सनातन–धर्म (हिन्दू–धर्म)
प्रश्न– महाराजजी! आजकल हिन्दू–धर्म में अनेक रूढ़ियाँ, अनेक सम्प्रदाय प्रचलित हैं। सभी अपने को सनातनधर्मी कहते हैं। कृपया बताया जाय कि सनातन धर्म क्या है?
उत्तर– धर्म में समय-समय पर भ्रान्तियाँ पनप जाया करती हैं। सनातन-धर्म के नाम पर भी पनपती आयी हैं; किन्तु उन युगों में भी ऐसे महापुरुष होते आये हैं जो उस दलदल से समाज को निकालकर प्रशस्त पथ पर खड़ा कर देते हैं। भगवान राम ने यही किया। श्रीकृष्ण ने यही किया। बुद्ध, शंकराचार्य, कबीर, नानक, तुलसी सभी ने यही किया। आज भी कुछ रूढ़ियाँ प्रचलित हैं, भले ही उनका स्वरूप कुछ दूसरा है।
आज भी अधिकांश तथाकथित सनातनधर्मी नहीं जानते कि वस्तुतः सनातन-धर्म है क्या? देखा जाता है कि कोई पीपल की पूजा करता है, कहता है- सनातन-धर्म है। भूतों की पूजा, वह भी सनातन-धर्म, देवी-देवताओं की पूजा भी सनातन-धर्म, तीर्थों की पूजा भी सनातन-धर्म मानी जाती है। यहाँ तक कि तैंतीस करोड़ देवताओं की गणना किसी समय में हुई थी और अब भी वे पनपते, बढ़ते जा रहे हैं। भुइयाँ रानी, सन्तोषी माँ जैसी देवियों का सृजन होता जा रहा है। चित्रकूट क्षेत्र में लोमड़ी के बिल की पूजा होती है। एक विशेष पर्व पर कोल-भील उसकी पूजा करते हैं। मजीरा लेकर बिल के चारों ओर नाचते-कूदते गाते हैं- ‘लोहखरी के बिल से निकली भवानी लपलप टेबरी खाइयो माँ!’ अर्थात् लोमड़ी के बिल से भवानी निकलेगी और जो नैवेद्य (उबला हुआ महुआ) हम अर्पित करेंगे, वह लपलप सेवन करेगी और बदले में हम लोगों का कल्याण-साधन जुटायेगी।
इसी प्रकार नाग-पूजा, बैल-पूजा, हाथी-पूजा तथा कुत्ते की भी पूजा होती है। तुकाराम नामक एक मस्त महात्मा थे। एक बार उन्होंने भगवान को भोग लगाने के लिए भोजन तैयार किया। इतने में एक कुत्ता रोटी लेकर भाग चला। तुकाराम ने सोचा कि भगवान का भोग कुत्ता नहीं खा सकता। सिद्ध है कि भगवान ही कुत्ते का रूप धारण करके आये हैं। बस, घी का कटोरा लेकर कुत्ते के पीछे दौड़ पड़े कि- महाराज! रोटी सूखी है। आपके गले उतरेगी कैसे? घी तो लगा देने दें। भावावेश में दौड़ते रहे। वही तुकाराम बड़े अच्छे सन्त हुए। लोगों ने पूछा-महाराज! रोटी कौन ले गया था? तुकाराम बोले- विट्ठल भगवान ले गये। उसी दिन से कुत्ते की पूजा आरम्भ हो गयी। यह पूजन उन्होंने चलाया नहीं था, वे तो अपने भावावेश में थे।
गुरु गोविन्द सिंह ने परिस्थितियों से बाध्य होकर एक बाज पाला, जो इस बात का प्रतीक था कि जैसे एक बाज पक्षियों के झुण्ड पर टूट पड़ता है वैसे ही प्रत्येक बहादुर को बनना चाहिए। केवल इस प्रेरणा के लिए उन्होंने बाज को माध्यम बनाया था। उनके पश्चात् अब सिख जहाँ बाज देख लेते हैं, उसके सम्मान की भावना लोगों में उभर आती है। इस प्रकार महापुरुषों के नकल पर भी अनेक रूढ़ियाँ पनप जाया करती हैं।
