दान

दान

दक्षिणावन्तो अमृतं भजन्ते। दक्षिणावन्तः प्रतिरन्त आयुः। (ऋग्वेद, १/१२५/६)

दानी अमृत प्राप्त करता है। दानी दीर्घायु होता है।

प्रगट चारि पद धर्म के, कलि महुँ एक प्रधान।

जेन केन बिधि दीन्हें, दान करइ कल्यान।।

यद्यपि सत्य, तप, दया और दान धर्म के चार चरण हैं किन्तु साधना की प्रवेशिका में दान ही श्रेयतर है। दान परमात्मा की ओर है। दान संसार को छोड़ना सिखाता है। जिस दिन से आप छोटा-सा भी दान करते हैं उस दिन संसार को किसी न किसी मात्रा में त्यागते हैं। सज्जन अथवा महात्मा लोग शनैः-शनैः सब कुछ त्याग देते हैं। दान में अमीर-गरीब का प्रश्न नहीं होता। समय-समय पर अनेक राजा-महाराजाओं ने भी अपने वैभव का त्याग किया, शान्ति नहीं मिली तो इन्द्रिय-संयम किया, इनके भोगों का त्याग किया, मन को संयत किया। जिस क्षण मन भली प्रकार समर्पित हुआ, अचल स्थिर ठहरा और मिटा, तत्क्षण ईश्वर का ईश्वरत्व पा गये। दान आवागमन से मुक्ति की ओर पहला कदम है। इसलिए दान प्रत्येक दशा में कल्याणकारी है- जेन केन बिधि दीन्हें, दान करइ कल्यान।– (रामचरितमानस, ७/१०३ ख) जिस किसी प्रकार से दान किया जाय वह कल्याण ही करता है।

दूसरों की भलाई में जो दिया जाता है, दान है। प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि उसका पड़ोसी भूखा न सोने पाये। इतिहास में ऐसे कथानक प्रचुरता से उपलब्ध हैं- जब प्राकृतिक प्रकोपों- अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प इत्यादि की त्रासदी पर सम्पन्न व्यक्तियों ने अपना सर्वस्व देकर प्राणियों की रक्षा की। इस सन्दर्भ में राजा रन्तिदेव का कीर्तिमान आज भी प्रासंगिक है जिन्होंने अवर्षण के समय अन्न भण्डार, राजकीय भण्डार प्रजाजनों को समर्पित करने के पश्चात् स्वयं चालीस दिनों तक अन्न नहीं ग्रहण किया। उनकी मान्यता थी कि प्रजा पुत्रतुल्य होती है, प्राण के समान होती है। यदि प्रजा भूखों मर रही है तो मैं कैसे अन्न ग्रहण करूँ? दानी दूसरे के प्राणों को अपने जैसा समझता है, रंचमात्र भी अपने से विलग नहीं देखता। वस्तुतः वही सच्चा दानी है, वही दान कर पाता है, सब नहीं।

दान में दिखावा नहीं होना चाहिए, अन्यथा वह अपना फल यहीं पा गया। ऐसे दान से उसने तो समाज में प्रतिष्ठा चाही थी, मिल गई। दान गोपनीय क्रिया है। श्रीकृष्ण और सुदामा की कथा कुछ ऐसा ही आदर्श सँजाये हुए है। बालसखा सुदामा श्रीकृष्ण के हिस्से का थोड़ा-सा चना चुराकर खा गये। दुष्परिणाम यह निकला कि उन्हें वृद्धावस्था तक दरिद्रता का जीवन बिताना पड़ा। सुदामा भक्त थे, तपस्वी थे। भिक्षान्न से जीवनयापन करते थे किन्तु स्वाभिमानी थे। एक दिन उनकी पत्नी ने किसी प्रकार अनुनय-विनय कर उन्हें श्रीकृष्ण के पास सहायतार्थ भेज ही दिया। दीन-हीन दशा में सुदामा द्वारिका पहुँचे। द्वारपाल ने सुदामा का परिचय दिया-

शीश पगा न झगा तन पै प्रभु जाने को आहि बसै केहि ग्रामा।

धोती फटी सी लटी दुपटी अरु पाय उपानह की नहिं सामा।।

द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक रह्यो चकि सो बसुधा अभिरामा।

पूछत दीन दयाल को धाम बतावत आपनो नाम सुदामा।। (नरोत्तमदास)

सुदामा का नाम सुनते ही श्रीकृष्ण उठकर खड़े हो गये, राजकीय कार्य रुक गया। गिरते-पड़ते-दौड़ते सुदामा के पास पहुँचे, उन्हें छाती से लगा लिया। सुदामा की दशा देख विलखने लगे। उन्हें उठाकर अपने सिंहासन पर ला बिठाया। आँसुओं से उनके चरण धोये। अपने महल में रखा। स्वागत-सत्कार किया और वह दिन भी आया जब श्रीकृष्ण ने उन्हें भावभीनी विदाई दी, दूर तक पहुँचाया, गले मिलकर प्रेम से विदा किया।

सुदामा ने देखा कि न तो उनका झगा बदला, न लकुटी बदली। दुपट्टी जो जीर्ण-शीर्ण होते-होते थोड़ी-सी बच रही थी, वह भी ज्यों-की-त्यों रह गई। मन में पश्चाताप करने लगे कि अकारण ही चले आये। विचारों में खोये सुदामा अपने गाँव आ गये। उनकी झोपड़ी वहाँ न थी। वहाँ कोई महल जगमगा रहा था। सुदामा की पत्नी दास-दासियों से घिरी महल से निकली और बतायी कि अब यह सब आपका है। झोपड़ी के स्थान पर सुदामापुरी ही बस गई थी। इधर द्वारिकापुरी और उधर इतना कुछ दे दिया कि सुदामापुरी बस गई। श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने समानान्तर स्थिति प्रदान की। वहाँ के लोग भी उसी वैभव से जीवनयापन करने लगे, जैसे द्वारिका के नागरिक सुविधासम्पन्न थे। श्रीकृष्ण का अपना धाम तो समुद्र में डूब भी गया किन्तु सुदामापुरी बची रही। उन्होंने सुदामा से कहा भी नहीं कि हम तुम्हें कुछ दे रहे हैं किन्तु सर्वस्व दे डाला। दान गोपनीय ही फलीभूत होता है।

