गीतोक्त वर्ण–व्यवस्था
प्रश्न – महाराजजी! गीता में वर्ण–व्यवस्था का स्वरूप क्या है?
उत्तर– गीता में जैसी वर्ण-व्यवस्था पायी गयी है उसे समझने के लिए गीतोक्त कर्म को समझ लेना आवश्यक है। गीता के अनुसार, आराधना ही कर्म है। यज्ञ और कर्म एक दूसरे के पूरक हैं। आराध्य को प्राप्त करा देनेवाला रास्ता ही यज्ञ है, जिसमें चिद्विलास जगत् ही हवन-सामग्री है। इस यज्ञ की अन्तिम आहुति में संचित और प्रारब्ध को, वृत्तियों सहित चित्त के अस्तित्व को प्रकृति के प्रवाह रूप तीन गुणों को समाहित कर बुद्धि भी यज्ञरूप हो जाती है। तत्क्षण यज्ञ के परिणामस्वरूप प्राप्त होनेवाला परमात्मा असम्भव से सम्भव हो जाता है।
यज्ञ को क्रियारूप में लाना कर्म कहलाता है। दूसरे शब्दों में, यज्ञ के आचरण को कर्म कहते हैं-
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।। (गीता, 3/9)
वस्तुतः यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। इसके अतिरिक्त जो किया जाता है, जिसमें सारा संसार मरता-जीता और मोहित रहता है, कर्म नहीं है। वह तो इसी लोक का बन्धन है, जीवों के बन्धन का कारण है। गीता जिसे कर्म कहती है वह तो अमरत्व की उपलब्धि करानेवाला है। गीता में यत्र-तत्र सर्वत्र कर्म के इसी पक्ष पर बल दिया गया है; क्योंकि यही कर्म पूर्ण कल्याण करनेवाला है। परमपद और परमधाम इसी कर्म की पूर्ति में है। गीतोक्त कर्म आराधना अथवा चिन्तन की पद्धति मात्र है। सुगमता की दृष्टि से इसी कर्म को चार क्रमिक सोपानों में विभाजित किया गया, जिसे श्रीकृष्ण ने वर्ण के नाम से पुकारा। ‘वर्ण’ नामकरण में बहुत बड़ा रहस्य छिपा है। वर्ण का शाब्दिक अर्थ रूप, रंग, आकृति होता है। अध्ययनकर्ता जिस श्रेणी का होता है उसका हाव-भाव, उसकी आकृति उसी स्तर के अनुरूप होती है। उदाहरणार्थ, प्राथमिक कक्षा का छात्र सैकड़ों उलझनों की अनुभूति में डूबता-उतराता रहता है। यह मानसिक उथल-पुथल उसे एक प्रकार की आकृति प्रदान करती है। इसके विपरीत ‘डाक्टरेट’ इत्यादि उपाधियों से अलंकृत, पारंगत विद्वान् अपने को पूर्ण अधिकार में देखेगा। उसके विचारों का वेग कुछ और ही होगा। अपने विषय पर उसका स्वामीभाव रहेगा। प्राथमिक छात्र की अपेक्षा उसकी उमंग कुछ और होगी, वर्ण या चेहरे की रंगत में आकाश-पाताल का अन्तर होगा। उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट योनियों की प्रगति भी मानसिक स्तर से निर्धारित होती है। मृत्यु के समय मन उच्च विचारों से ओतप्रोत रहने से उच्च योनियाँ प्राप्त होती हैं। इसी प्रकार संकीर्ण विचारों से क्षुद्र योनियों में जन्म लेना पड़ता है। अतः मनःस्थिति ही आकृति का निर्धारक है। और स्पष्ट कहा जाय तो मन की स्थिति ही आकृति है।
श्रीकृष्ण ने गुणों के भेद से कर्मों को चार वर्णों में विभक्त किया। दैनिक जीवन में देखा जाता है कि मनुष्य भजन करने बैठता है लेकिन मन नहीं लगता। विचारों का ज्वार आ जाता है। जो बात याद नहीं थी, भजन के ही समय याद आती है। भजन में बाधक कौन बनता है? इसमें मौलिक अवरोध कहाँ से है? चिन्तन से ज्ञात होता है कि तीनों गुण ही इस कर्म (भजन) में रुकावट हैं। इन तीनों गुणों के माध्यम से ही कर्म (आराधना) का उत्थान और पतन होता है। गुणों से कर्म को देखा और मापा जाता है। गुण ही वर्ण परिवर्तन की जाँच का पैमाना है। मन की केन्द्रित अथवा विच्छिन्न अवस्था गुणों के कारण ही होती है। परन्तु कर्म (भजन) एक ऐसा यंत्र है जो गुणों के सम्पूर्ण कार्य को उठाता-गिराता है और गुण को जड़ से उखाड़ भी देता है। कर्म के प्रभाव से गुण प्रभावित होते हैं।
श्रीकृष्ण का कथन है कि ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्’- चार वर्णों की रचना मैंने की है। मनुष्य को नहीं बल्कि कर्म को चार भागों मे बाँटा है। किस आधार पर? श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘गुणकर्म विभागशः’ (गीता, 4/13)- गुणों के उतार-चढ़ाव से कर्म को वर्णों (श्रेणियों) में बाँटा गया है। अतः मनुष्य ब्राह्मण-क्षत्रिय नहीं है बल्कि भजन ही ब्राह्मण है, भजन ही क्षत्रिय है, भजन ही वैश्य है और शूद्र भी है। यह विभाजन गुणों पर आधारित है। तीनों गुण अलग-अलग प्रभाववाले हैं। मन इनके रहने का स्थान है। गुण तीन हैं, किन्तु वर्ण चार हैं; क्योंकि एक गुण जितनी मात्रा में हटता है दूसरा गुण उतनी ही मात्रा में उसका स्थान ग्रहण करता है। तीनों गुणों में से प्रत्येक का स्वभाव है कि बढ़ने पर वह शेष दो गुणों को दबा देता है। अतः समान अनुपात में दो गुणों के मिश्रण से एक अधिक वर्ण का सृजन स्वाभाविक है। व्यवहार में, जिस व्यक्ति में केवल सात्त्विक गुण हैं उसे ब्राह्मण, आधा सात्त्विक और आधा राजसी गुणवाले को क्षत्रिय, आधा राजसी और आधा तामसी को वैश्य तथा मात्र तामसी गुणवाले को शूद्र कहा जाता है।