प्रारम्भ में शास्त्रार्थ और दिग्विजय ही विद्वता का प्रमाणपत्र था। शास्त्र तो नपे-तुले हैं, उन पर कितना विवाद हो? शास्त्र के श्लोक कम पड़ने लगे तो गढ़े जाने लगे। किसी ने पूछा कि ये श्लोक किस शास्त्र के हैं, तो उत्तर मिला कि ब्राह्मण विद्वान् स्वयं रचयिता हैं, हमने स्वयं बनाये। दिग्विजय उन्हें मिली। श्लोक बनाने की परिपाटी ही चल निकली। मान्यताएँ बदलीं कि केवल वाणी के विवाद से क्या होता है? आचरण होना चाहिए। शास्त्रार्थ के साथ किसी ने सूर्य को एकटक देखा, कोई एक टाँग पर खड़ा रहा, कोई काँटे पर सो रहा, दिग्विजय उन्हें मिली। तपस्या का वास्तविक रूप न जाने कितनी दूर छूट गया। चमत्कारों से रूढ़ियों को बल मिला।
शिक्षा के अभाव में भी भ्रान्तियाँ जुड़ती गयीं। उस समय स्त्रियों और शूद्रों को पढ़ने का अधिकार नहीं था। वैश्यों को अधिकार तो था किन्तु चारों वर्णों की उदरपूर्ति के रोजगार से अवकाश कहाँ? चारणों ने क्षत्रियों की झूठी प्रशंसा से उन्हें अकर्मण्य बना दिया। सम्मान मिलता ही है तो क्यों पढ़ें? शिक्षा-दीक्षा केवल ब्राह्मणों की वस्तु रह गयी। आज की तरह उनकी पढ़ाई की जाँच करनेवाला कोई बोर्ड भी नहीं था। मनुस्मृति का उल्लेख है कि ब्राह्मण को बासी नहीं खाना चाहिए; किन्तु खोवे से बनी वस्तु या घी से निर्मित पकवान को घी मिलाकर, तलकर खा सकते हैं। वाह! हम मालपुआ खायें और हमारी हजारों पीढ़ी मालपुआ छानें। उस समय उन्होंने अपनी भावी विनाश को नहीं देखा; आज सभी अपना तेज भूल बैठे हैं। दोष उनका भी नहीं था। स्वच्छन्द हो जाने पर ऐसी भूलें होती ही हैं। उनके स्थान पर जो भी जाति होती वह भी यही सब करती।
अरबवालों का भारत पर आक्रमण हुआ। हिन्दुओं का भोजन चल रहा था कि एक मुसलमान उधर से आ निकला। कुहराम मच गया कि एक यवन ने चौके में पाँव रख दिया। पण्डितजी ने निर्णय दिया कि धर्म तो नष्ट हो गया। वे लोग दस फुट की दूरी पर भोजन कर रहे थे लेकिन धर्म नष्ट हो गया। उनके राम-कृष्ण सदा के लिए परिलुप्त हो गये। वे या तो अल्लाह-अल्लाह कहने लगे या आत्महत्या करके मर गये। धर्म के लिए वे मरना जानते थे, मिटना जानते थे लेकिन यह नहीं जानते थे कि धर्म है क्या? धर्म तो हो गया छुईमुई। हम तो जहर से नष्ट होंगे, शस्त्र से नष्ट होंगे लेकिन धर्म पाँव रखने से नष्ट हो गया। छुईमुई तो छू जाने पर मुरझाती है और हाथ हटाते ही पुनः विकसित हो जाती है किन्तु यह धर्म बिना छुए ही नष्ट हो गया और ऐसा नष्ट हुआ कि कभी भी विकसित नहीं होगा।
हिन्दुओं की इन कमजोरियों से मुसलमान अवगत थे। उन्होंने पाया कि हिन्दुओं को मारने की आवश्यकता नहीं है। केवल इनकी कमजोरियों का अध्ययन करो और उन्हीं स्थलों का स्पर्श करो, वे स्वतः चींख-चिल्लाकर कहेंगे कि अब क्या करें? धर्म तो नष्ट हो गया! वे स्वतः मुसलमान होने के लिए बाध्य हो जायेंगे; क्योंकि हिन्दू समाज फिर उन्हें स्थान नहीं देगा। हमीरपुर जिले में ऐसे ही पैंसठ गाँव मुसलमान हो गये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी थे। तीन-चार मुसलमान योजनाबद्ध होकर अर्धरात्रि में गाँव के एकमात्र कुएँ के आसपास छिप गये। उन्होंने सोचा कि कर्मकाण्डी ब्राह्मण यहाँ सबसे पहले स्नान करने आयेगा। आते ही पण्डितजी को उन्होंने पकड़ लिया। उनके सामने कुएँ का पानी खींचा, पीया और कुएँ में डाल भी दिया। पण्डितजी को दिखाकर रोटी का एक टुकड़ा भी उन्होंने कुएँ में डाला और पण्डितजी को अपने यहाँ ले जाकर एक कोठरी में बन्द कर दिया। चौबीस घंटे पश्चात् उन लोगों ने पण्डितजी से पूछा, ‘‘कुछ भोजन करेंगे?’’ पण्डितजी बोले, ‘‘कैसी बात करते हो। मैं ब्राह्मण हूँ, तुम यवन हो। तुम्हारा भोजन मैं कैसे कर सकता हूँ?’’ मुसलमानों ने पण्डितजी को छोड़ दिया। वे घबराये से गाँव में पहुँचे, पूछा-‘‘कुएँ का पानी तो किसी ने नहीं पी लिया?’’ लोगों ने कहा- ‘‘एक ही कुआँ है, रोज यहीं से पीते हैं। आज क्या हो गया?’’ पण्डितजी ने बताया- ‘‘इस कुएँ की जगत पर यवन चढ़ गया। उसने पानी पीया, जूठा जल और रोटी का एक टुकड़ा भी मेरे सामने डाला। अब तो तुम सभी धर्मभ्रष्ट हो गये। सनातन-धर्म में ऐसा कोई उपाय नहीं कि तुम शुद्ध हो सको।’’ इस अप्रिय व्यवस्था को सुनकर बहुतों ने आत्महत्या कर ली; किन्तु गाँव के गाँव कितने लोग आत्महत्या करते? बच्चे बड़े हुए तो उनसे कोई शादी-विवाह भी नहीं करना चाहता था। जीने के लिए कुछ तो करना ही था। विवश होकर मुसलमान बन गये। आज भी वे हल-मूसल-बाँस गाड़कर शादी-विवाह की रस्म अदा करते हैं। अन्तर इतना ही है कि शादी के समय एक मौलवी आता है, कलमा पढ़कर चला जाता है।
इसी तरह बंगाल का एक युवक था। तत्कालीन प्रथा के अनुसार आचार्य के यहाँ से अध्ययन पूर्ण करके घर लौट रहा था। रास्ते में नवाब का महल पड़ा। नवाब के साथ उसकी पुत्री बाहर का दृश्य देख रही थी। लड़की ने कहा, ‘‘अब्बाजान! जो युवक आ रहा है, इसके साथ मेरा निकाह करा दीजिए।’’ नवाब ने पूछा, ‘‘क्यों बेटी, तुम्हें यह पसन्द है?’’ वह बोली, ‘‘हाँ!’’ स्वस्थ सुन्दर युवक! नवाब ने बुलवाया, कहा, ‘‘हमारी लड़की से शादी कर लो।’’ युवक बोला, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? मैं ब्राह्मण हूँ, तुम म्लेच्छ हो।’’ युवक अकेला था। उसे कोठरी में बन्द कर दिया गया। युवक उस नवाब के यहाँ पानी भी नहीं पीता था। पानी पीने से धर्म नष्ट हो जाने का प्रश्न था। उपवास के नौवें दिन वह बेहोश हो गया। उसी बेहोशी में नवाब की लड़की ने फलों का रस पिलाया जिससे उसमें कुछ चेतना आ गई। युवक ने पूछा, ‘‘तुमने कुछ खिलाया तो नहीं?’’ लड़की ने कहा, ‘‘केवल फलों का रस पिलाया है।’’ युवक ने नाममात्र के लिए उससे निकाह किया और जान बचाकर वहाँ से भागा। युवक कश्मीर से कन्याकुमारी तक के धर्माचार्यों से मिला। अपनी समस्या रखी। तिथि निर्धारित कर एक गोष्ठी काशी में बुलाई गयी। देश के कोने-कोने से हजारों विद्वान् एकत्र हुए।
युवक ने सबको सम्बोधित करते हुए प्रार्थना के स्वर में कहा, ‘‘नवाब की लड़की ने धोखे से मुझे फलों का रस पिला दिया। मेरा दिल वही है, दिमाग वही है, रहन-सहन एवं आस्थाएँ सब कुछ पूर्ववत् हैं। मैं शुद्ध सनातनी हूँ। आप मेरे गुरुदेव हैं। आपका उत्तम शिष्य रहा हूँ। सभी विद्याएँ हमें उसी तरह याद हैं। मुझे यह कलंक न लगे कि मैं नष्ट हो गया।’’ वेद-शास्त्र उलटे गये। निर्णय मिला कि अब सनातन-धर्म में ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे तुम शुद्ध हो सको। युवक ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘आपलोग फिर से विचार कीजिए, हमारी आस्थाएँ वही हैं। हमारा कुछ भी बिगड़ा नहीं है। अनजान में केवल फलों का रस पिलाया गया। मेरा कोई दोष नहीं है।’’ तीन दिन तक पुनः शास्त्रार्थ चला और अन्ततोगत्वा वही निर्णय मिला कि अब सनातन-धर्म में तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है। युवक प्रतिशोध की भावना लेकर गया, नवाब की लड़की को रख लिया। नवाब ने अपनी नवाबी भी उसे दे दी। वह विद्वान् युवक हिन्दुओं की कमजोरियों से पूर्णतः अवगत था ही, उसने आदेश दिया कि हिन्दुओं को बलात् खिलाओ-पिलाओ, मन्दिर और मूर्तियों को ध्वस्त करो। भारत का वह सबसे बड़ा मूर्तिभंजक निकला। औरंगजेब से भी अधिक कट्टर उसने अपने को प्रमाणित कर दिखाया। उसका नाम ही लोगों ने काला पहाड़ रख दिया। कहा जाता है कि हिन्दुओं के साथ उसने बहुत ज्यादती की। ज्यादती उसने की या हिन्दुओं ने उसके साथ ज्यादती की?
विचार कीजिए, धर्म की शरण हम क्यों ग्रहण करते हैं? इसलिए कि हम दुर्बल हैं, धर्म सबल है। हम मरणधर्मा हैं लेकिन धर्म शाश्वत है। हम धर्म की शरण इसलिए ग्रहण करते हैं कि वह हमारी रक्षा करे, जन्म-मरण से छुटकारा दिलाकर शाश्वत ब्रह्म में स्थिति दिलाये। हम तो काटने से मरें, जहर से मरें और धर्म इतना गया गुजरा हो गया कि एक घूँट पानी पीने से, एक ग्रास चावल खाने से, रोटी के एक टुकड़े से नष्ट हो जाता है। जो फलों का रस पीने से नष्ट हो जाता है, वह हमारी रक्षा क्या करेगा? सिद्ध है कि वह धर्म नहीं, धर्म के नाम पर कोई रूढ़ि पनप रही थी जो धर्म की संज्ञा पा गयी।
अंग्रेज आये तो उन्होंने भी यही किया कि हिन्दुओं को किसी तरह अपने साथ खिलाओ-पिलाओ। ईसाई मिशनरियाँ इसके लिए अधिक सक्रिय थीं। बाँदा जिले के मानिकपुर के पास इसी प्रकार की मिशनरी है। वे कोल-भीलों को अपनाते हैं, उनके दुःख-दर्द में दवा-कपड़ा बाँटते हैं, फिर उन्हें खाना खिलाकर छोड़ देते हैं और सुविधा बन्द कर देते हैं। प्रचार करा देते हैं कि यह भील ईसाई बन गया। भील जब अपने समाज में आता है तो सुनने को मिलता है, ‘‘तै क्रिस्तान होईगा। देख मोर भड़वा न छुइहे।’’ अर्थात् मेरे बर्तन न छू देना। भोलीभाली जनता धर्म-कर्म क्या जाने। सब लकीर के फकीर! यह धारणा व्यापक रूप से प्रसारित हो चली। यहाँ तक कि शहरों से लेकर जंगलों तक, उच्च से निम्न श्रेणी तक, मद्रास से मरुस्थलपर्यन्त- जहाँ कई-कई मील पर घर होते हैं, सर्वत्र एक ही धारणा बन गई कि पात्र मत छूना। तुम ईसाई हो गये।
भारतीय अपने को जगद्गुरु, विश्वगुरु कहेंगे किन्तु भारत से बाहर समुद्र पार करने में धर्म चला जाता है। जब पार ही नहीं होंगे तब विश्वगुरु कैसे होंगे! वस्तुतः सनातन-धर्म इतना अगाध और उदार है, जिसके बल पर भारत विश्वगुरु कहलाता है। विश्व का मानव भारत की अध्यात्म विद्या का ऋणी है। वशिष्ठ, अगस्त्य इत्यादि महर्षियों ने विश्व का भ्रमण किया था। ऋग्वेद में वशिष्ठ की समुद्र-यात्रा का उल्लेख है। आज यहाँ तक रूढ़ियाँ फैलीं कि समुद्र पार मत करो अन्यथा धर्म नष्ट हो जायेगा। कोलम्बस से भी हजारों वर्ष पूर्व भारतीय सभ्यता का प्रचार अमेरिका में हो चुका था। वहाँ की प्राचीन प्रस्तर-मूर्तियों से ऐसा ज्ञात हुआ है। दक्षिण-पूर्वी एशिया तो पग-पग पर भारतीय सभ्यता से अनुस्यूत है। आज समुद्र-यात्रा से धर्म नष्ट हो जाता है।
