गो-रक्षा

गोरक्षा

गोरक्षा हमारा सनातनधर्म है किन्तु पशु गाय धर्म नहीं।स्वामी अड़गड़ानन्द

बन्धुओ!

आये दिन ‘गो-वध बन्द हो’ का नारा लगता है। धर्माचार्यों के अनशन और लाखों रुपये के चन्दे इसी के नाम पर होते हैं। इन सबका परिणाम केवल इतना निकला है कि यदि सन् १९४२ में १७,००० गायें नित्य कटती थीं तो आज उनकी संख्या ५०,००० तक पहुँच चुकी है। विचारणीय है कि क्या गाय हमारा धर्म है? क्या इसके समर्थन में हमारे पूर्वजों ने वेद, गीता और रामचरितमानस-जैसे आर्षग्रन्थों में कुछ कहा है? यदि नहीं कहा तो यह एक धोखा है। इससे हम सबको सतर्क हो जाना चाहिए।

गाय को धर्म मानने का दुष्परिणाम समूचे भारत को भोगना पड़ा है। गाय की ओट से निशाना लेकर मुट्ठीभर तुर्कों ने वीर राजपूतों को उनके ही देश में हरा दिया। अंग्रेजों ने हिन्दू और मुसलमानों में फूट डालने के लिए इसी गाय को साधन बनाया। स्वतन्त्र भारत के साम्प्रदायिक दंगों के पीछे गाय कहीं-न-कहीं अवश्य रहती है। इस पागलपन के पीछे अवधारणा यह है कि गाय हमारा धर्म है, किन्तु क्या आप इसके समर्थन में प्रमाण दे सकते हैं?

श्रीरामचरितमानस के अनुसार भगवान का अवतार केवल चार के लिए होता है-

गो द्विज धेनु देव हितकारी।

कृपा सिन्धु मानुष तनुधारी।। (५/३८/३)

निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ, सुर महि गो द्विज लागि।। (४/२६)

बिप्र धेनु सुर सन्त हित, लीन्ह मनुज अवतार।। (१/१९२)…. इत्यादि।

जनसाधारण में इन दोहे-चौपाइयों का यह अर्थ प्रचलित है कि भगवान जब भी अवतार लेते हैं तो पशुओं में एक पशु गाय-विशेष के लिए और मनुष्यों में एक वर्ग-विशेष ब्राह्मण के लिए लेते हैं और वह द्विज-समुदाय केवल भारत में पाया जाता है। जब गाय और ब्राह्मण पर विपत्ति आती है- सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी। (१/१२०/७) तभी भगवान अवतार लेते हैं। यह विपत्ति ब्राह्मणेतर जाति ही तो डालेंगी, भगवान उनको मारकर गो और द्विज को निर्भय बनाते हैं। तब हर देश, हर जाति के लोग ऐसे भगवान से कौन-सी आशा लगाये बैठे हैं? तो क्या भगवान सबके लिए नहीं हैं? यह रामचरितमानस कहना क्या चाहता है? विचारणीय है कि भगवान गाय के लिए अवतार तो लेते हैं किन्तु गाय से परे हैं। यह गाय कौन-सा शिकंजा है जिसमें सारा संसार फँसा है, किन्तु भगवान उससे पार हैं। गाय क्या है? यहाँ एक प्रश्न है- माया गुन गो पार (१/१९२)।

मानस के अनुसार भगवान ने अवतार तो लिया किन्तु न तो एक द्विज की सहायता की और न एक गाय ही लंका से छुड़ायी। गोशाला या चरागाह बनवाने पर भी उन्होंने कहीं बल नहीं दिया। अतः आप विचार करें कि वस्तुतः गो है क्या? कहीं कोई भ्रान्ति तो हमारा पीछा नहीं कर रही है?

श्रीरामचरितमानस में लगभग सत्तर बार ‘गाय’ शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसमें सत्रह बार गाय मात्र दृष्टान्त है, तेरह बार वस्तु है, सम्पत्ति है और लगभग चालीस बार ‘गो’ शब्द का प्रयोग इन्द्रिय के लिए किया गया है। दृष्टान्त के रूप में ‘गाय’ का प्रयोग देखें-

अधम निसाचर लीन्हें जाई।

जिमि मलेछ बस कपिला गाई।। (३/२८/८)

भूप प्रतापभानु बल पाई।

कामधेनु भै भूमि सुहाई।। (१/१५४/१)

पैठत नगर सचिव सकुचाई।

जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।। (२/१४६/३)

यहाँ गाय मात्र दृष्टान्त है। इसी अर्थ में देखें-

स्याम सुरभि पय बिसद अति, गुनद करहिं सब पान।

गिरा ग्राम्य सिय राम जस, गावहिं सुनहिं सुजान।। (१/१० ख)

गाय तो काले रंग की है किन्तु दूध गुणकारी है, इसीलिए सभी उसका पान करते हैं। इसी प्रकार ग्राम्यभाषा में लिखित यह कथा है तो काली गाय की तरह, किन्तु सियराम का यश इसमें अंकित है इसलिए सभी इसे स्वीकार करेंगे। यहाँ गाय मात्र उदाहरण है, धर्म नहीं।

रामजन्म के अवसर पर हाटक धेनु बसन मनि (१/१९३) राजा ने दान में दिया। विश्वामित्र की याचना पर दशरथ ने सहरोष कहा- मागहु भूमि धेनु धन कोसा। (१/२०७/३) जमीन, गाय, धन और खजाना सभी एक श्रेणी में हैं। जनकजी ने गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी।। (१/३२५/४) दहेज में दिया। हाथी-घोड़ा की तरह गाय भी यहाँ एक वस्तु के रूप में है। पिता की मृत्यु के पश्चात् भरतजी धेनु बाजि गज बाहन नाना। (२/१६९/८) का दान देकर विशुद्ध हुए। रामराज्य में भी विदेह नगर की तरह मनभावतो धेनु पय स्रवहीं। (७/२२/५)- मनचाही दूध देनेवाली गायें थीं। कम दूध देनेवाली गायों को कहाँ खपा दिया, यह तो नहीं बताया लेकिन थी एक भी नहीं। तात्पर्य यह है कि हाथी, घोड़ा, गाय, दास, दासी, वस्त्र, सोना और मणि लेन-देन की वस्तुएँ थीं, धर्म नहीं।

अब आइये उन चालीस प्रसंगों में से कुछेक देखें, जहाँ ‘गो’ शब्द इन्द्रियों का प्रतीक है-

अनवद्य अखंड न गोचर गो।

सबरूप सदा सब होइ न गो।। (६/११०/छन्द)

जो ‘अनवद्य’ अर्थात् निर्दोष हैं, अखण्ड हैं, वे न तो गोचर हैं न तो गो ही हैं। अर्थात् वह भगवान न तो इन्द्रियाँ हैं और न इन्द्रियाँ जहाँ से अपनी खुराक पाती हैं वह विषय ही भगवान हैं।

सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं।

जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं।। (४/९/छन्द)

आज मेरी आँखों के समक्ष वही भगवान उपस्थित हैं, ‘न इति न इति’ कहकर श्रुति जिसका गायन करती है, पवन और मन को जीतकर तथा गो को निरस कर मुनि लोग कदाचित् ही उन्हें ध्यान में पाते हैं। गो को निरस करने पर ही वह भगवान ध्यान में आते हैं, तो क्या गाय का दूध, खून तथा हड्डियाँ सुखा दें तब भगवान ध्यान में आएँगे। गो निरस से तात्पर्य क्या है? वास्तव में गो का अर्थ है मनसहित इन्द्रियाँ। जब तक एक भी इन्द्रिय को एक भी विषय में तनिक भी रस मिलता है तब तक ध्यान में वही विषय आएँगे। तब तक ध्यान में भगवान कदापि नहीं दिखायी देंगे, भगवान धूमिल पड़ जायेंगे। तो कैसे करें गो को निरस?

बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरम् ।

गोबिन्द गोपर द्वन्दहर बिग्यानघन धरनीधरम्।। (३/३१/छन्द)

उन भगवान का बल अतुलनीय है। वे अनादि हैं, अजन्मा हैं, अव्यक्त हैं, एक हैं, अगोचर हैं अर्थात् इन्द्रियों के विषय नहीं हैं फिर भी इन्हीं इन्द्रियों के बीच हृदय-देश में उनका निवास है इसलिए वे गोविन्द हैं, वस्तुतः ‘गो’ से परे हैं। वे इन्द्रियों के द्वन्द्व का अपहरण करनेवाले हैं। हम अपनी बुद्धि से इन विकारों का पार नहीं पा सकते। इन्द्रियों में इतनी क्षमता कहाँ कि यथार्थ निर्णय ले सकें, कारण कि-

गो गोचर जहँ लगि मन जाई।

सो सब माया जानेहु भाई।। (३/१४/३)

इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के विषय में जहाँ तक मन जाता है, बुद्धि जहाँ तक निर्णय लेती है वह सब की सब माया है, इसलिए आप अपने भरोसे गो को निरस नहीं कर सकते। यदि बुद्धि-विवेक या विचार से कोई निर्णय लेंगे तो वह मायिक क्षेत्र का ही छोटा-बड़ा निर्णय होगा; क्योंकि बुद्धि इसके आगे का हाल नहीं जानती। इसलिए मनसहित इन्द्रियों (गो) को निरस करने के लिए भगवान का अवतार होता है। भगवान विज्ञान-घन हैं, अनुभवस्वरूप हैं। वह आत्मा से रथी होकर (अनुभव या आन्तरिक निर्देशनों द्वारा) इस पृथ्वी को धारण करते हैं। इसी गाय की सुरक्षा के लिए भगवान अवतार लेते हैं। गो या इन्द्रियजनित विकारों को दूर करने के लिए ही अवतार की व्यवस्था साधक के हृदय में प्रसारित है; किन्तु किसी-किसी लगनशील साधक के हृदय-देश में यह घटना घटित होती है, अवतार होता है।

गीता गीता का उपदेश करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- सात्त्विक गुण के कार्यकाल में जो शरीर का त्याग करता है, वह देव इत्यादि उन्नत योनियों को प्राप्त करता है। राजसी गुण की अधिकता में शरीर त्यागनेवाला मनुष्य मानव होता है और तामसी गुण के कार्यकाल में जो शरीर का त्याग करता है वह पशु-पक्षी, कीट-पतंग इत्यादि अधम योनियों को प्राप्त होता है। गीता के अनुसार पशु एक अधम योनि है। जो स्वयं निकृष्ट योनि भोग रही है, वह गाय आपको शाश्वत धाम कैसे देगी? जो आपसे गहरे दलदल में फँसा हो, वह आपको निकाल कैसे सकेगा?

योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, जिस प्रकार पुराने वस्त्र को त्यागकर पुरुष नया वस्त्र धारण कर लेता है, ठीक उसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी यह आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर संस्कारों के अनुरूप नया शरीर धारण कर लेता है। अर्जुन! यह शरीर अनित्य है। जो स्वयं नश्वर है, वह अधम शरीर शाश्वत धाम कैसे देगा? उन शरीरों में से गाय का भी एक शरीर है, वह शाश्वत सनातन कैसे बन जायेगी?

आश्चर्य है कि स्मृतियों और पुराणों में गाय की पूँछ पकड़कर उस वैतरणी को पार करने का विधान है जिसमें कोई तरणी काम नहीं करती। दिनभर में सैकड़ों लोग जिसकी पूँछ पकड़कर (खींचकर) उसे अधमरा बना देते हैं, उन पुजारियों को दया नहीं आती। मरियल-सी गाय आपको वैतरणी पार करा देती है, क्योंकि गाय के शरीर में देवताओं का निवास बताया गया है। यदि गाय के मल-मूत्र, रोम-रोम में देवता भी हैं तब तो गाय और बड़ा धोखा है। डूब मरने के लिये गाय ही काफी थी, जिस पर यह देवता, देवता तो स्वयं बह रहे हैं- ‘भव प्रबाहँ संतत हम परे।’ (मानस, ६/१०९/१२) आप ही की तरह वे बेचारे बह रहे हैं, आपको क्या तारेंगे?