ब्राह्मण– जिस पर सात्त्विक गुण का प्रभाव है, जो ब्राह्मण है, उसका मन स्वभावतः शान्त होगा। अन्तःकरण का निग्रह, इन्द्रियों का दमन, बाह्यान्तर की शुद्धता, क्षमा, तप, सरलता, ज्ञान, विज्ञान, ईश्वरीय जानकारी की मस्ती इत्यादि उसमें स्वभाव से ही रहेगा। जिसके अन्तःकरण में सात्त्विक गुण मात्र है, जिनमें राजसी एवं तामसी गुण कार्यरत नहीं हैं उस पुरुष में सात्त्विक गुणों के कार्य ज्ञान, विज्ञान, ध्यान इत्यादि ब्रह्म-लक्षण स्वाभाविक रहेंगे। ब्राह्मण अथवा उच्चकोटि के साधक के लिए यही करना विधेय है। ऐसा करने में ही उसका कल्याण है।
क्षत्रिय– जिसके अन्तःकरण में तामसी गुणों का पूर्णतः अभाव है, राजसी गुण भी आधा शान्त हो चुका है परन्तु सात्त्विक गुण पूरा नहीं मिला ऐसा; अति उत्तम तो नहीं, उत्तम साधक क्षत्रिय वर्ण का है। ऐसा साधक शूरवीर होता है, माया की चपत से कायर नहीं होता है। आसुरी वृत्तियों से युद्ध करने में कभी पलायन नहीं करता। उसमें ईश्वर-भाव अर्थात् स्वामिभाव बना रहता है क्योंकि भजन की बाधाओं पर विजय प्राप्त करने में उसे दृढ़ विश्वास रहता है। आत्म-प्रकाश का तेज, धैर्य, दक्षता, दान इत्यादि क्षत्रीत्व के लक्षण हैं। राजसी और सात्त्विक गुण का आधा-आधा मिश्रण जब कार्यरत होता है तब यह लक्षण स्वतः बन जाता है। इन गुणों के सम्मिश्रण के बिना बलात् कोई क्षत्रिय नहीं बन सकता; क्योंकि इन लक्षणों की जड़ तो स्वभाव है, जो गुणों से निर्धारित होता है। इसीलिए श्रीकृष्ण ‘क्षात्रकर्म स्वभावजम्’ (गीता, 18/43) कहते हैं, अर्थात् उपर्युक्त लक्षण स्वभावस्थ हैं, आदत का अंग बन चुके हैं। इसलिए क्षत्रिय के कर्म को भी स्वभाव ने जन्म दिया।
वैश्य– जिसके अन्तःकरण में आधा तामसी और आधा राजसी गुण होता है वह वैश्य है। ऐसे व्यक्ति के भजन-पथ से आधा तमस् हट चुका है, अर्धरजस् से पथ आलोकित है। अतः कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य ऐसे साधक के लिए स्वाभाविक कर्म हैं। ‘राम नाम धन खेती’- आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। इसी का उपार्जन करना ही खेती है। ‘गो’ इन्द्रियों को कहते हैं। अतः गो-रक्षा का तात्पर्य इन्द्रियों की रक्षा है। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विषयों में इन्द्रियों का विचरना ही उनका नष्ट होना है। ज्ञान-विज्ञान, विवेक-वैराग्य से उनकी रक्षा होती है। आत्मिक सम्पत्ति का अपव्यय नहीं होने पाता। आत्मिक सम्पत्ति को विषयों में न खोकर उनका संग्रह करना ही धन कमाना है। माया इस संग्रह में बाधक है। वह इस आत्मिक सम्पत्ति को क्षीण करती रहती है। घाटा दिलाती रहती है। इसलिये भजन भी एक प्रकार का व्यवसाय है, जिससे आत्मिक सम्पत्ति का संवर्द्धन करना वैश्य का स्वभाव माना गया है। आत्मिक सम्पत्ति को अपने में ढालना ही पूँजी का संग्रह है। यही सत्य व्यापार है जो निज धन की प्राप्ति करानेवाला है। ऐसे पुरुष का मन साधना में लगने लगता है।
शूद्र– भजन की सबसे क्षुद्र सोपान शूद्र है। जो उन व्यक्तियों में पाया जाता है जिनके अन्तःकरण में तामसी गुण कार्यरत रहते हैं, राजसी गुण की क्षीण रेखा ही रहती है। व्यक्ति के मन में प्रमाद और आलस्य विशेष होगा। प्रयत्न करने पर भी उसका मन स्थिर नहीं रह सकेगा। सत्य वस्तु को समझने की क्षमता भी उसमें नहीं होगी। उसका मन तमस् से पूर्णतः आच्छादित होने के कारण अपने लक्ष्य को नहीं देख पाता। आराधना में मन लगता ही नहीं। कर्म के क्षेत्र में उसका स्थान तुच्छ होता है । अतः शूद्र स्वभाववाले व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने निजी उत्थान के लिए महापुरुषों की सेवा करे- ‘परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।’ (गीता, 18/44)
