देवता

देवता

प्रश्नमहाराजजी! योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता में कहीं बाह्य देवताओं पर कटाक्ष करते हैं तो कहीं देवताओं की उन्नति करने को कहते हैं, ऐसा क्यों?

उत्तर गीता में देवताओं के दो रूप हैं। एक तो अन्तःकरण की प्रवृत्ति (दैवी सम्पत्ति) है। यह दैवी सम्पत्ति परमदेव परमात्मा के स्वरूप की ओर प्रेरित करनेवाली है। परमदेव का देवत्व यही अर्जित कराती है। यही परमतत्त्व में प्रवेश देती है, देव बनाती है; इसलिए यह इष्ट-प्रसारिणी सम्पत्ति ‘दैवी सम्पत्ति’ कहलाती है। तीसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में श्रीकृष्ण इसी सम्पत्ति को उन्नत बनाने का निर्देश देते हैं। विवेक, वैराग्य, शम, दम, एकाग्रता, धारावाही चिन्तन की प्रवृत्ति, वास्तविक जानकारी तथा अनुभवी संचार इत्यादि दैवी सम्पत्ति के चौबीस लक्षणों का सविस्तार निरूपण योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता के सोलहवें अध्याय में किया है। इन देवताओं के द्वारा परमदेव परमात्मा शनैः-शनैः सुलभ होता है। क्रमशः उत्थान करते-करते जब दैवी सम्पत्ति परिपक्व होती है तो अव्यक्त परमात्मा भी विदित हो जाता है।

दूसरे देवता वे हैं जिनका संसार में प्रचलन है। बहुत पहले की एक गणना के अनुसार उनकी संख्या तैंतीस करोड़ थी और अब तक तो न जाने कितने और हो गये हैं। भूत, भवानी, धात्री, सावित्री, भैरव, ब्रह्म बाबा, डीह, चौरा इत्यादि असंख्य देवता नित्य बनते हैं और कुछ काल में प्रसुप्त हो जाते हैं। इन्हीं की ओर इंगित करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि बहुत से लोग मुझे छोड़कर, कामनाओं से आक्रान्त होकर अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वह पूजा अविधिपूर्वक है (गीता, 7/20, 9/23)। उनके चिन्तन की विधि गलत है, इसलिए वे फल तो पाते हैं किन्तु मेरी प्राप्ति नहीं कर पाते। वे फल नाशवान् हैं, इसलिए उनसे कल्याण नहीं हो सकता। (गीता, 7/23)। देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजनेवाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा भक्त मुझको ही प्राप्त होता है (गीता, 9/25)। ब्रह्मलोक से लेकर सभी लोक पुनरावर्ती स्वभाववाले हैं; परन्तु कौन्तेय! मुझे प्राप्त भक्त का पुनर्जन्म नहीं होता। (गीता, 8/16)।

वस्तुतः देवताओं का परमदेव परमात्मा से स्वतन्त्र न तो कोई अस्तित्व है और न पृथक्-पृथक् उनकी कोई सत्ता ही है। केनोपनिषद् की कथा है कि उस परमेश्वर की शक्ति के बिना अग्नि एक तिनके को भी जला नहीं सकती, वायु उस तिनके को उड़ा नहीं सकता। इसी रहस्य पर प्रकाश डालते हुए सामवेदीय जाबालदर्शनोपनिषद् के चतुर्थ खण्ड में भगवान दत्तात्रेय ने साङ्कृति मुनि से कहा, ‘‘महामुने! बाह्य तीर्थ से श्रेष्ठ आन्तरिक तीर्थ ही है। शरीर के भीतर रहनेवाला दूषित चित्त बाह्य तीर्थों में गोता लगाने मात्र से शुद्ध नहीं होता, जैसे- मदिरा से भरा हुआ घड़ा ऊपर से सैकड़ों बार धोने पर भी ज्यों-का-त्यों ही रहता है। आत्मतीर्थ ही महातीर्थ है। आत्मतीर्थ प्राप्त पुरुष के सामने दूसरे तीर्थ निरर्थक हैं। मस्तक ही श्री शैल है, ललाट केदार तीर्थ है, नासिका और भौंहों के मध्य काशीपुरी है, दोनों स्तनों के स्थान पर कुरुक्षेत्र है और हृदय कमल में तीर्थराज प्रयाग है। मूलाधार में कमलालय तीर्थ है। जो शरीर के भीतर स्थित इन तीर्थों का परित्याग करके बाहर के तीर्थों में भटकता है, वह हाथ में रखे बहुमूल्य मणि को त्यागकर काँच खोजता फिरता है। भावनामय तीर्थ ही सर्वश्रेष्ठ है इसलिए योगी जल से भरे तीर्थों और काष्ठ आदि से निर्मित देव प्रतिमाओं की शरण नहीं लेते। योगी अपने आत्मा में ही शिव का दर्शन करता है, प्रतिमाओं में नहीं। अज्ञानी मनुष्यों के हृदय में भगवान के प्रति भावना जागृत करने के लिए ही प्रतिमाओं की कल्पना की गई है; किन्तु मुनिश्रेष्ठ! अज्ञानी मनुष्य के अन्तःकरण को शुद्ध करने के लिए तत्त्वदर्शी महात्माओं का चरणोदक सर्वोत्तम तीर्थ है।’’

