क्या छूने, खाने-पीने या समुद्र पार करने से धर्म नष्ट हो जाता है?

प्रश्न – क्या छूने, खानेपीने या समुद्र पार करने से धर्म नष्ट हो जाता है?

उत्तर :- विचारणीय है कि छूना किसे है? यदि आप विकारों का स्पर्श करते हैं, आसुरी प्रवृत्ति को छूते हैं तो ह्रास अवश्य होगा- ‘श्रृंगी की भृंगी करि डारी, पाराशर के उदर विदार। रमैया की दुलहन लूटा बाजार।।’  साधना के विपरीत दृष्टिपात् करने से साधन का ह्रास हो जाता है। साधना नष्ट तो कभी नहीं होती क्योंकि इस भगवत्पथ में आरंभ का नाश नहीं होता।

रहा स्पर्श करने से धर्म के नष्ट होने का प्रश्न। व्यक्ति के छूने से धर्म का नष्ट होना कदापि संभव नहीं है; क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह पुरुष मेरा विशुद्ध अंश है। प्रकृति गर्भ धारण करनेवाली माता और मैं बीजरूप से पिता हूँ, अन्य माता-पिता तो निमित्त मात्र हैं। ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः(गीता, १५/७)- यह पुरुष मेरा विशुद्ध अंश है, इसलिए गीता के अनुसार मनुष्य-मनुष्य के छूने से धर्म कदापि नष्ट नहीं होता; किन्तु यदि आप सत्य और नित्य की राह छोड़कर अनित्य की राह पकड़ लेंगे, उसको छू देंगे तो ह्रास अवश्य होगा। यदि इसी जन्म में पार होना है तो जन्म, दो जन्म का झटका अवश्य लग जायेगा।

गीता के अनुसार यज्ञ (जिसका परिणाम सनातन ब्रह्म का दर्शन और स्थिति है) करने का अधिकार उन सबको है जिन्हें मानव-तन मिला है। भगवान कहते हैं- अर्जुन! यज्ञ (गीतोक्त साधना) रहित पुरुष के लिए पुनः मनुष्य-शरीर भी सुलभ नहीं है तो भला परलोक कैसे सुलभ होगा? यज्ञ उन सबको करना है जिन्हें मानव-तन मिला है। समाज में ऊँची-नीची उपाधियाँ समय-समय की व्यवस्थाएँ हैं। जिन वर्गों के आय के स्रोत सबल थे, वे कमजोर वर्ग से काम लेने लगे। यह उतार-चढ़ाव सदैव रहता आया है। जिन कबीलों में फूट होती है, उनका भाग्य वे कबीले लिखते हैं जिनमें एकता होती है, संगठन होता है। बुद्धिमान् भोक्ता और बुद्धिहीन भोजन होता है, किन्तु ईश्वर-पथ में इस विषमता का कोई मूल्य नहीं है। ये दुर्दिन अपने रचे हुए दुर्दिन हैं। धर्म में इनका कोई स्थान नहीं है।

इसी प्रकार आपस के खान-पान से सौहार्द्र बढ़ता है न कि धर्म नष्ट होता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘यह आत्मा अच्छेद्य है, अदाह्य है। जल इसे गीला नहीं कर सकता, आकाश इसे अपने में समाहित नहीं कर सकता। यह आत्मा सर्वव्यापक, अचल स्थिर रहनेवाला और सनातन है।’’ आप कौन हैं? सनातन धर्म के अनुयायी! सनातन कौन है? आत्मा! यदि आप आत्मपर्यन्त दूरी तय करानेवाली विधि से अवगत नहीं हैं, तो आप सनातन धर्म नहीं जानते। खान-पान तो दूर, प्रकृति में उत्पन्न कोई वस्तु उस सनातन का स्पर्श भी नहीं कर पाती तो वह सनातन धर्म छूने-खाने से नष्ट कैसे होगा?