ठीक इसी प्रकार की कतिपय रूढ़ियाँ श्रीकृष्णकाल में भी प्रचलित थीं। उनमें से एकाध रूढ़ि का शिकार अर्जुन भी था। दोनों सेनाओं के बीच में उसके रथ को जब योगेश्वर श्रीकृष्ण ने खड़ा कर दिया तो अर्जुन ने वहाँ अपना परिवार, मामा का परिवार, ससुराल का परिवार, सुहृद् और गुरुजनों को ही खड़ा पाया। अर्जुन ने केवल अपने परिवार और सम्बन्धियों को देखा और कुछ भी नहीं देखा। रोमांच हो आया, अश्रुपात होने लगा। बोला- अपने ही परिवार को मारकर मैं कैसे सुखी होऊँगा? कुलधर्म सनातन है- ऐसा युद्ध करने से सनातन-धर्म नष्ट हो जायेगा। कुलधर्म शाश्वत है- ऐसा युद्ध करने से शाश्वत-धर्म नष्ट हो जायेगा। कुलधर्म पुरातन है, पुरातन-धर्म नष्ट हो जायेगा। कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जायेंगी। स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर पैदा होगा, जो कुल और कुलघातियों को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। अतः हम लोगों को धर्मरक्षा के लिए कोई उपाय तुरन्त करना चाहिए। हमलोग समझदार होकर भी महान् पाप करने को उद्यत हुए हैं। हम भी भूल करते हैं- ऐसी बात नहीं, आप भी भूल करते हैं। श्रीकृष्ण को भी लांक्षित किया। ऐसा कहते हुए अश्रुपात करता अर्जुन धनुष का त्याग करके रथ के पिछले भाग में बैठ गया। बोला- गोविन्द! अब मैं युद्ध कदापि नहीं करूँगा।
तब योगेश्वर श्रीकृष्ण ने हँसते हुए-से कहा- अर्जुन! तुझे इस विषम स्थल में अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हो गया? जिस स्तर का युद्ध मैंने बताया है, उसकी समता का कोई स्थल दुनिया में है ही नहीं। तूने यह तर्क कहाँ से लाकर रख दिया? तुझे यह अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हो गया? क्यों, अज्ञान कैसा? अर्जुन तो सनातन-धर्म की रक्षा के लिए उद्यत था। क्या सनातन-धर्म की रक्षा भी अज्ञान है? श्रीकृष्ण कहते हैं- न तो श्रेष्ठ पुरुषों ने कभी इसका आचरण किया, न तो यह स्वर्ग को और न कीर्ति को ही देनेवाला है। अर्जुन जिसके लिए आहें भर रहा था, सम्भावित पुरुषों ने कभी उसका आचरण ही नहीं किया। यदि सनातन-धर्म वही होता तो श्रेष्ठ पुरुष उसका आचरण अवश्य करते। सिद्ध है कि वह सनातन-धर्म नहीं, मात्र अर्जुन का अज्ञान था।
अर्जुन ने प्रश्न किया- भगवन्! मैंने ऐसा सुना है कि कुलधर्म ही सनातन है। इसका पालनकर्ता ही वास्तविक सनातनधर्मी है। मैंने सुना भर है, देखा नहीं है। अब धर्म के रास्ते में मोहितचित्त मैं आपकी शरण हूँ, आपका शिष्य हूँ। मुझे वह उपदेश कीजिए, जिससे मैं परमकल्याण को प्राप्त हो जाऊँ। किन्तु भगवन्! स्वर्ग के साम्राज्य-स्वामित्व और धन-धान्यसम्पन्न पृथ्वी के अकण्टक साम्राज्य में भी मैं उस कल्याण को नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखानेवाले शोक को दूर कर सके। अतः इतना ही मिलेगा तो मैं युद्ध नहीं करूँगा। बल्कि यही लोग राज्य करें, हम भिक्षा पर ही निर्वाह कर लेंगे। (भीष्म, द्रोण इत्यादि गुरुजनों को मैं बाणों से कैसे मारूँगा? वस्तुतः आध्यात्मिक पक्ष ऐसा है जिसमें अन्त में ‘गुरु न चेला पुरुष अकेला’ रह जाता है। गुरु का गुरुत्व, ईश्वर का ईश्वरत्व शिष्य के अन्तराल में प्रवाहित हो जाता है। न गुरु ही विलग रहता है, न प्रभु ही। उनका पृथक् अस्तित्व अन्ततोगत्वा मिट जाता है। यही उनका मरना है।) अतः इसके आगे भी कोई सत्य हो तो उसे मेरे प्रति कहिए।