जो महापुरुष अपने से बहुत ऊपर उठ चुके हैं, उनको पकड़ें। उनकी शरण होकर तन-मन-वचन से सेवा करने का विधान है। सेवा-धर्म परम गहन है। सेवक किसी भी सेवा को तुच्छ नहीं समझता। वह कभी यह तर्क नहीं करता कि बिस्तर-झाडू क्यों लगाऊँ या टट्टी क्यों साफ करूँ? वस्तुतः जो महापुरुष पवित्र हो चुके हैं, उनके सान्निध्य से ही शूद्र स्तर के साधक का मल दूर हो सकेगा। इसी सेवा में ही उसे आगेवाली श्रेणी प्राप्त हो सकेगी, वह वैश्य-गुणधर्म को पकड़ सकेगा। उसमें जो योग्यता नहीं थी, वह भी आ जायेगी।
इस प्रकार गुणों के उतार-चढाव से कर्म के चार विभाजन किये गये। जिसे ब्रह्म का निकटवर्ती अनुभव है, प्रवेश करना ही शेष है, जिसके पश्चात् कर्म की आवश्यकता ही नहीं रहती, ऐसे सत्त्वगुण से संचालित, ज्ञान, विज्ञान, ध्यान और समाधि की अवस्था जिसमें स्वभाव से है वह ब्राह्मण है। ‘क्ष’ काटने को तथा ‘त्री’ तीन को कहते हैं। तीनों गुणों को काटने की जिसमें क्षमता है वह क्षत्रिय है। भजन के विघ्नों का सामना करने में शूरवीरता, आत्मतेज, स्वामिभाव इत्यादि कर्म उसमें स्वभाव से ही होते हैं, जो ब्राह्मणत्व प्राप्ति के कारण हैं। भजन में मन का कुछ-कुछ लगना, सद्गुणों का एक-एक करके हृदय में लाना, इन्द्रियों की विषयोन्मुखी प्रवाह को रोकना वैश्य का सहज कर्म है जो क्षत्रियत्व की ओर ले जानेवाला है। इस प्रकार जिस साधक से कुछ भी पार न लगता हो, निद्रा-प्रमाद और आलस्य की अधिकता से भजन न बन पड़ता हो, ऐसे शूद्र स्थिति वाले के लिए कर्म (भजन) का प्रथम चरण सेवा है। उस सेवा के प्रभाव से वह वैश्यत्व की ओर अग्रसर हो सकेगा।
चराचर जगत् ही तीनों गुणों का विकार है। देवता, मनुष्य, राक्षस सभी इन तीन गुणों के अन्तर्गत ही आते हैं (गीता, 18/40)। इससे सिद्ध है कि देश-विदेश के सभी लोग भजन-प्रवेश के साथ इन वर्णों के अन्तर्गत हैं। वे लोग भ्रम में हैं जो कहते हैं कि वर्ण केवल हिन्दुस्तान में है। वस्तुतः हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, जैन, यहूदी अथवा विश्व का कोई भी प्राणी जब परमात्म-स्वरूप की ओर बढ़ेगा, तब गीता के अनुसार चार वर्णों में से उसे गुणों के अनुरूप किसी-न-किसी वर्ण में आना ही पड़ेगा। चाहे आप हिन्दू ही क्यों न हों, भजन में प्रवेश शूद्र स्तर से ही होगा।
भगवत्-पथ (कर्म) में वेषधारी ठग बहुत से हैं। योग्यता में तो वे शूद्र हैं, तमोगुण के बाहुल्य से उनका मन तो हवा से बातें करता है; किन्तु स्वांग ऐसा भरते हैं जैसे तपोधन हों। ऐसे वंचक कर्म के क्षेत्र में कुछ भी नहीं कर पाते। श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्वभाव से प्राप्त स्थिति को छोड़कर जो ऊँची श्रेणी की नकल करता है वह वस्तुतः अपनी हानि ही करता है- ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।’ (गीता, 3/35)
क्रमशः चलकर तो बड़ी से बड़ी योग्यता प्राप्त की जा सकती है किन्तु प्राथमिक कक्षा का छात्र यदि उच्चकक्षा में बैठ जाय तो उच्चकक्षा का ज्ञान तो दूर रहा, प्राथमिक कक्षा की योग्यता से भी वह वंचित रह जाता है। लौकिक दृष्टान्त से इस प्रकार भी समझा जा सकता है- शूद्र, जिसे अभी ‘प्राइमरी’ में भी पढ़ना शेष है, यदि मैट्रिक या इण्टर की कक्षाओं में बैठने लगे तो उसे प्राइमरी का भी ज्ञान नहीं हो सकेगा। इसी प्रकार वैश्य, जिसे मिडिल या मैट्रिक तक पढ़ने का अधिकार है, बी.ए. की कक्षाओं में बैठे तो उसे मैट्रिक की योग्यता भी नहीं मिलती। इसी प्रकार बी.ए. की कक्षाओं में पढ़ने का अधिकारी क्षत्रिय, एम.ए. अथवा शोध की कक्षाओं में बैठे तो वह बी.ए. की भी योग्यता से शून्य हो चलेगा। यह तो एक दृष्टान्त मात्र है। वस्तुतः एक के पश्चात् एक कक्षा को पार करने पर ही जिस प्रकार पारंगत विद्वान् बना जाता है उसी प्रकार एक के पश्चात् दूसरे वर्ण को पार करने पर ही निज लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।
