेवाला बनूँ और वर्णसंकर का कर्त्ता होऊँ। अर्थात् श्रीकृष्ण एक योगी थे, योगेश्वर थे। आत्मभाव में परमतत्त्व में स्थित परमात्मस्वरूप थे। वे कहते हैं- यदि मैं सावधान होकर क्रिया में न बरतूँ और बरतते हुए पीछेवालों को क्रिया में न बरताऊँ तो सारी प्रजा की हत्या करनेवाला बनूँ, वर्णसंकर का कर्त्ता होऊँ।
जीवात्मा का शुद्ध वर्ण परमात्मा है और क्रिया के द्वारा ही वह स्वरूप पाना सम्भव है। यदि महापुरुष पीछेवालों को उस पर न चलावें तो सबलोग आत्मपथ से भटक जायेंगे, प्रकृति में मिश्रित हो जायेंगे। यह मिश्रण ही वर्णसंकर है। वे अपने आत्मपथ से च्युत हो जायेंगे- यही हनन है, मृत्यु है, यही है हिंसा और उस स्वरूप की ओर बढ़ना शुद्ध अहिंसा है। सच पूछिये तो सबसे बड़े अहिंसक वे महापुरुष हैं जो तत्त्व में स्थित होकर भी क्रिया करते हुए सबको अपने पीछे चलाते हैं। वे सब भ्रान्तियों से निकालकर आत्मा को जगाते हैं, जागृत करने के बाद उसे आत्मपथ पर चलाते हैं। शनैः-शनैः चलते-चलते साधक अपने स्वरूप को विदित कर लेता है, स्थिति पा लेता है, ऐसा जन्म पा लेता है जिसके पीछे मृत्यु नहीं है। यही शुद्ध अहिंसा है। शुद्ध अहिंसा का पालन करनेवाले आप ही हो जायँ तो आप भी अहिंसक हैं। इस प्रकार वे सबकी रक्षा करते हैं और यदि न चलावें तो वे भी हत्यारे हैं। अतः श्रीकृष्ण के अनुसार, अपने स्वरूप की ओर बढ़ना-बढ़ाना अहिंसा है और उससे च्युत होना हिंसा है।
गीता के छठें अध्याय में योगेश्वर कहते हैं- अर्जुन! आत्मा ही मित्र है और आत्मा ही शत्रु है। जिस पुरुष के द्वारा मनसमेत इन्द्रियाँ जीत ली गई हैं उसके लिए उसी की आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतती है, परमकल्याण करनेवाली होती है और जिस पुरुष के द्वारा इन्द्रियाँ नहीं जीती गयी हैं उसके लिये उसी की आत्मा शत्रु है, शत्रु बनकर शत्रुता में बरतती है, इसलिए पुरुष को चाहिए कि अपने द्वारा ही अपना उद्धार करे, अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचावे। आत्मा को अधोगति में पहुँचाना, प्रकृति की अनन्त योनियों मे फेंकना हिंसा है और इसका उद्धार, आत्मभाव की प्राप्ति ही अहिंसा है। ‘मानस’ के अनुसार-
जो न तरै भव सागर, नर समाज अस पाइ।
सो कृत निन्दक मन्दमति, आत्माहन गति जाइ।। (७/४४)
नर शरीर पाकर जो भवसागर का पार नहीं पा लेता वह मन्दबुद्धि है, कृत-निन्दक है अर्थात् कर सकता है किन्तु टालता रहता है, वह अपनी आत्मा का हत्यारा है, हिंसक है। भवसागर को पार न करना आत्महत्या है, जघन्य हिंसा है और भवसागर का पार पाना अहिंसा है।
अतः योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार महापुरुष द्वारा पीछेवालों को आत्मपथ पर चलाना, जिसे छान्दोग्य के ऋषि आत्मयज्ञ की दक्षिणा कहते हैं, यही सामूहिक अहिंसा है और प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचावे, यही व्यक्तिगत अहिंसा है। साथ ही अहिंसाव्रती को चाहिए कि पड़ोसी के प्रति सहृदयता और प्रेम रखे। इतने से ही वह भी अहिंसा के पथ पर चल देगा और आप चलानेवाले होंगे।
बाह्य मारकाटजन्य हत्या के विषय में श्रीकृष्ण का क्या दृष्टिकोण है? यह क्या है? इस पर कहते हैं (गीता अध्याय १८ में)- अर्जुन! शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक कार्य के होने में पाँच माध्यम हैं- कर्त्ता यह मन है, कारण इन्द्रियाँ, नाना प्रकार की चेष्टाएँ, आधार अर्थात् साधन (क्योंकि चेष्टाएँ अनन्त होती हैं किन्तु जिस इच्छा के साथ आधार मिल जाता है वही इच्छा पूरी होने लगती है) और पाँचवाँ (हेतु) दैव है। दैव माने होनहार, संस्कार, पहले का किया हुआ कर्म। शुभ अथवा अशुभ के होने में यही पाँच माध्यम हैं। चाहे आप शाश्वत परमात्मा की ओर इष्टोन्मुख दौड़ लगायें या प्रकृति की ओर भटक जायँ- यही पाँच माध्यम हैं। इतने पर भी जो कैवल्यस्वरूप परमात्मा को कर्त्ता देखता है, कहता है, वह मूढ़बुद्धि यथार्थ को नहीं जानता। इसके अगले ही श्लोक में कहते हैं कि अर्जुन! जो पुरुष जानता है कि यही पाँच माध्यम हैं, भला वह कैसे किसको मारता है और कैसे किसको मरवाता है? सम्पूर्ण लोकों को मारकर भी न तो वह पाप से बँधता है और न कर्मों से ही बँधता है।
अतः योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, बाहरी मारकाट मात्र सामाजिक समस्या और बदले हैं, शान्ति और व्यवस्था का प्रश्न है। समाज में जो संगठित रहेगा वह सबल है, जो फूट से रहेगा वह दुर्बल है। जो आविष्कारक है, बुद्धिजीवी है वह सबल है और जो शरीर का ही बल रखता है, वह दुर्बल है। भीम के पास शारीरिक बल था; किन्तु अनेक अवसरों पर मेधावी युधिष्ठिर ने उसे बचाया। अर्जुन ने भी उसे बचाया; क्योंकि उसके पास दिव्यास्त्र थे, आविष्कार था। विधि जानने के कारण अभिमन्यु चक्रव्यूह के सातवें फाटक तक पहुँच गया; किन्तु बाहुबल का भरोसा रखनेवाला भीम गदा भाँजता ही रह गया। जहाँ शरीरबल के साथ बुद्धिबल है, संगठन भी है, वहीं बलवान है और जहाँ फूट अधिक है, वहीं गुलाम है। अफ्रीका में कबीले अधिक हैं, फूट अधिक है। अफ्रीका आज भी गुलाम है। अस्तु संगठन अपेक्षित है।
यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण का कहना है कि यह जो बाहरी मारकाट है, यह न पाप है न पुण्य है। हाँ, यह सामाजिक दायित्व अवश्य है। एक दूसरे के लिए सहृदय और आत्मवान् होना ही चाहिए। जो आपको क्षति नहीं पहुँचाते, उनकी अकारण हत्या क्यों करेंगे आप? पशुओं से अलग रहकर इस मानव-समाज ने अभी तक इतनी ही तो सभ्यता सीखी है। परस्पर सहायता करनी ही चाहिए। सहायता के द्वारा ही ‘लोक लाहु परलोक निबाहू’ (मानस, १/१९/२)- उभयमुखी विकास सम्भव है, हम-आप बढ़ सकते हैं। किन्तु भौतिक समृद्धि भी शाश्वत शान्ति नहीं दे सकती। जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि, दुःख और दोषों से व्यथित होकर ही हमारे पूर्वज शाश्वत आनन्द की खोज में निकले और जब उन्होंने उसकी प्राप्ति की विधि का अन्वेषण कर लिया तो शोध के इस परिणाम को अपने तक ही सीमित न रखकर प्राणिमात्र में इसके प्रचार-प्रसार के लिए वे अधीर हो उठे- ‘पर दुख द्रवहिं सन्त सुपुनीता।’ (मानस, ७/१२४/८) मनुष्य में ही परमात्मा के शोध की सबसे अधिक क्षमता देख, ऋषियों ने उसे सृष्टि में सर्वोपरि स्थान दिया। ‘न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्।’ पत्थर-पानी, गाय-बकरी कुछ भी तो मनुष्य से बढ़कर नहीं है। इसीलिये आप्तकाम ऋषियों ने स्वयं कष्ट उठाकर भी मानव-मानव तक पहुँचने, उन्हें उद्बोधित करने और उनकी सुरक्षा तथा सेवा को भी अहिंसा के अन्तर्गत लिया; क्योंकि यदि मनुष्य जीवित ही न रहा तो अहिंसा के मार्ग पर, आत्मोद्धार के मार्ग पर चलेगा ही कौन? आत्मोद्धार के लिये ही उन्होंने शरीर-रक्षा, परस्पर सहयोग और सहृदयता की बात पर बल दिया। अस्तु, शरीर की रक्षा आवश्यक है किन्तु अहिंसा नहीं है।
एक बार भ्रमण करते-करते हम नैमिषारण्य चले गये। वहाँ एक हत्याहरण कुण्ड है, जिसके पास नौ-दस कन्याएँ सुन्दर वस्त्र पहनकर पान चबाती हुई चारपायी पर बैठी थीं। लोग कुण्ड में स्नान करके, कन्याओं का चरण छूकर और दक्षिणा चढ़ाकर पापमुक्त हो रहे थे। आसपास पण्डे घूम-घूमकर लोगों को बुला रहे थे। कुछ दूरी पर खड़े होकर हम भी यह तमाशा देख रहे थे। तब तक लट्ठधारी कुछ तीर्थ-पुरोहित हमारी ओर भी आये, बोले- ‘‘इधर आइये! कुण्ड में स्नान करके कन्या का चरण स्पर्श कीजिए और जन्मभर की हत्याओं से मुक्त हो जाइये।’’ हम बोले, ‘‘भाई! हमने तो कोई हत्या नहीं की।’’ वे बोले, ‘‘वाह! ऐसा कैसे हो सकता है। आप नैमिषारण्य में पैदल घूम रहे हैं, पता नहीं कितनी चींटियाँ पाँव से दबकर अकाल मौत को प्राप्त हुई होंगी। हत्या से कौन बचा है?’’ हमने कहा, ‘‘भाई! मरी होंगी तो अपनी मौत से, हमने निशाना साधकर तो किसी के ऊपर पैर नहीं रखा। भगवान ने हमारे पैर को उनकी ओर और उन्हें हमारे पैर की ओर बढ़ाया होगा, क्योंकि ‘हानि लाभ जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।’ (मानस, २/१७१) यह तो उसकी व्यवस्था है। इसमें हम क्या कर सकते हैं? जिसका जब नम्बर आ जायेगा, जाना ही पड़ेगा। एक श्वास भी अधिक नहीं ले सकता। जिस शरीर को जिस कारण से नष्ट होना पहले से नियत है तो अकाल मौत कैसी? काल आया ही नहीं तो मारेगा कौन? तब तो संसार के अधिकांश महापुरुष अकाल मौत ही मरे?’’ किन्तु वे पण्डे माननेवाले नहीं थे। उन्हें तो दक्षिणा से मतलब था। बोले, ‘‘अच्छा स्नान न कीजिए, कन्या के चरण ही छू लीजिये!’’ हमने कहा, ‘‘बस इतना ही तो गुरु महाराज ने मना किया है कि जो स्त्री का दर्शन करता है, देखी हुई स्त्री का स्मरण करता है, स्पर्श करता है, सम्भाषण करता है, वह संन्यासी एक दिन संन्यासी नहीं रह जायेगा। छूएँगे तो मन में किसी प्रकार की हत्या जरूर लग सकती है, क्षमा करेंगे।’’ पण्डे तुरन्त घूमकर दूसरी ओर बढ़ गये; सोचा और भी ग्राहकों को फोड़ न लें। अतः नश्वर शरीर के लिए प्रयत्न करना अहिंसा नहीं। आत्मस्वरूप की रक्षा ही अहिंसा है, आत्मा को अधोगति में ले जाना ही हिंसा है।
क्या खायें और क्या न खायें?- इस पर गीता (अध्याय १७) में श्रीकृष्ण कहते हैं, अर्जुन! भोजन तीन प्रकार का है। आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ानेवाले रसयुक्त चिकने और स्थिर रहनेवाले तथा स्वभाव से ही हृदय को प्रिय लगनेवाले भोज्य पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं। कड़वे, खट्टे, अधिक नमकीन, अत्यन्त गर्म, तीखे, रूखे, दाहकारक और रोगों को उत्पन्न करनेवाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं तथा जो भोजन एक प्रहर अर्थात् तीन घण्टे पहले का बना है, ‘गतरसं’– रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, जूठा और अपवित्र है, वह तामस पुरुष को प्रिय होता है। अर्जुन! संसारभर में भोजन तीन प्रकार का ही है, जो सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार प्रिय होता है। उन्होंने यह नहीं कहा कि प्याज मत खाओ, लहसुन या गाजर मत खाओ।
जहाँ तक हृदय को प्रिय लगने का प्रश्न है, बंगालियों को मछली, मद्रासियों को चावल, पंजाबियों को रोटी, यूरोपियन्स को बीफ, अरेबियन्स को दुम्बा और सामान्यतः भारतीयों को सब्जियाँ प्रिय लगती हैं। विकासोन्मुखी बुद्धि में विदेशी भी पीछे नहीं हैं। आरोग्यता और लम्बी आयु में भी विश्वस्तरीय आँकड़े उनके अच्छे हैं। गीता के अनुसार आयु, बल, बुद्धि बढ़ानेवाला प्रत्येक भोज्य पदार्थ सात्त्विक है। जिस किसी आहार में उपर्युक्त गुण हो, वही आप लें।