भाग्यवान् याचकों की श्रेणी में महाराज मनु का भी नाम आता है। वह चक्रवर्ती नरेश थे, विश्व के स्रष्टा थे किन्तु उन्हें भी महान् दुःख था। एक कमी खटकती थी कि जीवन भजन के बिना ही बीत जाना चाहता है। घर से निकल पड़े, नैमिषारण्य गये, ऋषियों से मिले, साधन-क्रम समझा और भजन में लग गये। उनकी मान्यता थी कि ब्रह्मा-विष्णु-महेश जिसके अंश से उत्पन्न होते हैं- ऐसे प्रभु भी सेवक के वश में होते हैं तो हमारी अभिलाषा अवश्य पूरी करेंगे। मनु सर्वस्व देकर प्रभु की प्रभुता चाहते थे, उनका दर्शन चाहते थे। मन से प्रभु में समर्पण किया, चित्त का निरोध होने लगा। भगवान ने सुनवायी की, आकाशवाणी हुई कि मुझे महादानी समझकर निःसंकोच वर माँगो। मनु ने निवेदन किया तो केवल प्रभु को ही माँगा। अस्तु यदि माँगना ही है तो भगवान से माँगो। वे महादानी हैं। भगवान को ही माँग लो। भगवान आयेंगे तो उनकी भगवत्ता, उनकी विभूति, आलोक, ऐश्वर्य सब कुछ आपके आसपास रहेगा। इसलिए प्रभु-दर्शन के अतिरिक्त अन्य कोई भी क्षुद्र कामना नहीं करनी चाहिए।

सृष्टि में दान दो प्रकार का है- आध्यात्मिक और भौतिक। भौतिक दान के भी तीन-चार अंग हैं, जैसे विद्या-दान या भिक्षा-दान, स्वास्थ्य-दान, अन्न-दान- जिसमें वस्त्र तथा आवासादि सभी आ जाते हैं। चौथा श्रमदान या सेवा है। भौतिक दानों में सर्वोपरि दान विद्या का है- अन्नेन क्षणिका तृप्तिः विद्या यावज्जीवनम्।– अन्न क्षणिक तृप्ति देता है किन्तु शिक्षा जीवनपर्यन्त का सम्बल है। सन्त-महात्माओं, धनी व्यक्तियों तथा सरकार द्वारा विद्यालयों की स्थापना की जाती है। यदि किसी को शिक्षा दी गई तो उसी के माध्यम से वह सद्बुद्धि, सम्मान, अन्न, वस्त्र सब कुछ पा गया। जीवनहेतु आवश्यक समस्त स्रोत उसके लिए खुल जाते हैं। विद्याहीन देश आदिवासी कहलाता है, जैसे अफ्रीका। विद्वानों के मध्य अशिक्षितों की वही स्थिति होती है जैसे हंसों के मध्य कौए की होती है। कौआ न केवल स्वयं गन्दा खाता है अपितु अपने बच्चों को भी वही खिलाता है, वही सिखाता है। इसलिए श्रेष्ठ सामाजिक संरचना-हेतु विद्या-दान सर्वोपरि है।

स्वास्थ्यदान उत्तम स्वास्थ्य लौकिक तथा पारलौकिक उपलब्धियों की आधारशिला है। दुःख से छटपटाते व्यक्ति की पहली आवश्यकता उसे नीरोग करना है। पीड़ा दूर करना बहुत बड़ा दान है। इसीलिए अनेक समाजसेवियों ने मानव-सेवा को ईश्वर-सेवा के समकक्ष घोषित कर मानवता के त्राण-हेतु औषधालयों की स्थापना की। स्वामी विवेकानन्दजी ने ऐसा एक मिशन ही बना दिया। मानव में ईश्वर तक के शोध की सम्भावना निहित देख अनेक मनीषियों ने आजीवन स्वास्थ्य दान देने का व्रत ही ले लिया। राकफेलर फाउण्डेशन जैसी धर्मार्थ संस्थाएँ दानदाताओं के सौजन्य से विश्वभर में कार्यरत हैं, कुछ रोग निरोधक टीके इसी सन्दर्भ में लगाये जा रहे हैं; किन्तु कितनी भी पीड़ा दूर की जाय इस शरीर को एक दिन तो जाना ही है। मरण, दुःख का निवारण इस स्वास्थ्य दान से या किसी भी भौतिक दान से सम्भव नहीं है। इसलिए अन्य भौतिक दानों की तरह स्वास्थ्यदान भी एक सीमा तक ही उपादेय है।

