एक भाविक का प्रश्न
प्रश्न– एक समय पूज्य महाराजजी से एक भाविक ने प्रश्न किया, ‘‘महाराजजी! यह रामायण तेली, कुम्हार, श्वपच, कोल, किरात और कलवारों को अधम पुकारती है। जिससे प्रतीत होता है वर्ण कोई धर्म नहीं है। यह तो मनुष्यों का बँटवारा है। इस पवित्र रामायण में जहाँ ‘मानउँ एक भगति कर नाता’ वहाँ यह वर्णाधम और वर्णीय चित्रण का अभिप्राय क्या है?
उत्तर– महाराजजी ने बताया कि सत्पुरुष का सान्निध्य न प्राप्त होने से ऐसी भ्रान्तियों का सृजन हो जाया करता है; वस्तुतः रामायण में ऐसी भ्रान्तियों के लिए कोई स्थान नहीं है। आपकी जिज्ञासा उत्तरकाण्ड के कागभुशुण्डि-गरुड़ संवाद प्रकरण की है। जिसमें कागभुशुण्डिजी ने अपने से लाखों वर्ष पूर्व के एक कल्प में दोषों से परिपूर्ण युग कलियुग का चित्रण किया है, जिसमें सभी स्त्री-पुरुष अधर्म परायण और वेद के प्रतिकूल आचरणवाले थे। ‘कलिमल ग्रसे धर्म सब, लुप्त भए सदग्रन्थ।’ (मानस, 7/97), ‘बरन धर्म नहिं आश्रम चारी।’ (मानस, 7/97/1) न तो वर्ण-धर्म थे और न उनके पालन का स्थान ही। ‘बरनाश्रम धर्म अचार गए।’ (मानस, 7/101/छन्द 4)- वर्ण-धर्म के आचरण तिरोहित हो गये, समाप्त हो गये। सद्ग्रन्थ लुप्त हो गये फिर भी दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना करके धर्म के नाम बहुपंथ प्रगट कर दिया, जैसे- ‘मिथ्यारम्भ दम्भ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई।।’ (मानस, 7/97/4) झूठ-मूठ का कोई आडम्बर खड़ा कर दिया। लोग कहने लगे-अच्छे सन्त हैं। ‘पर त्रिय लंपट कपट सयाने।’ ‘तेइ अभेदबादी ज्ञानी नर। देखा मैं चरित्र कलिजुग कर।।’ (मानस, 7/99/1-2) आचरणहीन अपने को अभेदवादी कहने लगे। ज्ञानी कहलाने लगे। उन्हीं दम्भियों ने मनुष्य-मनुष्य में ऊँच-नीच का बँटवारा भी कर दिया और वर्ण-धर्म को मान्यता दे दी। ‘जे बरनाधम तेलि कुम्हारा।’ (मानस, 7/99/5)- तेली-कुम्हार अधम हैं- यह उन दम्भियों के हृदय की उपज थी, न कि यह रामचरित मानस में प्रतिपादित सिद्धान्त है। उन्हें अधम कहना धर्म नहीं है। धर्म तो ग्रस लिया गया था। तुलसीदासजी इस अधमता को अस्वीकार करते हैं तभी तो इसे दम्भियों की व्यवस्था कहते हैं। उन दिनों निरक्षर, लोलुप, कामी, आचरणहीन, शठ तथा वृषली स्त्रियों के स्वामी भी विप्र बन बैठे थे। ‘द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी।’ (मानस, 7/100/छन्द)- उनकी पहचान जनेऊ थी। विचार करें, जब विप्र के यही लक्षण हैं तो इनसे सेवा लेने पर उभय लोक कैसे नष्ट होगा? यह तो लाखों वर्ष पूर्व घटित कागभुशुण्डिजी का मात्र संस्मरण है। उसके एक हजार जन्मों के पश्चात् वे स्थितप्रज्ञ महापुरुष हुए। सत्ताइस कल्पों तक उन्होंने नीलगिरि पर निवास किया। तब से अब तक के अन्तराल पर ध्यान न देकर उसे आज के समाज का चित्रण मान बैठना भ्रान्ति नहीं तो क्या है?