योगेश्वर का आशय केवल इतना है कि समाज में और भजन के लिए भी स्वस्थ शरीर आवश्यक है। प्राचीन योगी इसीलिए आसन करते थे। बुद्ध सम्यक् व्यायाम को योग का आवश्यक अंग मानते थे और रोगों से किसी भी प्रकार मुक्ति पाकर यथाशीघ्र भजन में लगने के लिये भगवान श्रीकृष्ण युक्ताहार-विहार पर बल देते हैं। वे कहते हैं- अर्जुन! यह योग न बहुत खानेवाले का सिद्ध होता है और न बिल्कुल न खानेवाले का ही सिद्ध होता है। अधिक भोजन से आलस्य, निद्रा और प्रमाद घेरेंगे। भोजन छोड़ देने से इन्द्रियाँ शिथिल हो जायेंगी, चिन्तन में बैठने की क्षमता नहीं रहेगी। अतः वही आहार लें, जो चिन्तन में सहायक हो।
इसी तथ्य को समझकर महात्मा बुद्ध ने अहिंसा पर बल तो दिया; किन्तु भोजन के कड़े नियम नहीं बनाये। उनका चचेरा भाई देवदत्त था। उसने कहा, ‘‘भन्ते! जब आप अहिंसा के पुजारी हैं तो भोजन के कड़े नियम क्यों नहीं बनाते?’’ भगवान बुद्ध बोले, ‘‘मैं कड़े नियम नहीं बना सकता। तुम अमीरों की तरह ये गरीब लोग पौष्टिक आहार नहीं जुटा पाते। इन्हें जो चिड़िया-चंगुल, मछली आदि मिल जाती है, उसी को खाकर जीवन-बसर करते हैं। यदि कड़े नियम लग जायेंगे तो ये लोग भूखों मर जायेंगे।’’ देवदत्त ने पुनः प्रश्न किया, ‘‘भगवन्! तब भिक्षु क्या भोजन करे?’’ उत्तर मिला, ‘‘भिक्षु वही भोजन करे, जो गृहस्थ के घर में बना हो। उनके लिये अलग से कोई व्यवस्था न करे। ऐसी व्यवस्था करने में उन्हें कष्ट होगा। हो सकता है, उनकी गृहस्थी की परिस्थितियाँ विपरीत होने लगे तो भिक्षु बोझ हो जायेगा।’’
देवदत्त अभी शंकालु था। उसने परखना चाहा कि गौतम की कथनी और करनी में कितना अन्तर है। उसकी प्रेरणा से गौतम को भी एक बार ‘सूकरमद्दव’ खाना पड़ा। सिद्धान्त के लिए उन्होंने अपनी बलि तक दे दी। इसी भोजन से वे बीमार पड़ गये, उनका शरीरान्त हो गया; क्योंकि वैसा भोजन उन्होंने खाया ही कब था? उन्हें देता भी कौन? अतः क्या खायें, क्या न खायें?- इसका अहिंसा से कुछ मतलब नहीं है।
इसका यह अर्थ नहीं है कि जो कुछ मिलता जाय, उसे आप उदरस्थ कर लें। निष्ठा से च्युत लोगों का आचरण प्रमाण नहीं हो जाता। महापुरुष के आचरण की नकल न करें, बल्कि वह जो कहता है उसे करें। पूज्य महाराजजी के जीवन की एक घटना है- नंग-धड़ंग विचरण करते हुए एक बार वे बम्बई की गलियों से गुजर रहे थे। लोग अभी सो रहे थे। सबेरा होने को था। एक महिला दूसरी मंजिल से सड़क पर कुछ फेंकने जा रही थी। महाराजजी पर दृष्टि पड़ते ही बोली, ‘‘ओ बाबाजी! लोगे, पराठे हैं?’’ महाराजजी ने सोचा- बिना माँगे मिल रहा है, यही दूधभिक्षा है। खड़े हो गये। वह नीचे आयी और हाथ में बढ़ा दिया चिकने-चिकने तीन-चार पराँठे और उस पर घुँइँयाँ-जैसी सब्जी।
चिन्तन में अनवरत लीन रहनेवाले महाराजजी ने चलते-चलते एक ग्रास मुँह में डाला तो चौंके! मछली-जैसा स्वाद मिला। बचपन में खाते थे, स्वाद पकड़ में आ गया। विचार करने लगे कि साधु को मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इसने बिना माँगे दे दिया, एक प्र्रकार से यह दूधभिक्षा है। बिना माँगे जो मिले, उसका त्याग भी नहीं करना चाहिए। हमने तो माँगा भी नहीं था, भगवान ने यह क्यों दिला दिया? खायें अथवा न खायें? कभी मन करता था फेंक दें तो कभी विचार आता था कि बिना माँगे मिला है। इसी ऊहापोह में मीलों निकल गये। ग्रास मुख में ही था। अन्त में महाराजजी ने उसे फेंक दिया। एक नल पर मुँह धोने लगे। बगल में पान की एक दूकान थी। दूकानदार दौड़कर आया, बोला- लीजिए सन्तजी पान खा लीजिए! महाराजजी ने लिया और आगे बढ़ गये। मुँह शुद्ध हो गया।
हमने कुतूहलवश पूछा कि महाराजजी! आपको मछली मिली क्यों? उन्होंने बताया, ‘‘जब मैं रेलगाड़ी में बैठकर बम्बई जा रहा था, तो बगल की सीट पर एक मुसलमान यात्री मछली खा रहा था। मेरे मन में आया कि मछली खाने का ढंग तो यह है, ऐसे पकड़ते हैं, ऐसे खाते हैं। भगवान ने भी देखा कि भजन छोड़कर मछली का चिन्तन कर रहा है, इसीलिये भगवान ने उसे दिलाकर उससे निवृत्ति पैदा करा दी।’’ अतः जो घर-द्वार छोड़कर सन्त हो गये हैं, जो सतत चिन्तनपरायण हैं, उनके अनुकूल माँस-मदिरा नहीं है।
एक समय महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक ग्राम के समीप से गुजरे। ग्रामवासियों ने निवेदन किया, ‘‘भन्ते! आप इस मार्ग से न जायँ। इधर एक भयंकर सर्प रहता है, जो पचासों को काट चुका है। वे सभी मृत्यु के ग्रास बन गये। हम लोगों ने तो यह रास्ता ही छोड़ दिया है। कोई भूला-भटका चला जाता है तो दुर्घटना हो ही जाती है।’’ बुद्ध उसी गाँव में रुक गये।
महात्मा बुद्ध का एक शिष्य आरम्भिक जीवन में सँपेरा रह चुका था। वह चुपके से उसी रास्ते की ओर बढ़ा, जिधर साँप था। ग्रामवासियों के रोकने पर उसने बताया, ‘‘मैं नाग को वश में करना जानता हूँ।’’ लोगों ने उसे जाने दिया। पदचाप सुनते ही सर्प फुँफकारते हुए अपने स्थान से चला। भिक्षु ने ज्योंही सर्पविद्या का प्रयोग किया, सर्प शिथिल पड़ने लगा। अन्ततः भिक्षु ने उसे पकड़ लिया, उसके दाँत तोड़ डाले, विष-ग्रन्थि निकाल ली और केंचुए के सदृश उस साँप को जमीन पर जिन्दा फेंक दिया।