गीता का अकाट्य निर्णय है कि स्वभाव से प्राप्त अपने कर्म (भजन) द्वारा परमेश्वर की अर्चना करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। अपने धर्म का आचरण करते हुए अर्थात् गुण के अनुरूप कर्म करते हुए मरना भी कल्याणकर है जबकि दूसरों का धर्म भयावह है। दूसरों की नकल करनेवाला समूल विनष्ट हो जाता है। नकल करने के प्रयास में उसकी अर्जित क्षमता भी समाप्त हो जाती है। अतः गीता के अनुसार, ‘कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।’ (गीता, 18/41)- स्वभाव से उत्पन्न हुए गुणों के अनुसार कर्म विभक्त किया गया है। स्पष्ट है कि विभाजन कर्मों का हुआ है, मनुष्य का नहीं। अतः जिन लोगों का विचार है कि मनुष्यों का वर्ण जन्म से निर्धारित हो जाता है अथवा जिस वर्ण का बनना था बन गये, अब तो जीवन भर उसी वर्ण में रहकर भगवान की वाणी का पालन करना है, ऐसा सोचनेवाले भ्रान्ति में हैं। ऐसा प्रचार करनेवाले श्रीकृष्ण के उपदेशों से वस्तुतः दूर खड़े हुए हैं। श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि ‘कर्माणि प्रविभक्तानि’- कर्म को बाँटा गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने तो कृपा करके आराधना-पथ को चार सोपानों में विभक्त किया, जिससे कमजोर से कमजोर मनवाला मानव भी क्रमशः चलकर भगवान तक पहुँच सकता है। वहाँ तक पहुँचानेवाली क्रिया के विभिन्न सोपानों को पार करके आत्मा राक्षस से देवता और देवता से भी आगे प्रभु से मिलकर स्वयं प्रभुस्वरूप बन जाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि अनेक जन्मों से चलकर साधक मेरे स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। यह कर्म (आराधना) उच्च से उच्च योनियों में जन्म देता है, स्वरूप बनाता है। इसलिए इसका ‘वर्ण’ नामकरण यथार्थ एवं सार्थक है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने अतिशय प्रिय भक्त अर्जुन को आराधना-पथ के विभिन्न वर्णों को पार करने का परम गुह्यतम किन्तु सबसे सुगम उपाय गीता के उपसंहार के समय बताया है। उन्होंने कहा कि कर्म करनेवाला स्वयं इस चक्कर में न पड़े कि मैं किस वर्ण का हूँ। वह अपनी परीक्षण में समय को व्यर्थ न गँवाये। इसीलिए अर्जुन! तू किसी वर्ण-धर्म का विचार न करके मेरी शरण में हो जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा। यह उल्लेखनीय है कि योगेश्वर, परमात्मा, परमतत्त्व, परमपुरुष, सद्गुरु साधन- काल में एक दूसरे के पर्याय के रूप में कार्य करते हैं। साधक को अपने वर्ण की चिन्ता छोड़कर उनकी शरण में ही जाना चाहिए। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।’ (गीता, 18/57)- चित्त से सभी कर्मों को मुझपर छोड़कर मेरे परायण हो जा। ऐसा करने से वर्ण मिटेंगे नहीं बल्कि शरण में होने पर वर्णों से पार करने की जिम्मेदारी भगवान पर हो जाती है। वर्णों को तो पार करना ही होगा किन्तु स्वामी पर जिम्मेदारी सौंपकर सेवक निश्चिन्त हो जाता है। जब वर्ण भगवान द्वारा सृजित हैं तो उनके अनुरूप साधक में गुणों का समावेश कराना भगवान या सद्गुरु के लिए नितान्त सरल है। इसीलिए श्रीकृष्ण स्पष्ट कह देते हैं-
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता, 18/62)
अर्जुन! तू सब प्रकार से उन्हीं परमेश्वर की शरण में जा। उन्हीं की कृपा से ही तू परमशान्ति एवं शाश्वत स्थान को प्राप्त कर सकेगा। किसी महापुरुष की शरण में रहकर वर्णों को पार करना सुगम है।
गीतोक्त वर्ण-व्यवस्था के इस विवेचन से कई महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं-
1- भगवत्प्राप्ति के उपायों का नाम यज्ञ है और उस यथार्थ क्रिया का नाम कर्म है। यज्ञ जिस प्रकार किया जाता है वह कर्म है।
‘कर्माणि प्रविभक्तानि’- कर्म को चार वर्णों में बाँटा गया है, न कि मनुष्यों को। गीतोक्त कर्म का अर्थ आराधना है। इसी आराधना के चार सोपान हैं। एक बार जागृत हो जाने पर यह कर्म तभी पीछा छोड़ता है जब इन चारों वर्णों से गुजर जाय।
2- जो भगवत्पथ पर नहीं चलता, वह किसी भी वर्ण का नहीं है। वह न तो ब्राह्मण है न क्षत्रिय, न तो वैश्य है न शूद्र। वर्ण उसके लिए है जो कर्म करता है, आराधना करता है। परमात्मा की प्राप्ति के अतिरिक्त सांसारिक कार्यों में संलग्न लोग न तो किसी वर्ण की क्रिया करते हैं और न तो गीतोक्त किसी वर्ण के अन्तर्गत आते हैं। यदि आस्तिक हैं तो प्रत्याशी अवश्य हैं। जो इच्छा करता है वही तो पाता है, जो नहीं करता वह कभी नहीं पाता, मात्र हताशा हाथ लगती है।
