गीता के आलोक में ‘अहिंसा’
सृष्टि के आदिज्ञान का लिपिबद्ध रूप भगवान श्रीकृष्णोक्त गीता है इसलिये आदिशास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता है। भगवान ने श्रीमुख से इसे शास्त्र घोषित किया- ‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।’ (गीता, १५/२०)- यह गोपनीय से भी अति गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसे जानकर तू समग्र ज्ञान, श्रेयपद की प्राप्ति, सदा रहने वाला धाम प्राप्त कर लोगे। अत: गीता आपका धर्मशास्त्र है। इसका प्रथम प्रसारण पृथ्वी पर हुआ और दूसरा प्रसारण भारत में (कुरुक्षेत्र में) हुआ; इसलिये विश्व-मनीषा का सम्पूर्ण धर्मशास्त्र केवल गीता है। जब-जब गीता विस्मृत हुई लोग संकट में पड़े और जब यह प्रकाश में आयी, भ्रान्तियों का निवारण हो गया, संकट दूर हो गये।
कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में कौरव-पाण्डव सेनाएँ व्यूहबद्ध हो गईं। अर्जुन ने कहा, ‘‘केशव! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलिए। मैं देख तो लूँ कि किन-किन के साथ मुझे युद्ध करना है।’’ सैन्य निरीक्षण करते ही अर्जुन काँप गया। वह बोला- भगवन्! मैं यह युद्ध नहीं करूँगा। भले ही शस्त्रधारी कौरव मुझे मार डालें, मरना श्रेयस्कर है किन्तु गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा। यह अधर्म है; क्योंकि ‘कुलधर्मा: सनातना:’– कुलधर्म सनातन है। युद्ध करने से सनातन धर्म नष्ट हो जायेगा। ‘जातिधर्माश्च शाश्वता:’– जातिधर्म शाश्वत है। युद्ध करने से शाश्वत धर्म नष्ट हो जायेगा। कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जायेंगी, वर्णसंकर पैदा होगा जो कुल और कुलघातियों को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। युद्धजनित भीषण नरसंहार से पिण्डोदक क्रिया लुप्त हो जायेगी, पितर भूखे रह जायेंगे। वह लगा तर्क देने।
अर्जुन ने कहा- हम लोग समझदार होकर भी महापाप करने जा रहे हैं, जो राज्य और सुख के लोभ में अपने ही कुल का संहार करने को उद्यत हैं। क्यों न हम इस पाप से बचने का विचार करें। मैं ही भूल कर रहा हूँ- ऐसी बात नहीं है, आप भी भूल करने जा रहे हैं, श्रीकृष्ण पर भी आरोप लगाया। अभी वह समझ में अपने को श्रीकृष्ण से कम नहीं आँकता। धनुर्वेद में अपने को कदाचित् इक्कीस ही मानता था। वह कहता है, भले ही कौरव न समझें; किन्तु हम-आप तो समझदार हैं। ऐसा कह धनुष-बाण त्याग रथ के पिछले भाग में बैठ गया।
अपनी समझ से अर्जुन अहिंसा का ही निर्वाह कर रहा था क्योंकि वह कई अरब लोगों की हत्या को बचा रहा था; किन्तु भगवान ने कहा- यदि तू इस धर्ममय संग्राम को नहीं करेगा तो स्वधर्म, कीर्ति और यश खोकर पाप को प्राप्त होगा। अर्जुन कहता है कि युद्ध करना पाप है, भगवान कहते हैं कि युद्ध नहीं करोगे तो पाप है। अत: विचारणीय है कि अहिंसा क्या है?