गाँववाले बहुत प्रभावित हुए। कहने लगे, ‘‘भन्ते! आपने हमें महान् संकट से उबारा है। बतायें, हम कौन-सी सेवा करें, क्या खिलायें?’’ भिक्षु ने कहा, ‘‘यदि आपलोग प्रसन्न ही हैं तो अंगूर की शराब पिलाइये।’’ तुरन्त व्यवस्था हुई। सबने मात्र चखा; किन्तु उस भिक्षु ने अधिक ले लिया, निश्चेष्ट होकर गिर पड़ा। भक्तों ने उसे उठाया। बुद्ध के पास ले गये। उसका सिर बुद्ध के चरणों में रखकर लिटा दिया। बोले, ‘‘भन्ते! इसी ने नाग को वश में किया है किन्तु अधिक शराब पीने से अपनी चेतना खो बैठा।’’ इतना शब्द कान में पड़ते ही वह भिक्षु आवेश में उठा; किन्तु दूसरे ही क्षण अपना पैर बुद्ध के चरणों से सटाकर पुनः निश्चेष्ट लेट गया।
तब बुद्ध ने पूछा, ‘‘भिक्षुओ! क्या यह वही भिक्षु है, जिसने नाग को वश में कर लिया था?’’ ‘‘हाँ भन्ते!’’ ‘‘क्या इस हालत में भी यह नाग को वश में कर सकता है?’’ ‘‘नहीं भन्ते!’’ ‘‘भिक्षुओ! यदि वह नाग इसे अब मिलता, तब क्या होता?’’ ‘‘भन्ते! तब यह मारा जाता।’’ तब बुद्ध ने कहा, ‘‘आबुसो! इसीलिये मैं तुमलोगों के लिए माँस-मदिरा का निषेध करता हूँ। इनका प्रयोग स्मृति को लुप्त कर देता है। स्मृति ही कवच है। जो स्मृति के साथ चलता है, उठता है, बैठता है, चिन्तन करता है, वह कभी धोखा नहीं खाता। वह स्मृति के साथ ही आगे बढ़ जाता है। माँस-मदिरा चिन्तन के विपरीत मनोभावों को जन्म देते हैं, चिन्तन में बाधक हैं, इसीलिये चिन्तनपरायण पुरुषों के लिए इनका निषेध है, न कि यह पाप या पुण्य, हिंसा अथवा अहिंसा है। यह आध्यात्मिक पथ में अवरोध हैं, उसकी प्रगति शिथिल करते हैं।’’
पूज्य महाराजजी इस सम्बन्ध में एक कथानक सुनाया करते थे। एक महात्मा थे। जीवनभर उन्होंने भजन ही किया था। उनकी कुटिया के सामने एक तालाब था। जब उनका शरीर छूटने का समय आया, तो देखा कि एक बगुला मछली मार रहा है। उन्होंने बगुले को उड़ा दिया। इधर उनका शरीर छूटा तो नरक गये। उनके चेले को स्वप्न में दिखायी पड़ा; वे कह रहे थे- ‘‘बेटा! हमने जीवनभर कोई पाप नहीं किया, केवल बगुला उड़ा देने मात्र से नरक आना पड़ा। तुम सावधान रहना।’’
जब शिष्य का भी शरीर छूटने का समय आया, तो वही दृश्य पुनः आया। बगुला मछली पकड़ रहा था। गुरु का निर्देश मानकर उसने बगुले को नहीं उड़ाया। मरने पर वह भी नरक जाने लगा, तो गुरुभाई को आकाशवाणी मिली कि गुरुजी ने बगुला उड़ाया था, इसलिए नरक गये। मैंने नहीं उड़ाया, इसलिये नरक में जा रहा हूँ। तुम बचना!
गुरुभाई का शरीर छूटने का समय आया, तो संयोग से पुनः बगुला मछली मारता दिखाई पड़ा। गुरुभाई ने भगवान को प्रणाम किया कि भगवन्! आप ही मछली में हैं और आप ही बगुले में भी। हमें नहीं मालूम कि इसमें क्या झूठ है, क्या सच है? कौन पाप है, कौन पुण्य? आप अपनी व्यवस्था देखें। मुझे तो आपके चिन्तन की डोरी से प्रयोजन है। वह शरीर छूटने पर प्रभु के धाम गया।
नारदजी ने पूछा, ‘‘भगवन्! अन्ततः वे नरक क्यों गये ? महात्माजी ने बगुला उड़ाकर कोई पाप तो नहीं किया?’’ उन्होंने बताया, ‘‘नारद! उस दिन बगुले का भोजन वही था। उन्होंने उसे उड़ा दिया। भूख से छटपटाकर बगुला मर गया अतः पाप हुआ, इसलिए नरक गये।’’ नारद ने पूछा, ‘‘दूसरे ने तो नहीं उड़ाया, वह क्यों नरक गया?’’ भगवान बोले, ‘‘उस दिन बगुले का पेट भरा था, वह विनोदवश मछली पकड़ रहा था, उसे उड़ा देना चाहिए था। शिष्य से भूल हुई, इसी पाप से वह नरक गया।’’ नारद ने पूछा, ‘‘और तीसरा?’’ भगवान ने कहा, ‘‘तीसरा अपने भजन में लगा रह गया, सारी जिम्मेदारी हमारे ऊपर सौंप दी। जैसी होनी थी, वह हुई; किन्तु मुझसे सम्बन्ध जोड़े रह जाने के कारण, मेरे ही चिन्तन के प्रभाव से वह मेरे धाम को प्राप्त हुआ।’’ अतः-
पाप पुण्य की करे न आसा।
सो पहुँचे रघुनायक पासा।।
पाप-पुण्य की चिन्ता में समय को न गँवाकर जो निरन्तर चिन्तन में लगा रहता है, वह पा जाता है। भगवान का भजन ही पुण्य है, बाकी सब पाप है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’ (गीता, ३/९)- यज्ञ के अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है वह इसी लोक में बाँधकर रखनेवाला है, जिसमें खाना-पीना सभी कुछ आ जाता है। जब बन्धनकारी हर कार्य कर ही रहे हैं तो हत्या की ही इतनी चिन्ता क्यों? वह नियत कर्म कीजिये जो भव-बन्धन से छुड़ा दे।
श्रीमद्भागवत महापुराण का निर्णय है कि सृष्टि में सभी जीव एक दूसरे के आहार हैं। हाथवालों के लिये बिना हाथवाले आहार हैं, पैरवालों के लिये बिना पैरवाले आहार हैं- इस प्रकार चराचर जगत् आहार है। दुर्बल सबलों का आहार है। सबल वही है जो संगठित है, दुर्बल वही है जो असंगठित है। अतः आपसी बिखराव के कारणों को खत्म करें, कन्धा से कन्धा मिलाकर चलें, शूरवीर बनें। जहाँ तक खाने और न खाने का प्रश्न है- यह देश, काल और आविष्कारों के अनुसार परिवर्तनशील है। कभी लोग कच्चा माँस खाते थे; किन्तु आज! हिमालय की उपत्यका से गुजरते ही गर्म पेय और रेगिस्तान के टीलों पर शीतल पेय की आवश्यकता महसूस होने लगती है- यह निर्धारण प्रकृति की देन है। यह न तो अहिंसा है और न धर्म से ही सम्बन्धित है।
