प्रश्न– महाराजजी! समुद्र के जलचर समुद्र से भी बड़े एवं असंख्य थे तो वे रुके कहाँ? सतयोजन समुद्र के बराबर एक–एक जलचर का शरीर था और कुछ तो इतने बड़े थे कि उन्हें खाने की क्षमता रखते थे।
उत्तर– विषयरूपी जल से परिपूर्ण यह संसार ही समुद्र है। यदि हम कुछ नहीं करते तो यह अथाह समुद्र है; किन्तु ज्यों-ज्यों चिन्तन में लगते जायेंगे, इसका आयतन भी घटता जायेगा।
सतयोजन तन– सत्य में आयोजित प्रक्रिया की पूर्ति कर लेने पर संसार या भव का पार मिल जायेगा। वैराग्य एवं अनुभवकाल में यही इस समुद्र का आयतन है। जब ‘लव’ में अंकुर आना बन्द हो जाता है तब-
गोपद सिन्धु अनल सितलाई।। (मानस, 5/4/2)
जितना हमारी इन्द्रियों का विस्तार है, उतना ही समुद्र है। लगनकाल में इन इन्द्रियों के एक-एक हरकत पर नियंत्रण रहता है, पूर्व में नहीं। वही नाम-यजन जब परावाणी के पूर्तिकाल में पहुँच जाता है, तब यही समुद्र सूख जाता है। जैसा कि- नाम लेत भवसिन्धु सुखाहीं। (मानस, 1/24/4)
नाम इतना ही नहीं है जितना कि हम लोग जुबान से कहते हैं। यह तो उसकी प्रारम्भिक अवस्था है। आगे चलकर यही नाम सूक्ष्म हो जाता है, परन्तु उसकी जानकारी का पैमाना इष्ट-प्रेरणा पर आधारित रहता है। जब तक अनुभवी सद्गुरु नहीं मिलते तब तक नाम की सूक्ष्म जानकारी असम्भव है। अब सिद्ध हुआ कि संसार ही समुद्र एवं योगी की आत्मिक प्रवृत्ति ही जलचर है। जब हम भजन नहीं करते, तब आत्मा से मिलनेवाली प्रवृत्ति सबके हृदय-देश में छिपी रहती है और विषयरूपी जल का प्रवाह ऊपर छाया रहता है। दृष्टिगोचर न होने के कारण यही जलचर है। श्वास के निरोधकाल में यही यौगिक प्रवृत्ति ऊपर उठकर परिपक्व हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप विषय का वेग कम हो जाता है। एक-एक साधन इतना परिपक्व हो जाता है कि उसकी आड़ में विषयरूपी तरंग आती ही नहीं। उनके यौगिक नाम इस प्रकार दिये गये हैं-
मकर– करना मेरा कर्तव्य है और मुझे करना है।
नकर– करते हुए भी मैं कुछ नहीं करता हूँ। मैं मात्र यंत्र हूँ, करनेवाला कोई और है।
नाना झक ब्याला– इसी प्रकार की मानसिक भजनमयी प्रवृत्तियाँ हैं।
तिन्ह की ओट न देखिअ बारी।
मगन भये हरि रूप निहारी।। (मानस, 6/3/8)
ध्यान की मस्ती एवं स्वरूप का आभास तभी होता है, जबकि विषयरूपी वारि भजनमयी प्रवृत्तियों के प्रबल प्रवाह में पूर्णतया आवृत्त हो जाय। जब तक एक भी तरंग बाधक है, तब तक ध्यान की मस्ती नहीं मिल सकती। यह मानस है। सबके हृदय में छिपी हुई स्थितियाँ किसी महापुरुष के द्वारा ही जागृत होती हैं।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)