गीता में युद्ध का स्वरूप क्या है?

गीतोक्त युद्ध

प्रश्नमहाराजजी! गीता में युद्ध का स्वरूप क्या है?

उत्तर देखिये, देश-विदेश में जहाँ जिसने गीता का नाम भी सुना है वह इतना अवश्य ही सोच लेता है कि गीता महाभारत युद्ध की प्रवेशिका मात्र है। इतना ही नहीं, गीता का नाम लेते ही मानव-मन युद्ध की ओर चला जाता है। परन्तु शास्त्रकार की सूक्ष्म दृष्टि पर विचार करें तो यह अकाट्य निर्णय है कि बाह्य युद्ध नहीं अपितु अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियों का संघर्ष है, इसलिए गीता योगशास्त्र है। सम्पूर्ण गीता में भौतिक संघर्ष अथवा मारकाट का एक भी सूत्र नहीं है।

1- अर्जुन लड़ना नहीं चाहता था। अठारह अक्षौहिणी में अपने ही परिवार, सुहृद् और गुरुजनों को देखकर वह युद्ध से कतराने लगा। सनातन-धर्म और कुलधर्म की दुहाई देने लगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि अर्जुन! तू न शोक करने योग्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों की तरह वचन कहता भर है परन्तु पण्डित लोग जिनके प्राण चले गये हैं और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिए भी शोक नहीं करते; क्योंकि आत्मा न तो मरता है, न किसी को मारता है। कौन्तेय! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देनेवाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो क्षणभंगुर हैं। इसलिए अर्जुन! तू उनको सहन कर।

क्यों? क्या हिमालय की लड़ाई थी जो अर्जुन सर्दी सहन करता? अथवा क्या रेगिस्तान की लड़ाई थी जो गर्मी सहन करता? कुरुक्षेत्र तो एक समशीतोष्ण स्थली है। कुल अठारह दिन ही तो लड़ाई हुई। श्रीकृष्ण ऐसा निर्देश क्यों देते हैं? वस्तुतः यह एक अन्तःकरण की लड़ाई है। सुख-दुःख, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी इनका सहन करना एक योगी पर निर्भर करता है। अतः योग की प्रवेशिका वालों के लिये ही इसका विधान है।

2- तदनन्तर श्रीकृष्ण ने कहा कि अर्जुन! असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं होता और सत्य का तीनों कालों में कभी अभाव नहीं। यह आत्मा ही परमसत्य है और शरीर नाशवान् है, इसीलिए तू युद्ध कर। तो क्या पाण्डव-पक्ष के शरीर अविनाशी थे? वे भी तो शरीरधारी थे। इससे यह तो निश्चित नहीं होता कि अर्जुन कौरवों को मारे, पाण्डवों को नहीं। जिधर भी शरीर दिखायी पड़े, उधर ही मारना चाहिए था। फिर, जब शरीर नाशवान् है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है तो श्रीकृष्ण किसकी रक्षा में खड़े हैं? अर्जुन कौन था? क्या कोई पिण्डधारी था? श्रीकृष्ण की ही मान्यता है कि नाशवान् शरीर के लिए श्रम करनेवाले यथार्थ नहीं जानते। इन्द्रियों का आराम चाहनेवाले पापायु वृथा ही जीते हैं। अतः यदि श्रीकृष्ण किसी की शरीर-रक्षा के लिए खड़े थे तब तो वे भी अविवेकी, पापायु और व्यर्थ जीनेवाले सिद्ध होंगे; क्योंकि शरीर को तो रोका नहीं जा सकता। अतः स्पष्ट है कि गीता सांसारिक युद्ध से सम्बन्धित नहीं है।

पुनः काटने से क्या शरीर कट जायेगा? टहनियों के काटने से क्या वृक्ष सूख जायेगा? असम्भव! वस्तुतः जो जिसको जितना दबाता है, बदले में उसे भी उतना ही दबना पड़ता है। यह शरीर भी जन्म-जन्मान्तरों में चुकाया जानेवाला बदला है। शस्त्र से काटने मात्र से शरीर-क्रम के समाप्ति की सम्भावना नहीं है क्योंकि शरीर संस्कारों पर निर्भर है। अतः शरीर का सर्वथा अन्त तभी होगा जब जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों का अवसान होगा। तभी इस शरीर और आत्मा का सदा-सदा के लिए विच्छेद होता है। संस्कारों में जो कुछ भी है, संकल्पों में उभड़कर आता है। अतएव जिन महापुरुषों ने संकल्प-विकल्प की गति का निरोध कर लिया उन्होंने मन के सर्वथा निरोध के साथ ही अन्तःकरण में परमतत्त्व, शाश्वत, सनातन ब्रह्म का प्रतिबिम्ब पा लिया। इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः’- उन पुरुषों द्वारा सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया जिनका मन समत्व में स्थित है। क्यों? मन के समत्व और संसार जीतने का क्या सम्बन्ध है? जिसने संसार जीत लिया वह रुका कहाँ? श्रीकृष्ण कहते हैं, निर्दोषं हि समं ब्रह्म’- ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर साधक का मन भी उत्थान करते-करते इतना निरुद्ध हुआ कि निर्दोष और समत्व की स्थितिवाला हो गया, अतः तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः(गीता, 5/18) वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। इसी अवस्था में शरीर का सम्बन्ध सदा के लिए टूटता है, इसके पूर्व कभी नहीं। अतः शरीर का वास्तविक नाश चिन्तन-भजन पर निर्भर करता है, न कि तलवार द्वारा काटने पर।

3- अध्याय दस में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी मुख्य-मुख्य विभूतियों का संक्षेप में वर्णन किया कि अर्जुन! सप्तर्षि और उनसे भी पूर्व होनेवाले सनकादि चारों ऋषि मैं ही हूँ, सूर्य में प्रकाश मैं हूँ, अग्नि में तेज मैं हूँ, शस्त्रधारियों में राम मैं हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ। इसी प्रकार विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा कि, अर्जुन! मेरी विभूतियों का कोई अन्त नहीं है, अनन्त हैं। तुम्हें बहुत जानने से क्या प्रयोजन? जितनी भी ऐश्वर्ययुक्त वस्तुएँ हैं, मेरे ही अंश से उत्पन्न जान। जुए में छल से जीतनेवालों की विजय मैं हूँ। यदि यह साधारण जुआ है तब तो भगवत्प्राप्ति के साधनों में इसे भी गिना जाता क्योंकि जीतने पर भगवान मिलते; किन्तु सम्पत्ति चाहे जो मिल जाय, जुए से भगवान मिलते किसी को दिखायी नहीं पड़े। वास्तव में प्रकृति ही एक जुआ है, धोखे का एक आवरण है। विवेक-वैराग्य से, सतत लगनपूर्ण साधना से ब्रह्मज्ञ पुरुषों के संरक्षण से जो भी प्रकृति पर विजय पा लेता है उसी की विजय सच्ची विजय है। इसी विजय के अन्त में भगवान रहते हैं, न कि साधारण जुए के अन्त में। इसी प्रकार श्रीकृष्ण ने कहा, मैं सबमें व्याप्त हूँ।