अन्नदान अन्न दान अरु रस पीयूषा। (मानस, ६/२५/६) रामचरितमानसकार ने अन्न-दान की महिमा में कहा है कि अन्न सामान्य दान नहीं अपितु जीवन है। भूख से तड़पती हुई आत्मा को यह तत्काल जीवन प्रदान करता है, उसे मौत के मुख से निकाल लेता है। अन्न शरीर र्का इंधन है। इसके बिना शरीर नहीं चलता। इसलिए इससे श्रेष्ठ दान कुछ भी नहीं है; किन्तु यह अन्न सदा-सदा के लिए किसी के प्राणों की रक्षा तो नहीं कर सकता। आयु पूरी होने पर अन्न रहते हुए भी लोग मर जाते हैं। अन्त में विद्या भी काम नहीं आती। ऐसी परिस्थिति में इससे भी श्रेष्ठ दान अभयदान है। दानं परं किं त्वभयं सदैव (शंकराचार्य)। भय प्रकृति में है परमात्मा में नहीं, परमात्मा ही अभय है। शरणागत की रक्षा करना सर्वोपरि दान है; किन्तु प्रकृति के द्वन्द्व से निकालकर मात्र परमात्मा में प्रवेश दिला देना यह योगियों का दान है; जहाँ पूर्णतया मनुष्य अभय होता है।

आध्यात्मिक दान योगी के क्षेत्र की वस्तु है। दूसरा कोई यह दान नहीं दे सकता। प्रकृति के आधिपत्य में सब जीव छटपटा रहे हैं, उसकी अधिकृत भूमि में हैं। उसके नियन्त्रण से निकालकर आत्मा का आधिपत्य दिला देना अध्यात्म कहलाता है। जिस पुरुष के लिए आत्मा विदित है, जो आत्मा से ओतप्रोत और उसी में स्थित है वह महापुरुष योगी है और वही यह आध्यात्मिक दान दे सकता है। भगवान बुद्ध, महर्षि नारद इत्यादि इसी स्तर के दाता थे। झोपड़ी से लेकर बहुत से चक्रवर्ती राजकुमारों को नारदजी ने ब्रह्म तत्त्व तक पहुँचाया। प्रचेता के दस हजार राजकुमार, दक्ष प्रजापति के लड़के, भक्त प्रह्लाद, भक्त धु्रव, पार्वती और सीता सबके गुरु नारद थे। कुंभकर्ण जैसे राक्षस को भी उपदेश देने का समय उन्होंने निकाल ही लिया और परमात्मा की ओर बढ़ा दिया (रावण से उसने बताया- नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा।। (मानस, ६/६२/६) प्रत्येक महापुरुष की यही भूमिका हुआ करती है।

सती अनुसुइया आश्रम के पूज्य श्री परमहंसजी महाराज इसी स्तर के महापुरुष थे। बहुत से साधक उनकी शरण में पहुँचे। महाराज ने उनके लिए जीवनोपयोगी व्यवस्था दी तथा उन्हें अनन्त जीवन की ओर बढ़ा दिया। स्वामी सच्चिदानन्दजी महाराज धारकुण्डी को इंगित कर एक बार उन्होंने कहा था कि जिसे तुम लोग बड़ा समझते हो, यह जब मेरे पास आया था तो भगवान ने बताया कि इसकी आयु छः महीना ही शेष है। इसे जीवन मैंने दिया है। स्थिति मैंने दी है। यह जो कुछ भी है, मैंने बनाया है।

गुरु महाराजजी मेरी ओर भी मुड़े। कहने लगे, जीवन तो तुम्हारा भी बहुत थोड़ा-सा है, आयु है ही नहीं। जबकि हमारा शरीर उस समय पहलवानों-जैसा था इसलिए महाराज की अटपटी वाणी हमारी समझ में नहीं आयी।

महाराजजी की शरण में आने के ढाई वर्ष पश्चात् हम बीमार पड़े। शरीर कंकाल मात्र रह गया। अनुभव में एक दृश्य दिखाई पड़ा। चार-छः परिचित लोग मुझसे प्रेम से मिले और घोर जंगल में ले गये। वहाँ एक विशाल शस्त्रागार दिखाई पड़ा जिसका द्वार लगभग १५-२० फीट चौड़ा था। हम सबके पहुँचते ही द्वार स्वतः खुल गया। भीतर शस्त्रों की चकाचौंध से कक्ष जगमगा रहा था। सबके प्रवेश करते ही द्वार बन्द हो गया। साथवालों ने एक-एक शस्त्र उठा लिया। उन लोगों ने आपस में कहा, ‘‘अब क्या देखते हो? तुरन्त इसे मार दो।’’ उनके शस्त्र हमारे समीप होते जा रहे थे। हम सोच रहे थे कि यदि इस बार बच जाते तो इतना भजन करते कि इनकी पकड़ में न आते। उन लोगों से अनुनय-विनय करने लगे कि केवल एक अवसर दो, केवल एक बार छोड़ दो; किन्तु हमारे निवेदन का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। वे बढ़ते ही आ रहे थे। जब समीप आ गये तब अचानक ही वे पीछे हटने लगे। फाटक अलग होने लगा, जाकर दूर गिरा। हमने उनसे कहा कि मैं अकारण तुम लोगों से विनय कर रहा था, डर रहा था। अभी कल ही तो महाराजजी की छड़ी मुझे लगी थी। अब तुम लोग मुझे नहीं मार सकते। प्रातः महाराज जी से बताया तो बोले- बेटा! होनी टल गई। तुम्हारे पास तो आयु ही नहीं थी। अब तुम निरन्तर भजन करो, अब मत चूकना। मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।। (मानस, १/३१/९) अपने भजन के प्रभाव से भाग्य के असाध्य कुअंक भी मिट जाते हैं, महापुरुष अपनी इच्छा से मिटा देते हैं। हमारी श्रद्धा ही उधर से कृपा बनकर लौटती है और फलदायिनी होती है।