तब श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तू शोक न करने योग्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों-जैसी बातें भर करता है। पण्डितों की जानकारी से तू बहुत दूर खड़ा है। पण्डित लोग जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिए शोक नहीं करते और जो जीवित हैं, उनके लिए खुशी भी नहीं मनाते; क्योंकि आत्मा न कभी मरती है, न जन्म लेती है। यह केवल वस्त्र बदलती है। अर्जुन ने पूछा था- इसके आगे भी कोई सत्य हो तो कहिए। श्रीकृष्ण ने बताया कि आत्मा ही सत्य है। यह आत्मा परमसत्य है। आत्मा ही सनातन है। हमलोग कौन हैं? सनातनधर्मी! आत्मा शाश्वत है। हमलोग कौन हैं? शाश्वत-धर्म के अनुयायी! जो इस आत्मा को उपलब्ध करा देनेवाली प्रक्रिया नहीं जानता वह सनातन-धर्म का प्रत्याशी हो सकता है किन्तु सनातनधर्मी नहीं है। वह प्रक्रिया-विशेष सनातन धर्म की क्रिया कहलायेगी जिसके द्वारा उस आत्मा की प्राप्ति सम्भव है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इसी क्रिया को कर्म, निष्काम कर्मयोग के नाम से सम्बोधित किया है, जो यज्ञ की प्रक्रिया-विशेष है। इस आत्मा की प्राप्ति का वही एकमात्र उपाय है। मन के निरुद्ध अवस्था में ही उस आत्मतत्त्व का दिग्दर्शन सम्भव है।
श्रीकृष्ण ने कहा कि यह आत्मा अकाट्य है, अशोक्य है। वायु इसे सुखा नहीं सकता, पानी इसे गीला नहीं कर सकता, अग्नि इसे जला नहीं सकती, आकाश अपने में समाहित नहीं कर सकता। यह अजर, अमर, शाश्वत और अमृतस्वरूप है। जिसमें मृत्यु का प्रवेश नहीं होता। प्रकृति में उत्पन्न होनेवाली कोई भी वस्तु उस सनातन का स्पर्श ही नहीं कर सकती तो एक घूँट पानी पीने से अथवा रोटी का एक टुकड़ा खाने से वह सनातन नष्ट कैसे हो सकता है? वह अजर-अमर सनातन मर कैसे सकता है? सिद्ध है कि धर्म के नाम पर कतिपय रूढ़ियाँ प्रचलित हो गयी थीं। उन्हीं के चंगुल में फँसकर सनातन धर्म को माननेवाला समुदाय अस्त-व्यस्त हो गया। वस्तुतः वह सनातन-धर्म नहीं था। उसके नाम पर एक रूढ़ि पनप गयी थी।
जब सनातन शाश्वत आत्मा सबके अन्दर है ही तो ढूँढ़ा किसे जाय? शरीर के भीतर अजर-अमर-शाश्वत कोई वस्तु दिखाई तो नहीं पड़ती। रात-दिन शोक, सन्ताप और मृत्यु ही दिखाई देती है। श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! यह आत्मा अचिन्त्य है। जब तक चित्त और चित्त की लहर है तब तक वह आत्मा दिखाई नहीं देती। तब तक हमारे उपभोग के लिए आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है। अब चित्त का निरोध ही कैसे हो? उस चित्त निरोध की विधि-विशेष का नाम यज्ञ है। इसी यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म है, इस कर्म का आचरण ही धर्म है और यह धर्म अपरिवर्तनशील है अर्थात् धर्म कभी बदलता नहीं है। अर्जुन! वस्तुतः आत्मा ही अजर, अमर और शाश्वत है। प्रश्न उठता है कि आप कहते हैं इसलिए मान लें। श्रीकृष्ण समाधान करते हैं- ‘‘अर्जुन! आत्मा को इन विभूतियों से युक्त केवल तत्त्वदर्शियों ने देखा कि आत्मा सत्य है, यही परम सत्य है, शाश्वत और सनातन है।’’ किसने देखा? तत्त्वदर्शियों ने देखा! न किसी प्रोफेसर ने देखा, न दस भाषाओं के जानकार ने देखा, न किसी समृद्धशाली ने ही देखा। इन विभूतियों से युक्त आत्मा को केवल तत्त्वदर्शियों ने देखा।