इसे सुनकर ग्यारहवें अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने कहा, ‘‘भगवन्! आपने जो कुछ कहा सर्वथा सत्य है, मैं मानता हूँ। इसे सुनकर मेरा अज्ञान, मोह नष्ट हो गया।’’ क्या वस्तुतः अर्जुन का मोह नष्ट हो गया था? क्योंकि इसी के ठीक पश्चात् भगवान के विराट् स्वरूप का दर्शन कर अर्जुन गिड़गिड़ाने लगा। कहीं ज्ञानी को भय होता है? अर्जुन को अभी तक कोरी सैद्धान्तिक जानकारी ही थी। अर्जुन भी इस बात को जानता था। अतः उसने प्रार्थना की कि, भगवन्! जैसा आपने बताया है, बल, ऐश्वर्य और विभूतियों से परिपूर्ण आपके उस स्वरूप को मैं देखना चाहता हूँ। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्त, अनन्य सखा अर्जुन से कहा- ले, तू मेरे उसी स्वरूप को देख। अब, आकाश से पाताल तक सर्वत्र फैले हुए मेरे तेज को देख! मेरे ही अन्तर्गत आदित्यों, वसुओं और अश्विनीकुमारों को देख! मरुद्गणों को देख! चराचरसहित सम्पूर्ण विश्व को मेरे अन्तराल में एक ही स्थान पर खड़ा देख! इस प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण दो-तीन श्लोक तक बताते चले गये लेकिन अर्जुन आँखें मलता ही रह गया। तब सहसा भगवान रुक जाते हैं। कहते हैं- अर्जुन! तू मुझे इन आँखों से नहीं देख सकता (क्योंकि भगवान तो अगोचर हैं, मन-बुद्धि से सर्वथा परे हैं।) अब मैं तुझे वह दृष्टि देता हूँ कि तुम मुझे देख सको।

भगवान तो सामने खड़े ही थे। अर्जुन ने देखा। सहस्रों (अनन्त) सूर्य से भी अधिक उनके तेज को देखा। सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश दिखाई पड़ा। अर्जुन को दिग्-भ्रम हो आया (क्योंकि सूर्य से तो ही दिशा का बोध होता है)। वह बोला- भगवन्! आपका यह असह्य तेज देखकर मैं दिशाओं को भी नहीं जान पा रहा हूँ- ‘दिशो न जाने’। हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से आप को जानते हैं। आप जिसे जना दें वही आपको जान पाता है। वस्तुतः भगवान जिस भक्त को बताना चाहते हैं उसके अन्तराल में स्वयं दृष्टि बनकर सामने स्वयं खड़े हो जाते हैं। केवल वही देख पाता है, अन्य कोई नहीं।

अर्जुन ने बताया- आपके अन्तर्गत मैं चराचर जगत् को स्थित देखता हूँ। रुद्र, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धगणों के समुदाय सभी आपके अन्तराल में स्थित हैं। धृतराष्ट्र के सभी पुत्र, भीष्म, द्रोण, सूतपुत्र कर्ण सबके सब बड़े वेग के साथ आपके भयानक मुखों में चूर्ण होते जा रहे हैं। न मैं आपके आदि को देख पाता हूँ, न अन्त को ही देख पाता हूँ और न मध्य का ही निर्णय कर पाता हूँ। रोमांच हो गया, धनुष गिर गया। प्रार्थना करने लगा- ‘‘भगवन्! भोजन अथवा शयन के समय, एकान्त अथवा सखाओं के बीच मैंने कभी आपको ‘हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा!’- ऐसा कुछ कह दिया था, उन त्रुटियों को आप क्षमा करें।’’

छोटी-छोटी बातों के लिए अर्जुन क्षमा-याचना करने लगा। कभी ‘कृष्ण’ अर्थात् काला कह दिया था। क्या कृष्ण कहना भी कोई अपराध है? कृष्ण का रंग साँवला था ही, गोरे कैसे कहे जाते? यादव कहना भी कोई अपराध नहीं था; क्योंकि यदुवंश में श्रीकृष्ण ने जन्म ही लिया था। और कहा भी क्या जाता? सखा कह देना भी अपराध नहीं था क्योंकि श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को सखा कहकर सम्बोधित करते थे; किन्तु जब अर्जुन ने उनके प्रभाव को देखा तो इन क्षुद्र त्रुटियों के लिए क्षमायाचना करने लगा। उसने देखा कि श्रीकृष्ण न तो काले हैं, न गोरे हैं, न यादव हैं और न सखा ही बल्कि यह तो परात्पर ब्रह्म अव्यक्त सत्ता हैं। जिस पर दया करते हैं उसी को दिखाई पड़ते हैं। इधर दृष्टि बनकर खड़े हो जाते हैं उधर स्वयं रहते हैं। इस प्रकार अर्जुन ने श्रीकृष्ण को तत्त्वतः देखा।