भगवान ने कहा- अर्जुन! पण्डितजन जिनके प्राण चले गये, उनके लिए भी शोक नहीं करते; क्योंकि शरीर की जैसे शैशव, युवा, प्रौढ़ तथा वृद्ध अवस्था होती है, वैसे ही अन्य-अन्य शरीरों की प्राप्ति होती है। एक शरीर छूटा, दूसरी अवस्था तैयार; इसलिए पण्डितजन शोक नहीं करते।
अर्जुन! शरीर नाशवान है, जिसका कोई अस्तित्व नहीं है। आत्मा ही सत्य है। शरीर क्षणभंगुर है, अनित्य है इसलिए तू युद्ध कर। सम्पूर्ण गीता में भगवान ने युद्ध का केवल एक औचित्य बताया कि शरीर नाशवान है इसलिये युद्ध कर। तो क्या पाण्डव-पक्ष के शरीर अविनाशी थे। आधे सगे-सम्बन्धी उधर थे तो आधे इधर। सभी सम्बन्धी ही तो थे। इस आदेश से यह स्पष्ट नहीं होता कि अर्जुन केवल कौरवों को ही मारे। उसे तो जहाँ शरीर दिखाई पड़ता, बाण चलाना चाहिए था। इसके अतिरिक्त क्या शरीर मारने से मर जायेगा?
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा–
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।। (गीता, २/२२)
भूतादिकों का स्वामी आत्मा शरीररूपी वस्त्र को त्यागकर नवीन शरीर धारण कर लेता है। शरीर एक वस्त्र है। आत्मा एक शरीर बदलकर दूसरा धारण कर लेता है। जीर्ण-शीर्ण वस्त्र बदलकर नवीन वस्त्र धारण कर लेता है, तो बच्चे क्यों मर जाते हैं? उन नये वस्त्रों को तो अभी विकसित होना था। वस्तुत: संस्कार ही शरीर की जीवनी शक्ति है। संस्कार दो दिन का है, तो शरीर दो दिन में ही जीर्ण-शीर्ण हो गया। संस्कार समाप्त तो शरीर धारण करने का कारण भी समाप्त हो जाता है इसलिये मारने-काटने से शरीर कभी नहीं मरेगा। शनै:-शनै: भजन करते हुए अन्तिम संस्कार का मिट जाना और शरीर धारण करने का कारण का मिट जाना एक साथ घटित होता है। कोई संस्कार रंचमात्र भी शेष है, जैसा संस्कार है वैसा पिण्ड तैयार हो जायेगा। शरीर मिलेगा। अत: अन्तिम संस्कार का कट जाना और शरीर होने के कारण का मिट जाना- यही शरीर का अन्त है। स्मृति पटल पर वही उद्वेग उठते हैं जो संस्कारों में होते हैं। संस्कार शेष नहीं है तो चित्तवृत्ति शान्त प्रवाहित हो जाती है। यह मन की निरोधावस्था है। इस निरोध के साथ ही शरीर होने के कारणों का निरोध हो जाता है और पुरुष परमतत्व परमात्मा को विदित कर लेता है। इस स्तर पर युद्ध पूर्ण होता है और शाश्वत विजय मिल जाती है। इस धारणा के अनुसार जीवों को मारने से कोई क्षति नहीं हुई। जीवात्मा को वस्त्र तो बदलना ही था। कैसी हत्या? क्या वस्त्र बदलना हत्या है? वस्त्र में प्राण है क्या? अत: विचार करें कि अहिंसा क्या है?