अब एक नवीन प्रश्न खड़ा होता है कि तत्त्वदर्शिता क्या है? गीता अध्याय 18/51-55 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि तत्त्व की चाहवाले पुरुषों को चाहिए कि कर्म करें। संगदोष से अलग रहकर, इन्द्रियों को वासनाओं से भली प्रकार समेटकर, परम वैराग्य में स्थित रहते हुए, एकान्त-देश का सेवन करते हुए चित्त को ध्यान में लगावें। यह नहीं कि हम कुछ भी करते हैं तो कर्म करते हैं। इस योग में निश्चयात्मक क्रिया एक ही है। उस नियत विधि-विशेष की जानकारी होनी चाहिए। लक्ष्य वास्तविक होना चाहिए। दीर्घकाल तक सतत अभ्यास करते-करते मन इतना सूक्ष्म हो गया कि काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सर इत्यादि बाह्य प्रवृत्तियाँ अन्तःकरण से सर्वथा शान्त हो गयीं; विवेक, वैराग्य, ध्यान और समाधि उभरकर आ गये, पूर्णतः परिपक्व हो गये, उस समय वह साधक ब्रह्म को जानने योग्य होता है। आवश्यकता तो थी तत्त्व जानने की; किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं- ब्रह्म को जानने योग्य होता है, क्योंकि तत्त्व और ब्रह्म एक दूसरे के पर्याय हैं। इसी योग्यता का नाम पराभक्ति है। भक्ति अपनी पराकाष्ठा पर है, परिणाम देने की स्थिति में है। इस पराभक्ति के द्वारा ही पुरुष उस परमतत्त्व को जानता है।
उस समय परमतत्त्व जानने में तो आ जाता है; किन्तु वह तत्त्व है कैसा? श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! मैं जो हूँ, जिन विभूतियों से युक्त हूँ, अजर-अमर-शाश्वत-अव्यक्त जिन अलौकिक गुणधर्मों वाला हूँ उसको जानता है। अर्थात् भगवान जो हैं, जिन अलौकिक गुणधर्मों से संयुक्त हैं उनको जानता है और मुझको जानकर अर्जुन! तत्क्षण मुझमें ही प्रवेश कर जाता है। पहले तो भगवान जानने में आते हैं और दूसरे ही क्षण अपनी आत्मा को ईश्वरीय गुणधर्मों से भरपूर खड़ा पाता है। गोस्वामी तुलसीदासजी इसी स्थल के लिए संकेत करते हैं, ‘तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई।’– भगवन्! तुम्हारी ही कृपा से कोई-कोई ही तुम्हें पाते हैं। पाने पर उसका स्वरूप कैसा होगा? ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ (मानस, 2/126/3)- तुम्हें जानकर वह तुम ही बन जाता है। श्रुति है ‘ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मैव भवति’- ब्रह्म को जाननेवाला ब्रह्म ही हो जाता है। साधना की पूर्तिकाल में उस परमतत्त्व परमात्मा का जिसने दिग्दर्शन और स्पर्श किया तो उस क्षण उसे भगवान दिखाई पड़े किन्तु दूसरे ही क्षण वह अपनी आत्मा को ही ईश्वरीय गुणधर्मों से परिपूर्ण, अव्यक्त और शाश्वत की श्रेणी में पाता है। श्रीकृष्ण परमात्मा को ही परमतत्त्व मानते हैं, न कि पाँच तत्त्व या पचीस प्रकृति को!