भगवान बोले, ‘‘अर्जुन! मेरे स्वरूप को जैसा तूने देखा है वैसा तेरे सिवाय न दृष्टपूर्वम्’- न तो कोई पहले देख पाया है और न कोई भविष्य में देख सकेगा।’’ तब तो गीता हम सबके लिए व्यर्थ है; क्योंकि भगवान को देखने की योग्यता केवल अर्जुन तक सीमित रह गयी। स्वयं श्रीकृष्ण पहले बता आये हैं कि इसी कर्म को करके बहुत से मनीषी मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं- बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः(गीता, 4/10)। यहाँ ग्यारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि मेरे स्वरूप को पूर्व में तेरे अतिरिक्त न कोई देख पाया, न भविष्य में कोई देख सकेगा। अन्ततः श्रीकृष्ण कहना क्या चाहते हैं? अर्जुन कौन था? ‘अनुरागरूपी अर्जुन’। अर्जुन अनुराग का प्रतीक है। कहना न होगा कि भगवान अनुरागी को ही मिलते हैं-

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा।

किएँ जोग तप ज्ञान बिरागा।। (मानस, 7/61/1)

इष्ट के अनुरूप राग अनुराग है और अनुरागी ही अर्जुन है। अनुरागविहीन न तो पहले ही किसी ने भगवान को प्राप्त किया और न भविष्य में ही कभी कोई प्राप्त कर सकेगा। भगवान अनुरागिन के उर बसैं, उदासीन के शीश।

4- इतना ही नहीं अपितु श्रीकृष्ण ने अपनी प्राप्ति का उपाय भी बताया-

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।

निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।। (गीता, 11/55)

अर्जुन! जो मेरे द्वारा निर्धारित कर्म करता है, मेरे परायण होकर कर्म करता है, किन्तु संगवर्जितः’- संगदोष के रहते इस कर्म को नहीं किया जा सकता; अतः संगदोष से अलग रहकर जो कर्म करता है, जो सम्पूर्ण भूत-प्राणियों से सर्वथा वैरभाव से रहित है, वही मुझे देख सकता है, जैसा तूने देखा है। संगदोष से रहित होकर नितान्त एकान्त में अर्जुन किससे लड़ता? फिर यदि अर्जुन लड़ता तो वह भगवान के स्वरूप को नहीं देख पाता। यदि वह प्रण करके जयद्रथ या कर्ण को मारता है तो ‘निर्वैरः सर्वभूतेषु’ की भगवद्-आज्ञा का तिरस्कार करता है। किन्तु अर्जुन लड़ता है। बिना वैर के लड़ाई कैसी? इस प्रकार गीता में एक भी सूत्र ऐसा नहीं है जो बाह्य मारकाट का समर्थन करता हो। वस्तुतः यह अन्तःकरण की लड़ाई है।

5- अध्याय सोलह में श्रीकृष्ण ने बताया- अर्जुन! इस लोक में प्राणियों के स्वभाव दो प्रकार के माने गये हैं। एक तो देवों-जैसा और दूसरा असुरों-जैसा। अभय, अन्तःकरण की स्वच्छता, इन्द्रियों का दमन, आर्जवम्, क्षमा, दया, अद्रोह, निरन्तर चिन्तन, वास्तविक जानकारी इत्यादि चौबीस लक्षण दैवी सम्पद् के गिनाये, जो सब-के- सब किसी पहुँचे हुए महापुरुष में ही सम्भव हैं। आंशिक रूप में आप में, हममें भी हो सकते हैं। इसी तरह दम्भ, दर्प, मात्सर्य, काम, क्रोध, लोभ तथा मोह आसुरी सम्पदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं। आसुरी सम्पद् को प्राप्त मनुष्य अनन्त आशा, अनन्त तृष्णा एवं अपरिमेय चिन्ताओं से युक्त रहता है। वह सोचता है कि मेरे पास इतना धन है, भविष्य में इतना हो जायेगा। मैं ही ऐश्वर्य का भोक्ता हूँ। स्त्री-पुरुष के संयोग से जो कुछ उपलब्ध है, मात्र इतना ही सत्य है, आगे ईश्वर नाम की कोई वस्तु नहीं है। ‘‘आसुरी सम्पद् अधोगति और नीच योनियों के लिए होती है जबकि दैवी सम्पद् परमकल्याण और शाश्वत स्थिति के लिए होती है। पाण्डव! तू शोक मत कर क्योंकि तू दैवी सम्पदा को प्राप्त हुआ है, तू मुझमें निवास करेगा।’’ सुधीजनों से कहने की आवश्यकता नहीं है कि दैवी सम्पदा की सभी योग्यताएँ ईश्वरोन्मुख साधकों के लिए है, न कि किसी सांसारिक योद्धा के लिए।