गीता के अनुसार, संसार में न कोई शत्रु है न मित्र। एक आत्मा ही सत्य है। विधाता और उससे उत्पन्न सृष्टि नश्वर है-
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।। (गीता, ८/१६)
सृष्टि के रचयिता विधाता और उनसे उत्पन्न यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील, दु:खों की खान और क्षणभंगुर है। काल व्यतीत होने पर ब्रह्मा भी लोकसमेत शान्त हो जाते हैं; किन्तु अर्जुन! मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। शरीरों की सीमा विधाता तक है।
वस्तुत: आत्मा ही सत्य है, परमतत्व है। यह सनातन पुरुष है, काल से अतीत अमृतस्वरूप है। इस आत्मा को विदित करने की नियत विधि (योग-विधि) का नाम यज्ञ है। इस यज्ञ में बहुत से योगी इन्द्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं, प्रश्वास को श्वास में हवन करते हैं और शनै:-शनै: ‘प्राणापान गती रुद्ध्वा प्राणायाम परायणा:’– श्वास-प्रश्वास की गति रोककर प्राणायाम कर ले जाते हैं। ज्ञानाग्नि, योगाग्नि, संयमाग्नि, श्वास-प्रश्वासाग्नि- यहाँ भौतिक अग्नि नहीं जलती। अग्नि तो दृष्टान्त मात्र है। जिस प्रकार अग्नि में प्रत्येक वस्तु भस्म हो जाती है, ठीक उसी प्रकार संयम एक अग्नि है जिसमें इन्द्रियों का बहिर्मुखी प्रवाह सदा के लिए शान्त हो जाता है। प्राणायाम एक ऐसी अग्नि है जिसमें प्राणों के व्यापार पर विराम लग जाता है। इस अवस्था में अन्त:करण में भले-बुरे उद्वेग नहीं उठते। यह चित्त की निरोधावस्था है।
सारांशत: योग-विधि यज्ञ है। इस योग-विधि को कार्यरूप देना कर्म है। कर्म का आशय है आराधना, कर्म का आशय है चिन्तन। कर्म पर प्रकाश डालते हुए भगवान ने कहा कि यह आत्मा को विदित कराता है। यही नियत कर्म है, यज्ञार्थ कर्म है। यज्ञ को क्रियान्वित करना ही कर्म है। ‘अन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:’– यज्ञ के अतिरिक्त अन्य जो कुछ भी किया जाता है, इसी लोक का बन्धनकारी कर्म है। यह कर्म ‘मोक्ष्यसेऽशुभात्’- तुम्हें अशुभ अर्थात् संसार-बन्धन से मुक्ति प्रदान कर देगा।
अर्जुन! इस कर्म को किये बिना सृष्टि में कोई मुझे न प्राप्त कर सका है न भविष्य में कर पायेगा। हम कर्म करते ही रहेंगे अथवा कभी इससे छुटकारा भी मिलेगा? इस पर भगवान कहते हैं- कर्मों के परिणाम में जिसे आत्मा विदित है, जो आत्मतृप्त है, आत्मस्थित है, उस महापुरुष के लिये किञ्चित् भी कर्तव्य शेष नहीं है। उन्हें अब कर्म करने से न कोई लाभ है और न कर्म छोड़ देने से कोई क्षति ही है। फिर भी वह महापुरुष पीछेवालों के हित की इच्छा से भली प्रकार कर्म में बर्तते हैं। उनके लिए प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्त नहीं है। आगे कोई सत्ता है ही नहीं तो कामना किसकी करें? उनसे समानता करते हुए भगवान् ने अपना परिचय दिया, ‘‘अर्जुन! मुझे भी तीनों कालों में किञ्चित् भी प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्त नहीं है। कर्म करने से न मुझे कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि ही है, फिर भी मैं पीछेवालों के हित की इच्छा से भली प्रकार कर्म में बर्तता हूँ। यदि मैं सावधान होकर कर्म न करूँ तो समाज भी मेरा अनुसरण कर भ्रष्ट हो जायेगा। इस प्रकार महापुरुष से अपनी तुलना कर भगवान ने स्पष्ट किया कि वह योगेश्वर थे, सद्गुरु थे। पहले स्वरूप में स्थित महापुरुष का परिचय दिया, पुन: उससे समता करते हुए अपना परिचय दिया। यदि सावधान होकर वह महापुरुष कर्म न करें या मैं न करूँ तो समाज वैसा ही करने लग जाय। समाज वर्णसंकर हो जायेगा और मैं इस प्रजा का हनन करने वाला, मारने वाला बनूँ।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यमिमा: प्रजा:।। (गीता, ३/२४)