तत्त्वदर्शी महापुरुषों ने, जिन्होंने भगवान को प्रत्यक्ष देखा, साक्षात्कार किया, उन्होंने देखा कि आत्मा ही परम सत्य है, आत्मा ही शाश्वत है, आत्मा ही सर्वत्र व्यापक है, इसके आगे कोई सत्य नहीं और यही सनातन है। अतः यदि हमें तत्त्व की चाह है, सनातन- धर्म की चाह है तो हमें आत्मा की प्राप्तिवाली प्रक्रिया-विशेष को समझना चाहिए और उस पर चलना चाहिए। आत्मानुभूति ही सनातन-धर्म है।
आत्मा देश में, विदेश में, यूरोप में, अमेरिका में, रहस्यमय सौरमण्डल एवं जो टापू खोज में न आये हों, उनमें भी सर्वत्र एक ही जैसी है, व्यापक है। सभी आत्माएँ उसी एक शाश्वत सत्ता की आशा करती हैं। यह बात अलग है कि संकटापन्न स्थिति में उस सत्ता की याद धुँधली पड़ जाय। अरबी भाषा में उसे खुदा कहते हैं। अंग्रेज उसी को ‘सुप्रीम गॉड’ कहकर पुकारते हैं, जिसे संस्कृत में ब्रह्म या परमात्मा कहते हैं। आत्मा सब में समान है। कोई यूरोप में पैदा हुआ हो अथवा विश्व के किसी कोने में, यदि वह उस आत्मतत्त्व की ओर अभिमुख है तो सनातनधर्मी है। आंग्ल भाषा के माध्यम से जल को वे ‘वाटर’ भले ही कह लें, ‘सुप्रीम गॉड’ कहकर वे उसी आत्मा की प्राप्ति करेंगे।
यदि हम आत्मा की प्राप्ति करा देने की प्रक्रिया से अवगत नहीं हैं तो हम सनातन- धर्म के प्रत्याशी भले हों, सनातनधर्मी नहीं हैं। जब तक भूत-प्रेत या इधर-उधर पूजाएँ करते रहते हैं तब तक हम सनातन-धर्म से अवगत नहीं हैं। इन्हीं रूढ़ियों में फँसकर छूने-खाने से नष्ट होने की घड़ी आई, जबकि आजकल कोई छूने-खाने से नष्ट नहीं होता। इसका कारण यह नहीं कि अब धर्म सबल है बल्कि लोग साक्षर हो गये हैं। वे पूछ बैठते हैं कि बताइये पण्डितजी! धर्म नष्ट कैसे हुआ? धर्म का स्वरूप क्या है? पण्डितजी तो यह भी नहीं जानते। चुप हो जाते हैं। अतः धर्म सबल नहीं हुआ बल्कि धर्म पर उँगली उठानेवालों का समूह बँट गया। छूने-खानेवाले लोग भी नहीं जानते कि वस्तुतः धर्म है क्या? कर्म है क्या?
अब यदि आपको उस क्रिया-विशेष को जानना है जिसका नाम धर्म है, सनातन आत्मा की प्राप्ति करनी है तो श्रीकृष्ण के शब्दों में तत्त्वदर्शी सद्गुरु के पास जाओ। निष्कपट भाव से सेवा और प्रश्न करके उन्हें प्राप्त करो।
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)