इसी क्रम में श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी सम्पद् को प्राप्त पुरुष विचार करता है, ‘‘वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और दूसरे शत्रु भी भविष्य में मेरे द्वारा मारे जायेंगे।’’- ऐसा सोचनेवाला अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा को कृश करनेवाला है। उस आत्मा और मुझ परमात्मा के बीच प्रकृति की परतें पड़ती जाती हैं, वह मुझ परमात्मा से दूर हो जाता है। ऐसे क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बारम्बार अधोगति और नीच योनियों में ही गिराता हूँ।’’ इतनी स्पष्ट चेतावनी सुनकर भी क्या अर्जुन लड़ता? यदि अर्जुन प्रण करके जयद्रथादि किसी को लड़ाई में मारता तो वह भी अधोगति और नीच योनियों का पात्र होता। फिर तो आसुरी योनियों में जाना चाहिए था, जबकि भगवान स्वयं कहते हैं कि, ‘‘अर्जुन! तू मुझमें निवास करेगा।’’ अर्जुन यदि लड़ता तो परमकल्याण को न पाता, भगवान को न पाता। खुले हुए नरक का द्वार देखकर भी क्या कोई लड़ेगा? कभी नहीं। मूर्ख भले ही लड़े किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण का शिष्य तो कभी नहीं लड़ेगा। अतः पूरी गीता में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है जो बाह्य मारकाट का समर्थन करे। संसार में झगड़े होते रहते हैं लेकिन जो जीतता है विजय उसकी भी नहीं होती। जब शरीर ही नाशवान् है तो शरीर के उपयोग की वस्तु कब तक साथ देगी? संसार में होनेवाली लड़ाई तो बदले हैं जिसमें जन्म-जन्मान्तर के संस्कार चुकाये जाते हैं। वास्तविक युद्ध तो अन्तःकरण की लड़ाई है, जिसमें एक बार जीत लेने पर हारने का प्रश्न ही नहीं खड़ा होता।

6- अध्याय आठ में श्रीकृष्ण ने कहा- ‘‘अर्जुन! प्रयाणकाल में मनुष्य जिसका स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है प्रायः उसी को प्राप्त होता है और जो पुरुष अन्तकाल में मेरा चिन्तन करते हुए शरीर का त्याग करता है वह साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।’’ तब तो बड़ा सस्ता सौदा है। जनम भर मौज करें, मस्ती काटें, जब मरने लगेंगे तो भगवान का स्मरण कर लेंगे। किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं ऐसा हो ही नहीं सकता। उस समय स्मृति भ्रमित रहती है, बुद्धि विकल रहती है। नवीन विचार आ ही नहीं सकते। आजीवन जिस भाव का अभ्यास रहता है, अन्तकाल में भी वही चिन्तन अनायास खड़ा हो जाता है। अतः अर्जुन! तू आज से ही मेरा चिन्तन कर। कल तो कभी आता ही नहीं। यदि करता है तो आज से ही कर और युद्ध भी कर।