यह भी एक भ्रान्ति ही है कि समुद्र पार करने से धर्म नष्ट हो जाता है। हम तो कहते हैं कि समुद्र पार करना ही हमारा धर्म है, न पार करने से धर्म अवश्य नष्ट होता है। संसार एक समुद्र है। इसे पार करने ही हम-आप चलते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- जो अनन्य भाव से मुझमें समर्पित होकर लगते हैं, उन्हें मैं संसारसागरात्– संसाररूपी समुद्र से पार कर देता हूँ।

भवसिन्धु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।(मानस, ७/१३/५)- वे अथाह भवसिंधु में पड़े हैं, जो उन पावन प्रभु के चरण-कमलों में प्रेम नहीं करते। हमें सागर पार होना है, प्रभु की शरण होकर होना है। समुद्र पार जाने से ही शाश्वत की स्थिति मिलनी है।

संसार में यत्र-तत्र प्रचलित है कि समुद्र पार मत जाओ, फल्गु नदी पार मत करो, कर्मनाशा नदी में पाँव मत डालो अन्यथा धर्म-कर्म नष्ट हो जायेगा। इस तरह के हथकंडों या अन्धविश्वास का धर्म में कोई स्थान नहीं है। श्री सीताजी अयोध्या पधारीं- उन्हें सब आदर की दृष्टि से ही तो देखते हैं। श्री रामजी समुद्र पार गये, हनुमान गये और आये, सभी बन्दर-भालू समुद्र पार गये और आये। भगवान श्रीराम की विजय पर सभी देवता प्रभु की वन्दना में आये। ब्रह्मा ने उन बन्दरों की प्रशंसा की- कृतकृत्य विभो सब वानर ये। निरखन्ति तवानन सादर ए। (मानस, ६/११०/९) ब्रह्माजी को कहना चाहिए था कि समुद्र पार करनेवाले वानर भ्रष्ट हो गये, धर्म नष्ट हो गया, जबकि देवताओं के पितामह स्तुति करने लगे। वशिष्ठ इत्यादि का स्नेह उन्हें प्राप्त हुआ। भगवान राम ने उन्हें अपना सखा माना। अतः यह धारणा निराधार है कि समुद्र पार करने से धर्म नष्ट होता है।

सृष्टि में यदि जल न हो तो जीव की उत्पत्ति ही असम्भव है- ‘छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम शरीरा।। (मानस, ४/१०/२) शरीर उक्त पंच महाभूतों से निर्मित है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव शरीर ९४% तरल पदार्थ से निर्मित है। सन्त कबीर ने इसे पानी केरा बुलबुला, अस मानुस की जात। कहा, किसी ने इसे ‘ओस की बूँद’ की संज्ञा दी। संसार में जल का जो भी उपयोग है वह सब समुद्र से ही आता है। पृथ्वी यदि एक हिस्सा है तो इसका तीन गुना जल क्षेत्रफल में है। जल के भीतर भी सृष्टि है। विशाल जल-जन्तु जल से ही आक्सीजन ग्रहण करते हैं। इस समुद्र के पार जाने या न जाने से धर्म को कुछ भी लेना-देना नहीं है। हाँ, ईश्वर-पथ के चिन्तन में अनुरक्त साधक यदि संसार-समुद्र में पाँव रख दे, काम-क्रोध-लोभ-मोह की ओर गतिशील हो जाय तो साधना की क्षति है। समूल नष्ट तो नहीं होगा, लक्ष्यप्राप्ति में विलम्ब या अवरोध आ सकता है।

विरति चर्म असि ग्यान मद, लोभ मोह रिपु मारि।

जय पाइअ सो हरि भगति, देखु खगेस विचारि।।

(मानस, उत्तरकांड, १२० ख)

वैराग्य की ढाल है, ज्ञान की तलवार है। मद, लोभ, मोह शत्रु हैं। इन शत्रुओं का वध कर जो विजय प्राप्त की जाती है उसका नाम है हरिभक्ति। यह संसार षड्विकारों का प्रसार ही तो है। साधक भजन से विचलित हो कदाचित् इन विकारों की ओर उन्मुख हो जाता है तो उसने भूल की है, उसे पुनः भगवत्पथ पर कुछ घूमकर आना पड़ेगा। बीज का नाश साधन-पथ में नहीं है। साधन का स्वल्प अभ्यास भी पार लग गया तो अगले जन्म में साधन जहाँ से छूटा था, वहीं से आरम्भ करेगा। इस विचलन से उसका रास्ता थोड़ा लम्बा और दुरूह हो जायेगा।