पूज्य महाराजजी कहा करते थे- ‘‘हो, संसार में सब दानी ही तो बने हैं लेकिन असली दानी मैं हूँ। मैं मोक्ष देता हूँ। सत्पुरुषों के समान संसार में कोई दानी नहीं है।’’ महाराजजी ने बहुतों को जीवन दिया, साधना दी और अनन्त जीवन, शाश्वत स्वरूप की ओर बढ़ा दिया, जो आज भी महाराजजी की कीर्ति के प्रामाणिक हस्ताक्षर हैं।

योगीप्रदत्त इस सर्वोत्कृष्ट दान को पाने के लिये साधक को एक दान करना पड़ता है। वह है मन का दान, विचारों का दान, मन-क्रम-वचन से समर्पण! यदि गुरु कहता है कि यह आम का वृक्ष है, भले वह बबूल का हो, फिर भी कहें कि आम है। आम का ही फल मिलेगा। आप आज देख रहे हैं, वह महापुरुष आगे क्या होनेवाला है इसे देख रहे हैं। वे भविष्य की संरचना देख रहे हैं। इसलिए गुरु के वचनों में कभी गुंजाइश, कोई तोड़-मरोड़ या घट-बढ़ नहीं करनी चाहिए। ऐसा समर्पित साधक शीघ्र पा जाता है।

इस सम्बन्ध में राजर्षि जनक का कथानक अनुश्रुतियों में है। महाराज जनक पूर्वजन्म में क्रियाशील योगी थे। योग के संस्कार उनमें प्रबल थे इसलिए राजकीय वैभव उन्हें सुखद प्रतीत नहीं होता था। उन्होंने एक स्वप्न देखा, जिससे उन्हें घबराहट हुई। विद्वानों को बुलाकर उन्होंने प्रश्न किया कि मैंने जो स्वप्न में देखा वह सत्य है या जिसे देख रहा हूँ वह सत्य है? सबने अपने-अपने तरीके से उत्तर तो दिया; किन्तु उससे समाधान न होते देख राजा ने उन सबको जेल में बन्द करा दिया। वर्षों तक ऐसा चला। राजा की व्याकुलता बढ़ती गई। विद्वान् बनकर दरबार में जाने को कोई तैयार ही न होता था।

अन्ततोगत्वा जनक के दरबार में अष्टावक्रजी पधारें। उन्हें देखकर जनक की पूरी सभा हँसने लगी। जब सबकी हँसी समाप्त हुई तो अष्टावक्र भी हँसने लगे। हँसते ही रह गये। जनक को लगा, यह पागल तो नहीं है! पूछने लगे, ‘‘ऋषिवर! आप हँसे क्यों?’’ अष्टावक्र ने कहा- ‘‘पहले तो आप लोग ही हँसे थे। अतः पहले आप ही बताएँ?’’ दरबारियों ने बताया कि एक से बढ़कर एक विद्वान् रूपवान् जिस प्रश्न को न सुलझा सके उस प्रश्न को सुलझाने आपको आया देख सबको हँसी आ गई। आपके दाँत पीछे को जा रहे हैं, आँखें उलटी हुई हैं, हाथ-पाँव टेढ़े हैं। आपकी आकृति देख सभी हँस पड़े। ऋषि ने कहा- ‘‘राजन्! मुझे भी इसलिए हँसी आ गई कि यह विद्वानों की नहीं बल्कि चमारों की सभा है। ऊपरी चमड़े के पारखी ही यहाँ हैं। क्या आत्मा के दाँत ऊपर को हैं? आँखें निकली और पाँव पीछे को हैं? शरीर तो रहने का एक घर है। इसका आश्रय लेकर हमें आत्मा की शोध करनी है।’’ दरबार में सन्नाटा छा गया।

राजा ने अपना प्रश्न रखा। अष्टावक्र बोले, ‘‘राजन्, कुछ दान दें।’’ राजा ने कहा- ‘‘आप एक हजार गायें ले लें।’’ ऋषि ने पूछा, ‘‘बस, इतना ही!’’ राजा ने दस हजार स्वर्ण से मढ़ी सींगवाली गायों को देने का प्रस्ताव किया। ऋषि ने आग्रह किया, इससे भी बड़ी कोई अपनी वस्तु दें। राजा ने आधा राज्य भी देने का प्रस्ताव किया। अष्टावक्र झुँझलाये- ‘‘कभी गाय दान तो कभी राज्य दान! क्या यह राज्य तुम्हारा है? तुमसे पहले यहाँ का राजा कौन था? तुम्हारे पश्चात् यह दूसरे का होगा तो यह तुम्हारा कैसे? कोई अपनी वस्तु दें।’’ जनक की समझ में नहीं आया तो बोले, ‘‘भगवन्! कुछ याद दिलायें।’’ ऋषि ने कहा- ‘‘अपने मन को दान कर दें।’’

जनक ने तुरन्त मन का संकल्प कर दिया। वे महापुरुष एक ओर बैठ गये, ध्यान में लग गये। जनक खड़े ही रहे। सोचने लगे- इन्हें मुँहमाँगा दान दिया; किन्तु इन्होंने हमें बैठने के लिए भी नहीं कहा और न हमारे प्रश्न का ही उत्तर दिया। जनक बौखलाये; किन्तु तब तक ध्यान आया कि हमने मन का ही तो दान किया था, फिर यह क्रोध कौन कर रहा है? लगता है मन अभी हमारे पास है। जिसे दिया है इन्हीं महात्मन् का मनन इसे करना चाहिए। जनक बैठ गये, मुनि का ध्यान करने लगे। शाम होते-होते जनक की समाधि लग गई। उस दशा में उन महापुरुष ने जनक के हृदय में बताया कि स्वप्न में तुम्हारा भिखारी बने घूमना या जागने पर सिंहासन पर बैठना इनमें से कोई भी सच नहीं है। सत्य है परमात्मा। प्रयत्न करो और पा जाओ। इस प्रकार सद्गुरु के प्रति अन्तःकरण का समर्पण ही साधक का सच्चा दान है।

दानवीरों की सूची में महर्षि दधीचि का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। कहा जाता है कि इन्होंने देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियों तक का दान कर दिया था। महर्षि की समूची कहानी आध्यात्मिक रूपक है। वह ऐसे महापुरुष थे जिनकी वृत्तियाँ ध्यान में अचल स्थिर ठहर गई थीं। अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। (मानस, १/१४४/४) ऐसी अवस्था में ही आसुरी सम्पद् का पूर्ण विनाश तथा दैवी सम्पद् की सुरक्षा हो पाती है। हड्डी का यह दान किसी विरले अधिकारी साधक से ही पार लगता है। वैसे इसकी व्यवस्था सबके अन्दर है। इसके लिए साधक को लगनशील, दृढ़ टेकवाला होना होता है। ऐसा ही कथानक राजा हरिश्चन्द का भी है। इन समस्त आध्यात्मिक कथानकों का एक ही आशय है कि-

रेग ज़ारो में बगूलों के सिवा कुछ भी नहीं।

साया ये अब्रे गुरेजाँ से हमें लेना भी क्या ?

घोर रेगिस्तान में तप्त रेत के उड़ते हुए चक्रवातों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। चारों ओर से झुलसा रही उस भीषण गर्मी में वात्याचक्रों के साथ यहाँ-वहाँ उड़ते बादलों की जानलेवा छाया क्या वस्तुतः शीतलता प्रदान कर पायेगी? वस्तुतः सारा संसार ही एक जलता हुआ मरुस्थल है। इसमें पिता-पुत्र, पति-पत्नी, मित्र तथा सम्बन्धियों की छाया, विद्या-स्वास्थ्य-अन्नादि के बृहद् भण्डार, विपुल कोश, सुख देने के सारे साधन रेतीली आँधियों के बीच भागती छोटी-मोटी बदलियों द्वारा प्रदत्त शीतलता से अधिक नहीं हैं। छाया पाने की आशावाला रेत के टीलों में दबकर रह जाता है। कल जो बैठा मंच पर आज मसाने दीख। संसार इतना नश्वर है, फिर भी मोह का इतना गहरा खिंचाव है कि लोग एक भी पल इससे विरत नहीं हो पाते। इसकी नश्वरता दिखाते हुए सहज स्वरूप की ओर बढ़ा देना उस सच्चे दानी की देन है जिसे उस भगवत्ता का बोध है। रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड (१२६/१-२) में है-

सोई सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता।

सोइ महि मण्डित पण्डित दाता।।

धर्म परायन सोइ कुल त्राता।

राम चरन जा कर मन राता।।

वह धर्मज्ञ है, धर्म का विशेषज्ञ है, वही गुणी है, ज्ञाता है- सब कुछ जानता है, पृथ्वी में वही सम्मानित है, वही पण्डित और दाता है- उसी के पास देने योग्य कुछ है। जिसके पास है वही दे भी सकता है। कौन? राम चरन जा कर मन राता। परमात्मा के चरण कमलों में जिसका मन अनुरक्त है, ऐसे योगी सन्त ही वास्तविक दान दाता हैं। एक ओर परमात्मा महादानी, दूसरी ओर ये सन्त दानी। ऐसे सन्त सत्पुरुषों का सान्निध्य-लाभ करें; किन्तु जो एक ईश्वर को छोड़कर अनेक स्थलों पर श्रद्धा का विकेन्द्रीकरण करने में लगे हैं, वह तो ईश्वर-पथ में आई हुई एक भँवर मात्र है।

दान सद्गृहस्थ आश्रम की शोभा है। अतिथि-सत्कार भी दान के अन्तर्गत आता है। एक बार जोधपुर के महाराजा का एक प्रबल शत्रु उनके राज्य की सीमा से गुजरा। राजा को सूचना मिली तो उन्होंने पीछा किया। रेत के टीलों से भागते, प्यास से तड़पते वह एक घर में पहुँचा, बोला- मुझे भयंकर प्यास लगी है, पानी पिलाकर मेरे प्राण की रक्षा करो। संयोग से वह मकान महाराजा के विश्वस्त सरदार का था। सरदार ने पहचाना भी किन्तु पानी पिलाया, दूध पिलाया, स्वागत किया और रास्ता बताते हुए तुरन्त विदा भी कर दिया। कुछ ही देर में शत्रु को खोजते-खोजते महाराज भी वहाँ पहुँचे। सरदार से उस शत्रु के बारे में पूछा, किन्तु सरदार को मौन देखकर बोले- ‘‘अतिथि समझकर तुमने उसे जाने दिया किन्तु मैं खोज लूँगा।’’ राजा चलने लगे तो सरदार ने भी तलवार उठायी और ऊँट पर सवार होकर राजा की सहायता के लिए चल पड़ा क्योंकि शत्रु प्रबल था। इस प्रकार दरवाजे पर आये शत्रु को भी अवध्य मानना, शरणागत को जीवन-दान देना, आतिथ्य सत्कार करना भी दान का एक प्रमुख अंग है।

