प्रश्न – क्या धर्म राष्ट्र तक ही सीमित होता है?
उत्तर :- राष्ट्र, नस्ल, प्रजाति, भाषा, भू-भाग, मज़हब या सम्प्रदाय इत्यादि के नाम पर भावात्मक एकता का संगठन है जो इसी तरह के दूसरे संगठनों से मनुष्य की अलग पहचान बनाता है। राष्ट्र तक आपकी सीमाएँ हो सकती हैं, धर्म की नहीं। जहाँ तक यह मानव-तन है, वहाँ तक धर्म का राष्ट्र है। उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक जहाँ भी मनुष्य है, उसके हृदय में जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि का भयंकर वेग चल रहा है। वह इन दुःखों का अन्त और सहज सुख की प्राप्ति की तलाश में है। मनुष्य के दुःखों का निवारण और सहज सुख की प्राप्ति का साधन होने से धर्म की सीमा मानव मात्र तक है। कदाचित् किसी ग्रह में मनुष्यों की और भी आबादी है तो उसके लिए भी यही धर्म है। मनुष्य दुःखी है। यदि दुःखी नहीं तो लड़ क्यों रहा है? लड़कर किसे सामने से हटा रहा है? हटा देने पर भी वह कुछ नहीं पाता, लेकिन गीता एक ऐसा युद्ध है जिसमें एक बार विजय मिल गयी तो उसके पीछे हार नहीं। विजय में शाश्वत धाम, अमृतमय पद है और यदि चिन्तन करते-करते इसके पूर्व ही शरीर का समय समाप्त हो गया और निवृत्ति नहीं हुई तब भी वह दैवी सम्पद् प्राप्त कर लेता है। ईश्वर-पथ में बीज का नाश नहीं है। इसका स्वल्प अभ्यास भी जन्म-मृत्यु के महान् भय से उद्धार करानेवाला होता है।
मानव मात्र का आदि धर्मशास्त्र गीता है। यह मानव-दर्शन है। भारत में इसका प्रादुर्भाव हुआ इसलिए यह भारतीयों का गौरव-ग्रन्थ है। भारत ने विश्व को जो अवदान दिया वह धर्मशास्त्र गीता है। विश्व के सभी धर्मशास्त्रों का उत्स गीता है। वेद इत्यादि ग्रन्थ गीता के ही विस्तार हैं; क्योंकि गीता पहले उतरी, वेदों का प्रादुर्भाव बाद में हुआ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में मैंने सूर्य से कहा। कल्प अर्थात् सृष्टि का आरम्भ! सूर्य ने अपने पुत्र आदि मनु से इसे कहा। दिया कुछ नहीं बल्कि जुबान से कहा। कही हुई वस्तु सुनकर हृदय में धारण की जाती है, अंतःकरण में इसी याददाश्त को स्मृति कहा जाता है। मनु ने इस स्मृति-ज्ञान को सबके लिये सुलभ कराने के लिए स्मृति की परम्परा दी। उन्होंने इस स्मृति को अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा। उनसे राजर्षियों ने जाना। इस महत्त्वपूर्ण काल से यह अविनाशी योग इसी पृथ्वी में लुप्त हो गया था। वही पुरातन योग अब मैं तेरे प्रति कहने जा रहा हूँ; क्योंकि तू मेरा प्रिय भक्त और अनन्य सखा है।
अर्जुन ने भगवान से अनेक प्रश्न किये। आपका जन्म अब हुआ, सूर्य का जन्म तो बहुत पुराना है, कल्प के आदि में आपने ही कहा था, मैं कैसे मान लूँ? वह प्रश्न-परिप्रश्न करने लगा। भगवान उत्तर देते चले गये। अंत में अर्जुन का समाधान हो गया। जो प्रश्न वह नहीं कर सकता था, जीव की समझ से बाहर थे, ऐसे कुछ प्रश्न भगवान ने स्वयं उठाये कि अर्जुन! जानते हो ईश्वर कहाँ रहता है? अंत में भगवान ने पूछा, ‘‘अर्जुन! क्या तुमने मेरे उपदेश को एकाग्रचित्त होकर श्रवण किया? क्या तुम्हारा मोह से उत्पन्न अज्ञान नष्ट हुआ?’’ तब अर्जुन ने कहा-
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।। गीता, १८/७३