कृतकृत्य बिभो सब बानर ए।

निरखंति तवानन सादर ए।।

धिग जीवन देव सरीर हरे।

तव भक्ति बिना भव भूलि परे।। (मानस, ६/११० छन्द)

इस देव-शरीर को धिक्कार है, आपकी भक्ति के बिना भव भूलि परे– भव में भूलकर पड़े हुए हैं।

महाभारतकार का निर्णय है कि इस सृष्टि में मनुष्य सर्वोत्कृष्ट है, गुह्यं ब्रह्म तदीतं ब्रवीमि। न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्। श्रीकृष्ण भी कहते हैं, अर्जुन! तू इन्द्रियों को सब ओर से समेटकर मेरा ही चिन्तन कर। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि तू मेरे स्वरूप को प्राप्त होगा। अर्थात् जैसा स्वरूप श्रीकृष्ण का है उसी स्वरूप में अर्जुन भी स्थिर होगा। जो मनुष्य इसी स्वरूप में इस स्थिति को प्राप्त नहीं कर लेता श्रीकृष्ण उसे आत्महत्यारा कहते हैं। स्पष्ट है कि मानव का परमधर्म परमात्मा तक की दूरी तय करना, उन्हें प्राप्त कर लेना है। मनुष्य-शरीर ही साधन-शरीर है। देवता तक मुक्ति के लिये इसी नर-तन से आशावान् हैं जो बड़े सौभाग्य से आपको प्राप्त है। इस शरीर-प्राप्ति में आप देवताओं से भी बढ़कर हैं; फिर पत्थर, पानी, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे आपका धर्म, आपका आदर्श कैसे बन सकते हैं।

योगेश्वर श्रीकृष्ण की गीता में दो स्थानों पर गाय का स्पष्ट उल्लेख भी मिलता है। एक तो वैश्यश्रेणी के साधक के लिये गो-रक्षा अर्थात् इन्द्रिय-संयम के सन्दर्भ में और दूसरा तत्त्वदर्शी महापुरुष की रहनी के सन्दर्भ में कि ऐसे पण्डितजन गाय, कुत्ता, हाथी, चाण्डाल में समान दृष्टि रखनेवाले होते हैं। उनकी दृष्टि में न गाय कोई धर्म है और न कुत्ता कोई अधर्म, अथवा न विशालकाय हाथी ही कोई विशेषता रखता है; क्योंकि उस महापुरुष की दृष्टि चमड़ी पर नहीं अपितु इन सबके हृदय में आत्मिक संचार पर पड़ती है।

कुछ लोग गाय के पीछे इसलिए जान देने के लिए तुले हैं कि श्रीकृष्ण गाय चराते थे। यादव वंश में तो जन्म व पालन-पोषण हुआ था, गाय न चराते तो हाथी-घोड़ा कहाँ से पाते! रैदास को चमड़ा मिला, कबीर को सांचा, राम को धनुष, तो क्या यह सब धर्म हो गया? श्रीकृष्ण ने तो एक चंचल बलरूपी धेनुकासुर को मारा। द्वारिकाधीश बनने पर वे एक दिन भी गाय नहीं चरा पाये।

पशु के रूप में गाय धन है- गोधन गजधन बाजिधन और रतनधन खान। प्राचीनकाल में गोधन एक विशिष्ट सम्पत्ति थी। जुताई, बुआई, मड़ाई, खराई, खाद, पानी, प्रदूषण निवारण, पौष्टिक आहार, वाहन एवं भारवाहक साधन के रूप में इसकी उपयोगिता असंदिग्ध थी। गो-वंश के संवर्द्धन पर समाज की सतर्क दृष्टि थी। जिस प्रकार नागासाकी को फिर से बसाने के प्रयास में उन्तीस बच्चे पैदा करनेवाली महिला को वहाँ मदरलैण्ड की उपाधि से सम्मानित किया गया, कुछ इसी प्रकार गाय की उपयोगिता को देखते हुए प्राचीनकाल में उसे ‘गो माता’ की पदवी प्रदान की गयी थी। जिस प्रकार आजकल शेर को राष्ट्रीय पशु घोषित कर उसकी हत्या करनेवाले को दण्डित करने का विधान है, कुछ ऐसी ही व्यवस्था प्राचीनकाल में गाय के साथ थी। आज दण्ड-संहिता है, विधान है; तब स्मृतियाँ थीं।

वस्तुतः विशेषता गाय में नहीं, मानव-मस्तिष्क में है, जिसने गाय में इतनी उपयोगिता का दर्शन किया। विशेषता लोहे में नहीं, अणु में नहीं वरन् उस मनुष्य में है जो उसका प्रयोग कर अन्तरिक्ष में उड़ रहा है, सागर की लहरों पर तैर रहा है। आवश्यकता के अनुरूप नये आविष्कार करना मानव-मस्तिष्क का स्वभाव है। इसलिये आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों के समक्ष गाय धन के स्थान से च्युत हो चली है। गो-वंश के इस अवमूल्यन से मन में कसक चाहे जितनी हो, गाय को धर्म कहनेवाले कितने लोग स्वयं गाय पालते, चराते हैं? सात्त्विक आहार में फलों के पश्चात् गाय के दूध का ही स्थान है तो क्या फल हो गये धर्म? गाय मात्र सम्पत्ति है और सबकी है।

प्राचीनकाल में गाय विनिमय का माध्यम भी थी। आज के रुपयों की तरह उन दिनों गाय के माध्यम से वस्तुएँ आपस में बदली जाती थीं। वैदिककालीन सामाजिक व्यवस्था में इसका व्यवहार अपने उत्कर्ष पर था। इतना ही नहीं, ‘सोमयाग’ के प्रकरण में तो गाय के द्वारा सोम का लिया जाना आवश्यक माना जाता था। इसका संग्रह समृद्धि का प्रतीक था। अतएव उस समय के बुद्धिजीवी वर्ग ने इन्हें अधिक से अधिक पाने का नयी-नयी स्मृतियों के माध्यम से उद्योग किया। सामाजिक स्मृतियाँ न्यायशास्त्र हैं। दैनिक जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप को पाप की संज्ञा देना और प्रत्येक पाप के निवारण के लिये गाय का दान देने का विधान उन्हीं की देन है। क्योंकि उनकी जीविका के लिये निर्धारित तीन साधन भिक्षा, शीलोंछवृत्ति और दान में से केवल दान का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है और उन्होंने बढ़ाया भी। नेवला मारने पर कम से कम दस गाय के दान का विधान है मनुस्मृति में। प्रशासन को अपने शिकंजे में रखकर अधिकांश जनता को निरक्षर बनाकर वे ही धर्म के व्याख्याता बन बैठे। उन्होंने परिभाषाएँ बदल दीं, जैसे- ऋषि उसे कहते हैं जो गुरुकुल में पढ़ाता हो। इन्द्रियों के स्थान पर गो का समीकरण पशु में बैठाना, पशु गाय को धर्म के नाम पर उछालना, महाराजाओं या महापुरुषों का नाम लेकर नये-नये नियम गढ़ना उनकी देन है। ये स्मृतियाँ एक वर्ग-विशेष की भोजन-व्यवस्था के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हैं।

स्वतन्त्र भारत के प्रत्येक नागरिक से, जिन्हें सौभाग्य से अब पढ़ने का अधिकार मिला है उन सबसे हमारा निवेदन है कि इन स्मृतियों को एक बार पढ़ें; क्योंकि न्यायालयों में आज भी हिन्दू-विधि के मामले में हिन्दू धर्मावलम्बियों को न्याय देने के लिए स्मृतियों को ही प्रमाण माना जाता है। त्याग, तपस्या और साधन की तो बात ही छोड़िये, पूरी की पूरी स्मृति में एक बार भगवान का नाम तक नहीं आया है और यह भी लिख मारा कि पाराशर-स्मृति और वेद पढ़ना एक ही बात है। आप इसी को पढ़ें, तब भी आप वेदज्ञ हैं।

इन्हीं स्मृतिकारों की देन है कि आज हम गाय के नश्वर पिण्ड में सनातन-धर्म देखने लगे। हम घरों में रहते हैं, हमारा धर्म बाड़े में बँधा रहता है। चरवाहे तक पेड़ की छाया में रहते हैं और हमारा धर्म जंगल में घूमता रहता है। शेर खा जाता है मर जाता है हमारा धर्म, कोई भी हमारे धर्म को उठा ले जा सकता है। गाय की पूजा आप करें और वह आशीर्वाद दे रही हैं डेनमार्क में, तब तो हमारा धर्म चला गया वहाँ, जहाँ कि गायें दूध देने में कीर्तिमान स्थापित कर चुकी हैं। वहाँ वे पूजा नहीं करते, नस्ल उत्पन्न करते हैं।

यदि गाय धर्म है तो सबसे बड़ा धार्मिक भी वह है जो गाय के अत्यन्त समीप है और वह है ग्वाल परिवार, जिसने सैकड़ों वर्षों, पीढ़ियों से उसी गाय की सेवा की है। आज न उनके शरीर पर वस्त्र है और न खाने को भरपेट अन्न। बुद्धि के स्तर पर मूर्ख-चपाट कहकर उनकी खिल्ली आप ही तो उड़ाते हैं।

न केवल प्राचीन शास्त्रों में अपितु हर युग की सन्तवाणियों में भी गो का अर्थ इन्द्रिय ही है। सन्त कबीर तो गाय को काटने की बात करते हैं-

माता मारि परमपद पावै, पिता बधे सुख होय।

गो काटे बैकुण्ठ सिधावै, सन्त कहावै सोय।।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस संसार में त्रिगुणमयी प्रकृति ही माता है और मैं ही परम चैतन्य बीजरूप पिता हूँ। इसी स्वर में कबीर भी कहते हैं कि जो इस प्रकृतिरूपी माता का दमन कर लेता है वह उस परमपद को पा सकता है। उसी का नाम है पिता और वह पद है परमात्मा। उसकी जानकारी के साथ ही वह भी भिन्न नहीं रह जाता, उसी में विलीन हो जाता है, जहाँ वह सदा रहनेवाली शाश्वत शान्ति, शाश्वत सुख को पा जाता है। लेकिन इन सबकी प्राप्ति के लिए गो काटना ही एकमात्र कुंजी है। गो माने इन इन्द्रियों की दौड़ को जो न केवल काट देता है बल्कि संयत इन्द्रियों के स्वरूप को भी जो मिटा देता है, वह उस प्रभु की प्राप्तिवाला होता है और वही सन्त कहलाने का अधिकारी है। यही कारण है कि तुलसीदासजी गोस्वामी कहे जाते हैं।

एक चरवाहे को घड़ी देखना सिखाया गया। वह साढ़े तीन को बता सकता था; किन्तु तीन चालीस नहीं बता सका। बुद्धि का यह हाल है तो उनके पास समृद्धि कहाँ से होगी। समृद्धि की जड़ तो बुद्धि है, स्मृति है और यहाँ वही साफ है। पशु चराते-चराते मस्तिष्क पशुवत् हो गया, कारण कि संगत नहीं मिली। प्रचार किया जाता है कि गाय समृद्धि और मोक्ष देगी, तो इन्हें क्यों नहीं दे देती? आज तो जो ग्वाल-बाल खुशहाल हैं वे सत्तर प्रतिशत भैंस पालते हैं, गाय नहीं।

शास्त्रों का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि भगवान गो और द्विज के लिए अवतार लेते हैं; किन्तु उस गो का अर्थ गाय नामक पशु नहीं बल्कि मनसमेत इन्द्रियाँ हैं। इन्द्रियजन्य विकारों को दूर करने के लिये भगवान का अवतार होता है। इसी प्रकार जगजामिनी से जब योगी जाग जाता है, गर्भवास की यातनाओं से भिन्न आत्मस्वरूप की ओर अग्रसर होने लगता है, वह द्विज है। द्वितीय जन्म पाया है इसलिए वह द्विज है। इन्हीं भक्तों, साधकों, विरही अनुरागियों के लिए भगवान का अवतार होता है, न कि किसी जाति या पशु के लिए।

हम यह नहीं कहते कि आप गाय को न मानें। जब गो-रक्षा न तो आप्तपुरुषों की वाणी में है और न वरिष्ठ शास्त्रों में ही इसका उल्लेख है, तब क्यों लकीर पीटते हैं? यदि कहीं है तो मानें, बतायें तो हम भी मानेंगे। यदि यह पहले से चली आ रही है जो भूलमात्र है, तो सुधारने के लिए हम सारे समाज का आवाहन करते हैं कि आप साहस के साथ आगे आयें अन्यथा गाय के प्रति यह पूर्वाग्रह हमें, आपको, सबको नष्ट करके छोड़ेगा।

निःसन्देह गाय उपयोगी पशु है, मूल्यवान् धन है, धन की सुरक्षा कौन नहीं चाहेगा? आप रक्षा करें; किन्तु ‘गाय धर्म है’, ‘गाय ही सनातन-धर्म है’- ऐसा कहकर समाज को गुमराह न करें। विचार-विमर्श हेतु आपका एवं आपके सुझावों का सदैव स्वागत है।