महाराज हर्ष के समय में चीन का यात्री ह्वेनसांग बौद्धधर्म का अनुशीलन करने भारत आया। पर्यटन के क्रम में उसने लोगों से पूछा कि यहाँ भोजन की व्यवस्था क्या है और कहाँ पर मिलेगा? जिससे पूछा गया था उसी ने कहा, ‘‘भद्रे! आपका स्वागत है।’’ सम्मानसहित अपने घर ले गया, भोजन कराया और विदा कर दिया। ऐसी ही निःशुल्क व्यवस्था उसे प्रत्येक स्थान पर मिलती गई। भोजन और जल उसे सर्वत्र मिला, आदर के साथ मिला, मीठे वचन मिले- यह भी एक दान है। अन्ततोगत्वा ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वृत्तान्त में लिखा कि भारत के लोग अतिथि-सत्कार में एक दूसरे से होड़ करते हैं। इनकी वाणी बहुत मधुर है। वस्तुतः भारत देवभूमि है। यहाँ मनुष्य नहीं, देवता रहते हैं। सद्गृहस्थों को सदैव इसका विचार रखना चाहिए और किसी भिक्षु या जरूरतमन्द को खिलाकर ही स्वयं भोजन करने में प्रसन्नता की अनुभूति करनी चाहिए।

सद्गृहस्थ दानवीरों में कर्ण का नाम आता है। उसके दान के तीन कथानक प्रसिद्ध हैं। एक बार उसने अपने महल के सारे दरवाजे तोड़कर दान दे डाला, दूसरा कवच-कुण्डल देना और तीसरा मरणासन्न अवस्था में दाँत का स्वर्ण निकालकर दान करना। सबसे पहले देखें काष्ठोपकरण तोड़ने की घटना- श्रीकृष्ण कर्ण की दानवीरता की चर्चा अर्जुन के समक्ष करते ही रहते कि कर्ण तुम धन्य हो। तुम्हारा दान धन्य है। सुनते-सुनते अर्जुन के कान पक गये। एक दिन जब बहुत असहनीय हो गया तो उसने कहा- ‘भगवन्! आप सदैव कर्ण की प्रशंसा करते हैं। क्या आप कृपया बतायेंगे कि भ्राता युधिष्ठिर किस दृष्टि में उनसे कम हैं? कर्ण तो धूर्तों का साथ देता है, उनके इशारों पर चलता है जबकि युधिष्ठिर में ऐसा कोई दोष भी नहीं है। महाराज युधिष्ठिर अपना सम्पूर्ण राज्य दान में दे सकते हैं। कोई माँगे तो प्राण भी दे सकते हैं। वह धर्मात्मा हैं। श्रीकृष्ण ने कहा कि इस प्रश्न का उत्तर वे कभी अवसर मिलने पर देंगे। उन्होंने अब ऐसी चर्चा ही बन्द कर दी।

कुछ समय पश्चात् जब श्रीकृष्ण ने देख लिया कि अर्जुन इस प्रकरण को भूल चुका है तो उन्होंने चुपके से एक योजना बनायी। वर्षा के दिन थे। लगातार पानी बरस रहा था। श्रीकृष्ण ने नगर के समस्त व्यापारियों को गोपनीय सूचना प्रेषित कर एक व्यवस्था दे दी। सभी व्यापारियों का चन्दन बाहर पानी में रखवा दिया। महलों के चन्दन की भी व्यवस्था कर दी। तब उन्होंने अर्जुन से वेश बदलकर मन बहलाव की इच्छा व्यक्त की, जिसे अर्जुन ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। दोनों ने साधु का वेश बनाया और भिक्षाटन पर निकल पड़े।

सर्वप्रथम वे दोनों महाराज युधिष्ठिर के महल में पहुँचे। ‘नारायण हरि!’ बोलने लगे। युधिष्ठिर ने उन्हें सन्त समझ पूछा, ‘‘भगवन्! क्या आदेश है?’’ विप्र देवता बोले, ‘‘भिक्षा!’’ युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘प्रभु, सब तैयार है, आसन ग्रहण करें।’’ विप्र बोले- ‘‘राजन्! हम स्वयंपाकी हैं। अपने ही हाथ से बनाकर पाते हैं। उस पर भी हमलोगों का व्रत है कि वर्षाकाल में चन्दन की सूखी लकड़ी से ही भोजन बनायेंगे।’’ युधिष्ठिर ने कहा- ‘‘चन्दन की अभी व्यवस्था हो जाती है, आप विराजें।’’ दोनों बैठ गये। युधिष्ठिर ने चन्दन की लकड़ी खोजवाई तो महल में नहीं मिली। पूरे नगर में नौकरों को दौड़ाया। रथों से दूर-दूर तक खोज की गई। सूखा चन्दन कहीं नहीं मिला। युधिष्ठिर उदास और खिन्न होकर आनेवाले नौकरों को देख रहे थे। कुछ कहते भी न बनता था। इतने में श्रीकृष्ण ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं राजन्! हम अन्यत्र भिक्षा कर लेंगे।’’ उठे और चल दिये। युधिष्ठिर देखते ही रह गये।

वहाँ से निकलकर भगवान कर्ण के महल में पहुँचे। कर्ण खड़ा हो गया, साष्टांग दण्डवत् किया, भोजन के लिये निवेदन किया। श्रीकृष्ण ने वही शर्त यहाँ भी दुहरा दी। यहाँ भी सारे रथ नगर की परिक्रमा कर लौट आये, बोले- चन्दन की लकड़ी तो क्या उसका एक छिलका भी सूखा नहीं है। कर्ण ने तुरन्त उठाया धनुष, बाण चलाया। चौखट गिर पड़ा। बड़ा-सा पलंग उसमें मारा, फिर खिड़की-दरवाजे सब तोड़ डाले। चन्दन की सूखी लकड़ियों का ढेर लगा दिया और कहा- ‘‘भगवन्! आप जीवन भर मुझे सेवा का अवसर दें और सूखी लकड़ी से ही भोजन बनायें।’’ उन विप्रों को बहुत कुछ क्या खाना-पीना था, दो-एक टिक्कड़ बनाये और खा-पीकर निकल गये।

