मूर्तिपूजा की उपादेयता
एक परिवार में एक बहू आयी। सास बहुत खुश थी। उसने सुन रखा था कि आने वाली बहू बहुत विद्वान है, होशियार है। उसने सोचा कि बहू को देवी मन्दिर में दर्शन करा दें, गोद भरने की मनौती मान लें। बहू ने सुना तो सोचा कि घर में सिकुड़-सिमटकर बैठे-बैठे ऊब गये, बाहर कुछ घूम लेंगे। १५-२५ औरतों के साथ सास बहू को मन्दिर ले चली। सीढ़ियों के दोनों ओर कुत्तों की प्रतिमाएँ थीं। हट्टे-कट्टे कुत्तों को देखते ही बहू चीखकर सास से चिपक गयी। सास लड़खड़ा गयी। बहू ने कहा– अरे मावा, कुत्ता! कुत्ता काटा!! कुक्कुर, कुक्कुर!!!
बुढ़िया बिगड़ी कि विवाह करानेवाले उस अगुवा का सर्वनाश हो जाय; बेईमान कहता था कि बहू समझदार है लेकिन लगता है इसे कहीं घुमाया-दिखाया नहीं। वह डाँटते हुए बोली– गँवार कहीं की! देखती नहीं कि ये पत्थर के हैं। कहीं पत्थर का कुत्ता भी काटता-भूँकता है। बहू ने कहा– अच्छा माताजी! यदि यह पत्थर का है तब तो यह नहीं काटेगा। सास ने सिर पीट लिया– हे भगवान! यह बिना बुद्धि की लड़की हमारे गले पड़ गयी।
दस-पाँच सीढ़ियाँ चढ़ने पर मन्दिर के द्वार के सामने मुँह खोले, पंजा उठाये शेर को देख भयभीत बहू उछलकर सास के ऊपर गिर पड़ी। सास भी सीढ़ियों पर गिर गयी। माथे पर बड़ा-सा गूमड़ा निकल आया। वह बहू चीख पड़ी– मावा, शेर! शेर फाड़कर खा जायेगा। सास अगुवा को कोसने लगी कि आज वह मिल जाता तो उसकी मूँछें उखाड़ लेती। कहता था कि बहू बड़ी गुनी है, जानकार है लेकिन इसने तो कुछ देखा ही नहीं। सास बोली– यह पत्थर का है रे! भला पत्थर कैसे खा लेगा? देख…. सास ने शेर के मुँह में हाथ डालकर दिखा दिया। बहू बोली– समझ गयी माताजी! यह पत्थर का शेर है, कुछ कर नहीं सकता। सास बोली, पागल कहीं की! पत्थर का शेर भी काटता-खाता है क्या? हे भगवान! हमारे बच्चे का जीवन-निर्वाह इस मूर्ख के साथ कैसे होगा?
सास बहू को लेकर मन्दिर के गर्भगृह में गयी। वहाँ पत्थर की एक देवी-मूर्ति थी। सास ने कहा– बेटी! यह हलवा-पूड़ी देवी को खिलाओ। यह तुम्हारी गोद भरेंगी, धन-धान्य से सम्पन्न करेंगी। बहू बोली–
अब तक हमही रहे बउरान,
कि बूढ़ा मावा अब तूँ बउरानिउ ना।
अर्थात् अभी तक तो आप हमें ही पागल कह रही थीं, अब आप भी पागल हो गयी हैं क्या? सास ने कहा– क्या बक रही है? बहू बोली–
पथरे क कूकुर भूँकत नाहीं, नहीं बाघ गुर्राई।
तब पथरे की देवी मावा, कैसे क हलवा खाई।।
कि बूढ़ा मावा अब तूँ बउरानिउ ना।।
जब पत्थर का कुत्ता भूँक नहीं सकता, काट नहीं सकता, पत्थर का बाघ खा नहीं सकता तो पत्थर की देवी हलुवा कैसे खा लेगी? सास ने समझाया– देख, पंडित बाबा ने इसके अन्दर प्राण-प्रतिष्ठा किया है, जीव पहना दिया है! बहू ने कहा–
जवन मंत्र पढ़ि पंडित बाबा पथरे में जिउ पहिराई।
तवन मंत्र पढ़ि पंडित बाबा पुरखा काहे न लिये जियाई।।
कि बूढ़ा मावा अब तूँ बउरानिउ ना।।