3- गीतोक्त वर्ण-व्यवस्था मानसिक स्थिति पर निर्भर करती है, जबकि हिन्दुओं में प्रचलित वर्ण-व्यवस्था भौतिक शरीर का सामाजिक विभाजन मात्र है। समाज में प्रचलित ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्ण शरीर के हैं। इनकी उतनी ही सीमा है। इन वर्णों से शरीर का निर्वाह होता है और जीवनयापन की दृष्टि से यह विभाजन अपने स्थान पर उचित ही है। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारकों में परिवर्तन होने से वर्ण-व्यवस्था में उलट-फेर होता रहा। प्रारम्भ में जातियों एवं वर्ण श्रेणियों की कोई रूपरेखा नहीं थी। कालान्तर में समाज सुर और असुर इन दो वर्णों में बँट गया। फिर तो गन्धर्व, पिशाच, यक्ष, वानर इत्यादि वर्ग बने और मिटे। जीविका के साधनों की उत्कृष्टता अथवा निष्कृटता के आधार पर समाज अनन्त चक्रों में विभाजित होता गया और भविष्य में भी होता रहेगा। ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा जो भी नाम दिया जाय, उदर-पोषण को लेकर समाज में वर्ग बनते ही रहेंगे; किन्तु वास्तविक कल्याण के लिए गीतोक्त वर्ण-व्यवस्था ही यथार्थ है। मोह से पराधीन होकर मनुष्य स्वयं अपने को नष्ट करता है। वस्तुतः न तो कोई मुसलमान घातक है, न कोई अन्य धर्मावलम्बी ही आध्यात्मिक प्रगति में बाधक हो सकता है। कर्म ही व्यक्ति का उन्नायक है और उससे रहित होकर मनुष्य स्वयं ही अपने को नष्ट करता है, गीता का यह दृढ़ निश्चय है।
4- तीनों गुणों के द्वारा कर्म (भजन) को चार वर्णों में बाँटा गया और इन तीनों गुणों के अन्तर्गत ही सम्पूर्ण संसार है। इससे भगवान ने स्पष्ट कर दिया कि सारा संसार चार वर्णों के अन्तर्गत है। यह उल्लेखनीय है कि योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अठारहवें अध्याय में वर्ण विभाग का वर्णन यहीं से प्रारम्भ किया कि देवलोक, मृत्युलोक यावन्मात्र सर्वजगत् तीनों गुणों से उत्पन्न होकर उन्हीं से कार्य करते हैं। गुण ही ऊँचे-नीचे स्वभाव का कारण है और उसी स्वभाव से वर्ण बनते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण संसार वर्णधर्म से बाहर नहीं है। इस बात पर पुनः बल देना समीचीन होगा कि संसार का अर्थ केवल भारत ही नहीं होता।
5- तीनों गुणों से स्वभाव बनता है, स्वभाव से ही वर्ण की योग्यता निर्धारित होती है। छोटे गुण से क्षुद्र स्वभाव बनता है जबकि बड़े गुण से ब्राह्मणत्व जैसा बड़ा स्वभाव बन जाता है। गीता के ही अनुसार किसी भी गुण को बढ़ाया जा सकता है। अध्याय चौदह के दसवें श्लोक के अनुसार कोई भी गुण शेष दो गुणों को दबाकर बढ़ाया जा सकता है, बढ़ता-घटता है। इस प्रकार यदि गुणों में परिवर्तन सम्भव है तो शूद्र से वैश्य, वैश्य से क्षत्रिय, क्षत्रिय से ब्राह्मण होना नितान्त सम्भव है। इसी का अनुसरण करके आज भी आप जगद्गुरु हैं।
6- अत्यन्त चंचल मनवाले व्यक्ति भी साधना के सही दौर में पड़ने पर संकल्परहित समाधि की क्षमता वाले देखे गये। वाल्मीकि, सूरदास, तुलसीदास इत्यादि महापुरुषों के प्रारम्भिक जीवन पर दृष्टिपात करने से यह तथ्य उद्भासित होता है कि स्वभाव में परिवर्तन सम्भव है। उनके जीवन के पूवार्ध और उत्तरार्ध के स्वभाव में पूरब और पश्चिम का अन्तर पाया जाता है। काम-क्रोध, लोभ से चंचल उनका मन समाधि की क्षमतावाला तथा सरलता से युक्त पाया गया, जो ब्राह्मण के लक्षण हैं। इस प्रकार यदि स्वभाव में परिवर्तन सम्भव है तो वर्णों के परिवर्तन में भी संदेह नहीं है।
7- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वर्ण-परिवर्तन के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि अर्जुन! वेद तीन गुणों तक ही प्रकाश करते हैं अथवा तीनों गुणों तक ही सीमित हैं, इसलिए तू वेदों के बन्धन से ऊपर उठ। साथ ही श्रीकृष्ण ने ऊपर उठने का तरीका भी बताया कि निर्द्वन्द्व, एकरस, सत्त्व में स्थित हो और योगक्षेम की चिन्ता न कर आत्मपरायण बन! श्रीकृष्ण के शब्दों में-
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।। (गीता, 2/45)
यहाँ प्रश्न खड़ा होता है कि क्या कोई वेदों से ऊपर उठा? (वेदों से, गुणों से ऊपर उठना एक ही वस्तु है) और यदि कोई कभी उठा तो उसकी क्या गति हुई? इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस प्रकार बड़े जलाशय के प्राप्त होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय से जितना प्रयोजन रह जाता है, ठीक उतना ही प्रयोजन ब्रह्म को जाननेवाले ब्राह्मण का वेदों से रहता है। सारांशतः वेद तीन गुणों तक ही प्रकाश करते हैं, इसलिये वेदों से ऊपर उठ। ऊपर उठने पर जो स्थिति आती है उसका नाम ब्राह्मण है। यहाँ ब्रह्म प्रत्यक्ष है। अर्थात् तू ऊपर उठ, ब्रह्म को जान और ब्राह्मण बन-
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।। (गीता, 2/46)
