प्रश्न – सत्य क्या है और नश्वर क्या है?
उत्तर :- गीता के अध्याय दो में अर्जुन ने प्रश्न रखा, ‘‘गोविन्द! कुलधर्म सनातन है, कुलधर्म शाश्वत है, जातिधर्म ही सत्य है। ऐसे नरसंहार के पश्चात् कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जायेंगी, वर्णसंकर पैदा होंगे।’’ वह सामाजिक जीवन खान-पान, रहन-सहन, कुल, जाति, वर्ण को सनातन मानकर युद्ध से विरत होना चाहता था।
भगवान ने हँसते हुए से कहा, ‘‘अर्जुन! इस विषम स्थल में यह अज्ञान तुझे कहाँ से उत्पन्न हो गया। यह न कीर्ति बढ़ानेवाला है न कल्याण ही करने वाला है। न ही पूर्व के वरिष्ठ महापुरुषों ने भूलकर भी इसका आचरण किया, न प्रत्यक्षदर्शी महापुरुषों ने ही ऐसा आदेश दिया है। तुझे यह अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हो गया?’’
अर्जुन धर्म की रक्षा के लिए प्राण देने को तैयार है। वह कुलधर्म, जातिधर्म को शाश्वत सनातन धर्म मानता था, वह पिण्डोदक क्रिया लुप्त होने के विचार से बेचैन था, वह स्त्रियों को दूषित होने से बचाना चाहता था; किन्तु इन सामाजिक व्यवस्थाओं को भगवान ने अज्ञान कहकर सम्बोधित किया। आज की प्रचलित स्मृतियों में भी इतना ही कुछ लिखा है- जीने-खाने की पद्धतियाँ, नश्वर शरीर और उसके जीवनयापन की व्यवस्थाएँ। ‘अनार्यजुष्टम्’– श्रीकृष्ण ने कहा, यह अनार्यों का चरित्र तूने कहाँ से सीख लिया। गीता आर्यसंहिता है।
तब अर्जुन ने पूछा, ‘‘भगवन् ! आप ही बतायें कि सत्य क्या है?’’
भगवान बोले-
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।। गीता, २/१६
अर्जुन! सत्य वस्तु का तीनों कालों में अभाव नहीं है, उसे मिटाया नहीं जा सकता और असत् का अस्तित्व नहीं है, उसे रोका नहीं जा सकता, वह है ही नहीं। अर्जुन! आत्मा ही सत्य है और भूतादिकों के शरीर नाशवान हैं। प्राणीमात्र के शरीर नाशवान हैं।
नाशवानों की शृंखला में आता कौन-कौन है?-
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।। ८/१६
अर्जुन! सृष्टि के रचयिता विधाता और उनसे उत्पन्न यावन्मात्र जगत्, देव-दानव-मानव सभी पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं, दुःखों की खान हैं, क्षणभंगुर हैं; किन्तु मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। आत्मा, मेरा भक्त, ब्रह्म, पुरुषोत्तम, परमात्मा इत्यादि उस एक ही तत्त्व के सम्बोधन हैं, पर्याय हैं। शरीर नाशवान है इसलिये तू युद्ध कर! यह अलग प्रश्न है कि शरीर का कैसे अंत हो? युद्ध में विजय कैसे हो? यही तो गीता की सम्पूर्ण साधना है।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *