प्रश्न- मंत्रजप के लिए श्रद्धा या विश्वास का क्या प्रयोजन है?
उत्तर- श्रद्धा के बिना तो कुछ होता ही नहीं और इसका सार्थक प्रयोग मंत्रजप में है, सृष्टि में अन्यत्र कहीं नहीं। लोक-व्यवहार में माता-पिता, पति-पत्नी, गुरुजनों या उच्चाधिकारियों के प्रति श्रद्धा का प्रदर्शन देखने को मिलता है जिसके मूल में स्वार्थ ही प्रधान है किन्तु स्वार्थपूर्ति में विघ्न आते ही श्रद्धा तिरोहित हो जाती है। वास्तविक श्रद्धा परमात्मा या सद्गुरु के प्रति ही होती है; क्योंकि ‘हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।’ (रामचरितमानस, ७/४६/५)
भगवान श्रीकृष्ण ने ‘गीता’ में कहा–
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।। (१७/२८)
अर्जुन! बिना श्रद्धा के होमा हुआ हवन, दिया दान, तपा तप– सब व्यर्थ चला जाता है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं और ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।’ (५/३९)– परमात्मा के प्रति समर्पित उस ज्ञान को प्राप्त कर लेता है जिसे पाने के बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता। इसलिए प्रभुनाम के जप में श्रद्धा प्रथम अनिवार्य शर्त है।
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(‘नवयुवकों की जिज्ञासाऍं एवं भजन से लाभ’ से उद्धृत)