कर्म की गति वस्तुतः गूढ़ है। क्या कर्म है? क्या अकर्म है?- बड़े-बड़े विद्वान् भी इसी स्थल पर संशययुक्त हैं। वस्तुतः कर्म का तात्पर्य आराधना है। और अकर्म का आशय मात्र इतनी मान्यता है कि करानेवाला कोई और है, मैं तो निमित्त मात्र हूँ- ऐसा समझकर कर्म में तल्लीन हो जाना ही मोक्षप्रद है। इसी का नाम निष्काम कर्म है। कर्म की अन्तिम स्थिति ब्राह्मण श्रेणी की कही जाती है।
8- कोई ब्राह्मण कब बनता है? इस प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।। (गीता, 4/19)
जब सम्पूर्णता से प्रारम्भ किया हुआ कर्म (जिसमें कहीं कमी न हो) क्रमशः उस श्रेणी पर पहुँच जाय जहाँ काम और संकल्प का सर्वथा अभाव है (सिद्ध है कि कर्म कोई ऐसी वस्तु है जो मन की संकल्पों से उपराम करता है), तहाँ ज्ञान-अग्नि में कर्म जल जाते हैं और कर्म के जलते ही वह प्राणी महर्षियों द्वारा बोधस्वरूप ब्राह्मण कहा जाता है। इससे सिद्ध है कि कोई भी पुरुष ब्राह्मण अथवा पण्डित बन सकता है। कोरी, चमार, वैश्य, शूद्र, ईसाई, मुसलमान, यहूदी सभी कर्म को समझ, उस पर चलकर ब्राह्मण बन सकते हैं।
9- यथार्थ तो यह है कि ब्राह्मण बनना ही हमारा लक्ष्य नहीं है। यह वर्ण भी दोषों का घर है। अन्य वर्णों की अपेक्षा यह वर्ण सुलझा हुआ अवश्य है किन्तु सुलझे कर्म का कर्त्ता भी मुक्त नहीं कहा जा सकता। ब्राह्मण वर्ण प्राप्त कर लेने पर भी हार्दिक प्रसन्नता कैसे होगी जबकि संसार पीछे लगा है। जहाँ तक वर्ण और कर्म है, संसार का अस्तित्व भी साथ ही है। इसलिए वर्णों से कोई आशा नहीं करनी चाहिए। वर्ण छोटा मिला हो अथवा बड़ा, वह हमारा लक्ष्य नहीं है। हाँ, लक्ष्य तक पहुँचने में वह सहयोग अवश्य देता है। उन्हें पार किये बिना लक्ष्य तक पहुँचा भी तो नहीं जा सकता। इसलिए इन वर्णधर्मों का पालन आवश्यक है। प्रत्येक वर्ण के निर्धारित लक्षणों को जो अपने में अच्छी तरह ढाल लेता है, वह आगे के वर्ण में प्रवेश का अधिकारी बन जाता है। क्रमशः चौथे वर्ण के धर्म की जिस क्षण पूर्ति होती है उसी क्षण परमप्रभु अपने दीन सेवक को अपना बना लेते हैं। अपने में स्थिति प्रदान कर देते हैं।
10- परमप्रभु परमात्मा में स्थिति प्राप्त करना ही जीव का चरम लक्ष्य है। यह वह स्थल है जहाँ वर्ण नहीं रह जाता, कर्म नहीं रह जाता, धर्म-अधर्म कुछ भी तो नहीं शेष बचता। श्री शंकराचार्यजी इसी स्तर से बोल उठते हैं- ‘न ब्राह्मणः न क्षत्रियो न वैश्यो न शूद्रः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।’ जीवात्मा एवं परमात्मा का द्वैत इसी बिन्दु पर सदा-सदा के लिए तिरोहित हो जाता है। इसी अद्वैत स्थिति का संकेत गोस्वामीजी भी ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई’ कहकर करते हैं। यही नानक का ‘वाहे गुरु’ और कबीर का ‘प्रत्यक्ष स्वरूप’ है। जिसके अखण्ड-अभेद स्वरूप में वर्णभेद का कोई स्थान नहीं है।
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! तू मुझमें निवास करेगा। अनेक जन्मों के अन्त में पूर्णत्व पानेवाला ज्ञानी मेरा ही स्वरूप है, मुझमें और उस ज्ञानी में किंचित् अन्तर नहीं है। (गीता, 7/19)। अब उस भजन का स्वरूप क्या है? श्रीकृष्ण कहते हैं- मेरे पास आओ अर्थात् किसी तत्त्वस्थित महापुरुष के पास जाकर निष्कपट भाव से सेवा और प्रश्न करते हुए उस ज्ञान को प्राप्त करो। ‘सद्गुरु मारे उलट निहारे, सोवत में उठ जागे।’
प्रश्न– सरकार! वर्ण–व्यवस्था के सम्बन्ध में ऋग्वेद के अनुसार ब्राह्मण विराट् पुरुष के मुख से, क्षत्रिय बाहु से, वैश्य पेट से तथा शूद्र पैर से पैदा हुए, जिससे लगता है कि वर्ण–व्यवस्था जन्म से निर्धारित होती है?
उत्तर– देखिए, सब कुछ गीता में है क्योंकि वेदों का प्राण उपनिषद् है और ‘श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्र’ के अनुसार उपनिषदों का भी सार गीता है जो वेदसम्मत ही है। महाभारत में महर्षि व्यास का वचन है-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।।
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।
अतः गीता स्वयं में पूर्ण है किन्तु आपने जब वेद की किंचित् चर्चा की है तो उस ओर से भी देख लेते हैं; वैसे गीता इससे भिन्न नहीं है, श्रीकृष्ण की वाणी है।
प्रश्न है कि ब्रह्म कब पैदा होता है? जब ब्रह्म कण-कण में व्याप्त है तो उसके पाँव कहाँ होंगे और शीर्ष स्थान कहाँ जायेगा?