समुद्र भी तो सृष्टि के ही अंतर्गत है। सृष्टि एक इकाई है। यह दुःखरूप है। इसके पार जाने के लिए दुर्लभ मानव-तन मिला है। दुर्लभ मानव-तन क्या भारत में ही है? हम-आप पशु नहीं हैं, कीट नहीं हैं, वनस्पति नहीं हैं, मनुष्य हैं। मानव एक इकाई है। प्रजनन की दृष्टि से मानव एक इकाई है। महाराज मनु से जायमान होने से सभी मनुज हैं, मानव हैं। ‘स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह ते भै नर सृष्टि अनूपा।। (मानस, १/१४१/१) अनुपम अर्थात् जिनकी कोई तुलना नहीं, ऐसी विशुद्ध एक सृष्टि हुई। इस प्रकार सम्पूर्ण सृष्टि के मानव महाराज मनु के विशुद्ध अंश हैं, जिनके छूने-खाने से धर्म नष्ट होने का कोई प्रश्न ही नहीं है।

रामचरित मानस में है कि भगवान राम ने स्वयं एक सभा बुलायी और सबको समझाया- बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन्हि गावा।। (मानस, ७/४२/७) बड़े सौभाग्य से यह मानव-तन मिला है। यह देवताओं को भी दुर्लभ है। देवता भी नर-तन से आशावान् हैं। देवताओं की अपेक्षा एक वस्तु आपके पास अधिक है। देवता देवलोक में सुख की पराकाष्ठा का उपभोग अवश्य करते हैं; किन्तु पुण्य क्षीण हो जाने पर क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति (गीता, ९/२१) वहाँ से गिरकर मृत्युलोक में आ जाते हैं। देवराज इन्द्र गिरे तो अजगर हो गये, कोई गिरगिटान हो गया। यह निश्चित नहीं कि उन्हें दुर्लभ मानव-तन मिले। वे सुख अवश्य भोग लें किन्तु देवलोक में नवीन साधना करके परमकल्याण तक की दूरी नहीं तय कर सकते। उस दूरी को तय करने का माध्यम यह दुर्लभ मानव-तन है। यह साधन का धाम है, मुक्ति का द्वार है। ऐसे दुर्लभ मानव-तन को पाकर जिसने अपना निजी परलोक नहीं सँवारा-

सो परत्र दुख पावइ, सिर धुनि धुनि पछिताइ।

कालहि कर्महि ईश्वरहि, मिथ्या दोष लगाइ।। (मानस, ७/४३)

यदि वह अपना निजी परलोक नहीं सँवार लेता, (किसी पर एहसान मत करो) अपना निजी परलोक नहीं सुधारता, वह जन्मान्तरों में दुःख पाता है, सिर धुन-धुन कर पछताता है, काल, कर्म और ईश्वर को व्यर्थ ही दोष देता है। प्रायः दो-तीन बहाने मनुष्य करता ही है- समय अनुकुल नहीं है- काल को दोष देना, भाग्य में लिखा नहीं है- कर्म को दोष देना, कर्त्ता-धर्ता भगवान हैं, वे कराते ही नहीं- ईश्वर को दोष देना; किन्तु भगवान राम कहते हैं कि वह व्यर्थ दोष देता है। यदि दुर्लभ मानव-तन उपलब्ध है तो भवसागर पार न कर लेने का सब दोष हमारा है। मानव-तन साधन धाम है। वह साधन जो मोक्षपर्यन्त आपकी दूरी तय करा दे; उसमें श्रद्धा-समर्पण-विवेक-वैराग्य-साधना जो कुछ चाहिए, सब कुछ सजाकर, सँवारकर भगवान ने इस दुर्लभ मानव-तन को पैदा किया है। इसलिए इस तन को स्पृश्य या अस्पृश्य कहना भगवदाज्ञा की अनभिज्ञता है। इसी तरह भवसिन्धु से पार होना ही है। बाहर संसार में जितने समुद्र हैं, उपयोगी हैं। संसार में समुद्र न होते तो यह पृथ्वी भी उन मृत ग्रहों की तरह होती जहाँ जल के अभाव में जीवन का अस्तित्व ही नहीं है। समुद्र पार करने से धर्म की क्षति नहीं है। हाँ, संन्यासी यदि साधना छोड़कर वासनाओं के समुद्र की ओर कदम बढ़ाता है तो वह शोचनीय अवश्य है। उसने अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारी है। वह साधन कर सकता था; किन्तु प्रमादवश विषयों के संसर्ग से एक-आध जन्म का धक्का खा गया। धर्म नष्ट हो जाय ऐसी कोई विभीषिका वहाँ भी नहीं है।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

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