विशेषउन प्रत्यक्षदर्शी महापुरुषों का यह निर्णय अक्षरशः सत्य है कि भगवान गो और द्विज के लिए ही अवतार लेते हैं; किन्तु न तो उस ‘गो’ का अर्थ गाय नामक पशु है और न द्विज का अर्थ ब्राह्मण। यदि यही दो अवतार के कारण और रक्षा के पात्र हैं तो अन्य सभी जातियों का क्या होगा? तब तो अन्य सबको परमात्मा का संरक्षण पाने के लिए उनके दर्शन और प्रवेश के लिए किसी अन्य उदार धार्मिक संघ को पकड़ना पड़ेगा; क्योंकि भगवान केवल गाय और ब्राह्मण के लिए ही उतरते हैं किन्तु शास्त्र और पूर्णत्व प्राप्त महापुरुष की वाणी में ऐसा धोखा नहीं है।

शास्त्रों में गो का अर्थ मनसमेत इन्द्रियाँ हैं। इन्द्रियाँ प्रमथन स्वभाववाली हैं। ये सदैव विषयों की ओर भागती हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अनन्त वासनाओं द्वारा ये विकृत हो जाती हैं, अनन्त योनियों का कारण बन जाती हैं- यही गो-हत्या है। यही सनातन परमात्मा से दूरी पैदा करती हैं इसलिए सनातन की रक्षा का उपाय गो-रक्षा से है। इसके विपरीत शम, दम और नियमों द्वारा इन्द्रियों को इष्ट के आदेश के अनुरूप संयमित रखना गो-रक्षा है। यही हमारा दायित्व है, धर्म है। गो-रक्षा हमारा सनातन-धर्म हैं क्योंकि विवेक, वैराग्य, धारणा, ध्यान, सतत चिन्तन तथा उस परमात्मा के निर्देशनों के अनुसार इन्द्रियों को ढालने से वह सनातन शाश्वत कहलानेवाला अमृततत्त्व विदित हो जाता है।

इष्ट के अनुरूप संयत इन्द्रियाँ ब्रह्मपीयूष धारण करने लगती हैं, उनसे ईश्वरीय आनन्द की अनुभूति होने लगती है तो यही नन्दिनी है। जिसमें ईश्वरीय आनन्द जागृत है, ऐसे महापुरुष का सान्निध्य और उसके द्वारा निर्दिष्ट टूटी-फूटी सेवा से कामनाओं की स्वाभाविक पूर्ति होने लगती है (जैसा कि पूर्व महापुरुषों की गाय राजा लोग चराया करते थे) और जब यही संयत इन्द्रियाँ ईश्वर के तद्रूप खड़ी हो जाती हैं तहाँ ये सभी कामनाओं की पूर्ति करनेवाली हो जाती हैं इसलिए कामधेनु हैं। उस महापुरुष की इच्छा इच्छा-शक्ति में बदल जाती है। यहाँ तक कि भगवान स्वयं उसकी इच्छा की पूर्ति करने लगते हैं-

जो इच्छा करिहहु मन माहीं।

हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।। (मानस, ७/११३/४)

कामधेनु कोई पशु नहीं है जो मनचाहा व्यंजन परसने लगे या कल्पवृक्ष वृक्ष जैसा कोई काल्पनिक वृक्ष नहीं है। वस्तुतः सुनु सेवक सुरतरु सुर धेनू। (मानस, १/१४५/१)- भगवान ही सेवक के लिए कल्पवृक्ष और कामधेनु बन जाते हैं। उसकी कामनायें पूरी होने लगती हैं।

निःसन्देह गो-विकृति से (इन्द्रियों की विकृति से) नरक है, अनन्त योनियाँ हैं और गो को भली प्रकार संयत रखने से ही शाश्वत धाम है। इसी पर हमारा शाश्वत, सनातन धर्म टिका है, क्योंकि यही सनातन परमात्मा के उपलब्धि का तरीका है और संसार भर में यही है।

।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

समीक्षा

शंकासमाधान

श्री परमहंस आश्रम जगतानन्द द्वारा प्रकाशित पुस्तिका ‘पशु गाय धर्म नहीं’ पर आक्षेप करते हुए चित्रकूट के एक समादरणीय आचार्य ने पुस्तिका लिखी है, ‘सनातन धर्म की विग्रह स्वरूपा गौ माता’। उनका कहना है कि गाय भगवान है, मोक्ष मिलेगा तो गाय से मिलेगा, इसलिए उसकी पूजा करो। अथर्ववेद (९/७/१-२६) का गोपरक अर्थ निकालकर उनका कहना है कि गाय के शरीर में देवता रहते हैं। प्रजापति परमेष्ठी इसकी सींग में है, सिर में इन्द्र, ललाट में अग्नि, गले में यमराज, मस्तिष्क में चन्द्रमा है। ऊपर का जबड़ा द्युलोक, नीचे का जबड़ा पृथ्वीलोक, जीभ बिजली की चमक और मरूत दाँत हैं। पीठ की हड्डी रुद्र हैं, वायु देवता पूँछ हैं। जब यह पूरब की ओर मुँह करके खड़ी होती है तो इन्द्र है, यही जब दक्षिणोन्मुख खड़ी होती है तो यमराज है। इस प्रकार जितने भी देवता हैं, सब गाय में ही निवास करते हैं। गाय क्या है पूरा देव-समूह है। सभी शक्तिशाली देवता इसमें निवास करते हैं। वज्रधारी इन्द्र, दण्डधारी यम उसके अन्तराल में हैं।

उन देवताओं को गाय की रक्षा तो करनी चाहिए, जबकि दक्षिण में ही अधिक कटती हैं। अमृत जिसकी नाभि में है, वे गायें भारत के कई राज्यों में कटती हैं- विश्व की तो बात ही छोड़ें।

वस्तुतः अथर्ववेद के नवम काण्ड, चतुर्थ अनुवाक्, सप्तम सूक्त के इन मंत्रों में किसी गाय का वर्णन नहीं है; क्योंकि इसका तेरहवाँ मन्त्र है- क्रोधो वृक्कौ मन्युराण्डौ प्रजा शेपः– क्रोध ही इसके दोनों वृक्क हैं, मन्यु (तेज) दोनों अण्डकोश और प्रजा जननेन्द्रिय है। यह उक्ति गाय-जैसे स्त्रीलिंगीय पशु के लिए चरितार्थ नहीं होती।

ऐसी ही कल्पना अथर्ववेद, नवम काण्ड, चतुर्थ सूक्त (ऋषभ सूक्त) में भी देखने को मिलती है। जिसमें कहा गया है कि देवताओं ने ऋषभ के दोनों कूल्हों में बृहस्पति, पूँछ में वायुदेव, पेड़ू में सूर्यलोक इत्यादि की कल्पना की। जो ब्राह्मण ऋषभ को प्रसन्न करता है, वह शतयाजी होता है, अग्नियाँ उसे नहीं तपातीं, सभी देवता उसे तृप्त करते हैं।

प्रश्न उठता है- कौन है वह ऋषभ? क्या कोई साँड़? नहीं, क्योंकि यजुर्वेद के सत्रहवें अध्याय के इक्यानवें मन्त्र में चार सींगवाले वृषभ का वर्णन है, तो अथर्ववेद (४/५/१) में सहस्रश्रृङ्गो वृषभो– हजारों सींगवाले बैल का वर्णन है। यजुर्वेद (९/११) में इसका रहस्य स्पष्ट करते हुए बताते हैं, इन्द्रस्य रूपमृषभो अस्तु, यह इन्द्र ऋषभ या वृषभ परमात्मा है, कोई बैल नहीं; और गाय तो कदापि नहीं।

ऋग्वेदीय ऐतरेयोपनिषद् के अनुसार गाय के शरीर में तो कोई देवता रहता ही नहीं। किसी देवता ने गाय के शरीर को पसन्द ही नहीं किया। इसी उपनिषद् के प्रथम अध्याय, द्वितीय खण्ड के चार मन्त्रों में है कि परमात्मा द्वारा रचे हुए सभी देवता बोले कि हमारे लिए एक ऐसे स्थान की व्यवस्था कीजिए जिसमें रहकर हमलोग अन्न भक्षण कर सकें। परमात्मा उन देवताओं के लिए गौ का शरीर लाये। उसे देखकर उन्होंने कहा कि यह हमारे लिए पर्याप्त नहीं है। उनके ऐसा कहने पर परमात्मा उनके लिए घोड़े का शरीर लाये। उन्होंने कहा कि यह भी हमारे लिए पर्याप्त नहीं है। तब परमात्मा उनके लिए मनुष्य का शरीर लाये। वे बोले- बस! यह बहुत सुन्दर बन गया। सचमुच ही मनुष्य-शरीर सुन्दर रचना है।

यहाँ गाय के तन से मानव-तन को श्रेष्ठ माना गया। परमात्मा ने उन सब देवताओं से कहा कि अपने-अपने योग्य स्थान देखकर इस शरीर में प्रविष्ट हो जाओ, तो अग्नि देवता वाक् इन्द्रिय बनकर मुख में प्रविष्ट हो गये, वायु देवता प्राण बनकर नासिका छिद्र में प्रविष्ट हो गये, दिशायें कान में और चन्द्रमा मन बनकर हृदय में प्रविष्ट हो गया। यही बात गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि इन्द्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।। (मानस, ७/११७/११) देवता हैं तो मानव-तन के भीतर हैं, बाहर कहीं हैं ही नहीं; वह भी दैवी और आसुरी वृत्तियों के रूप में, जैसा कि गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण भी कहते हैं। कौन कहता है कि देवता गाय के शरीर में रहते हैं?

* एक स्थान पर लिखते हैं कि त्रिपुरासुर ने अमृत का कुण्ड चुरा लिया, जिसके प्रभाव से वह मर नहीं रहा था। तब भगवान विष्णु बने गाय, ब्रह्मा को बनाया बछड़ा और पूरा अमृत पी गये। राक्षस मारा गया। सफलता मिली। इसलिए गाय को मानना चाहिए; क्योंकि गाय विष्णुस्वरूपा हो गई।

विष्णु ने तो भस्मासुर से शंकर की रक्षा के लिए एक बार मोहिनी रूप धारण किया, सागर-मन्थन के समय मोहिनी रूप से ही दैत्यों में सुरा का वितरण किया, तो क्या सौन्दर्यसम्पन्न मोहिनीस्वरूपा सभी स्त्रियों की पूजा करते फिरें? समर जलंधर सन सब हारे। (मानस, १/१२२/५) अपनी पत्नी के सतीत्व के प्रभाव से जलंधर मर नहीं रहा था तो छल करि टारेउ तासु ब्रत (मानस, १/१२३)- इन्हीं विष्णु ने छल किया। जलंधर का रूप बनाकर उसकी पत्नी का सतीत्व नष्ट किया। सफलता मिली। राक्षस मारा गया। यदि एक बार एक गाय का रूप बनाने से सभी गायें पूज्य हैं तब तो सभी चारित्रिक मर्यादा का उल्लंघन करनेवाले विष्णुरूप ही होंगे। करो न पूजा! मत्स्यावतार, कच्छपावतार, वराह अवतार के नाते मछली, कछुआ या सूअर कुछ भी तो नहीं पूजते, फिर गाय के प्रति ही व्यामोह क्यों? ब्रह्मा-विष्णु-शिव सृष्टि का संचालन करते हैं। जैसे काम चलेगा, वे चलायेंगे। इसमें पूजनेवाली बात कहाँ से आ गई।

* प्रायश्चित तत्व, मदन पारिजात, अपरार्क इत्यादि अर्वाचीन पुस्तकों में गोमती विद्या का वर्णन है जिसमें गो-हत्या से शुद्धि के लिए गायों की प्रशंसा में कहा गया है कि गायें ब्रह्मा की पुत्री हैं। ब्राह्मण और गाय एक ही कुल के हैं और दो भागों में बँटे हैं जिनमें ब्राह्मणों में तो वैदिक मन्त्र निवास करते हैं और गायों में देवताओं के लिये आहुतियाँ रहती हैं।

वस्तुतः ब्रह्मा और ब्रह्मा की सृष्टि दोनों ही नश्वर हैं। आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन– ब्रह्मा और उनकी सृष्टि पुनर्जन्म की परिधि में आते हैं। जब वही शाश्वत और सनातन नहीं हैं तो उनसे उत्पन्न गाय सनातन कैसे हो गयी? उसका भजन क्यों नहीं करते, जो जन्म-मरण की सीमा से परे है। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते। (गीता, ८/१६)- मुझे प्राप्त होकर उसका पुनर्जन्म नहीं होता, अतः भजस्व माम् (गीता, ९/३३)- मेरा भजन कर! गाय अथवा अन्य किसी का नहीं।

रामचरितमानस (१/५/४) में है कि ‘बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।’ प्रपंच है क्या? बताते हैं कि-

दानव देव ऊँच अरु नीचू।

अमिअ सुजीवनु माहुर मीचू।। (मानस, १/५/६)

सरग नरक अनुराग बिरागा।

निगमागम गुन दोष बिभागा।। (मानस, १/५/९)

स्वर्ग-नरक, दानव-देवता, स्थावर, जड़-चेतन सब विधाता का प्रपंच है जिसमें गाय भी है। आप प्रपंच की, जंजाल की या धोखे की पूजा क्यों करते हो?

श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह को सान्त्वना देते हुए लक्ष्मण ने बताया कि जगत् का जाल क्या है? धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।। (मानस, २/९१/७) स्वर्ग और नरक भी जगत् का ही एक जाल है, इनके बारे में सोचना भी मोह है, अज्ञान है, परमार्थ नहीं है और आप इनको पूजने की बातें कहते हो? फिर परमार्थ है क्या? तो सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।। (मानस, २/९२/६) मन, कर्म और वचन तीनों तो राम में लगाना है। अब आपके पास बचा क्या जिसे गाय की पूजा में लगायेंगे?

भगत भूमि भूसुर सुरभि, सुर हित लागि कृपाल।

करत चरित धरि मनुज तनु, सुनत मिटहिं जग जाल।। (मानस, २/९३)

परमप्रभु श्रीराम भक्त की भूमि, इन्द्रियों में दैवी सम्पद् के विकास के लिये, अमलात्मा भूसुर के हित के लिए किसी भाग्यशाली मनुष्य-तन को धारण कर लेते हैं, उसके अन्तराल में चरित्र करने लग जाते हैं, इस चरित्र को जो सुनता है अर्थात् परमात्मा की आवाज को सुनता है, उस पर दृढ़तापूर्वक चलता है उसके लिए जगत् का जाल मिट जाता है।

सखा समुझि अस परिहरि मोहू।

सिय रघुबीर चरन रत होहू।। (मानस, २/९३/१)

हे सखा! ऐसा समझ मोह को त्यागकर सीतारामजी के चरणों में अनुरक्त हो जाओ। मोह क्या है? धरणि, धाम, धन, स्वर्ग-नरक, देवी-देवता, जिसमें गाय भी है, इसका त्याग करो। और प्रेम किससे करना है? भगवान से! किसी गाय-बैल से नहीं।

यहाँ अवतरण-विधि की ओर भी विज्ञजनों का ध्यानाकर्षण अप्रासंगिक नहीं होगा। अवतार का शाब्दिक अर्थ ऊपर से नीचे उतरना, शरीर धारण करना या प्रादुर्भाव है। इसकी क्षीण रेखा वैदिक वाङ्मय में देखने को मिलती है, जिसमें कहा गया है कि वह एक परमात्मा सत् है। वही इन्द्र, वरुण, मित्र और अर्यमा है (ऋग्वेद, १/१६४/४६)। अवतार होता कैसे था? ऋग्वेद के दशम मण्डल एक सौ पचीसवें सूक्त की पाँचवीं ऋचा में है कि यं कामये तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषि तं सुमेधाम्– जिसे मैं चाहता हूँ उसे तेजस्वी, ब्रह्मज्ञाता ब्राह्मण, ऋषि तथा निर्मल मेधायुक्त कर देता हूँ। इसी विचारधारा का पल्लवन कठोपनिषद् के प्रथम अध्याय/द्वितीय वल्ली/बाइसवें मन्त्र में है कि-

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू ँ् स्वाम्।।

यह आत्मा न तो प्रवचन से, न विशिष्ट बुद्धि से और न बहुत कुछ सुनने से प्राप्त हो सकता है। उसकी ओर चलनेवाले हजारों, लाखों पथिकों में से जिस किसी का भी वह वरण (चयन) कर लेता है वही उसे देख पाता है। उसके निर्देशन में चलकर वही उसे जान पाता है। भगवान सबके हृदय में है किन्तु उसे देख वही पाता है जिसका वह वरण कर लेता है। ‘सब घट मेरा साईयाँ, सूनी सेज ना कोय।’ प्रभु सर्वत्र है किन्तु जान वही पाता है जिसके यहाँ वह अवतरित होता है। इसी को गोस्वामीजी कहते हैं- सो केवल भगतन हित लागी। (मानस, १/१२/५), कृपासिन्धु जन हित तनु धरहीं। (मानस, १/१२१/१)- भगवान केवल भक्त के हित के लिये शरीर धारण करते हैं। किसी अव्यक्त स्वरूप को प्राप्त महापुरुष द्वारा लगनशील साधक के हृदय में जागृत हो जाते हैं। अवतरण का यही वेदोक्त तरीका है। गाय के लिये अवतार वेद में कहीं है ही नहीं। अवतार किसी योगी के हृदय में होता है, बाहर कहीं नहीं।

* इन सभी आक्षेपों से बच निकलने के लिये लेखक महोदय कहते हैं कि गाय विधाता की सृष्टि से बाहर है, लोकेतर है। उसने स्वेच्छया पशु शरीर धारण किया है। उसका पशुचित आहार-विहार और शरीर-त्याग भी लीलामात्र है, लोकहित के लिये है।

गाय क्या हुई भगवान हो गई। ठीक है, यदि गाय पशु है तो उसका कोई दूसरा नाम रख लें लेकिन भगवान कैसे हो गयी? गाय शरीरधारी है, आँखों से देखी जानेवाली, बुद्धि से पहचानी जानेवाली है- जबकि वह प्रभु मन-बुद्धि से परे है।

गाय ने मानवहित के लिये ही तो अवतार लिया है तो किसी ने अपना हित समझा उसके दूध-दही तथा घी में, किसी ने हित समझा उसकी खाल-हड्डी-माँस-मज्जा और गोरोचन से बनी दवाइयों में, तो क्या बुरा है? यह तो बताया नहीं गया कि हित कैसे समझें?

महाभारत के समरांगण में दिव्यास्त्रों का प्रभाव जिस पर नहीं पड़ा, उन श्रीकृष्ण ने साधारण से बहेलिये का एक बाण स्वीकार कर अपनी लीला का सँवरण कर लिया। यदि गाय भी लीला से ही शरीर त्यागती है तो उसको लीला करने दो, उसकी लीला में बाधा कौन उत्पन्न कर सकता है?

लेखक के अनुसार गाय पर संकट आते ही भगवान अवतार लेंगे। यदि गाय की रक्षा तभी होती है जब भगवान आते हैं, तो बीच में मनुष्य क्यों परेशान हैं? यदि गाय अरक्षित है, रक्षा के लिये आपसे आशावान् है तो आपकी रक्षा कैसे करेगी? जो गाय सहित सबका रक्षक है- जा करि तैं (गाय) दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई। (मानस, १/१८३ छन्द)- उस अविनाशी भगवान को क्यों नहीं भजते?

भगवान का अवतार शीघ्र हो- इसके लिये नारद-जैसे महर्षि ने कंस द्वारा देवकी के छः अबोध एवं निरपराध शिशुओं की हत्या करा दी। एक महात्मा को ऐसी हत्या के लिये प्रोत्साहन देना क्या शोभा देता है? वे गाय नहीं मरवा रहे थे, मानव-बालकों को मरवा रहे थे, वह भी श्रीकृष्ण के सगे भाइयों को! फिर भी नारद को कोई पाप नहीं लगा। श्रीकृष्ण के यहाँ उनका आना-जाना और सम्मान यथावत् रहा। अतः कम-से-कम महात्माओं को तो यह संकट नारद की चरम सीमा पर पहुँचाना चाहिए, जिससे अवतार लेने की बात भगवान कहीं टाल न दें।

* लेखक महोदय ने कविकुलगुरु कालिदास प्रणीत रघुवंश महाकाव्य का उद्धरण दिया है कि महाराज दिलीप ने गो-सेवा की, जिससे उनको पुत्र हुआ।

दिलीप चक्रवर्ती नरेश थे। यदि गाय चराने मात्र से सन्तान उत्पन्न होती तो अपनी ही गायों को क्यों नहीं चरा लिये? वस्तुतः सन्तान के अभाव का दुःख लेकर वे गुरु वशिष्ठ के पास गये, विनय सुनाया। वशिष्ठ द्रवीभूत हुए, एक सेवा सौंप दी। उनके पास गाय ही थीं तो मोटर साफ करने की सेवा कहाँ से देते।

कथा आती है कि उसी गाय को शेर ने पकड़ लिया। दिलीप ने कहा कि यह ऋषि की गाय है इसलिये छोड़ दो। यह नहीं कहा कि गाय धर्म है, इसलिये छोड़ दो। वस्तुतः महापुरुष के प्रति की गई सेवा ही आशीर्वाद बनकर लौटती है। महापुरुष की इच्छा को भगवान ही पूरा करते हैं- जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।। (मानस, ७/११३/४) हमारे परमहंसजी महाराजजी ने भी बहुतों को आशीर्वाद दिया; किन्तु यह देन महापुरुष की है, गाय की नहीं। दशरथ को पुत्रप्राप्ति का आशीर्वाद महापुरुष ने ही दिया था। फार्मूला पुराना होते हुए भी गो-सेवा की शर्त उन्हीं महर्षि वशिष्ठ ने नहीं रखी, महाराज दशरथ को पुत्र उत्पत्ति के लिये दूसरा उपाय किया। महाभारतकाल में नियोग विधि अपनायी गयी। गाय चराना पुत्रप्राप्ति का कोई रास्ता होता तो वंशोच्छेद के कगार पर खड़े अनेक परिवारों में आशा के दीप जल उठते, कोई सन्तानविहीन न रहता।

* गायों के समर्थन में लेखक ने महाभारत में उल्लिखित वशिष्ठ की कामना को उद्धृत किया है कि जिस प्रकार नदियाँ सागर में गिरती हैं उसी तरह से उन्मुक्त रूप से दूध देनेवाली, सोने से मढ़ी सींगोंवाली गायें मुझे निरन्तर मिला करें। लिखते हैं कि यदि गाय धर्म न होती, तो वशिष्ठ उनके बीच रहना क्यों पसन्द करते?

वस्तुतः महर्षि वशिष्ठ चक्रवर्ती नरेशों के पुरोहित थे, तभी तो सोने से मढ़ी सींगवाली गाय की कामना करते हैं। सोने के सींगवाली गायें पैदा तो होती नहीं। इसे तो कोई व्यक्ति ही मढ़ाकर देगा। उन्हें कुछ गायों को पाकर तृप्त हो जाना चाहिए था, किन्तु कहावत है कि जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई। (मानस, ६/१०१/१) सम्पत्ति से मन नहीं भरा तो आश्चर्य क्या? इसी का तो उन्हें खेद था- उपरोहित्य कर्म अति मन्दा। बेद पुरान सुमृति कर निन्दा।। (मानस, ७/४७/६)

वशिष्ठ ही क्यों, वैदिक ऋषियों की कामना देखें- सनेयमश्वं गां वासऽआत्मानं तव पूरुषः। (यजु. १२/७८)- हे परमात्मा! मैं घोड़ा, गाय, वस्त्र और आत्मा का निरन्तर सेवन करूँ। अन्नवतां ओदनवतां अमिक्षवतां एषः राजा भूयासम्।– हे भगवन्! जहाँ अन्न होता हो, जहाँ चावल होता हो, जहाँ दूध-दही और छेना होता हो, मैं ऐसे लोगों का राजा बनूँ। आज के लोग होते तो कहते- भगवन्! मैं बम्बई में रहूँ, फ्लैट खरीदूँ- तो क्या यह हो गया धर्म? वशिष्ठ ने कामना की तो क्या हो गया? पुरोहित और क्या माँगता? बहुत से दानों में, सम्पत्तियों में श्रेष्ठ तो यही गोधन था।

* महाभारत में ही गाय से भी बढ़कर एक चीज बतायी गयी है और वह है सोना! अनुशासन पर्व में है कि क्षत्रियों के संहार का पाप नष्ट करने के लिये परशुरामजी ने पृथ्वी, गाय और अन्न आदि का दान किया, यहाँ तक कि अश्वमेध यज्ञ किया; किन्तु पाप से मुक्त नहीं हुए। तब उन्होंने वशिष्ठ इत्यादि ऋषियों से पूछा। उन्होंने बताया कि भृगुनन्दन! पृथ्वी पर भूमि, गाय और सभी दानों से पावन है सुवर्ण का दान।

* जिस गाय की रक्षा भगवान करते हैं वह वस्तुतः मनसमेत इन्द्रियाँ ही हैं। अपने बल पर साधक इन्हें वश में नहीं कर सकता- छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। (मानस, ७/४८/५) क्योंकि गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।। (मानस, ३/१४/३) बुद्धि-विवेक से जो कुछ भी आप करते हैं, मायिक क्षेत्र का ही छोटा-बड़ा निर्णय होता है। वह माया से परे अविनाशी का निर्णय नहीं हो सकता। इसलिये तुलसिदास (मन) बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै। (विनय०, ८९) जब तक वह प्रभु हृदय से रथी होकर रोकथाम न करने लगे, (हृदय से रथी होना ही उनका अवतार है, जब तक वे ऐसा नहीं करते) तब तक आपके ऊपर भगवान की कोई कृपा नहीं है। कृपा मान लेने से कृपा हो नहीं जाती। मानस में है कि जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी।। (मानस, १/१०४/६) अनुभूति होने लगती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि साधना के सही मार्ग ‘नियत कर्म’ पर चलते ही वह निर्लेप, साक्षी परमात्मा हृदय-देश में जागृत हो जाता है, क्रमशः उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः और परमात्मेतिबन जाता है (गीता, १३/२२)। पूज्य महाराजजी कहते थे, ‘‘हो! भगवान ऐसे बतियावत हैं जैसे हम तूँ बैठ के घंटों बतिआईं और क्रम न टूटे। भजन कोई करता नहीं बल्कि भगवान ही करा लेते हैं। वे साथ न रहें तो निवृत्ति दिलानेवाला भजन आरम्भ ही नहीं होता।’’

बाहर संसार में पशु-योनि में जो गाय है वह केवल सम्पत्ति है। अथर्ववेद में है कि- गावो भगो (४/२१/५) अर्थात् गाय धन है। महाभारत में है कि- गोभिस्तुल्यं न पश्यामि धनं किंचित् इहाच्युत। (अनुशासन पर्व, ५१/२६) अर्थात् गाय के समान कोई धन इस संसार में मैं नहीं देखता। अस्तु गाय धन है। धन सामाजिक व्यवस्था के लिये आवश्यक भी है, धनोपार्जन एवं संग्रहहेतु लोग कितना कष्ट उठाते हैं? आप गोधन की सुरक्षा करें; किन्तु गाय को बैकुण्ठ का साधन, परमधर्म बताकर भोलीभाली जनता का भयादोहन न करें।

* इस पुस्तिका के लेखक एक मनोरंजक तर्क यह देते हैं कि गो द्विज धेनु देव हितकारी। (मानस, ५/३८/३)- इस अर्धाली में गोस्वामीजी ने गो तथा धेनु इन समानार्थक शब्दों का प्रयोग इसी अभिप्राय से किया है कि गो शब्द को लोग भले ही अनेकार्थक मान लें; किन्तु धेनु शब्द तो किसी भी प्रकार गाय के अतिरिक्त किसी भी अर्थ का बोध नहीं करा सकता किन्तु अब इसका क्या किया जाय कि धेनु शब्द भी अनेकार्थक है। वेद में यह शब्द वाणी के लिये भी प्रयुक्त हुआ है- सा ते काम दुहिता धेनुरुच्यते यामाहुर्वाचं कवयो विराजम् (अथर्व. ९/२/५)। धेनु शब्द धनसूचक भी है। मत्स्य पुराण, वाराह पुराण इत्यादि में दस-बारह प्रकार के धेनुओं का वर्णन आता है, जैसे- गुड़धेनु, तिलधेनु, मधुधेनु, शर्कराधेनु, दधिधेनु, घृतधेनु, नवनीतधेनु, रत्नधेनु, जलधेनु, लवणधेनु, कपासधेनु, धान्य अर्थात् अनाजधेनु। ये सब धन नहीं हैं तो क्या हैं? आज के युग में रेडियम धेनु है, पेट्रोल धेनु है, बिजली धेनु है।

भौतिक सम्पत्ति का उपयोग मानव की आयु तक ही सीमित है; किन्तु मृत्यु के पश्चात् भी जो सम्पत्ति साथ देती है वह है आत्मिक सम्पत्ति। वह निज धन है। एक बार यदि प्राप्त हो जाय तो निश्चित कल्याण करके छोड़ेगी। गो-संयम द्वारा ही वह आत्मिक सम्पत्ति अर्जित होती है इसीलिये गो का दूसरा नाम धेनु है। आत्मिक सम्पत्ति को ही श्रीकृष्ण ने गीता में दैवी सम्पद् कहा है, इसलिए गो का तीसरा नाम सुरभि है; क्योंकि यह परमदेव के सुरत्व को अपने में स्थान देती है।

* कहते हैं कि गो-चारण से लौटते समय श्रीकृष्ण के मस्तक पर गोधूलि लगी रहती थी, इसलिए धन्य हैं वे गौ माता।

कोई कहानी सुना रहा था कि एक मौलवी साहब प्रतिदिन पाव भर दूध खरीदते थे। एक दिन मौलवी साहब बहुत बिगड़े- कैसा दूध दिया था, कल तुम्हारे दूध में मक्खी निकली? ग्वाला हँसा और बोला, मौलवी साहब! पाव भर दूध में मक्खी नहीं तो क्या हाथी निकलेगी? इसी तरह श्रीकृष्ण भी बचपन में गाय चराते थे, नन्द के यहाँ वही व्यवस्था थी। गोधूलि से शोभा बढ़ती हो तो आजकल के चरवाहों को क्यों नहीं देख लेते? यह भी कोई तर्क नहीं कि स्वेच्छा से या गाय को धर्म समझकर चराते थे; क्योंकि ज्योंही अक्रूर से पता चला, श्रीकृष्ण मथुरा गये और इसके बाद कभी गो-चारण का प्रसंग नहीं मिलता। कहाँ गई उनकी इच्छा? क्यों छोड़ दिया उन्होंने गो-चारण धर्म? रही गोमूत्र से श्रीकृष्ण को नहलाने की बात तो आज भी आदिवासी पिछड़े क्षेत्रों में, जहाँ अस्पताल नहीं है, खसरा इत्यादि चर्मरोग होने पर गोबर मलकर स्नान करते हैं, घी और दूध के मटके के ऊपर गोबर लगाकर बाजार ले जाते हैं, ग्रहण लगने पर गोबर से गोंठते हैं। यह टोटका है, रीति है, सुरक्षा का प्रयास है न कि धर्म।

* विद्वान् लेखक ने इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया है कि निशाचर गो-ब्राह्मण पर ही अधिक अत्याचार करते थे, शूकर या गधे पर नहीं। गाय धर्म न होती तो निशाचरों का सर्वाधिक शिकार क्यों बनतीं? किन्तु ऐसी भी कोई बात नहीं है। रावण के यहाँ महिष मानुष धेनु खर अज (मानस, ५/२/छन्द) इत्यादि सब कुछ खाते थे। गाय ही नहीं गधा भी खाते थे। कौन कहता है कि गधा नहीं खाते थे। हाँ, गाय उस समय की सम्पत्ति थी और ब्राह्मण बुद्धिजीवी था। सामाजिक व्यवस्था के दोनों ही आधार-स्तम्भ थे इसलिये ये आसानी से नहीं मिलते थे। इसलिये रावण को इन्हें प्राप्त करने में बल प्रयोग करना पड़ता था। आज भी जब कोई देश दूसरे देश पर हमला करता है तो वहाँ सम्पत्ति छीनने और बुद्धिजीवियों को नष्ट करने का प्रयास करता ही है। फिर किसी पर अत्याचार हो तो क्या वह सनातन धर्म हो जायेगा? दानव और देवता विधाता के प्रपंच के दो छोर हैं। एक गुणों का नाम और दूसरा दुर्गुणों का नाम है, न कि कहीं सींगवाले राक्षस होते हैं। श्रीकृष्ण भगवान माने जाते हैं और वसुदेव देवता, नन्द-यशोदा मानव तथा बाणासुर, कंस इत्यादि सगे-सम्बन्धी राक्षस थे। जिनमें जैसे गुणों का बाहुल्य था वैसी संज्ञा मिली। श्रीकृष्ण के अनुसार (गीता, १६/६) सृष्टि में मनुष्य केवल दो प्रकार का होता है न चार प्रकार का, न दस प्रकार का, तीसरी कोई जाति हो ही नहीं सकती। दैवी सम्पद् प्रधान व्यक्ति देवता है और आसुरी सम्पद् को धारण करनेवाला असुर है। दो सगे भाइयों में से एक देवता तो दूसरा असुर हो सकता है और उनका खान-पान धर्म का मापदण्ड नहीं हो सकता।

* लिखते हैं कि गाय हव्य द्वारा देवताओं का, कव्य से पितरों का, दूध-दही से मनुष्यों का और मल-मूत्र से अनाज का पोषण करती है।

मान्यता है कि स्वाहा बोलकर हवन-सामग्री अग्नि में डालकर जो यज्ञ किया जाता है उसी से देवताओं का पालन-पोषण होता है। पहले तो यही विचार करना होगा कि आग में घी और हवि जलाना यज्ञ है भी या नहीं? गीता में श्रीकृष्ण का कहना है कि परमात्मा से मिलन करा देनेवाली विधि-विशेष का नाम यज्ञ है। श्वास-प्रश्वास का हवन यज्ञ है। इन्द्रियों का दमन यज्ञ है। महापुरुष के स्वरूप का स्मरण यज्ञ है। श्वास-प्रश्वास की गति का निरोध कर प्राणायाम की स्थिति पाना यज्ञ है। संकल्पों का निरोध ही प्राणायाम है- यही मन की विजेतावस्था है, चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था है- यहीं यज्ञ का परिणाम निकलता है कि यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। (गीता, ४/३१) यज्ञ का परिणाम है परमात्मा, सनातन ब्रह्म। जिसके पूर्तिकाल में सनातन ब्रह्म नहीं मिलता, वह यज्ञ कैसा? स्वाहा बोलने से, चरणामृत पीने से वह परमात्मा मिलता दिखाई नहीं देता।

योगेश्वर श्रीकृष्ण निर्णय देते हैं कि अर्जुन! यह सम्पूर्ण यज्ञ मन और इन्द्रियों की क्रिया से सम्पन्न होनेवाले हैं। श्वास में आप लग गये, सुरत स्थिर हो गयी तो लगती है आपकी श्रद्धा, आपका मन, अनुराग, विरह- यही लगता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि भौतिक द्रव्यों से सिद्ध होनेवाले यज्ञ भी हैं; किन्तु जो यज्ञ श्रीकृष्ण बताते हैं उनकी तुलना में भौतिक यज्ञ अत्यन्त अल्प हैं, तो आप वह यज्ञ क्यों नहीं करते जिसका परिणाम अल्प नहीं है? वह यज्ञ क्यों नहीं करते जिसकी विधि गीता में है? जबकि श्रीकृष्ण ने इस पर बड़ा जोर दिया कि यही शास्त्रविधि है। जो इस शास्त्रविधि को त्यागकर नाममात्र के यज्ञ करते हैं अर्थात् यज्ञ का नाम दे रखा है, यज्ञ है नहीं- ऐसे यज्ञ को करते हैं, वे यज्ञ नहीं करते बल्कि परमात्मा से द्वेष करते हैं। मिलने को कौन कहे, दुश्मनी हो गई- वह भी भगवान से! फिर तो बचना असम्भव है।

जो गीतोक्त विधि से यज्ञ नहीं करते, योगेश्वर कहते हैं कि ऐसे नराधमों, क्रूरकर्मियों और पापाचारियों को मैं अपवित्र नरक में गिराता हूँ, बार-बार आसुरी योनियों में गिराता हूँ, यही नरक है – न कि पाताल में कहीं नरक कुण्ड खोदा गया है। इस प्रकार श्रीकृष्ण द्वारा निर्धारित यज्ञ में गाय का दूध-घी नहीं लिखा है, हाँ! गो-संयम से मिलनेवाला रस अवश्य प्राप्त होता है। जहाँ गो-संयम हुआ, सनातन विदित होने लगता है। इसलिये गो-रक्षा हमारा सनातन धर्म है। गाय-बैल पालना न तो गो-रक्षा है, न सनातन धर्म!

वेद में भी गाय की नाभि को छेदकर यज्ञ करने की बात कही गयी है। गाय को निरस करके उसे दुहने की बात कही गयी है- निरस्य रसं गविषो दुहन्ति (ऋग्वेद, १०/७६/७)। यही गोस्वामीजी भी कहते हैं ‘जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं।’ (मानस, ४/९/छन्द) गो को निरस करने पर ही भगवान ध्यान में आते हैं। क्या गो माने गाय? नहीं, अन्यत्र कहते हैं- निरस्य इन्द्रियादिकं यान्ति ते गतिं स्वकं– इन्द्रियों को निरस्य करने पर ही स्वयं की स्थिति, स्वरूप में स्थिति मिलती है। होता हो गो माने गाय; किन्तु आत्मा की सद्गति के लिए, परमात्मा की प्राप्ति के सन्दर्भ में गो का अर्थ मनसमेत इन्द्रियाँ ही हैं, पशु गाय कदापि नहीं। गच्छन्ति विषयानि इति गावः– जो विषयों में गमन करे, वह गाय है अर्थात् इन्द्रियाँ। इन्हीं को विषयों से मोड़कर परमात्मा में लगाना है। यही तो साधना है। वेद में है कि शूरो न गोषु तिष्ठति (ऋग्वेद ९/१६/६) अर्थात् शूरवीर वही है जो इन्द्रियों में रमण नहीं करता। गाय की पूजा से परमगति का विधान कम से कम वेद में तो नहीं ही है, और कहीं भी नहीं है।

* कव्य उसे कहते हैं जो कौओं को खिलाया जाता है। मान्यता है कि उससे पितर तृप्त होते हैं; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण की मान्यता कुछ दूसरी ही है। गीता के अध्याय १५/८ में वे कहते हैं कि, अर्जुन! गन्ध के स्थान से वायु जैसे गन्ध का अपहरण करके ले जाता है, ठीक उसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी यह जीवात्मा जिस शरीर को त्यागता है उस शरीर से इन्द्रियों और मन द्वारा किये गये व्यापार को लेकर दूसरे शरीर में प्रविष्ट हो जाता है और दूसरे शरीर में पुनः इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता है।

दूसरे अध्याय के बाइसवें श्लोक में कहते हैं कि वासांसि जीर्णानि यथा विहाय– जैसे हम-आप पुराना वस्त्र बदलकर नया पहन लेते हैं, उसी प्रकार आत्मा शरीररूपी वस्त्र को बदल लेता है। वस्त्र बदलनेवाला जिन्दा है तो कव्य किसे देते हो? इधर शरीर छूटा, उधर मिला; बीच में कोई विराम नहीं, कोई गड्ढा नहीं, कोई नरक नहीं- जिसमें पितर प्रतीक्षा कर रहे हों, तो आप किसे तृप्त कर रहे हो? आत्मा जहाँ भी गया, जिस नये शरीर में गया, वहाँ भी भोग है ही तो तृप्त किसे करते हो? उस आत्मा की तृप्ति जब भी होगी मानव-शरीर में ही होगी, कव्य से नहीं। इसीलिए जब अर्जुन ने लुप्त पिण्डोदकक्रिया (गीता, १/४२) का भय दिखलाया तो योगेश्वर ने इसे अज्ञान ठहराया कि कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् (गीता, २/२)। पूर्वजों के निमित्त जो दान-पुण्य किया जाता है वह श्रद्धा-निवेदन मात्र है। उसे आप चाहे जितना कर लें किन्तु इससे उनको तृप्ति कैसी? कौआ को खिलाने से तृप्ति, वह भी मनुष्यों की – गीता ऐसे किसी भी अन्धविश्वास का समर्थन नहीं करती।

* लिखते हैं कि हव्य-कव्य ही नहीं, गाय मनुष्यों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देती है, लोक और परलोक देती है, इसलिए धर्म है। लेकिन देखें, रामचरितमानस क्या कहता है-

बरषा रितु रघुपति भगति, तुलसी सालि सुदास।

राम नाम बर बरन जुग, सावन भादव मास।। (मानस, १/१९)

रघुपति की भक्ति ही वर्षाऋतु है, प्रभु का दास धान है। राम नाम के दो अक्षर सावन और भादों के महीने हैं अर्थात् भक्त की तृप्ति इसी नाम से होनी है, गाय से नहीं।

आखर मधुर मनोहर दोऊ।

बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।।

सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू।

लोक लाहु परलोक निबाहू।। (मानस, १/१९/१-२)

राम का नाम-सुमिरन लोक में समृद्धि और परलोक में परमसुख की व्यवस्था देता है। यह रामनाम की महिमा है, गाय की नहीं- सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।। (३/१/८) जो भगवान से विमुख है उसके लिए समस्त जगत् अग्नि से भी अधिक जलाने वाला हो जाता है, सुख की कौन कहे?

अन्धकारु बरु रबिहि नसावै।

राम बिमुख न जीव सुख पावै।। (मानस, ७/१२१/१८)

एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं सुख है ही नहीं तो कोई पायेगा कहाँ से?

यह कहते हैं कि गाय मोक्ष देगी, तारेगी गौ माता! जबकि गोस्वामीजी कहते हैं-

रामचन्द्र के भजन बिनु, जो चह पद निर्बान।

ग्यानवन्त अपि सो नर, पसु बिन पूँछ विषान।। (मानस, ७/७८ क)

भगवान के भजन के बिना यदि कोई मोक्ष की आशा करता है तो वह भले ही अपने को ज्ञानी कहता फिरे लेकिन गोस्वामीजी के शब्दों में वह बिना सींग-पूँछ का पशु ही है, मनुष्य नहीं। इससे अधिक गोस्वामीजी क्या कहते?

बारि मथे घृत होइ बरु, सिकता ते बरु तेल।

बिन हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धान्त अपेल।। (मानस, ७/१२२ क)

* विद्वान् लेखक का अगला तर्क है कि वाल्मीकीय रामायण में मारीच ने राम को धर्म का विग्रह बताया, व्यास ने कृष्ण को धर्म कहा। चूँकि गाय, ब्राह्मण, सती इत्यादि भगवान का शरीर है, इस न्याय से भी धर्म हुई। इतना तर्कशास्त्र पढ़ने की क्या जरूरत है कि विष्णुस्वरूपा है इसलिए धर्म है, धारण करती है इसलिए धर्म है? वाल्मीकि और व्यास ने जो-जो कहा उसे ज्यों-का-त्यों क्यों मान नहीं लेते कि राम और कृष्ण धर्म के स्वरूप हैं। अव्यक्त को प्राप्त महापुरुष वास्तव में धर्म का विग्रह होता है। गाय को तो धर्म का विग्रह कहा नहीं, फिर खींच-तान कर गाय की ओर क्यों भागते हो? लगता है भावुकता के आवरण में कोई रूढ़ि मस्तिष्क को घेरकर बैठी है।

* लिखते हैं कि गाय, ब्राह्मण, वेद, सती, सत्यवादी, लोभरहित और दानी पुरुष पृथ्वी को धारण करते हैं और जो धारण करता है वह धर्म है। अतः गाय धर्म है। किन्तु नहीं, पृथ्वी को ये धारण नहीं करते। पृथ्वी ग्रहों के परस्पर आकर्षण शक्ति से टिकी हुई है। सब मिलकर धारण करते थे तो अकेले गाय ही क्यों? पहले सूर्य के रथ में घोड़े जुतते थे, चन्द्रमा को मृगछाला की चोट लगती थी, उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक की धरती गाय बनकर दौड़ती थी; किन्तु इन पौराणिक कल्पनाओं के दिन लद चुके हैं। अन्तरिक्ष की शोध के साथ पौराणिक मान्यताओं के विसर्जन के दिन आये हैं कि पृथ्वी को किसी गाय ने धारण कर रखा है। वास्तव में लोभरहित पुरुष, दानी पुरुष, सत्यवादी पुरुष, बुद्धिजीवी वर्ग या गाय- ये सभी मिलकर सामाजिक व्यवस्था को धारण करते हैं और व्यवस्थायें न तो शाश्वत-सनातन होती हैं और न धर्म! इनमें से अधिकांश का महत्त्व अब समाप्तप्राय है; क्योंकि इनसे भी अच्छी व्यवस्थायें आ गयी हैं।

* लेखक महोदय बताते हैं कि अथर्ववेद (९/१/४) में गायों को माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसा आदित्यानाम् कहा गया है अर्थात् गाय रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री और आदित्यों की बहन है। जो सबको रुलाता है उसे रुद्र कहते हैं। गाय को नहीं मानोगे तो एकादश रुद्र तुम्हें रुलायेंगे। उन्हें क्यों नहीं रुलाते जो गाय को काटते हैं? लिखते हैं, वसु धन के देवता हैं। गाय को नहीं मानोगे तो वसु तुम्हें निर्धन बना देंगे। जबकि भारत के कुछ ही प्रदेशों को छोड़कर अधिकांश विश्व गो-मांसाहारी है। बीफ (गो-मांस) के लिए बड़े-बड़े फार्म खुल रहे हैं। दुधारू गाय अलग, भोजनवाली गाय अलग, जैसे मत्स्य-पालन करते हैं। पचीस लीटर से कम दूध देनेवाली गायें भोजन के काम आ जाती हैं। पचास से साठ लीटर दूध देनेवाली गायें पाली जाती हैं। विश्वभर को दूध का पावडर सप्लाई करते हैं, उनके मकान तीस-तीस मंजिल के हैं, गायों की रखवाली हेलीकाप्टर से करते हैं। न तो धन का अभाव है, न वस्तुओं ने निर्धन बनाया, न रुद्र ने ही दण्ड दिया। जिस तरह अशिक्षित और भोलीभाली जनता को ओझा लोग आतंकित करते हैं कि भूत यहाँ से आया है, बचो! एक मुर्गा दो, एक बोतल शराब दो- यह धमकी भी कुछ वैसी ही है। स्वतन्त्रता से पूर्व जब भारत में शिक्षा का प्रतिशत शून्य था, गायों के प्रति यह मोह कुछ अधिक ही था, उनकी पूजा होती थी। उस समय छप्पर के स्थान पर खपड़े का छाजन भी नहीं था- इतिहास उठाकर देख लें, वसुओं ने क्यों नहीं धनवान बना दिया?

आदित्यों की बहन भी विचारणीय है। अदिति के लड़के द्वादश आदित्य हैं, जिनमें विष्णु भी हैं। दिति, अदिति, विनिता इत्यादि कश्यप की बारह रानियाँ थीं। दिति से दानव, अदिति से देवता, विनिता से पशु-पक्षी पैदा हुए। इस नाते गाय आदित्यों की बहन हुई। किन्तु आदित्यों की ही क्यों, उसे तो असुरों की भी बहन होनी चाहिए; क्योंकि पिता तो एक ही था।

* कहते हैं कि गाय माता है, ऐसा वेद में लिखा है। गौरव की बात है! आपकी माता है तो रक्षा करो; किन्तु वेद में यह कहाँ लिखा है कि गाय सनातन धर्म है, उसकी पूजा करो? वेद में लिखा है कि गाय माता है तो वेद में यह भी लिखा है कि उसका पति कौन है? अथर्ववेद के नवम काण्ड का चतुर्थ ऋषभ सूक्त है, जिसके दूसरे और चौथे मन्त्र में बैल को पिता वत्सानां पतिरघ्नानाम् अर्थात् गाय का पति और बछड़ों का पिता कहा गया है। तो क्या बैल को पिता मानकर पूजना होगा? गाय को ही क्यों, ऋग्वेद (१०/६२/३१) में पृथ्वी को माता कहा गया, (१०/६४/९) में जल को माता कहा गया, यजुर्वेद (१२/७८) में औषधीरिति मातरः औषधियों को माता कहा गया, तो क्या इनको पूजने लगें? इसी प्रकार मानस में- जनु मारेसि गुर बाँभन गाई। (मानस, २/१४६/३) इनका विशेष महत्त्व है, होना भी चाहिए। बहुत-सी वस्तुओं का महत्व है। पिता का महत्व है, भाई-बहन का महत्त्व है, गाय का भी महत्त्व है। जो वस्तु विकास में सहयोगी होगी, उसी का महत्त्व होगा। जैसा आजकल बिजली का बड़ा महत्त्व है, राष्ट्रीय सम्पत्ति है। आविष्कारों का महत्त्व बढ़ता-घटता ही रहता है; किन्तु इससे कोई वस्तु धर्म नहीं हो जाती।

* वेद में तो यह भी लिखा है कि अत्यन्त झूठ बोलनेवालों को, मारपीट और तोड़फोड़ करनेवाले को, घमण्डी लोगों को हे राजन्! उसी प्रकार छेद डालो जैसे कूदनेवाली गाय को लात से और हाड़ी को एड़ी से मारते हैं। (अथर्ववेद, ८/६/१७) इसी प्रकार ऋग्वेद में है- रजिष्ठया रज्या पश्वः आ गोस्तू तूर्षति पर्यग्रं दुवस्यु (१०/१०१/१२) अर्थात् जिस प्रकार सेवक गाय आदि पशु की नाक में रस्सी लगाकर, उसे पीड़ित करते हुए आगे ले जाता है….। इस ऋचा में गाय को पशु कहा गया और उसके रख-रखाव की एक व्यवस्था दी गई, न कि ऐसा करना कोई धर्म है।

अभी लंका में भारत की शान्ति सेना गई थी। वहाँ ‘लिट्टे’ के सैनिक कहते थे- जय लंकामाता! यहाँ हम कहते हैं- भारतमाता। कहीं कहते हैं गंगामाता! अमेरिका में आमेजन नदी को पिता कहते हैं। यह तो मनुष्यों की दी हुई मान्यतायें हैं। उपाधि किसी को भी मिल सकती है, जैसे आजकल मदर टेरेसा को मिली है। हर पादरी को अंग्रेज फादर कहते हैं। हिरोशिमा पर बम गिरा तो उसे पुनः बसाने के प्रयास में उनतीस बच्चों को जन्म देनेवाली माता को वहाँ ‘मदरलैण्ड’ की उपाधि से विभूषित किया गया। अस्तु परिवर्तनशील सामाजिक व्यवस्था के बारे में कोई भी लिखा-पढ़ी हर देश और हर समय के लिए उपयोगी नहीं हो सकती। उसका पीछा करोगे तो विकसित देशों से हजारों वर्ष पीछे उसी युग में पहुँच जाओगे। जब मोरपंख से भोजपत्र पर लिखते थे, अरणियों को घिसकर- दो लकड़ियों को घिसकर आग जलाते थे, उसके संग्रह की व्यवस्था भी न थी जैसा कि अभी महाभारतकाल तक था- एक ब्राह्मण की अरणि लेकर मृग भागा तो युधिष्ठिर ने उसका पीछा किया।

आजकल महाभारत को दूरदर्शन पर प्रस्तुत करनेवाले निर्माता निर्देशक श्री बी.आर. चोपड़ा ने एक साक्षात्कार में बताया है कि उन्हें पात्रों की वेशभूषा को लेकर असुविधा का सामना करना पड़ रहा है; क्योंकि उस समय के लोग सिले वस्त्र नहीं पहनते थे, बटन नहीं लगाते थे क्योंकि पहले सुई और बटन दोनों ही हड्डी से बनते थे। बटन शब्द तक अंग्रेजी भाषा का है। यह डींग भले ही हाँक लें कि आधुनिक कम्प्यूटर, राकेट या परमाणु बमों के सूत्र वेद में हैं; किन्तु पुरातत्व की प्राचीनतम खुदाइयों में भी वायुयान तो क्या साइकिल के भी अवशेष नहीं मिलते। वैदिककाल से परवर्ती पूर्वजों की शोध को नकारना अन्याय तो है ही, धृष्टता की पराकाष्ठा भी है कि उपयोग तो हम भैंस का करें किन्तु गुण गाय के गायें, उपयोग टैªक्टर का करें गीत बैलों के गायें, उर्वरकों के बिना जीवनयापन न हो किन्तु महिमा गोबर की बतायें। गाय के पीछे नारेबाजी करनेवाले कितने ऐसे हैं जो उन बैलों को बैठाकर खिलाते हों, जिन्होंने आजीवन उनका खेत जोता है? शायद ही कभी कोई बैल किसान के खूँटे पर मरता हो? वृद्ध से वृद्ध बैल को सौ-पचास रुपये में बेचनेवाले क्या अपनी बला नहीं टालते? क्या वे नहीं जानते कि ले जानेवाला इनका क्या करेगा?

* आचार्य प्रवर लिखते हैं कि गाय पवित्र है।- फिर अपवित्र कौन है? क्या भैंस अपवित्र है? बहुत से लोग गाय का दूध नहीं पीते क्योंकि गाय अभक्ष्य खाती है- जबकि भैंस मर जायगी किन्तु अभक्ष्य नहीं खाती। कौन कहता है कि गाय पवित्र है और भैंस अपवित्र? पाराशर-स्मृति के छठें अध्याय में है कि अन्न को गाय या कुत्ता सूँघ भी ले तो वह अपवित्र हो जाता है। गोस्वामीजी कहते हैं- सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।। (मानस, ७/९५/२) भजन करनेवाला शरीर पावन है- यह आचार्य कहते हैं गाय पावन है। गोस्वामीजी कहते हैं- कोई क्यों न हो भगवान का रामु कहत पावन परम, होत भुवन बिख्यात। (मानस, २/१९४), यह आचार्य कहते हैं- गोमूत्र पावन परम!

* कहते हैं कि गाय के गोबर से लिपाई होती थी, गोबर में लक्ष्मी का वास है, इसलिये गाय की पूजा करें। लिपाई जरूर होती थी। दीर्घकाल तक भारत के लोगों का उससे काम चला, आदर की वस्तु है; किन्तु क्यों होती थी? उस समय सीमेण्ट का आविष्कार नहीं था। धूल और गर्द को शान्त करने के लिए यही आविष्कार सुलभ था। गाय की महिमा का गायन करनेवाले भी सम्पन्न परिवारों की तरह सीमेण्ट, संगमरमर, मुजैक और एअर कण्डीशन में रहना पसन्द करते हैं। उसके ऊपर गोबर से लीपना सहन नहीं कर सकते, भाषण चाहे जो दे लें। सम्पन्न परिवारों के बीच यदि दो-एक कच्चे घर गोबर से लिपे दिखायी देते हैं तो बड़े आदमियों की निगाह उस पर गड़ी हुई है कि पन्द्रह-पचीस हजार देकर उसे भी खरीद लें। कौन कहता है कि गोबर में लक्ष्मी का निवास है? गोबर की लिपाई आजकल दरिद्रता की निशानी है, निर्धनता का नग्न ताण्डव है। कोई चाहता भी नहीं कि गोबर से लिपे घर में रहें, मुजैक सबको अच्छा लगता है किन्तु करें क्या! विवशता है उनकी, जो अभी भी लीप रहे हैं।

अनुसुइया का एक किसान कहता था कि हमारे बैल की पूँछ में बेर्रा (जौ और चना) का निवास है। उसका आशय था कि अधिक बेर्रा गोबर की देन थी। इसी प्रकार गोबर में लक्ष्मी का निवास तब था जब यूरिया, डाई, पोटाश, कैलशियम इत्यादि उर्वरकों का आविष्कार नहीं था, उपज का माध्यम गोबर था। उस समय अनाज धन था, गोधन था, औद्योगिक क्रान्ति नहीं हुई थी, कल-कारखाने नहीं थे, इसलिये उस जमाने में गोबर में लक्ष्मी का निवास था; किन्तु आज नहीं। आज लक्ष्मी का निवास इक्सपोर्ट, इम्पोर्ट में है, स्मगलिंग में है। गाय की पूँछ छोड़कर लक्ष्मी आजकल फाइव स्टार होटलों में रहने लगी हैं।

आचार्य का यह कथन भी ग्राह्य नहीं है कि गाय को ही वर प्राप्त है इसलिये उसके मल को भी गोबर कहते हैं। प्राप्त होने को तो गाय को शाप भी प्राप्त है फिर भी आचार्य का यह तर्क विचारणीय है कि गोबर नामकरण ही क्यों? भैंसबर क्यों नहीं? शूकरबर क्यों नहीं? कूकरबर क्यों नहीं? गदहीबर क्यों नहीं? गाय श्रेष्ठ है तभी तो गोबर नाम पड़ा।

वस्तुतः ऐसी कोई बात नहीं है। सभ्यता के आरम्भ में ही मानव-मनीषा ने गाय में अनेक उपयोगी वस्तुओं की शोध कर ली थी। चूँकि गाय शोध में पहले आयी इसलिये वैसी ही वस्तुयें अन्यत्र मिलने पर उन्हें भी वही नाम दिया गया। गायों को गोठ में बाँधते थे। गोठ अर्थात् गायों का समूह, उनका घेरा। आज किसी भी वस्तु की परिक्रमा को गोठना कहते हैं। आज राजस्थान में गोठ सामूहिक पिकनिक को कहते हैं- जहाँ लोग चूरमा-बाटी खाते हैं। गायों की व्यवस्था पर विचार-विमर्शहेतु लोग एकत्र होते थे उसे गोष्ठी कहते थे, आज छोटे-मोटे आमेलन को गोष्ठी कहते हैं- जैसे कवि-गोष्ठी। क्या कवि लोग गायों के बारे में ही विचार-विमर्श करते हैं? फिर कवि-गोष्ठी क्यों कहते हैं? गायों के वंश को गोत्र कहते थे। आज यह शब्द मानव-वंश के लिये प्रयुक्त होने लगा है। खोये हुए गायों की खोज को गवेषणा कहते थे, आज प्रत्येक शोध के लिये यही नाम व्यवहृत होता है। गायों पर दृष्टि रखने के लिए प्रयुक्त खिड़की को गवाक्ष कहते थे, आज प्रत्येक खिड़की को गवाक्ष कहते हैं; जबकि गायों की रखवाली के लिए इनका प्रयोग लुप्त हो गया। गायों की बहुतायत वाला प्रदेश ‘गोकुल’ कहलाया। जैसे बौद्ध-विहार अधिक होने से भारत के एक प्रदेश का नाम ही ‘बिहार’ पड़ गया। जिस प्रकार बिहार राज्य में बिहार के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है बल्कि बौद्ध-विहार ही कम हैं। आज गोकुल में गायें न के बराबर हैं भैंसें अधिक हैं फिर भी उसे गोकुल ही कहते हैं, उसी प्रकार भैंस के मल को भी गोबर कहते हैं तो आश्चर्य क्यों! कर्मकाण्ड में यदि कोई कहता है कि गाय का गोबर तो नहीं मिला तो पण्डित कहते हैं- भैंस का ही गोबर लाओ। काशी में तो भैंस के गोबर से भी काम चल जाता है।

* इसी प्रकार यह कहना भी विवेकसम्मत नहीं है कि गाय के विकार को गव्य कहते हैं। तब तो कौए के विकार को कव्य कहना पड़ेगा, जिसका उपयोग पितरों के लिये असंगत होगा। लिखते हैं कि गाय से ही पंचगव्य बनता है, अन्य किसी पशु से नहीं। सोचने की बात है कि गाय संसार में सर्वत्र पायी जाती है लेकिन पंचगव्य का आविष्कार और प्रयोग भारत तक ही क्यों सीमित है? भारत में भी केवल ब्राह्मण और ब्राह्मणों में भी केवल पुरोहित पंचगव्य बनाता है। यदि यह कोई उपयोगी आविष्कार होता तो विश्वभर में इसका उपयोग होता, जैसे- टेलीविजन का प्रयोग सब कर रहे हैं, गाय के दूध का पावडर, मक्खन की टिकिया, गोबर गैस का सर्वत्र प्रयोग है। पंचगव्य का प्रयोग अशुद्ध व्यक्ति अथवा वस्तु को शुद्ध करने में कुछेक स्मृतियों में है, जैसे- किसी ने गाय बाँधा और गले में रस्सी के साथ वह मर गई तो गाय की हत्या का पाप बाँधनेवाले को लगता है। अब शुद्धि के लिये वह गाय का दूध, दही, घी, मल और मूत्र मिलाकर पीये- यही पंचगव्य है। गोमूत्र में जौ उबालकर खाये, गाय चराये, गाय दान दे। यह कोई आविष्कार नहीं टोटका था, रूढ़ि थी, गायों की सुरक्षा का प्रयास था; किन्तु आज इन विधानों को मानने का दावा करते हुए भी इन्हें कोई नहीं मानता। गाय-बैल आज भी मरते हैं; किन्तु गो-हत्या के प्रायश्चित रूप में भीख माँगते, गोशाला में सोते, पंचगव्य पीते या गोमूत्र में जौ उबालकर खाते कोई दिखायी नहीं देता। प्रत्येक जीव की मृत्यु या हत्या में प्रचुर दान-दक्षिणा किसी वर्ग-विशेष की उस युग-जमाने की जीविका थी, जिसे मानना न तो आज सम्भव है और न कोई मानता ही है।

मल-मूत्र के आयुर्वेदिक प्रयोग में गाय के साथ अन्य पशु-पक्षियों का भी स्थान है। किसी पक्षी की बीट फोड़े को बहा देती है, तो बकरी और गैंडे के मूत्र का अपना प्रयोग है। भारत के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री ने तो शिवाम्बु का साहसिक प्रयोग किया। अतः यह कथन भी अतिशयोक्ति है कि केवल गाय का मल-मूत्र उपयोगी होता है।