यदि महापुरुष सावधान होकर नियतकर्म में न लगें या लोगों को नियत कर्म में प्रवृत्त न करें तो सारी प्रजा का हनन करनेवाला बनें। साधना में चलकर उस मूल अविनाशी की प्राप्ति जीवन है और प्रकृति में भटक जाना मृत्यु है। यदि महापुरुष प्रजा को क्रिया-पथ पर नहीं चलाता तो वह सबका हत्यारा है, हिंसक है और स्वयं चलते हुए दूसरों को चलाता है, वह शुद्ध अहिंसक है। गीता के अनुसार शरीर का निधन (नश्वर कलेवरों का निधन) मात्र वस्त्र परिवर्तन है, हिंसा नहीं।
संसार में स्त्रियों के स्वैराचार से वर्णसंकर सुना जाता है; किन्तु यह कैसा वर्णसंकर कि कोई स्वरूप में स्थित महापुरुष कर्म में बरतते हुए आपसे न कराये तो आप वर्णसंकर हो जायेंगे? वस्तुत: ‘हंसा तू सुबरन बरन’– इस आत्मा का वर्ण सुबरण- जो शाश्वत नित्य तत्व है, वही वर्ण है। ‘ईश्वर अंस जीव अबिनासी’– जो उस नित्य स्वरूप की ओर अग्रसर था, उसमें भ्रम उत्पन्न हो जाता है, वह प्रकृति में भटक जाता है, यही वर्णसंकर होना है। मैं वर्णसंकर का कर्ता और प्रजा का हनन करनेवाला बनूँ। अत: आत्मपथ की ओर उन्मुख होना अहिंसा है और आत्मपथ से वंचित होना, विकारों में भटक जाना हिंसा है। शुद्ध अहिंसक वे महापुरुष हैं जिन्होंने आत्मा विदित कर लिया है और जो उस पथ पर स्वयं चलते हुए दूसरों को भी चलाने की क्षमता रखते हों।
गीता के अध्याय अठारह, श्लोक तेरह-चौदह में भगवान कहते हैं कि अर्जुन! शुभ एवं अशुभ प्रत्येक कार्य के होने में पाँच कारण हैं- कर्ता, न्यारे-न्यारे करण, नाना प्रकार की चेष्टाएँ, आधार एवं दैव। कर्ता यह मन है। नाना प्रकार के करण (यदि शुभ पार लगता है तो श्रद्धा, समर्पण, एक ब्रह्म में निष्ठा, धारणा-ध्यान-समाधि, इन्द्रियों का संयम, मन का दमन, एकाग्रता- ये करण हैं। इनके द्वारा आप उधर कार्यरूप लेंगे। यदि अशुभ पार लगता है तो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर- षड् विकार, अनन्त इच्छाएँ, अनन्त वासनायें- ये करण होंगे। इच्छाएँ अनन्त हैं किन्तु वही इच्छा गतिशील होती है, कार्यरूप लेती है जिसे आधार और अवसर मिल जाय। पाँचवाँ हेतु दैव है। शुभ अथवा अशुभ कार्य के होने में यही पाँच माध्यम हैं।
इतने पर भी जो कैवल्यस्वरूप, कल्याण-तत्व परमात्मा को कर्ता कहता है, वह मूढ़बुद्धि यथार्थ नहीं जानता अर्थात् भगवान नहीं करते; किन्तु अठारह अक्षौहिणी जनसमूह में अर्जुन ऐसे धरातल पर खड़ा था जिसके लिए भगवान स्वयं ताल ठोंककर खड़े हो गये कि ‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’- अर्जुन! तू निमित्त मात्र बनकर केवल खड़े रहो। कर्ता-धर्ता तो मैं हूँ। विजय तुम्हारी होगी। ये मेरे द्वारा मारे हुए मृतकतुल्य हैं। इन मृतप्राय लोगों को मार। यश प्राप्त कर। कार्य मैं कर दूँ और यश तू ले ले कि विजय अर्जुन ने दिलायी। यहाँ पर भगवान अर्जुन के लिये खड़े हो गये।