इस परमपथ की प्रवेशिका में सामान्य एवं सरल मनुष्य के समक्ष सर्वप्रथम देवी-देवता, मन्दिर-मूर्तियाँ, तीर्थ-व्रत ही पड़ते हैं जिनसे संस्कार बनता है, पुण्य बढ़ता है; किन्तु मनुष्य उन देवताओं को परमदेव परमात्मा से पृथक् एवं प्रत्येक देवता को एक दूसरे से भिन्न उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट मान बैठता है; वह ऋग्वेद की इस ऋचा को भूल जाता है कि एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति’- एक परमेश्वर ही सत्य है, विप्रगण उसे अनेक नामों से सम्बोधित करते हैं क्योंकि किसी एक नाम से उस विराट् प्रभु की प्रभुता का बोध नहीं होता। सामान्य मानव देवताओं की अनेकता में निहित एकता को परखने का प्रयास नहीं करता, देवता की पृथक् सत्ता को ही गन्तव्य मान लेता है; इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं- उन्हें मेरी प्राप्ति नहीं होती। साधना के प्रारम्भ में मुझे भी एक देवता ही मिला; किन्तु तत्त्वस्वरूप महापुरुष (परमहंसजी) के अनुभवी प्रवेश के साथ ही वह शान्त हो गया।

वस्तुतः देवता भी मरणधर्मा हैं। अपने पुण्य-पुरुषार्थ से स्वर्गलोक की प्राप्ति करनेवाले तथाकथित ‘अमर’ विशाल स्वर्गिक भोगों का उपभोग करने के उपरान्त क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। (गीता, /21)- पुण्य क्षीण हो जाने पर उसी मृत्युलोक में गिर जाते हैं। उसी स्थान पर आ जाते हैं जहाँ से साधन प्रारम्भ किया था। इससे बड़ी क्षति क्या होगी? वह देव-तन ही किस काम का, जिसमें संचित पुण्य ही समाप्त हो जाय?

देवता तक मानव-तन से आशावान् हैं; क्योंकि मुक्त होने के लिए उन्हें भी मानव-तन प्राप्त करना होता है। देव, पशु इत्यादि भोग-योनियाँ हैं। केवल मनुष्य ही कर्मों का रचयिता है; जिसके द्वारा वह उस परमधाम को प्राप्त कर सकता है, जहाँ से पुनरावर्तन नहीं होता।

मरणधर्मा देवता हमारा लक्ष्य कदापि नहीं हो सकता। हमारा लक्ष्य तो परमदेव परमात्मा ही हो सकता है, जिसकी प्राप्ति के पश्चात् मनुष्य उस स्वरूप से कभी विलग नहीं होता। यही वह पराकाष्ठा है जहाँ पहुँचकर मनुष्य देवताओं का भी देवता बन जाता है। श्रद्धालुओं में देवत्व की जागृति करनेवाला सद्गुरु हो जाता है।

अतः आप सभी परमदेव परमात्मा को लक्ष्य बनाकर दैवी सम्पद् का अर्जन करें, दैवी प्रवृत्तियों को उन्नत बनायें।

।। ओम्।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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