वस्तुतः वेद, उपनिषद् इत्यादि योगदर्शन हैं, जैसा गीता में भी पाया जाता है। यह परमतत्त्व परमात्मा में विलय करनेवाला दर्शन है। उस व्यापक चेतन का प्रकटीकरण समाज में विवाद का एक विषय है; किन्तु योगियों के बीच वही सर्वसम्मत तथ्य है।
कठोपनिषद् का वचन है-
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनु~स्वाम्।। (1/2/22)
यह आत्मा न तो प्रवचन से प्राप्त होती है, न विशिष्ट बुद्धि से प्राप्त होती है और न बहुत सुनने-सुनाने से प्राप्त होती है। बल्कि हजारों में से वह परमात्मा जिस किसी का चयन कर लेता है वही उसको पाता है। हजारों पथिकों में से जिसका वह वरण कर लेता है वही उस आत्मतत्त्व को पाता है। जिस साधक की मन-क्रम-वचन से की गयी सेवा-प्रार्थना को वह स्वीकार कर लेता है, उसके हृदय से वह परमात्मा रथी बनकर आरूढ़ हो जाता है और क्रमशः बुद्धिरूपी लगाम को पकड़कर सही मार्गदर्शन करते हुए उस परमतत्त्व परमात्मा एवं स्वयं में स्थिति दिलाता है।
बस यही, साधक के हृदय में प्रसारण के साथ ही साधना के प्रथम चरण में वह परमात्मा साधक को शूद्र श्रेणी में प्रवृत्ति प्रदान करता है, उसका वैसा ही स्वभाव बनता है। दूसरे सोपान में वह भरण-पोषण और आत्मतृप्ति वाली वस्तुओं का संग्रह करता है। तीसरी अवस्था में वह विराट् प्रकृति से संघर्ष झेलने की क्षमता देता है। शीर्षस्थान अर्थात् चौथे स्थान पर ब्रह्म अपनी ब्रह्ममयी आत्मा से आर्जव, मन का शमन, सरलता, धारावाही चिन्तन इत्यादि गुणों को प्रस्फुटित कर स्वयं रथी के रूप में आरूढ़ रहते हुए पूर्ण तत्त्व की दिशा में ब्राह्मण की श्रेणी से विभूषित करता है और इस स्थिति से चलाता हुआ क्रमशः अपरिवर्तनशील स्थिति से गुजारते हुए अपने में समाहित कर लेता है। इस प्रकार वैदिक वर्ण-व्यवस्था भी जीव के परमकल्याण के सोपानों का निर्देशन मात्र है; न कि कोई ऐसा पुरुष खड़ा है जिसका सिर आकाश में और पाँव रसातल में चला गया हो। अतः यह क्रियात्मक पथ और उसकी जागृति आज भी पूर्णत्व से आप्लावित महापुरुषों में है और उन महापुरुषों में वह अनुभवगम्य है, जैसा कि विराट् स्वरूपों का विस्तार पाया जाता है। उनकी संगति करें और वे भी कृपा से मिलते हैं- ‘संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही।।’ (मानस, 7/68/7) मानस का यही निर्णय है क्योंकि मानस भी तो ‘नाना पुरान निगमागम’ का निचोड़ मात्र है।
वस्तुतः इन प्रसंगों में गीता से बाहर ढूँढ़ने का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता; क्योंकि योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी सभी अंगों से पूर्ण है और उपनिषदों का सारांश है। आइये, महाभारत का एक ज्वलन्त उदाहरण लें जिसमें वर्ण-व्यवस्था के स्वरूप को जानकर शापवश अजगर के रूप में निवास करनेवाले महाराज नहुष अपने परमधाम को प्राप्त हुए।
पत्नी एवं भाइयों सहित महाराज युधिष्ठिर वनवास कर रहे थे। भीम को शिकार का विशेष शौक था। एक दिन भीम शिकार से नहीं लौटे। धर्मराज युधिष्ठिर को भयंकर अपशकुन होने लगे। वामांग फड़कने लगा। उन नरेश ने महर्षि धौम्य से कहा- ‘‘ऋषि प्रवर! लगता है कि भीम किसी भारी संकट में पड़ गया है। मुझे अपशकुन हो रहा है। चलें, उसका पता लगायें।’’ महर्षि को साथ लेकर महाराज युधिष्ठिर भीम की शोध में निकल पड़े। भीम द्वारा मारे गये सैकड़ों शेर, हाथी, जंगली भैंसे पडे़ थे; पेड़ उखड़े मिल रहे थे। इन्हीं चिन्हों का अनुसरण करते हुए युधिष्ठिर आगे बढे़ और वहाँ पहुँच गये जहाँ भीम अजगर से लिपटा हुआ निश्चेष्ट पड़ा था। युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘भीम! तुम महान् बलवान हो। सृष्टि में जन्म लेनेवाला कोई भी जीवधारी ऐसा नहीं है जो तुम्हें नियंत्रित कर सके; फिर तुम एक अजगर की लपेट में कैसे आ गये? यह महाभाग अजगर कौन हैं?’’