प्रभु! अज्ञान से उत्पन्न मेरा मोह नष्ट हो गया। स्मृतिर्लब्धा– जो सूर्य से मनु, मनु से इक्ष्वाकु को स्मृति-परम्परा मिली थी, आज मैं उस स्मृति को प्राप्त हो गया हूँ।
उस युग में लेखन के साधन सुगम न थे। श्रुत अर्थात् सुनो और स्मृत अर्थात् याद रखो की परम्परा थी। अर्जुन ने कहा कि मैं उसी स्मृति को प्राप्त हुआ हूँ। मैं आपके आदेश का पालन करूँगा। उसने धनुष उठा लिया, युद्ध हुआ। अर्जुन की विजय हुई। एक धर्मसाम्राज्य की स्थापना हुई। युधिष्ठिर-जैसे धर्मात्मा नरेश अभिषिक्त हुए। एक धर्मशास्त्र गीता पुनः प्रसारण में आ गयी। इस प्रकार गीता आपका धर्मशास्त्र सृष्टि के आदि में थी, इक्ष्वाकु वंशज राम के समय त्रेता में थी, इसके पश्चात् गीता-ज्ञान विस्मृत हो चला तो भगवान श्रीकृष्ण ने इसे द्वापर में पुनः प्रकाशित किया। द्वापर में गीता धर्मशास्त्र के रूप में पुनर्प्रतिष्ठित हुई। पुनः इस पर प्रतिबन्ध लगे कि ‘‘महाभारत मत पढ़ो अन्यथा घर में महाभारत हो जायेगा। महाविनाश का ग्रन्थ है महाभारत!’’ जबकि महाभारत आपका संस्कृति शास्त्र है। परमात्मा का स्मरण करते हुए खान-पान, रहन-सहन, जीवन-यापन की विधि महाभारत में अंकित है, पूर्वजों की गौरव-गाथा है; किन्तु इस पर प्रतिबन्ध लगाया गया कि इसे पढ़ो ही मत, नहीं तो महाभारत हो जायेगा। इतना विशाल ग्रन्थ महाभारत है कि यदि इसे विधिवत् पढ़ा जाय तो एकाध वर्ष तो लग ही जायेंगे। इतने में परिवार में कोई घटना-दुर्घटना होना स्वाभाविक है। किसी का जन्म होगा या कोई बुजुर्ग वयोवृद्ध चल बसे तो दोष महाभारत-पाठ को दिया जाने लगा। महाभारत के अंतराल में ‘भीष्म पर्व’ में गीता है। जब महाभारत ही प्रतिबन्धित हो गया तो गीता कोई कैसे पढ़ता?
महापुरुषों ने गीता को महाभारत से निकाल कर स्वतंत्र पुस्तक बना दिया। तब गीता पर दूसरा प्रतिबन्ध लग गया कि यह तो संन्यासियों के लिये है। तुम्हारा लड़का गीता पढ़ेगा तो साधु-संन्यासी हो जायेगा। साधु तो लड़का होता, वयोवृद्धों को तो पढ़ने देते? प्रतिबन्ध लगा कि गीता घर में ही मत रखो, गीता देखो मत, पढ़ो मत- जबकि गीता आप सबका धर्मशास्त्र है। हमारा धर्मशास्त्र और हम ही न देखें! गीता-ज्ञान लुप्त होते ही अनेकानेक धर्मशास्त्र गढ़े जाने लगे। जिसके जो मन में आया धर्म के नाम पर रचना करने लगा, आदरणीय ऋषियों के नाम से उन्हें चलाने लगा। धर्म, कर्म, यज्ञ की नई-नई परिभाषाएँ बना दी गयीं। ‘तेरह कनौजिया चौदह चूल्हे’ की कहावत चरितार्थ होने लगी।
कन्नौजिया ब्राह्मणों की एक शाखा थी। एक स्थान पर अग्नि जला लिया, पुनः उसी से अग्नि लेकर तेरह भाइयों ने अपने अलग-अलग भोजन पकाये। एक दूसरे का छुआ नहीं खा सकते, अग्नि में भी पवित्रता का ध्यान- यह था उनका धर्म! असंख्य कुरीतियाँ, रीति-रिवाज धर्मशास्त्र गीता के विस्मृत होने का दुष्परिणाम है। इससे समाज बिखर गया। आपसी फूट और पृथक् राष्ट्र का कारण बन गया धर्म!
गीता आपका धर्मशास्त्र है। इसके होते हुए कोई सम्प्रदाय, कोई मज़हब, कोई कुरीति, धर्म कहलाने वाली कोई भ्रान्ति, उससे प्रेरित पृथक् राष्ट्र की माँग का सृजन हो ही नहीं सकता। धर्म का क्षेत्र राष्ट्र तक सीमित नहीं है बल्कि मानवमात्रपर्यन्त है।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *