प्रश्न- एक बार एक वृद्ध सज्जन विनीत शब्दावली में अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए प्रार्थना करते हैं कि- महाराजजी! जीवन पर विचार करने से सर्वाधिक पाप ही दिखाई पड़ता है। इसलिए अब कल्याण-हेतु मृत्युपर्यन्त मैंने अवध में ही निवास करने का निश्चय किया है। कारण कि अवध में शरीर-त्याग करने से आवागमन के बन्धन टूट जाते हैं। जैसा कि-
चारि खानि जग जीव अपारा।
अवध तजें तनु नहिं संसारा।। (मानस, 1/34/4)
उत्तर- मेरी भी यही धारणा है कि अवध में शरीर-त्याग करने से पुनर्जन्म नहीं होता; परन्तु वह अवध ही दूसरा है। जैसा कि हमने अनेकों बार बताया है कि यह मानस है। मानस का तात्पर्य मन से है। रामचरितमानस में वही अंकित है जो प्रायः सबमें प्रसुप्त एवं किसी-किसी में ही जागृत रहता है। रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामीजी ने गम्भीरतम विषय को छिपाकर लिखा है, ताकि उपयुक्त अधिकारी प्राप्त कर लें और अनधिकारी प्रयास करें। मानस में चर्चित अवध का तात्पर्य इस प्रकार है- वध कहते हैं नाशवान् को, मरणधर्मा को और अवध कहते हैं जिसका वध न किया जा सके अर्थात् अनश्वर हो।
यह भगवान के साथ मिलनेवाली भगवत् रहनी है, जो काल से अबाधित है। साधक के हृदय में जब भगवत्-तत्त्व का संचार होता है तो उस समय यह विघ्नसहित है। उसी की प्रेरणा से सम्पूर्ण विकारों के शमनोपरान्त जब रामराज्य की स्थिति का अभ्युदय हो जाता है, तत्क्षण सेवक का कार्य समाप्त हो जाता है और स्वामी की ही रहनी मात्र शेष रह जाती है। भूखण्डों में कहीं भी अजर-अमर होने का प्रमाण नहीं मिलता और न तो ऐसा सम्भव ही है। अब आइए प्रश्न की प्रवेशिका पर कि जिस महापुरुष की यह वाणी है उन्होंने राम के साथ अवध को चलता-फिरता धाम कहा है-
अवध तहाँ जहँ राम निवासू।
तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।। (मानस, 2/73/3)
जहाँ सूर्य प्रकाशित है वहीं दिन है और जहाँ राम हैं वहीं अवध है। यथार्थतः राम तो सर्वत्र हैं परन्तु प्रेममयी साधना द्वारा ही किसी-किसी के हृदय-देश में प्रगट हुआ करते हैं और उस राम के प्रगट होते ही अवध की स्थिति आ जाती है। उस अवध्य स्थिति में, शरीर का चाहे जब जहाँ भी परित्याग कर दिया जावे किन्तु मृत्यु से सम्बन्ध नहीं रहता। केवल शारीरिक निधन ही मृत्यु नहीं कहलाती।
अवध प्रभाव जान तब प्रानी।
जब उर बसहिं राम धनु पानी।। (मानस, 7/96/7)
अवध का प्रभाव, जैसा कि अजर-अमर कर देने की विशेष योग्यता है, वह मानव के लिए तभी प्रत्यक्ष होता है अर्थात् पुरुष तभी जान पाता है जब इष्ट (राम) की स्थिति ध्यान के माध्यम से हृदय में आ जाय। क्योंकि जहाँ राम रहते हैं वहीं अवध है। अतएव जब तक राम की स्थिति नहीं मिल जाती, तब तक अवध में प्रवेश नहीं कर सकते। याद रखें- ईश्वर का निवास स्थान हृदय है। उन्होंने जब कभी भी विश्राम करने के लिए स्थान पाया है तो हृदय में ही, अन्यत्र कहीं नहीं। समस्त विकारों के शमनोपरान्त आकाशवत् निर्विकार स्थिति द्वारा हृदय-देश में राम के आने का समय हो गया अर्थात् स्थिति वहाँ तक पहुँच गयी, जहाँ कि राम के साम्राज्य का स्थान है। अब आप यह स्मरण रखें कि भगवान का निवास स्थान हृदय है। हम चिन्तन के द्वारा ज्यों-ज्यों इष्ट के करीब होंगे, त्यों-त्यों भयरहित अवध्य स्थिति का संचार हृदय-देश में प्रसारित होने लगता है; किन्तु राम की पूर्ण स्थिति जिस क्षण इस शरीर के अन्दर आ जायेगी, उसी समय यह सम्पूर्ण शोभा की खानि हो जाती है। यही जीवात्मा अवध्य हो जाती है। इसलिए-
अवधपुरी प्रभु आवत जानी।
भई सकल सोभा कै खानी।। (मानस, 7/2/9)
जहाँ राम निवास करते हैं वहाँ अवध्य स्थिति का प्रसार हो जाता है। जब भगवत्-प्राप्ति की स्थिति में आ जाते हैं तो यह शरीर स्वतः सम्पूर्ण शोभा की खानि बन जाता है और इससे अवध्य स्थिति का चित्रण होने लगता है। इष्टदेव के शब्दों से ही इस स्थिति की जानकारी प्राप्त होती है। अन्यत्र इससे अवगत होने का कोई उपाय नहीं है। इसीलिए राम समझाते हुए कहते हैं कि-
सुनु कपीस अंगद लंकेसा।
पावन पुरी रुचिर यह देसा।। (मानस, 7/3/2)
यह प्राप्ति-स्थिति अत्यन्त पुनीत, रमणीय एवं अलौकिक है। यद्यपि सर्वत्र बैकुण्ठ की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है परन्तु अवध सदृश मुझे वह भी प्रिय नहीं है। इस मार्मिक प्रसंग को कोई विरला ही समझ सकता है। बैकुण्ठ, कामधेनु, अमृत इत्यादि यौगिक शब्द हैं। इन शब्दों के माध्यम से महापुरुषों ने इष्ट के सामीप्य की ऊँची-नीची अवस्थाओं को व्यक्त किया है। इसलिए अंगद कहता है कि- अरे बुद्धिहीन रावण! क्या बैकुण्ठ कोई नगरी बसी हुई है, जहाँ पहुँचकर डेरा डाल दोगे? कुण्ठ कहते हैं किनारे को अर्थात् जो माप-तौल में आ सके एवं बैकुण्ठ कहते हैं बेहद को, जिसका किनारा न मिल सके। जब तक साधक का चिन्तन माप-तौल के अन्दर है (2 घण्टे, 4 घण्टे या 8 घण्टे चलता है) अतः संख्या निर्धारित हो जाने से कुण्ठित है अर्थात् किनारा मिल गया। यदि वही भजन धारावाही होने लगे (जिसमें माप-तौल, किनारा आदि नहीं होते) तो यही स्थिति बेहद या बैकुण्ठ कहलाती है।
यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ। (मानस, 7/3/4)
इस प्रसंग को कोई-कोई ही जान पाता है। जिसके अन्दर यह स्थिति प्रत्यक्ष आ जाती है उसी के लिए जानने का विधान है। आगे-
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी।
मम धामदा पुरी सुख रासी।। (मानस, 7/3/7)
जो क्रमशः साधना-पथ में चलकर अवध्य स्थिति प्राप्त कर लेता है वह मुझे अत्यन्त प्रिय होता है, जैसे कि प्राण। जब तक भगवान का स्वरूप हृदय-देश में प्रगट नहीं होता तब तक अवध का प्रभाव एवं स्वरूप ही पकड़ में नहीं आता। अवध्य स्थिति एवं इसका प्रकटीकरण एक दूसरे के पूरक हैं अर्थात् स्वरूप के साथ ही साथ अवध्य स्थिति भी तत्क्षण प्राप्त हो जाती है। पुनश्च-
उत्तर दिसि बह सरजू पावनि। (मानस, 7/3/5)
यजनपूर्ण स्वर ही सरयू है। उत्तर दिशा का तात्पर्य है ऊर्ध्वरेता या उपराम। इस प्राप्तिकाल में यजनपूर्ण स्वर ऊर्ध्वरेता अथवा उपराम हो जाता है। ऐसी स्थितिवालों का मज्जन व संग करनेवाले मेरा सामीप्य पाते हैं।
हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी।
धन्य अवध जो राम बखानी।। (मानस, 7/3/8)
ऐसा सुनकर सब हर्षित हुए एवं विशेष अवध से अवगत होकर बोले कि वह अवध धन्य है जिसकी प्रशंसा राम ने स्वयं की है। इसलिए सिद्ध है कि अवध बहुत हैं। महात्मा तुलसीदास इन त्रुटियों से अवगत थे, इसीलिए कल्याणकारी अवध पर बारम्बार क्रियात्मक युक्तियों द्वारा विशेष बल दिये हैं, जिससे कि मानव अपने जीवन में अवध के परिणाम का सही उपयोग कर सके। जब रामराज्य अवध में स्थापित हो गया तो उस विशेष रामराज्य की स्थिति का चित्रण करते हुए व्यक्त किया गया है।
गरुड़ का सन्देह इतना बढ़ा कि कहीं उसका निवारण न हो सका। वे नारद, शंकर आदि के पास से होते हुए कागभुशुण्डि के पास जा पहुँचे। उनका सम्पूर्ण सन्देह आश्रम एवं महापुरुष के दर्शन से ही प्रायः दूर हो गया। कारण कि वे महापुरुष राम के अनन्य भक्त एवं प्रत्यक्षदर्शी थे। वे ही प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष जिस अवध में राम का राज्य है उसका चित्रण करते हुए कहते हैं-
जब ते राम प्रताप खगेसा।
उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।।
पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका।
बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।। (मानस, 7/30/1-2)
हे गरुड़जी! वह रामराज्य क्या था, वह एक प्रकार का प्रचण्ड सूर्य प्रगट हुआ था जिससे तीनों लोकों में पूर्ण प्रकाश छा गया। उस प्रकाश में बहुतों को सुख हुआ एवं बहुतों को दुःख।
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी।
प्रथम अबिद्या निसा नसानी।।
अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने।
काम क्रोध कैरव सकुचाने।। (मानस, 7/30/3-4)
जिन्हें शोक हुआ, उनका वर्णन सुनें-
प्रथम तो अविद्यारूपी निशा का सदा के लिए अन्त हो गया एवं अविद्या में पलनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गये अर्थात् मायिक प्रवृत्ति का नाश हो गया। जो विकसित हुए, उनका वर्णन करते हुए कहते हैं कि-
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना।
ए पंकज बिकसे बिधि नाना।। (मानस, 7/30/7)
धर्मरूपी तालाब में विवेक, वैराग्य, शम, दम इत्यादि ईश्वरोन्मुखी प्रवृत्ति पूर्णरूपेण विकसित हो गयी अर्थात् इष्टोन्मुख समस्त सद्गुणों का विकास हो गया; किन्तु इस रामराज्य की स्थापना जिस अवध में हुई, वह है कहाँ?
यह प्रताप रबि जाकें, उर जब करइ प्रकास।
पछिले बाढ़हिं प्रथम जे, कहे ते पावहिं नास।। (मानस, 7/31)
रामराज्य का यह प्रकाश जिसके हृदय में जिस समय व्याप्त हो जाता है तब पीछे दर्शाए गये सभी इष्टोन्मुखी सद्गुणों का पूर्णतया विकास हो जाता है और अधोगति में ले जानेवाले मायिक दुर्गुण समूल नष्ट हो जाते हैं।
अब स्पष्ट हुआ कि राम के साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली अबाध्य स्थिति ही अवध है, जो हृदय में प्रत्येक प्रयत्नशील (साधक) के लिए सम्भव है। यह इष्ट की स्थितिवाले किसी महापुरुष के अन्तर्देश की स्थिति है। वे जिस किसी को हृदय से पथ-प्रदर्शन करने लगे उसी के लिए सुलभ हो जाता है। इस अवध की स्थिति की जानकारी वे इष्ट स्वयं कराते हैं। कारण कि वह परमात्मा मन-बुद्धि के क्षेत्र से सर्वथा परे है। यह क्रमशः चलनेवाला क्रियात्मक पथ है, जहाँ परामर्श का स्थान नहीं। यदि जीते-जी किसी को यह स्थिति मिल गयी तो वहाँ मृत्यु का प्रश्न ही नहीं खड़ा होता।
चारि खानि जग जीव अपारा।
अवध तजें तनु नहिं संसारा।। (मानस, 1/34/4)
चारों खानियों में जो अपार जीव-श्रृंखला है उसमें से यदि कोई इस अवध को पाकर त्याग दे, तो उसका आवागमन नहीं होता। आपको इस प्रकार की संकीर्ण भावना नहीं रखनी चाहिए। वृद्धा और युवावस्था का भगवत्-पथ में कोई विशेष बन्धन नहीं है। भाग्य से ही ऐसी भावना आपके अन्तःकरण में जागृत हुई है। यदि आपको फलदायी अवध में पहुँचना है तो श्रम करिये। क्रियात्मक ढंग से ही लाभान्वित होना संभव है, किसी अन्य माध्यम से नहीं।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)