साधन-पथ में एक सीमा-रेखा है। जब तक साधक उसके नीचे रहता है, प्रकृति कार्य करती है, मनचाहा नाच नचाती है उसके लिए यही पाँच कारण होते हैं। साधक प्रकृति और पुरुष के मध्य की आधी दूरी तय कर लेता है, उसके पश्चात् कर्ता-धर्ता भगवान हो जाते हैं। साधक तो केवल निमित्तमात्र, यंत्रमात्र होकर रह जाता है। उसके द्वारा जो पार लगता है, उन प्रेरक प्रभु की देन होती है; किन्तु श्रम साधक को ही करना पड़ता है- इसलिये युद्ध कर किन्तु उसके द्वारा जो पार लग जाता है, वह उन रक्षक प्रेरक प्रभु की देन है; किन्तु प्रत्येक दशा में युद्ध करना है, विकारों को मारना है।
अध्याय १८/५५ में वे कहते हैं- अर्जुन! तुम मेरे इस आदेश का पालन करोगे तो इन्द्रियों के सम्पूर्ण दुर्गों को भली प्रकार पार कर जाओगे और यदि अहंकार या मोहवश मेरे आदेश को नहीं मानोगे तो विनष्ट हो जाओगे। अर्थात् युद्ध न करनेवाला विनष्ट है, आदेश केवल युद्ध का है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘अर्जुन! आत्मा ही शत्रु और आत्मा ही मित्र है। जिन पुरुषों के द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ जीती गई हैं उनके लिये उन्हीं की आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बर्तती है, परमकल्याण करनेवाली होती है और जिन पुरुषों के द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ नहीं जीती गई हैं उनके लिए उन्हीं की आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बर्तती है; अधोगति, नीच योनियों में फेंकने वाली होती है। इसलिये पुरुष को चाहिए कि अपने द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार करे; आत्मा को अधोगति में न जाने दे। आत्मा का उत्कर्ष ही अहिंसा है और आत्मा का हनन ही हिंसा है।
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयश:।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा:।। (गीता, १०/५)
दैवी सम्पद् को प्राप्त पुरुष के लक्षण बताते हुए अहिंसा शब्द का प्रयोग है (गीता, १६/२)। इसी प्रकार तप में प्रवृत्त पुरुष के लक्षणों में अहिंसा है (गीता, १७/१४)। यहाँ अध्याय दस में योगेश्वर कहते हैं कि मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, परमात्मा की जागृति, प्रकृति से निर्भयता और अहिंसादि भाव मुझसे होते हैं। प्रेरक के रूप में जब वे स्वयं खड़े होते हैं तभी सिद्ध होते हैं। आन्तरिक साधनाओं में एक अहिंसा भी है। अहिंसा का बाह्य जगत् में कोई उपयोग नहीं है। अहिंसा सुमिरन से सिद्ध होने वाला अन्तर्मन का एक संयम है। यह योग-साधना का अंग है। सामाजिक व्यवहार का यह शब्द ही नहीं है। समाज में जो अहिंसा, अहिंसा करते हैं किसी जीव को मत सताओ, ऐसा मत करो- एक भ्रान्ति है। धर्म के सही व्याख्याकारों के अभाव में भ्रान्तियों का सृजन हो जाया करता है। वस्तुत: आत्म-परिणाम की रक्षा अहिंसा है- जिस साधना का परिणाम आत्म-साक्षात्कार है। उसमें विघ्नकारक विकारों का सक्रिय होना हिंसा है और इन विकारों का अन्त करना अहिंसा है।
आप सब अपना मूल धर्मशास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य ‘यथार्थ गीता’ देखें, अभ्यास करें। अहिंसा की यह अवस्था संयम सधते ही आप सबमें सहज ही आ जायेगी।
।। ॐ ।।
(‘अहिंसा का स्वरूप’ से उद्धृत)