हाँ, राम, कृष्ण, बुद्ध इत्यादि महापुरुषों ने समाज को आत्मिक पथ पर चलाने के लिये सुधार का जो प्रयास किया, वह भी एक अहिंसा थी। इस चिन्तन-पथ में आन्तरिक विकारों के साथ बाह्य विरोधी विचारधाराओं को नष्ट करना ही अहिंसा है। नास्तिकता को आस्तिकता में बदलना अहिंसा है। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार- जो आत्मपथ पर नहीं चलता वह अपनी आत्मा का हत्यारा है, जो महापुरुष नहीं चलाता वह भी हत्यारा है और जो आत्मपथ पर चलने नहीं देते, वे तो सबसे बड़े हत्यारे हैं। समाज का एक वर्ग हमेशा से आत्मपथ का विरोध करता चला आ रहा है। वह कहता है कि ईश्वर नाम की कोई वस्तु नहीं है। स्त्री और पुरुष के संयोग से सृष्टि उत्पन्न है- इतना ही सत्य है। अतः खाओ-पीओ और मौज करो- जो इस विचारधारावाले हैं, वे आत्मा की हत्या करनेवाले हैं। साथ ही जो रूढ़ियों के पुजारी हैं, वे भी आपको परमात्मा के स्वरूप से वंचित कर रहे हैं, परमात्मा से दूरी पैदा करनेवाले हैं। उन्हें न मारकर केवल उनका हृदय बदलना भी अहिंसा का एक बहुत बड़ा अंग है।
परमदेव परमात्मा के देवत्व से दूरी पैदा करनेवाले आसुरी प्रवृत्ति के लोगों को नष्ट करने के लिए महापुरुषों ने दोनों तरीके अपनाये। जहाँ तक हो सका ऐसे लोगों का हृदय-परिवर्तन किया और जो किसी भी प्रकार से सुधरने को तैयार नहीं थे, चिन्तन-पथ में व्यवधान उपस्थित कर रहे थे उनका उन्होंने मूलोच्छेदन कर डाला। धर्मप्रचार के लिये शस्त्र के प्रयोग में राम की नकल (समानता) कुछ कबीलों ने की। ईसाइयों ने हृदय- परिवर्तन गौतम बुद्ध से सीखा; किन्तु वे इसके बदले सिखा क्या रहे हैं? मात्र कुरीतियाँ! काले-गोरे का अन्तर! क्योंकि परमात्मा की प्राप्ति की विधि को क्रमबद्ध बताने का तथा समाज को उस पथ पर चलाने का मौका न तो अल्लाह के रसूल को ही मिला और न महात्मा ईसा को ही।
हृदय-परिवर्तन प्रत्येक महापुरुष के क्षेत्र की वस्तु है; लेकिन तलवार के घाट उतारना, यह अवतार के अधिकार-क्षेत्र की बात है। अवतार भी महापुरुष ही है, आकाश से उतरा कोई विचित्र या काल्पनिक जीव-विशेष नहीं। मनुष्य-शरीर से ही साधन करके उन्होंने यह स्थिति पायी है। वस्तुतः प्राप्तिकाल में सभी महापुरुषों को परमात्मा की एक-जैसी अनुभूति मिलती है; किन्तु साथ ही समाज के संस्कारों के अनुरूप कुछ कार्यों की जिम्मेदारी भगवान उन्हें सौंप देते हैं, उन्हें विशेषाधिकारसम्पन्न कर देते हैं। जिस महापुरुष को जिस सीमा तक लोककल्याण करना रहता है उतनी भूमिका (रोल) निभाकर वह संसार के रंगमंच से तिरोहित हो जाता है। यह तो उन प्रभु का चयन है कि किससे कितना कार्य ले।
प्राप्ति और स्थिति की दृष्टि से भी सभी महापुरुष समान हैं; किन्तु समाज में उनकी भूमिका के अनुसार महापुरुषों की रहनी अलग-अलग प्रतीत होती है। अवतार चौबीस ही नहीं, अनन्त हुए हैं। आपके अन्दर भी अवतार सम्भव है- यदि आत्मानुभूति कर लें और वैसा समाज हो। समाज में उनके कार्यों का आकलन कर हम किसी को छोटा और किसी को बड़ा अवतार मान बैठते हैं; किन्तु आन्तरिक उपलब्धि की दृष्टि से सभी महापुरुष एक-जैसे हैं। जब आसुरी प्रवृत्तियाँ चरम सीमा पर पहुँच जाती हैं, समाज रूढ़िप्रधान हो जाता है, समझाने से भी नहीं समझता, समझना चाहता ही नहीं, उस समय विशेषाधिकारसम्पन्न महापुरुष का उदय होता है जिसे पूर्व मनीषियों ने अवतार की संज्ञा दी है। भगवान राम और श्रीकृष्ण ने समाज-सुधार के लिए दोनों उपायों का प्रयोग किया। उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व को देख असभ्य वनवासी भी धार्मिक हो गये। आदिवासियों ने स्वयं कहा-
सपनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ।
यह रघुनन्दन दरस प्रभाऊ।। (मानस, २/२५०/६)
मनुष्यों की तो बात ही क्या! राम ने तो बानर और भालुओं तक का हृदय-परिवर्तन कर दिया। ‘जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।। ते सब भये परम पद जोगू।’ (मानस, २/२१६/१-२) उन महापुरुष की दृष्टि जड़-चेतन जिस किसी पर पड़ी, उनमें परमपद प्राप्त करा देनेवाली क्रिया जागृत हो गयी। यही तो महापुरुष का दायित्व है, अहिंसा है। वास्तव में हृदय की आसुरी वृत्तियों के स्थान पर दैवी सम्पद् के गुणों को स्थापित करना, एक परमात्मा की ओर अग्रसर करा देना ही हृदय-परिवर्तन है और इसके माध्यम से हमारे पूर्व महापुरुषों ने समाज में एक नयी विधा का सूत्रपात किया कि पापी को नष्ट किये बिना भी पाप का उन्मूलन किया जा सकता है। यह सदैव स्मरणीय है कि केवल भगवान के भजन से ही पाप नष्ट होते हैं। ‘अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा।’ (मानस, २/१८२/६)- जो उनसे शत्रुभाव रखते थे, राम की दृष्टि उनके भी वास्तविक कल्याण पर ही रहती थी। इसीलिए ‘बैरिउ राम बड़ाई करहीं।’ (मानस, २/१९९/७)- बैरी भी उनकी प्रशंसा ही करते थे।
योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि साधनपाद के पैंतीसवें सूत्र में अहिंसा की महत्वपूर्ण कसौटी बताते हैं कि ‘अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः।’ जब अहिंसा भली प्रकार प्रतिष्ठित हो जाती है, तो उस योगी के सम्पर्क में सभी प्राणी बैर का त्याग कर देते हैं। वह सहिष्णु ही नहीं, जयिष्णु भी हो जाता है। उस महापुरुष में सबको सँभालने की क्षमता और सबके कल्याण की तड़प रहती है।
यह अहिंसा भगवान राम में पूर्ण प्रतिष्ठित थी। मनुष्य तो उन्हें आँखों में बसाने के लिए लालायित थे ही, उनके सान्निध्य में ‘करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगत बैर बिचरहिं सब संगा।।’ (मानस, २/१३७/१) या ‘खग मृग सहज बयरु बिसराई।’ (मानस, ७/२१/२) वन्य पशु भी अपनी बर्बरता को खो देते थे। इतना ही नहीं ‘जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।’ (मानस, २/२६१/८)- जहरीली नागिन भी उन्हें देखकर अपना विष त्याग देती थी।
उन्हीं अहिंसक राम के बार-बार समझाने और सन्देश भेजने पर जिनका हृदय- परिवर्तन नहीं हुआ, उन सबको राम ने काट डाला- ‘रहा न कुल कोउ रोवनिहारा।’ (मानस, ६/१०३/१०) अयोध्यावासियों तक को वे आत्मिक पथ पर चलने और भवसागर पार कर लेने के लिए प्रेरित करते हैं। आत्मपथ से विमुख लोगों को चेतावनी भी देते हैं- ‘काल रूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता।।’ (मानस, ७/४०/५) अतः अहिंसा का यह अर्थ नहीं है कि किसी को मारो मत या पीड़ा न पहुँचाओ। अहिंसा का अर्थ है शाश्वत स्वरूप की उपलब्धि और उस तक पहुँचने के लिये निर्धारित क्रिया का आचरण! इस अहिंसा के रास्ते में जो व्यवधान डालता है- आप चलना चाहते हैं कोई चलने नहीं दे रहा है, उसका विनाश कर देना एक अहिंसा है। और विनाश भी क्या होना है? आत्मा एक वस्त्र बदलेगा फिर वह आपके ही रास्ते पर, जहाँ से साधन छोड़ा था, आ जायेगा। अहिंसक जितना कोमल होता है, कदाचित् उससे भी अधिक कठोर होता है-
कुलसहु चाहि कठोर अति, कोमल कुसुमहु चाहि।
चित्त खगेस राम कर, समुझि परइ कहु काहि।। (मानस, ७/१९ ग)
अहिंसा कायरता नहीं है, कायरता तो हिंसा से भी खराब है। कायर बदला लेना तो चाहता है किन्तु मरने से डरता है, चाहता है उसकी रक्षा दूसरे लोग कर दें; किन्तु अहिंसक लोक-कल्याण की भावना से प्राणोत्सर्ग तक के लिए भी तैयार रहता है। विश्व की महानतम विभूतियाँ मानवता के कल्याण के लिए अपनी बलि देने में पीछे नहीं रहीं। अहिंसा का व्रती धर्म की रक्षा और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए सिर देने के लिए सदैव तैयार रहता है और स्वभावजन्य जड़ता का किसी भी प्रकार अन्त न देखकर सिर उतार भी लेता है।
आपको पुनः स्मरण दिला दें कि आत्मपथ के विरोधी विजातीय समाज को तलवार के घाट उतारना जनसामान्य का विषय नहीं है। जनसामान्य के लिये अहिंसा या अहिंसा की प्रतिष्ठा है भी नहीं। यह स्वरूप द्वारा आदेश पानेवाले महापुरुष के क्षेत्र की बात है, जिनको विशेष अधिकार था कि वैसे मुक्ति नहीं मिली तो ऐसे ही दे दिया। रावण का तेज राम में समा गया, कुम्भकर्ण का तेज राम में समा गया। श्रीकृष्ण ने कंस और शिशुपाल को मारा तो उनका तेज कृष्ण में समा गया।
यही हजरत मुहम्मद साहब ने मुसलमानों को सिखाया कि जो एक परमात्मा और एक गुरु को न माने, या तो उसे काट दो या अपने में मिला लो; किन्तु तत्कालीन समाज के बहुत कम लोगों ने उनके आशय को समझने का प्रयास किया। अधिकांशतः केवल शब्दों पर चले गये। मुहम्मद साहब पर तो आयतें उतरती थीं, वे खुदा की आवाज़ सुनते थे। (यह नितान्त व्यक्तिगत बात है, जो परमात्मा की आवाज़ सुनता है, उसके क्षेत्र की बात है, अन्य के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है।) उनकी मौजूदगी तक तलवार उठाने की बात जायज़ थी, किन्तु बाद में उनके अनुयायी भी उन्हीं विशेषाधिकारों की नकल करने लगे। धर्मप्रचार की सनक में वे सबको अपने रहन-सहन में भी ढालने का प्रयास करने लगे, जो समाज में कलह का कारण बना। समाज का रहन-सहन, खानपान या वेशभूषा धर्म नहीं है। इसका पालन इन्द्रियों और मन अथवा अन्तःकरण की क्रियाओं से होता है। भजन मानसिक होता है। आपके बगल में बैठा व्यक्ति भी नहीं जान सकता कि आप कब भजन कर रहे होते हैं।
आत्मिक शोध की विधि के प्रश्न पर संसार के सभी महापुरुष एक मत हैं और वह विधि भी केवल इतनी है कि (१) सर्वत्र व्याप्त एक परमात्मा में श्रद्धा, (२) उस परमात्मा का परिचायक दो-ढाई अक्षर के किसी नाम का प्रत्येक श्वास में जप (यह नाम किसी भी भाषा का हो सकता है, कुछ भी हो सकता है, शर्त यह है कि उससे परमात्मा की सर्वव्यापकता का बोध हो) और (३) साधन द्वारा चलकर उसी परमात्मा की प्राप्तिवाले किसी समकालीन महापुरुष की सेवा, उनके प्रति समर्पण; उन्हें गुरु, सद्गुरु या पैगम्बर कुछ भी उपाधि दे लें- इस विधि द्वारा चलकर अपने हृदय के भीतर निवास करनेवाले उसी परमात्मा को विदित कर लेना, उसके लिए यत्न करना- बस इतना ही तो अहिंसा है। अपने स्वरूप को प्राप्त करने का यत्न अहिंसा है।
संसार में प्राप्तिवाले सभी महापुरुषों के उपदेशों का सारांश बस इतना ही है। अहिंसा का स्थल एक है, धर्म की मान्यता भी एक है; किन्तु परिवर्तनशील व्यवस्था के सम्बन्ध में उनके निर्देशों को भी धर्म मान लेने की भूल उनके अनुयायी कर बैठते हैं। महापुरुष द्वारा मिलनेवाले वे नियम तत्सामयिक हैं स्थायी नहीं, समाज-विशेष के लिए हो सकते हैं सार्वभौम नहीं, जबकि धर्म सार्वभौम है। रहन-सहन के नियमों को यदि धर्म से निकाल दें तो धर्म के नाम पर होनेवाले झगड़ों का कारण समाप्त हो जाय। दिक्कत तो तब आती है जब महापुरुषों के अनुयायी एक सम्प्रदाय की खोल ओढ़ लेने की भूल कर बैठते हैं। धर्म के साथ-साथ अपना रहन-सहन, रीति-रिवाज, सामाजिक परम्पराएँ, अपने पर्व, खान-पान, भवन निर्माण शैली, पहनावा, भाषा और संक्षेप में अपनी सभ्यता दूसरों पर लादने का यत्न करने लगते हैं। झगड़ा इस बात को लेकर नहीं है कि एक परमात्मा को मानो, झगड़ा तो इस बात का है कि उसे कहा क्या जाय- राम कहें या अल्लाह या गॉड?