अब निरन्तर चिन्तन और युद्ध कैसे सम्भव है? हो सकता है कि हम डण्डा फेंकते रहें; वाण चलाते रहें और ‘जय कन्हैया लाल की’, ‘जय भगवान’ कहते जायँ। किन्तु नहीं; इस प्रकार के चिन्तन से काम नहीं चलेगा। उस चिन्तन का विधान भी स्वयं श्रीकृष्ण अगले श्लोकों में स्पष्ट करते हैं- अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना (गीता, 8/8)- अर्जुन! उस चिन्तन का विधान है कि परम वैराग्य में स्थिर होकर, संगदोष से अलग रहकर, एकान्त-देश का सेवन करते हुए, इन्द्रियों को विषयों से भली प्रकार समेटकर, चित्त को सब ओर से खींचकर मुझमें लगाये। सिवाय मेरे किसी दूसरे विषय-वस्तु का चिन्तन न करते हुए मेरा निरन्तर चिन्तन करे।’’ इस प्रकार भगवान के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु का चिन्तन न आये। यदि आता है तो भजन नहीं है। एकान्त-देश में जहाँ साधक के अतिरिक्त कोई नहीं है, युद्ध किससे होगा? पुनः चिन्तन की विधि इतनी सूक्ष्म है कि इष्ट के अतिरिक्त किसी भी वस्तु का स्मरण तक न हो। मान लीजिए कि आपके सामने रखी वस्तु ही श्रीकृष्ण है तो उनके सिवाय पृथ्वी, गिलास, पुस्तक, ‘मैटर’ क्षेत्र की कोई भी वस्तु ध्यान में आ जाय तो चिन्तन नहीं है। जब चिन्तन इतना सूक्ष्म है तो युद्ध कैसे होगा। जिसकी आँखें बन्द हैं, दृष्टि स्थिर है, चित्त को सब ओर से समेटकर जिसने इष्ट में लगा रखा है, वह लड़ेगा कैसे? साधारण लड़ाई में तो शत्रु की गतिविधि क्षण-क्षण पर परखते रहते हैं। ध्यानस्थ व्यक्ति युद्ध किस प्रकार करेगा? अतः गीता साधारण युद्ध का उद्बोधन नहीं है।

वस्तुतः जब साधक चिन्तन में अग्रसर होता है, चित्त को सब ओर से समेटकर इष्ट में निरोध करने लगता है तो मायिक प्रवृत्तियाँ बाधा के रूप में प्रत्यक्ष हैं। मन उड़ने लगता है। इन मायिक प्रवृत्तियों का पार पाना ही युद्ध है। वास्तविक युद्ध तो इस आध्यात्मिक क्रिया में ही है इसीलिए अर्जुन प्रश्न उठाता है कि, भगवन्! इस मन को मैं वायु से भी तेज चलनेवाला पाता हूँ। इसका रुकना तो असम्भव ही है। श्रीकृष्ण उसे उत्साहित करते हैं, असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।अर्जुन! इसमें कोई संशय नहीं कि मन बड़ा दुर्जय एवं चंचल है। बड़ी कठिनाई से वश में होनेवाला है; किन्तु अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते (गीता, 6/35)- अभ्यास और वैराग्य द्वारा अयुक्त मन को भी निरुद्ध किया जा सकता है। मन को एक स्थान पर बार-बार सब ओर से समेटने का नाम अभ्यास है और वैराग्य का आशय है- देखी और सुनी विषय-वस्तुओं में राग का सर्वथा त्याग। जहाँ भी चित्त जाय, वहाँ से समेटकर इष्ट में लगाने का नाम ही अभ्यास है। दीर्घकाल तक अभ्यास और वैराग्य द्वारा यह मन शनैः-शनैः निरुद्ध होते-होते सर्वथा रुक जाता है। अतः अर्जुन! तू अभ्यास कर। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने चिन्तन का जो स्वरूप बताया उसके लिए वैराग्य और अभ्यास ही एकमात्र माध्यम है जिसमें चित्त को सब ओर से समेटकर केवल इष्ट में लगाना होता है।