रामराज्य में वर्णधर्म की पुनः स्थापना हुई। ‘बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग।।’ (मानस, 7/20) राम के राज्य में (परमात्मा के पथ में जहाँ प्रवेश मिल गया उसके पश्चात्) साधक अपने-अपने वर्ण अर्थात् नियतकर्म को करने की क्षमता अनुसार ‘निरत’ अर्थात् विरक्त होकर ‘चलहि बेद पथ लोग’- वेद अर्थात् अन्तःकरण में मिलनेवाले ईश्वरीय निर्देशनों के आलोक में अहर्निश चलते हैं। जिसके परिणाम में भय, रोग, शोक और वियोग से परे शाश्वत सुख की प्राप्ति करते हैं।
रामराज्य में ‘राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी।।’ (मानस, 7/20/4) – चारों वर्णों के लोग एक परमात्मा राम की ही भक्ति करते थे। नारियों को भजन का समान अधिकार था। सभी वर्णों के नर-नारी परमगति, मोक्ष के अधिकारी थे।
‘अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा’- रामराज्य में चारों वर्णों के लोगों की अल्पमृत्यु नहीं होती थी क्योंकि इस साधन-पथ में बीज का नाश नहीं है। ‘सब सुन्दर सब बिरुज सरीरा’ (मानस, 7/20/5) – चारों वर्णों के लोग सुन्दर और नीरोग होते थे। ज्यों-ज्यों कोई ईश्वर-पथ पर अग्रसर होता जाता है, त्यों-त्यों ईश्वरीय आभा प्रस्फुटित होने लगती है। ‘काम वात कफ लोभ अपारा’– जैसे रोगों से मुक्ति मिलने लगती है। इस पर चलनेवाले साधक को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आक्रान्त नहीं कर पाते। ‘नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना’– आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। एक बार मिल जाने पर यह कभी आपका साथ नहीं छोड़ती। इस सम्पत्ति का प्राप्तकर्ता कभी अपने को असहाय नहीं पाता। ईश्वर का वरदहस्त सदैव उसे प्राप्त रहता है। ‘नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना’ (मानस, 7/20/6) साधक की जो श्रेणी है उसी स्तर का निर्देशन प्रभु से मिलता रहता है। यह वेद-पथ प्रभु पढ़ाते हैं और वह समझता है। इसलिए सबके सब प्रबुद्ध हैं। कल्याण के जो लक्षण चाहिए सब उसमें विद्यमान हैं। ‘सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी’ (मानस, 7/20/8)- रामराज्य में शूद्र हैं अवश्य, वैश्य भी हैं किन्तु हैं वे पण्डित! अपनी श्रेणी का उन्हें भली प्रकार बोध है। प्रश्न-परिप्रश्न या शंका-समाधान-हेतु उन्हें कहीं जाने की आवश्यकता नहीं रहती। अपौरुषेय वाणी ही उनका सदा समाधान करती है। उन्हें आवश्यकता है तो सदा केवल गन्तव्य पर चलने की। चित्त की स्थिति में परिवर्तन होते ही भगवान उन्हें तुरन्त बता देते हैं। सभी कृतज्ञ, प्रत्युपकार-परायण तथा निश्छल हैं।
रामराज्य में सरयू के राजघाट पर चारों वर्णों के लोग भेदभाव की भावना से मुक्त होकर एक साथ स्नान करते थे। अस्पृश्यता की गर्हित प्रथा संज्ञान में न थी। वास्तव में यजनपूर्ण स्वर ही सरयू है। इस श्वास के जप में अल्पज्ञ श्रेणीवाले का मन कम, मध्यमा श्रेणीवाले का उससे अधिक लगता है, जबकि ब्राह्मण श्रेणीवाला ध्यानस्थ होकर समाधिस्थ हो जाता है। कोई उन्नत अवस्था में है तो कोई आरम्भिक स्तर पर है। किन्तु घाट तो एक ही है जहाँ चारों वर्णों के साधक पहुँचते और स्नान करते हैं। जो भी रामराज्य की परिधि में आता है उसे चार वर्णों के क्रमोन्नत साधन में प्रवृत्त होना है, और यही धर्म है।