केवल शब्दों को पकड़कर बैठ जाने से भूल होती है। यही भूल वहाँ भी है, जब हम कहते हैं कि ईसा को माने बिना कोई स्वर्ग के राज्य में प्रवेश ही नहीं कर सकता। ईसा के समय में यह बात ठीक थी क्योंकि सद्गुरु ही परमात्मा के धाम की कुंजी हैं, उनके बिना कोई परमात्मा तक पहुँच नहीं सकता; किन्तु आज? आज आप उनसे केवल प्रेरणा लें और प्राप्तिवाले किसी महापुरुष को प्राप्त करें। श्रद्धा सबमें रखें, किसी प्राप्तिवाले महापुरुष का अपमान न करें, चाहे वह जिस काल में रहा हो; क्योंकि सबने एक ही क्रिया की है, सबने उसी परमात्मा का निरन्तर चिन्तन, ध्यान और इन्द्रियों का संयम किया है और सबने उसी एक परमात्मा को पाया है- किसी को हिन्दू भगवान, मुसलमान भगवान या ईसाई भगवान नहीं मिला।
यदि परमात्मा भी दो हैं तो एक में धोखा है, जरूर धोखा है। जब सर्वत्र एक वही व्याप्त है, तो दूसरा रहेगा कहाँ? यदि दूसरा है भी तो उसके लिए दूसरी सृष्टि चाहिए; क्योंकि इस सृष्टि के कण-कण में वह एक ही व्याप्त है। यदि उसी में दूसरा भी व्याप्त है तो एक ईकाई, एक तत्त्व एक ही हो गया, दो कैसा? दो भगवान कहनेवाले नितान्त भ्रम में हैं।
इस संसार में एक ही शाश्वत भगवान रहेगा। उसे कोई गॉड फादर कहता है तो दूसरा उसी को परमपिता भी कह सकता है। यह यहोवा, अल्लाह, अहुरमज्दा या जो भी है, आपके लिए आपके हृदय में है। आपको उसका जो भी नाम रुचे; किन्तु कोई छोटा-सा नाम जो श्वास में ढल सके, उसी नाम से पुकार लें। यह तो आप और आपके हृदयस्थ परमात्मा की नितान्त व्यक्तिगत बात है। मुख्य चीज है कि आप उस एक परमात्मा को मानते हैं या नहीं? उसकी प्राप्ति के लिए निर्धारित आचरण करते हैं या नहीं? इतना कोई करता है तो उससे झगड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता। उसका धर्म- परिवर्तन भी नहीं किया जा सकता। करके भी कौन-सा नया धर्म देंगे आप? अतः रहन-सहन और अपना महापुरुष भी किसी पर लादने का प्रयास धर्म नहीं है। आपके लिए आपका समकालीन महापुरुष ही उपयोगी है; क्योंकि वही आपके हृदय में योग की जागृति कर सकता है, प्राचीन महापुरुष नहीं। प्राचीनकाल के ही किसी महापुरुष से यदि यह जागृति हो जाती, तो अन्य महापुरुषों के आविर्भाव की परम्परा क्यों होती? इस आत्मिक पथ की यही तो विशेषता है कि यह आपको हमेशा-हमेशा के लिए स्वर्ग या नरक की व्यवस्था तक ही फँसाकर नहीं छोड़़ देता, जिसमें आपको न तो सुधरने का अवसर मिलता है और न गुलामी से मुक्ति, चाहे वह किसी तथाकथित महात्मा की ही क्यों न हो! जब तक आप उसी परमात्मा के तद्रूप नहीं हो जाते, इस गुलामी से, आवागमन से मुक्ति असम्भव है। यह दर्शन की क्रिया आपको गुलाम नहीं, मालिक बनाकर छोड़ती है। नियत कर्म का आचरण करके यही स्थिति हर देश और हर समय के व्यक्ति के लिए सम्भव है, तो किसी प्राचीन महापुरुष से चिपककर बैठने का औचित्य नहीं रह जाता।
वे महापुरुष आपके सम्मानित पूर्वज रहे हैं। उनसे आप प्रेरणा लें और समकालीन किसी महापुरुष की प्राप्ति की लालसा रखें, क्रिया द्वारा चलकर आप भी वैसा ही बनें। आप केवल एक परमात्मा में श्रद्धावान् होकर उसके किसी नाम को जपने के लिए कुछ समय दें। पुण्य-पुरुषार्थ घनीभूत होते ही आपके लिए जो भी सन्त या सद्गुरु निर्धारित होंगे, स्वतः मिल जायेंगे। यदि पुण्य-पुरुषार्थ उस स्तर का अभी नहीं है, कोई महापुरुष आप पर थोप दिया जाय तो इससे भी आपको कोई लाभ नहीं। इससे थोपनेवालों का स्वार्थ भले ही सिद्ध हो किन्तु जिस बेचारे पर थोपा गया है उसे रूढ़ि के अतिरिक्त कुछ भी मिलनेवाला नहीं है। अतः इस दुराग्रह का भी कोई औचित्य नहीं है कि केवल मेरे महापुरुष को मानो।
हमारे पूर्व मनीषियों ने यही किया। उन्होंने केवल नास्तिकता को आस्तिकता में बदला। किसी पर रहन-सहन या खान-पान का नियम नहीं लादा। खान-पान, पहनावा, भाषा इत्यादि आपको अलगाते हैं, जबकि धर्म आप सबकी आत्मिक एकता की प्रत्यक्ष अनुभूति कराता है, वह आपको एक करता है। वह बताता है कि किस बिन्दु पर आप एक हैं। अनेकताओं के बीच निहित आत्मिक एकता की दृष्टि देता है धर्म। कितना विरोधाभास है लोग बँटे हैं, लड़ रहे हैं- वह भी धर्म के नाम पर, महापुरुषों के नाम पर। समृद्धि और अपने अहं की सन्तुष्टि के लिए लोग लड़ते ही रहते हैं, आप शौक से लड़िए; किन्तु कोई स्थान नहीं है धर्म के नाम पर लड़ने का।
मानवमात्र के लिए एक धर्म का सन्देश लेकर हमारे पूर्वज चीन, जापान से लेकर मिस्र तक गये। अमेरिका में भी उनके प्राचीन स्मृति-चिह्न मिल रहे हैं। दक्षिण-पूर्वी एशिया को तो लोग बृहत्तर भारत ही कहने लगे थे। समूचे विश्व ने उनकी शिक्षाओं को हाथों-हाथ लेकर उनके धर्म-विजय में सहयोग दिया और जिस भी व्यक्ति ने धर्म के नाम पर समाज में फूट डालने की कोशिश की उसे उन्होंने भयंकर चेतावनी दी, जैसा कि प्रियदर्शी सम्राट अशोक के शिलालेखों से स्पष्ट है। अहिंसाव्रती उस सम्राट के पास सुसंगठित सेना भी थी। यह अहिंसा का उल्लंघन नहीं था बल्कि अहिंसा की ही प्रतिष्ठा में बाधक असामाजिक तत्त्वों के लिए दण्ड का विधान था।