इसी रहस्य की ओर संकेत करते हुए श्रीकृष्ण गीता के तीसरे अध्याय के तीसवें श्लोक में कहते हैं कि, अर्जुन! अध्यात्मचेतसा’- ध्यानस्थ चित्त से युद्धस्व’- युद्ध कर। यदि चित्त ध्यान की ओर उन्मुख है, आँखें बन्द हैं, सुरत की डोर लग रही है तो युद्ध किससे होगा? किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं- युद्ध कर। वस्तुतः सुरत की डोर लगाते समय जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार उभरकर सामने आते हैं। संगदोषजनित वर्तमान का दोष, यहाँ तक कि कुछ क्षण पूर्व का टकराव भी दृश्य बनकर सामने आता है। इन विजातीय संकल्पों का पार पाना ही युद्ध है अन्यथा जिसका चित्त ध्यान में केन्द्रित है वह भला किससे लड़ेगा?

7- इसी सन्दर्भ में इन शत्रुओं पर भी विचार कर लिया जाय जिनसे लड़ना है। तीसरे अध्याय में अर्जुन ने पूछा- भगवन्! जो कुछ आप कहते हैं, यदि वह सत्य है, फिर मनुष्य न चाहता हुआ भी किसकी प्रेरणा से पाप का आचरण करता है? श्रीकृष्ण ने बताया, काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः (गीता, 3/37)- अर्जुन! रजोगुण से उत्पन्न काम और क्रोध ही इस रास्ते के महान् शत्रु हैं। यही ज्ञान-विज्ञान को नष्ट करनेवाले तथा ज्ञानियों के निरन्तर के शत्रु हैं। इन्द्रियाँ और मन इनके निवास-स्थान हैं। इसलिए भरतर्षभ! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके कामरूपी इस दुर्जय शत्रु को मार। जब शत्रु अन्दर है तो बाहर कोई किसी से क्यों लड़ेगा? अतः यह अन्तःकरण की लड़ाई है, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का संघर्ष है। अंतःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं- दैवी सम्पद् और आसुरी सम्पद्। एक परमकल्याण करनेवाली है तो दूसरी अधोगति की ओर ले जानेवाली है। जब साधक चिन्तन द्वारा दैवी सम्पद् की ओर अग्रसर होता है तो आसुरी सम्पद् बाधा के रूप में प्रत्यक्ष ही है। इसका पार पाना ही युद्ध है।

8- शत्रुओं का स्वरूप स्पष्ट करते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार ही एक शत्रु है। ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् (गीता, 15/1)- संसार पीपल का वृक्ष है। जिसमें ऊपर परमात्मा ही मूल है, नीचे प्रकृति ही शाखाएँ हैं। यह अविनाशी भी है। जो इसे जानता है वह वेद के तत्त्व का ज्ञाता है।

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।

अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके।। (गीता, 15/2)

अर्जुन! इस संसार-वृक्ष की तीनों गुणरूपी जल के द्वारा बढ़ी हुई शाखाएँ, विषय-भोगरूपी कोपलें देव, मनुष्य और तिर्यक् योनियों में सर्वत्र फैली हुई हैं। अन्य योनियाँ तो केवल भोग भोगने के लिए हैं। केवल मनुष्य ही कर्मों का रचयिता है। इसीलिए देवता भी मानव-तन से आशावान् हैं। अतः मानव-तन अति दुर्लभ है। इस मानव-योनि में कर्मों के अनुसार बाँध लेनेवाली अहम् और ममतारूपी जड़ें भी नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं। अतः इस संसाररूपी शत्रु को असंगतारूपी शस्त्र से काट! यहाँ संसार ही एक शत्रु है।

9- छठें अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! यह आत्मा ही अपना शत्रु और मित्र है, विश्व में और कोई शत्रु या मित्र नहीं है। जिस पुरुष द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ जीती हुई हैं, उसके लिए उसी की आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतती है, परमकल्याण करनेवाली होती है और जिस पुरुष के द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ नहीं जीती गयी हैं उसके लिए उसी की आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतती है, अधोगति और अधम योनियों में फेंकनेवाली होती है। अतः अर्जुन! तू अपने द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार कर। यहाँ काम शत्रु, क्रोध शत्रु, संगदोष शत्रु, संसार शत्रु तथा इन्द्रियों के अधीन रहनेवाली आत्मा को भी शत्रु कहा गया है। हिन्दू शत्रु, मुसलमान शत्रु, ईसाई शत्रु या राज्य हड़पनेवाले को शत्रु नहीं कहा गया। जब शत्रुओं का यही स्वरूप है तो कोई बाहर किसी से क्यों लड़ेगा? जब शत्रु घर में है तो बाहरवालों से लड़ना कौन-सी बुद्धिमानी है?