जाति-पाँति कोई धर्म नहीं है। सम्पूर्ण रामचरितमानस में कहीं भी इस कुत्सित प्रथा का समर्थन नहीं किया गया है। मनुष्य किसी-न-किसी व्यवसाय से विभूषित परिवार में जन्म लेता है, कोई महर्षि कुम्भज की तरह घड़े में पड़ा मिलता है। वह जाति नहीं, केवल मनुष्य के रूप में जन्म लेता है। वह भगवान की करुणा का परिणाम है, भाग्यशाली है, क्योंकि मानव-तन साधन का धाम है, मोक्ष का दरवाजा है। कुलीन अथवा खाते-पीते परिवार को ही भगवान के यहाँ वरीयता मिलने जैसी भी कोई बात नहीं है। मानव-शरीर किसी कुलीनता की अपेक्षा नहीं रखता। वह कर्मों का रचयिता है, संस्कारों का दास नहीं। मनुष्य शरीर मिल गया तो आपका भाग्य पूर्ण है। केवट लोक-वेद दोनों में सब प्रकार से नीच माना जाता था। ‘साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा।।’ (मानस, 2/189/7)- उसके भाग्य में राम-भक्ति की रेखा नहीं थी; किन्तु जब राम ने अपना लिया, ‘राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें।।’ (मानस, 2/195/2)- वह तीनों लोकों में पवित्र पुरुष हो गया। भगवान को प्राप्त कर लिया। जिसकी छाया छू जाने मात्र से स्नान करने का विधान समाज ने बनाया था, वह भी भगवान को पा गया। वशिष्ठ ने उसे गले लगाया। आज लोग किसी गरीब को अपनाते हैं तो कहते हैं कि वह हमारा है, किन्तु वहाँ नीचे जमीन पर बैठो- भगवान इस तरह से नहीं अपनाते हैं। केवट को उन्होंने कहा, ‘तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।।’ (मानस, 7/19/3)- तुम मुझे उतने ही प्रिय हो जितना भरत। हे तात! सदैव आते रहना। अपने घर का दरवाजा ही खोल दिया। आप्तपुरुषों की वाणी में जाति की पैरवी कहीं नहीं है।
उन भाविक ने पुनः निवेदन किया, ‘‘भगवन्! वाल्मीकी रामायण में है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने शम्बूक का मात्र इसलिए वध किया था कि वह शूद्र होकर तपस्या कर रहा था– इसका क्या आशय है? क्योंकि वाल्मीकि भी अस्पृश्य श्रेणी से उठे थे। उन्हें तो राम ने सादर दण्डवत् किया था– ‘मुनि कहुँ राम दण्डवत कीन्हा।’ (मानस, 2/124/1)
पूज्य महाराजजी ने उन्हें बताया कि यह भी एक आध्यात्मिक, साधनात्मक कथानक है कि शम्बूक ने तपस्या आरम्भ की, जिससे ब्राह्मण बालक मर गया। वर्षों तक इसके कारण की शोध चलती रही। राम ने उधर तलवार से शिरोच्छेदन किया, इधर बालक जी उठा। बिना किसी शल्य-क्रिया के ऐसी प्राण-प्रतिष्ठा अभी तक देखने-सुनने में तो नहीं आयी।
शम्बूक शूद्र था अर्थात् अल्पज्ञ श्रेणी का आरम्भिक साधक था। ऐसे साधक प्रायः उच्छृंखल हो जाते हैं, ‘सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ज्ञान गुमानी।।’ (मानस, 2/171/6)- शूद्रकाल में कागभुशुण्डिजी से भी ऐसी भूल हुई थी। उन्होंने न केवल भजन में बैठने की भूल की अपितु (विप्र अवमानी) गुरुदेव का अपमान कर बैठे, जिसका प्रायश्चित उन्हें करना पड़ा। अल्पज्ञ साधक उन्नत साधकों की नकल करने लगते हैं। इससे उनमें उन्नत अवस्था तो नहीं आती प्रत्युत आरम्भिक स्तर की साधनात्मक जागृति भी प्रसुप्त हो जाती है। यही ब्राह्मण बालक का मरना है। शम्बूक समत्व की वृत्ति की नकल करनेवाले साधक का प्रतीक है। वह वृक्ष में उलटा लटककर तपस्या कर रहा था। ‘संसार बिटप नमामहे’ (मानस, 7/12/छन्द 5)- वह संसार-वृक्ष में, गर्भवास में उलटा लटका हुआ था; किन्तु शम्बूक समत्व प्राप्त ब्रह्मस्थित महापुरुष की नकल करने में लगा था। इससे जो ब्रह्म-आचरण जागृत हुआ था वह भी प्रसुप्त हो जाता है; किन्तु जब भगवान रथी हो जाते हैं तो साधक को पतित होने नहीं देते। त्यागरूपी तलवार से वे उसे उस स्तर से गिरा देते हैं। वर्षों का मरा हुआ ब्राह्मण बालक जी उठता है। ब्रह्माचरण पुनः जागृत हो जाता है और इस प्रकार योग की साज-सँभार करते उसे लक्ष्य तक की दूरी तय करा देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ‘परधर्मो भयावहः’ (गीता, 3/35)- अल्पज्ञ श्रेणीवाला साधक, यदि उन्नत की नकल करता है तो भय अर्थात् आवागमन को प्राप्त हो जाता है। स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार आचरण करनेवाला क्रमशः परमश्रेय को प्राप्त कर लेता है।
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)