इसी अहिंसा के व्रती सम्राट हर्षवर्धन ने, जिसने अपने राज्य में अशोक की तरह जीव-हिंसा बन्द करा दी थी, उस हर्षवर्धन ने आत्मिक पथ में आयी कुरीतियों को दूर करने के लिए प्रयाग में विद्वानों का सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें गौतम बुद्ध के अनुयायी चीनी यात्री ह्वेनसांग के विचारों को प्राथमिकता मिली। ईर्ष्यावश कुछेक विद्वानों ने उसे अपमानित करने की योजना बनायी। इस दुरभिसन्धि का पता लगते ही सम्राट ने घोषित किया कि यदि कोई उस विद्वान् को क्षति पहुँचाने का प्रयास करेगा, तो उसे मृत्युदण्ड दूँगा। एक ओर अहिंसा का पुजारी और दूसरे हाथ में तलवार! वस्तुतः आत्मिक पथ पर चलना और चलाना ही अहिंसा है और इसमें बाधक तत्त्वों का उन्मूलन करना भी अहिंसा ही है।
सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में अहिंसा की स्थापना के लिए शस्त्र का प्रयोग केवल दो महापुरुषों ने किया- भगवान राम ने और योगेश्वर श्रीकृष्ण ने, वह भी उस समय जबकि अन्य कोई मार्ग नहीं रह गया था। शेष महापुरुषों ने केवल हृदय-परिवर्तन से काम लिया। भगवान बुद्ध ने यही किया। एक ब्राह्मण सात सौ बछिया, सात सौ बकरा और सात सौ भेड़ इकट्ठा करके यज्ञ में हवन करने ही वाला था कि गौतम बुद्ध पहुँच गये। उन्होंने कहा, ‘‘इन मूक पशुओं को मारने से भगवान कैसे खुश हो जायेंगे? सृष्टि में अनन्त जीव जन्मते और मरते ही रहते हैं, उनको मारने से भगवान को कौन-सी सन्तुष्टि होगी? तुम तो जीव मारते-मारते ही मर जाओगे। चिन्तन की विधि तुम्हारे पास क्या है? आओ, जिसका नाम मोक्ष है वह मैं दूँगा।’’ उसे न केवल विधि बतायी बल्कि पीछे लगाकर उस पथ पर चलाया भी। इसीलिए दुनिया में सबसे ज्यादा विरक्त शिष्य और मुक्त महापुरुष बनाया भगवान बुद्ध ने। जब उनका शरीर छूटा तो पाँच सौ जीवन्मुक्त अर्हत् उनके पास बैठे थे।
भगवान बुद्ध भिक्षुओं के लिए शिक्षा का अलग समय रखते थे और गृहस्थों के लिये अलग। दोनों के लिए नियम भी अलग-अलग थे; क्योंकि एक को गृहस्थी का भार भी वहन करना है और दूसरे को केवल चिन्तन में अनुरक्त रहना है। यदि महात्माओं की वस्तु को अन्तर्जगत् में न ढूँढ़कर बाहर ढूँढ़ने लगें तो व्यवस्था गड़बड़ा जायेगी, जीवन भार हो जायेगा, जैसा कि अहिंसा के पहलू को अपनी ओर खींचकर आपने भार बना लिया।
जब कोई भाविक भक्त साधन-क्रम में लगता है तो आरम्भिक अवस्था में उसे भगवान अपनी थोड़ी-सी अनुभूति देने लगते हैं। जब साधना एकदम सूक्ष्म हो गई तब एक स्तर ऐसा आता है कि जहाँ पर प्रकृति दिखाई देती थी वहाँ पर परमात्मा का स्वरूप दिखाई देने लगता है- ‘सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।।’ (मानस, २/१३०/७) न स्वर्ग स्वर्ग के रूप में रह गया और न नरक नरक के रूप में रह गया। जहाँ भी दृष्टि पड़ी, वह अपने ही आराध्य देव का स्वरूप खड़ा पाता है। पेड़ में, जड़ में, पत्ते में, चेतन में जहाँ भी दृष्टि पड़ी, आराध्य देव का स्वरूप ही दिखाई देने लगता है। ऐसे महापुरुष को चींटी मारने में भी कष्ट होता है, वनस्पति तोड़ने से भी वे कतराने लगते हैं।
पूज्य महाराजजी को भी यह अवस्था आयी थी। एक बार हमने पूछा, ‘‘आपके दाँत में पायरिया क्यों हो गया?’’ वे बोले, ‘‘हो! दो साल तक हमने दतुअन ही नहीं किया।’’ हमने पूछा, ‘‘भगवन्! इसका कारण?’’ बोले, ‘‘हो! उन दिनों हम नंग-धड़ंग विचरण कर रहे थे। एक ऐसी अवस्था आई कि जहाँ भी दृष्टि पड़े वहाँ पर अपने आराध्य देव का ही स्वरूप दिखाई पड़े। जब दातुन तोड़ने लगें तो ऐसा भान हो कि जैसे कोई हमारा रोआँ उखाड़े तो हमें कष्ट होता है, वैसे ही इस पेड़ को भी कष्ट होता होगा। आत्मा और वस्तुओं में एकता आ गई, इसलिये हमने उनको तोड़ना बन्द कर दिया। सूखी पत्ती मिले वही कूँचकर फेंक दें। इसी से दाँत में कीड़े लग गये, पायरिया हो गया।’’
हमने पूछा, ‘‘भगवन्! यह कैसा दर्शन था?’’ बोले- ‘‘हो! उस समय तो यह साधना का एक अभिन्न अंग था। अब जिस स्वरूप में मैं हूँ, यहाँ से देखता हूँ तो वह सब भी एक अज्ञान ही था।’’
अतः सर्वत्र भगवान हैं- ऐसा मानकर बैठ जाने की जरूरत नहीं है। साधन द्वारा चलने पर, उस अवस्था के आने पर वह चींटी मारने में, पत्ती तोड़ने तक में दर्द महसूस करने लगता है। यह अहिंसा का एक स्तर है, श्रेणी है; लेकिन यह अहिंसा-स्थली साधन द्वारा ही सुलभ होती है। इस अवस्थावाला महापुरुष किसी को कष्ट नहीं पहुँचा सकता। इसीलिये कर्म, वचन और मन से भी किसी को पीड़ा न पहुँचाना अहिंसा है। समाज में प्रचलित अहिंसा महापुरुषों के इसी स्तर की नकल है। वस्तुतः अहिंसा क्रमागत चिन्तन-पथ का अंग है। आत्मिक पथ पर चलकर विश्व में कोई भी अहिंसक हो सकता है और आप भी।
।। बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय।।
(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)