दुनिया में झगड़े होते रहते हैं। आज जीते तो कल हारे! विश्व-विजय का सपना देखनेवाला सिकन्दर भी आहें भरता रह गया। संसार नश्वर है। यदि इतने के लिए ही कोई सिर पीटता है तो सिद्ध है कि वह अविवेक से आवृत्त है। जो स्वयं नश्वर है, उसमें हम ढूँढ़ क्या रहे हैं? वहाँ विजय कहाँ? वास्तविक युद्ध इस आध्यात्मिक प्रक्रिया में है जिसमें एक बार विजय पा लेने पर पुनः कभी हार नहीं होती। इस प्रक्रिया में मन के निरोध के साथ ही संसार का निरोध हो जाता है, संस्कारों का निरोध हो जाता है। मनसहित इन्द्रियों के निरोध होते ही आत्मा अनुकूल और विदित हो जाती है। उस दिग्दर्शन के साथ ही जीवात्मा उस परमतत्त्व में प्रवेश पा जाती है, विलय हो जाती है, जहाँ से पुनरावर्तन नहीं होता। यह ऐसी विजय है जिसके पीछे कभी हार नहीं होती।

क्रमशः साधना के सही दौर में पड़कर अनुभवी महापुरुष के संसर्ग और कृपाप्रसाद से जब हृदय में यौगिक क्रिया जागृत हो गयी, वे प्रेरक अभिन्न होकर, आत्मा से रथी बनकर रथ-संचालन करने लगें तो क्रमशः चलाते-चलाते, प्रकृति की भँवर से निकालते हुए साधक को अपने समकक्ष उसी स्थान पर खड़ा कर देंगे जहाँ से फिर पीछे लौटकर जीवात्मा आवागमन में नहीं आती। यह ऐसी विजय है, जिसके पश्चात् काल, कर्म और प्रकृति पर विजय मिल जाती है। साधक पुरुषत्व में चेतन का प्रतिबिम्ब पा लेता है। फिर तो काल, कर्म और प्रकृति उस पुरुषत्व में विलीन हो जाती है। इस स्तर पर पहुँचकर साधक स्वयं कल्याणस्वरूप, एकरस, अविनाशी, अव्यक्त और स्रष्टा का प्रतिबिम्ब पा जाता है। यही इस आध्यात्मिक युद्ध का परिणाम है। उस प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों ने निर्णय पाया कि ओम् ईशावास्यमिद~सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् (ईषा.उप., मन्त्र 1)- सर्वत्र ईश्वर का वास है। दूसरे शब्दों में, किंचित् मात्र भी जगत् है ही नहीं, तो कोई नष्ट कहाँ होगा? गड्ढा है ही नहीं तो कोई गिरेगा किसमें? अतः पूर्णता प्राप्त कर लेने पर पुनरावर्तन का विधान नहीं है। यही शाश्वत विजय है। वास्तव में गीता अन्तःकरण की लड़ाई है। अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं- दैवी सम्पद् और आसुरी सम्पद्। दैवी सम्पद् कल्याण के लिए है तो आसुरी सम्पद् नीच योनियों में ले जानेवाली होती है। साधक जब परमतत्त्व की ओर, विद्या की ओर अग्रसर होता है तो आसुरी सम्पद् बाधा के रूप में प्रत्यक्ष ही है। इन प्रवृत्तियों का पार पाना ही युद्ध है। बाहरी मार-काट गीता का अभीष्ट नहीं है।

।। ओम् ।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

Q & A
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