सायंकाल अर्जुन और श्रीकृष्ण स्वाभाविक वेश में युधिष्ठिर के यहाँ पहुँचे तो युधिष्ठिर तकिये पर औंधे मुख सिसक रहे थे। वैद्य, मन्त्री, परिवार के सभी सदस्य खड़े थे; किन्तु वे किसी से कुछ कह नहीं पा रहे थे। कण्ठ भर आता था, आँसू बन्द ही न होते थे। श्रीकृष्ण ने पूछा कि इतना कौन-सा कष्ट आ गया? युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘श्रीकृष्ण! केवल एक बात बताओ, मुझे याद क्यों नहीं आया? इन महलों में आग क्यों नहीं लग जाती? कर्ण से सैकड़ों गुना अधिक चन्दन के काष्ठोपकरण मेरे पास हैं। मुझे याद क्यों नहीं आया? कर्ण ने उन भिक्षुओं को भिक्षा करा दिया और मैं अभागा नहीं करा पाया? बताओ श्रीकृष्ण! मुझे याद क्यों नहीं आया?’’ श्रीकृष्ण ने बताया कि जो हृदय में होता है वही समय पर याद आता है। जो यह सोचकर दान या कोई कर्म करता है कि शास्त्र में लिखा है, नीति कहती है, करना चाहिए- ऐसा सोचकर जो करता है उसे समय पर याद नहीं आता; किन्तु दान तो कर्ण के हृदय में बसता है। इसलिये उसे समय पर याद हो आया।

सूर्य ने बार-बार कर्ण को सावधान किया था कि कवच और कुण्डल देने से प्राण संकट में आ जायेंगे; किन्तु कर्ण ने प्राणों का मोह छोड़कर अपना शरीर छीलकर उनका भी दान कर दिया और दानवीर कहलाया। युद्धभूमि में आहत कर्ण जब अन्तिम साँस गिन रहा था, श्रीकृष्ण वेष बदलकर उसके दानवीरता की परीक्षा लेने वहाँ भी पहुँचे। उस समय भी कर्ण ने अपना वह दाँत तोड़कर दे दिया जिसमें सोना लगा था। कहाँ देने लायक क्या है? कर्ण को सदैव स्मरण रहता था। श्रीकृष्ण ने कहा- यह सुवर्ण तो जूठा है। कर्ण ने बाण मारकर जलस्रोत पृथ्वी से पैदा किया। दाँत धोकर श्रीकृष्ण को अर्पित किया। प्रसन्न होकर भगवान ने उसे अपना धाम प्रदान किया। अतः हर परिस्थिति में हृदय से हुआ दान कल्याण करता है।

दान के सम्बन्ध में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में भरपूर प्रकाश डाला है। भगवान का निर्देश है कि यज्ञ, दान और तपरूप क्रियायें त्यागने योग्य नहीं हैं। ये मनीषियों को भी पवित्र करनेवाले हैं। अतः दान किसी भी परिस्थिति में त्यागने योग्य नहीं है।

गीता के सत्रहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि दान तीन प्रकार का होता है- सात्त्विक, राजस और तामस। दातव्यमिति यद्दानं– ‘दान देना ही कर्त्तव्य है’ इस भाव से जो दान देश, काल और सत्पात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार की भावना से रहित होकर दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है (१७/२०)। जो दान क्लेशपूर्वक अर्थात् देते नहीं बनता लेकिन देना ही पड़ रहा है तथा प्रत्युपकार की भावना से कि यह करूँगा तो यह मिलेगा अथवा पहले फल को उद्देश्य बनाकर, फिर दिया जाता है वह दान राजस कहा गया है (१७/२१)। जो दान बिना सत्कार किये अथवा तिरस्कारपूर्वक झिड़ककर अयोग्य देश-काल में अनधिकारियों को दिया जाता है वह दान तामस कहा गया है, लेकिन है यह भी एक दान; किन्तु जो देह-गेह इत्यादि सबके ममत्व को छोड़कर एकमात्र इष्ट पर ही निर्भर है, उसके लिए दान का विधान और भी उन्नत है। वह है सर्वस्व का समर्पण, सम्पूर्ण भावनाओं से हटकर मन का समर्पण; जैसा कि श्रीकृष्ण ने कहा है, मय्येव मन आधत्स्व (१२/८)। मेरे में मन को लगाओ। अतः दान नितान्त आवश्यक है।

सो धन धन्य प्रथम गति जाकी।

धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।। (मानस, ७/१२६/७)

गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि वह धन धन्य है जो सत्कर्म में काम आता है। भूखे को भोजन और प्यासे को पानी देने में तो कभी चूकना नहीं चाहिए। सद्गृहस्थ आश्रम का यह दायित्व है कि द्वार से कोई भूखा न जाए। दूसरे को खिलाकर ही खाना चाहिए। जिस दिन कोई अतिथि अभ्यागत नहीं आते थे, पूर्वजों को खिन्नता होती थी। किसी सुपात्र भिक्षु को खिलाकर ही खाना उनकी संस्कृति थी।

दानं परं किं सुपात्र दत्तम्– दान वही श्रेष्ठ है जो सुपात्र को दिया जाता है। कुपात्र को दान देने से दाता भी नष्ट हो जाता है। दान की महिमा देख बहुत से कबीले भी दान लेनेवाले बन गये। कुछ कबीलों ने तो दान को ही जीविका का साधन बना लिया। कहीं देवता दिखाकर, कहीं चमत्कारों का प्रदर्शन कर, कहीं स्वर्ग का प्रलोभन देकर, कहीं प्रायश्चित का भय दिखाकर दान का क्षेत्र बढ़ाना और उसे प्राप्त करना उनका उद्योग बन गया। महापात्रों के घर में बहू आती है, यदि उस वर्ष उसके यजमानों में कोई नहीं मरा तो कहते हैं कि बहू दरिद्र नारायण है। कदाचित् दस-बारह लोग यजमानी में दिवंगत हो गये, दस-बारह गद्दा-तकिया-चारपायी मिली तो कहते हैं कि बहू क्या है, साक्षात् लक्ष्मी आ गई। यह दान का दुरुपयोग है। शहरों में बच्चों का अपहरण कर उनके हाथ-पैर की शल्यक्रिया कर उन्हें विकलांग बना देते हैं, भीख माँगने योग्य आकृति दे देते हैं। उन्हें ट्रक में भरकर ले जाते हैं, चौराहे-चौराहे बैठा देते हैं। ऐसे बालक दिन भर ‘बाबूजी-बाबूजी’ कहकर माँगते ही रहते हैं। शाम को ट्रक आता है उन्हें भर कर ले जाता है। धन्धा चलानेवाले उस पैसे से क्लब अटेण्ड करते देखे जाते हैं। बम्बई-जैसे महानगरों में भिक्षा माँगने की जगह के लिए पगड़ी देनी होती है। आपस में पगड़ी का देन-लेन कर लेते हैं। भीख माँगनेवालों को दान देना अकर्मण्यता को बढ़ावा देना है और किसी भी विकासोन्मुख राष्ट्र के लिये अभिशाप हो सकता है।

अतः दान जरूरतमन्द को ही देना चाहिए जो सचमुच भूखा है। ईश्वर-चिन्तन में रत संन्यासी दान का सर्वोत्कृष्ट पात्र है। अच्छा-खासा परिवार छोड़कर जो भगवान के लिए समर्पित हो गया वह दान का प्रथम अधिकारी है; क्योंकि आठ घण्टे बैठकर वह भोजनदाता के लिए भजन करता है। यदि वह इससे अधिक भजन करता है तो वही उसका अपना होता है। ऐसे भिक्षुओं को भोजन कराना जो भजन में ही तल्लीन रहते हैं, सर्वोपरि दान है। बहुत से भिक्षुओं के इस सम्बन्ध में कठोर व्रत भी होते हैं कि अयाचित कोई खिला देगा तभी खायेंगे। हमारे गुरुदेव भगवान ने भी पेट के लिये कभी भिक्षा नहीं की। उनका विश्वास था कि साधु बनने की उन्होंने कभी कल्पना तक न की थी। घर-परिवार से बड़ा लगाव था; किन्तु आकाशवाणियों के माध्यम से जब उन्हें भगवान ने साधु बना दिया तो भोजन की व्यवस्था भी भगवान ही करेंगे। भगवान वैसा करते भी थे। निराधार विचरण के क्रम में किसी को स्वप्न दिखाई दे कि इन महात्मा को भोजन कराओ, कभी किसी को आकाशवाणी हो अथवा अनायास प्रेरणा हो और वह भोजन लेकर हाजिर हो जाता था। फिर भी दो-चार उपवास तो आये दिन की घटना थी; किन्तु तीसरे दिन तो कोई न कोई भोजन करा ही देता था। सच्चे सन्त भगवान के अन्तरंग होते हैं। भगवान के इशारे के बिना वे एक कदम भी नहीं रख सकते। साधु- सेवा के व्रती पुरुषों को ऐसे सन्तों को खिलाने-पिलाने का सौभाग्य अनायास ही मिल जाता है। निर्मल सन्त मनुष्यमात्र में अपनी ही आत्मा का संचार देखते हैं। वे विश्वात्मा होते हैं। उनको खिलाना विश्व को भोजन कराना हो जाता है। संसार तो लम्बा-चौड़ा है; किन्तु भगवान उसी से दान भी दिलवाते हैं जिसका कल्याण होना होता है। इसलिए सत्पुरुषों की सेवा में कभी चूकना नहीं चाहिए।

दान की महिमा वैदिककाल से लेकर अब तक अक्षुण्ण है। तत्पश्चात् इस धरा धाम में जहाँ भी धर्म का अंकुर फूटा, दान को सर्वोपरि स्थान मिला। भारतीय आर्य-संस्कृति के सभी संगठन सनातन, बौद्ध, जैन, सिख इत्यादि तथा पारसी, ताओ, ईसाई, मुसलमान और विश्व के सभी छोटे-बड़े धार्मिक संगठनों के सूत्रधर दान में विश्वास करते हैं। सभी अपनी आय का एक निश्चित अंश मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च इत्यादि समस्त देवस्थानों, पूजा-प्रार्थना-स्थलों तथा लोककल्याण केन्द्रों में दान करते हैं, जिसका सदुपयोग ईश-भजन या मानव-सेवा में होता है।

दान सार्वभौम है और प्रत्येक महापुरुष ने इसे हृदय की आँख से देखा है। दान से ही मोक्षमार्ग निकलता है। इसलिए प्रत्येक महापुरुष ने दान पर व्यवस्था दी। बुद्ध ने कहा- जो भिक्षुओं को दान करता है, वह मुझे खिलाता है। भगवान ने कहा- जो भक्तों को खिलाता है, मुझे खिलाता है। ईसा ने कहा कि जो भिक्षुओं को अन्न-वस्त्र देगा वह मुझे देगा। इन सभी महापुरुषों के उपदेशों में सन्तों के प्रति किये गये दान का बड़ा महत्व है-

जा दिन सन्त पाहुने आवत।

तीरथ कोटि स्नान किये फल तैसेइ दरसन पावत।।

।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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