अर्थात् जिस मंत्र को पढ़कर पंडितजी ने पत्थर में जान डाल दिया, वही मंत्र पढ़कर उन्होंने अपने बाप-दादाओं को क्यों नहीं जिला दिया? जिनका शरीर अभी ठण्डा नहीं हुआ, जो गड़ी सम्पत्ति बच्चों को बता नहीं सके, उन्हें क्यों नहीं जिला दिया? सास ने कहा– देखो विश्वास किया जाता है, तभी फल मिलता है। बहू बोली–
जवन वस्तु जहवाँ पै होइहैं, तहवाँ खोजो भाई।
विस्वास किये पानी में मट्ठा मारे घिव निकले न भाई।।
कि बूढ़ा मावा अब तूँ बउरानिउ ना।।
अर्थात् जो वस्तु जहाँ है, वहीं खोजनी चाहिए। कितना भी विश्वास करके मथानी लेकर पानी मथो, क्या उसमें घी निकलेगा? माताजी! यह कुत्ता, शेर और देवी एक ही कलाकार की रचनाएँ हैं–
जवन मनइया कुकुर के बनाएसि, उहइ बाघ बनाई।
उहइ मनइया देवी के बनएसि, लतवा से लतियाई।।
कि बूढ़ा मावा अब तूँ बउरानिउ ना।।
जिस कारीगर ने एक पत्थर का कुत्ता बनाया, एक पत्थर को शेर का आकार दिया, उसी ने देवी को गढ़ा है। कारीगर जब पत्थर गढ़ते हैं तो उसे पैरों से दबाकर, कभी पानी लगाकर, छेनी-हथौड़ी से ठोंक-पीटकर मूर्ति बनाते हैं।
रही पतोहिया चातुर भैया, बूढ़ा के रही समुझाई।
कौनउ बस न चला बूढ़ा का, बूढ़ा चली टिन्नाई।।
कि बूढ़ा मावा अब तूँ बउरानिउ ना।।
जब कोई उत्तर न सूझा तो सास बिगड़ खड़ी हुई कि आज आयी है और हमार माई बन के बैठ गयी। देखत हौ, कइसन पटर-पटर बतियावत है। क्रोध से तमतमाते हुए सास घर चली गयी। वास्तव में मूर्तिपूजा की एक सीमा है–
मन्दिर है हरि की परछाईं, श्रद्धा–सुमन चढ़ाई।
घट मन्दिर जब पट खुल जाई, रहो बचन सरनाई।।
कि बूढ़ा मावा तूँ बउरानिउ ना।।
मन्दिर और मूर्तियाँ हमारी प्राथमिक पाठशालाएँ है, श्रद्धा जगाने के आरम्भिक केन्द्र हैं। यह हरि का प्रतिबिम्ब हैं। अबोध शिशुओं को इन मन्दिर-मूर्तियों तक ले जाकर मातायें कहती हैं कि यहाँ अगरबत्ती जलाओ, वहाँ प्रणाम करो, यह जरूरी है। प्रथम गुरु तो मातायें ही होती हैं। यहाँ श्रद्धा-सुमन चढ़ाना चाहिए लेकिन जब हृदयरूपी मंदिर के किवाड़ खुल जायँ अर्थात् जब भगवान हृदय से बोलने लगें, उस समय देखना चाहिए कि भगवान चाहते क्या हैं, कहते क्या हैं, इसे समझते जायँ और चलते जायँ। ‘रहो बचन सरनाई’– उस वचन का आश्रय लेकर चलना चाहिए। जब तक भगवान हृदय से रथी नहीं होते, नाम का जप और संत-महात्माओं की सेवा श्रद्धापूर्वक करते रहना चाहिए।
वास्तव में जिस देवी-देवता की लोग बाल्यकाल से पूजा-अर्चना करते आये हैं, उन्हें छोड़ नहीं पाते कि कहीं वे देवता नाराज न हो जायँ, कहीं संकट में न डाल दें। उनका ऐसा सोचना स्वाभाविक है किन्तु धर्म की सही जानकारी और सम्पूर्ण समाधान के लिए देखें भगवान श्रीकृष्णोक्त गीता की यथावत् व्याख्या ‘यथार्थ गीता’। संतों की सेवा तथा सत्संग से मार्ग प्रशस्त होता जायेगा– ‘प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।’ (मानस, ३/३४/८)
।। बोलिये, श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘भगवान और सद्गुरु’ से उद्धृत)