भीम ने कहा, ‘‘यह हमारे पूर्वज, महान् धर्मात्मा महाराज नहुष हैं। ब्राह्मणों के शाप से यहाँ पड़े हैं। दिन के तीसरे प्रहर में जो भी इनकी अधिकृत भूमि में आ जाता है, वह कितना शक्तिशाली क्यों न हो, सहज ही इनके वश में हो जाता है। इनकी खुराक बन जाता है। यह भी ब्राह्मणों के आशीर्वाद का बल है।’’ तब तो युधिष्ठिर ने नहुष से कहा, ‘‘राजन्! आप तो महान् धर्मज्ञ थे। आपने बड़े-बड़े अश्वमेध यज्ञ किये, जिसके प्रभाव से इन्द्र-पद पर अभिषिक्त हुए। फिर आपने ब्राह्मणों का अपमान किया। आप से ऐसी भूल कैसे हो गयी? क्या आप विप्रों का महत्त्व नहीं जानते थे?’’ नहुष ने पूछ ही लिया कि, ‘‘आप ही बताइये कि विप्र का क्या महत्त्व होता है?’’ तब धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा कि, ‘‘इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, एकान्त सेवन, निरन्तर चिन्तन, अनुभवी उपलब्धियाँ, आर्जव, क्षमा, तपस्या इत्यादि लक्षण जिसमें स्वभाव से हों, वह विप्र है।’’ तब अजगर वेषधारी नहुष बोले कि ये लक्षण तो शूद्र में भी पाये जा सकते हैं? युधिष्ठिर ने कहा- ‘‘तब वह शूद्र भी विप्र है।’’ अजगर पुनः बोला, ‘‘इन लक्षणों से हीन विप्र भी तो पाये जाते हैं।’’ (यही तो नहुष की भ्रान्ति का कारण बना था। तभी उन्होनें महर्षियों से पालकी उठवायी और उन्हें जन्मना कुलीन न जानकर पैर से मारा था।) युधिष्ठिर ने निर्णय दिया कि, ‘‘यदि कोई इन लक्षणों से हीन है तो वह स्वभावतः शूद्र है, विप्र नहीं।’’ इतना सुनते ही महाराज नहुष तत्क्षण अपने स्वरूप में आ गये, भीम को मुक्त किया और युधिष्ठिर को विजय का आशीर्वाद देते हुए स्वर्ग चले गये।
इन्द्र का पद और विलासिता की सामग्री पाकर नहुष मदान्ध होकर शची तक चला। अत्रि, अगस्त्य, पुलह, वशिष्ठ इत्यादि विप्रों से पालकी ढुलवायी; क्योंकि वे जन्मना कुलीन नहीं समझे जाते थे। देर असह्य होने पर शीघ्र चलने के लिये महर्षियों को ‘सर्प-सर्प’ कहकर प्रेरित किया। दयालु विप्र पहले तो सहते गये किन्तु नहुष ने अगस्त्य को लात मारी, उसी का दुष्परिणाम था कि महर्षि ने कहा कि- ‘‘जा, सर्प हो जा।’’
नहुष ने जब अपने को पालकी से पतित होकर अधम योनि के लिये पृथ्वी पर आते देखा तो गिड़गिड़ाये। बोले, ‘‘हमारा उद्धार कैसे होगा?’’ महर्षियों ने आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘‘भविष्य में परम धर्मज्ञ महाराज युधिष्ठिर तुम्हारे कुल में होंगे, जिनसे विप्र की यथार्थ महिमा सुनने पर तुम्हें इस अधोगति से छुटकारा मिलेगा।’’ महिमा सुनते ही नहुष अपने परमधाम को चले गये। अतः विप्र के स्वरूप के सम्बन्ध में युधिष्ठिर का यह निर्णय निर्विवाद है, जिसके यथार्थता के प्रत्यक्ष प्रभाव से नहुष की सद्गति तत्क्षण हो गई। वर्ण-व्यवस्था के सम्बन्ध में इससे सच्ची आख्या क्या होगी, जिसके प्रभाव से नहुष को अधोगति से छुटकारा मिल गया।
इस आख्यान से स्पष्ट है कि वर्ण-व्यवस्था के सम्बन्ध में भ्रान्तियाँ प्रत्येक युग में थीं। सतयुग में उत्पन्न नहुष की भ्रान्ति का निराकरण कहीं जाकर द्वापर में हो सका। बीच में धर्म का तत्त्वज्ञ कोई हुआ ही नहीं जो नहुष की भ्रान्ति का निराकरण करता और वह भी विप्रों के आशीर्वाद का फल था। नहीं तो युधिष्ठिर को वह बुद्धि कहाँ से आती? अतः सज्जनो! विप्र को चाहिये कि वे अपने स्वरूप की रक्षा उक्त सद्गुणों के सृजन से करें। अन्य वर्णों, वर्गों, सम्प्रदायों के जो प्रत्याशी देर-सवेर इस अवस्था को पार करते हैं, महान् हैं। इस क्रिया, विधा की उपलब्धि का एक ही माध्यम चिरन्तन सत्य है और रहेगा कि अनुभवी विज्ञानी तत्त्वज्ञ महापुरुष का सान्निध्य प्राप्त करें। उन्हीं हरकतों से पेश आवें जिनसे वे प्रसन्न रहें, जिनकी कृपा से आप सत्य की प्राप्ति कर सकें। श्रीकृष्ण गीता में इंगित करते हैं-
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।। (गीता, 4/34)
‘‘अर्जुन! तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जा। दण्ड-प्रणाम करके उनकी सेवा कर और निष्कपट भाव से प्रश्न करके उस ज्ञान को जान।’’ हृदय में ईश्वर की जागृति तथा अपने मन से बौद्धिक स्तर का कार्य करना दोनों में पूरब और पश्चिम का अन्तर है। बौद्धिक निर्णय नास्तिकता और पतन की ओर अग्रसर कर सकता है। अतः किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष की सेवा अनिवार्य है। तत्त्वदर्शी महापुरुष ही माध्यम हैं। ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ…’– ऐसे महापुरुष भी पुण्य-पुरुषार्थ से ही मिलते हैं।
प्रश्न– महाराजजी! महापुरुष की प्राप्ति कहीं तो आप कृपा की देन मानते हैं और कहीं पुरुषार्थ की देन मानते हैं, ऐसा क्यों?
उत्तर– देखिये, साधक का भाव ही इधर से कृपा बनकर लौटता है। भाव ही पुण्य कराता है और ‘भाववस्य भगवान’, ‘भावे विद्यते देवा’।
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)