* ऐसी ही अतिशयोक्ति विद्वान् लेखक वहाँ भी करते हैं जहाँ वे कहते हैं कि गाय तो माँ से भी बढ़कर है; क्योंकि माँ बहुत सेवा लेती है, अन्न खाती है, जबकि गाय घास-भूसा खाकर ही सन्तोष करती है। पशु तो है ही और क्या मालपुआ खिलाने का विचार है? कहते हैं, माँ सालभर ही दूध पिलाती है, गाय आजीवन पिलाती है। यदि गाय इतनी ही प्रिय होती तो कष्ट में वृद्ध व्यक्ति भी ‘हाय मैया’ न कहकर ‘हाय गैया’ कहता; किन्तु ऐसी कोई बात नहीं है। कहावत है कि ‘हरिअर खेती गाभन गाय। तब जानो जब मुख में जाय।’ कहीं कोई बच्चा मर गया तो दूध का कोई भरोसा नहीं और दूध है तो ‘दुधारु गाय की चार लात’ ऊपर से सहनी पड़ती है। रूखी-सूखी खानेवाली गाय सौ ग्राम से अधिक दूध भी नहीं देगी। इतनी अल्पमात्रा में दूध, जिस पर पहला हक बछड़े का है, एक बूँद भी उसे नहीं मिलता- यह देखकर गाँधीजी ने गाय का दूध पीना बन्द कर दिया था, बकरी पाल रखी थी उन्होंने। फिर भी विश्ववन्द्य बापू कहलाये। ईसा भेड़ चराते रहे, मुहम्मद बकरी; किन्तु ईश्वरीय ज्ञान का आलोक मिलने में इन्हें कोई बाधा नहीं हुई, यद्यपि उन्होंने गो-सेवा नहीं की।

जीवनपर्यन्त की कौन कहे, गाय पाँच-छः महीने से अधिक दूध नहीं देती, बदलते रहना पड़ता है। गाय के दूध में प्रचुर घी भी नहीं होता। यदि भैंस चार हजार में मिलती है, तो उतनी ही दूध देनेवाली गाय दो हजार में मिल जाती है। भैंस को घर के भीतर बाँधते हैं, तो गाय को खेत में भी कोई पूछता भी नहीं। कहते हैं गाय का दूध नवजात शिशु के फाहे के काम आता है, जब माँ का दूध भी काम नहीं आता; किन्तु उससे भी पहले शिशु श्वास में आक्सीजन लेने लगता है और जीवनपर्यन्त लेता रहता है तो क्या आक्सीजन हो गया धर्म?

इस प्रकार उनकी पूरी पुस्तिका में गाय या तो वस्तु है या देवता। वस्तु है तो रक्षा कीजिये। अपनी वस्तु की रक्षा कौन नहीं करता? उसके लिए संकट कौन नहीं सहता? किन्तु वस्तु का उपयोग घटता-बढ़ता है। घर कच्चा था तो लीपने के लिये गोबर का उपयोग था, पक्का हो गया तो आवश्यकता जाती रही। खाद के लिए गोबर आवश्यक था; किन्तु यूरिया और डाई कुछ ऐसी आईं कि गोबर का प्रयोग क्षीण होने लगा। जिस प्रकार भैंस की खोज से गाय का मूल्य घट गया, उसी प्रकार जर्सी इत्यादि के समक्ष भैंसों का अवमूल्यन सम्भव है; यद्यपि जर्सी इत्यादि गाय हैं ही नहीं- क्रास हैं, वर्णसंकर हैं। अस्तु, वस्तु के रूप में गाय का प्रयोग ह्रासोन्मुख है। फिर भी वस्तु है तो भली प्रकार रक्षा करें।

रही बात गाय के देवता होने की! वैसे तो ऐतरेय उपनिषद् के अनुसार गाय के शरीर में कोई देवता रहता ही नहीं। फिर भी यदि गाय देवताओं की बहन, माता या पूरा देव-समूह भी हो तो क्या? जैसे सृष्टि में सभी जीव हैं वैसे ही देवता हैं। वे भी भव प्रबाहँ संतत हम परे। (मानस, ६/१०९/१२) जन्म-मृत्यु के प्रवाह में निरन्तर बहनेवाले हैं। अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा।। (मानस, ७/९३/७)- देवता भी काल की जलपान-सामग्री मात्र हैं। हम उस जलपान-सामग्री से क्यों प्रार्थना करें, ‘‘जो काल तुम्हें खाने बैठा है, उसी से हमें बचा लो।’’ वह सक्षम होता तो स्वयं न बच जाता? स्वर्गउ स्वल्प अन्त दुखदाई। (मानस, ७/४३/१) नहुष स्वर्ग से गिरा तो अजगर बना। ‘मनुज देह सुर-साधु सराहत’ (विनय०, पद १७५)- सराहना मानव-तन की होती है, गाय-तन की नहीं। देवताओं से भी बड़ी एक वस्तु आपके पास है, वह है मानव-तन। यह सुर-दुर्लभ है और आपको मिल चुका है, फिर आप किस देवता या गाय-बैल से आशावान् हैं। गोस्वामीजी कहते हैं-

काहे को फिरत मूढ़ मन धायो।

तजि हरिचरनसरोज सुधारस, रबिकरजल लय लायो।।

त्रिजग देव नर असुर अपर जग जोनि सकल भ्रमि आयो। (विनय०, १९९)

अर्थात् मूर्ख मन! कहाँ दौड़ रहा है? भगवान के चरण का अमृत छोड़ मृगतृष्णा के पीछे क्यों दौड़ रहा है? क्या है मृगतृष्णा? देवादि शरीर! और तुम उससे होकर आ रहे हो। तुम देवता रह चुके हो, वहाँ शान्ति नहीं!

भगवान राम के अनुसार भवसागर से पार होने का एक ही उपाय है कि नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। (मानस, ७/४३/७) तरने का उपाय नर-तन में है। गाय कोई उपाय नहीं है।

* कहते हैं, गाय विष्णुस्वरूपा है, तब भी वह परमश्रेय या कल्याण का साधन तो नहीं है। वे सृष्टि-संचालन के अन्तर्गत हैं, सृष्टि के बाहर नहीं। मनु तपस्या कर रहे थे, उस परम प्रभु के लिए- संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना।। (मानस, १/१४३/६) पूर्ण पराक्रम से नहीं अपितु जिसके अंशमात्र से अनन्त ब्रह्मा, अनन्त विष्णु और अनन्त शंकर पैदा होते हैं, वह कल्याणस्वरूप परमात्मा इन विष्णु से कहीं आगे हैं। किष्किन्धा में राम का परिचय लेने के प्रसंग में हनुमान ने पूछा- की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।। जग कारन तारन भव, भंजन धरनी भार। की तुम्ह अखिल भुवनपति, लीन्ह मनुज अवतार।। (मानस, ४/१) अर्थात् तीन देव कुछ और हैं, नर नारायण दूसरे हैं; किन्तु अखिल भुवनपति कोई और ही है। कहीं अगनित रबि ससि सिव चतुरानन (मानस, १/२०१/१) उस परमात्मा से निकल रहे हैं तो कहीं बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। (मानस, ७/९१/६) एक राम की उपासना पर बल दिया गया है।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्यान्य देवी-देवता की श्रेष्ठता पौराणिक कल्पना की उपज है। अवतारवाद की जो क्षीण रेखा वैदिक साहित्य में है और जितनी सरलता से कही गयी है, रामायण और महाभारतकाल तक आते-आते पूर्णतः विकसित हो गई है। वैदिक युग में प्रजापति एवं इन्द्र की विशेषताएँ धीरे-धीरे विष्णु में आरोपित की गईं और महाभारत के पश्चात् सृजित पुराणों में साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह के कारण एक-एक देवी या देवता से अनेकानेक दूसरे देवता निकलते दिखाई देते हैं। गोस्वामीजी भी उसी शैली का प्रयोग करते हैं; किन्तु ‘एक परमात्मा ही पूज्य है’ की वैदिक धारणा उनके सम्पूर्ण काव्य का केन्द्रबिन्दु है। यद्यपि वाल्मीकीय रामायण एवं महाभारत दोनों ही संकलन ग्रन्थ माने जाते हैं, कई शताब्दियों में उनके कलेवर का विस्तार होता रहा है फिर भी रामायण का अवतारवाद महाभारत का ही एक अंग है। पुरुषसूक्त के अनुसार गाय सृष्टि का ही एक अंग है।

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः।

गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः।। (ऋग्वेद, १०/९०/१०)

उसी परमपुरुष परमात्मा से घोड़े उत्पन्न हुए। ऊपर-नीचे दाँतोंवाले पशु उत्पन्न हुए। गायें उत्पन्न हुईं। उसी से बकरियाँ तथा भेड़ें भी उत्पन्न हुईं। जैसे सब पशु वैसे ही गाय भी है, विष्णुस्वरूपा नहीं और विष्णु भी अविनाशी परमात्मा नहीं है।

* रामचरितमानस का उद्घोष है कि भवरोग की केवल एक दवा है-

सद्गुर बैद बचन बिस्वासा।

संजम यह न बिषय कै आसा।।

रघुपति भगति सजीवन मूरी।

अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।

एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं।

नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।। (मानस, ७/१२१/६-८)

इसके अतिरिक्त जब कोई रास्ता है ही नहीं तो आप दूसरा यत्न क्यों करते हो? दाहिने-बायें यत्न करो या करोड़ों यत्न करो, गाय को ब्रह्मा-विष्णु मान लो या भैंस मान लो, उससे क्या होता है? यह तो भटकाव है, सम्प्रदायों का झमेला है, जिसमें कल्याण कदापि नहीं।

* वेद का निर्णय है, नारायण ऋषि द्वारा प्रसारित पुरुषसूक्त का निर्णय है कि वह अविनाशी परमात्मा हजारों हाथ, पैर और मुँहवाला है। अकेला वही सर्वत्र व्याप्त है। उसके अंशमात्र तेज से चराचर जगत् की उत्पत्ति है। ब्रह्मा ने यज्ञ द्वारा उसे ही हृदय-देश में पाया, इन्द्र ने उसी को देखा। अनादिकाल से पूर्व मनीषियों ने मानस-यज्ञ द्वारा जिसको पाया, वह अविनाशी तत्त्व यही है। उसे जाने बिना अमर होने का अन्य कोई रास्ता नहीं, अन्यत्र कहीं मुक्ति नहीं, कहीं शाश्वत शान्ति नहीं। फिर गाय के नश्वर कलेवर में आप कौन-सी मुक्ति खोज रहे हैं?

* बड़ा क्षोभ है लेखक महोदय को कि कलियुग में दुष्ट सुखी हैं और सज्जन कष्ट पाते हैं। सुना है, वे मानस के अध्येता भी हैं। इन्हें यह भी पता नहीं कि युग होता क्या है? कब से शुरू होता है और रहता कहाँ है? मानस में ही है कि बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। (मानस, ७/१०३/६) विवेकी पुरुष युग को मन के अन्तराल में जानते हैं। बाहर न कहीं युग है, न होगा। कलि या सतयुग जिसे आना है आपके हृदय में आयेगा। आपके चाहने से नहीं आयेगा। आयेगा तब जब राममाया क्रियाशील होगी। नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।। (मानस, ७/१०३/१) जैसे तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।। (मानस, ७/१०३/५) मन के अन्तराल में तामसी गुणों का बाहुल्य हो, किंचित् रजोगुण हो तो व्यक्ति की साधना कलियुगीन है। इस स्तर पर चारों ओर वैर-विरोध उसका स्वभाव होगा। अस्तु, युग साधक की आन्तरिक क्षमता की कसौटी है। यदि कलियुग आज कहीं बाहर है तो सात्त्विक किसी को होना भी नहीं चाहिए।

* अन्त में हताश होकर आचार्यजी कहते हैं कि जो श्रुति, स्मृति और पुराणों को नहीं मानेगा उससे कुछ भी कहना अरण्यरोदन के समान है। श्रुति माने वेद, जो संख्या में चार कहे जाते हैं। शास्त्र छः हैं- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त। जिन्हें लोग न जानते हुए भी शास्त्र की दुहाई देते हैं। इनसे भिन्न सैकड़ों पुराण और उपपुराण हैं जिनमें से अठारह अधिक प्रचलित हैं। मनु इत्यादि की स्मृतियों को धर्मशास्त्र भी कहते हैं, जो संख्या में सैकड़ों हैं। अब हम इस आरोप की समीक्षा पर आते हैं कि क्या हम वेद-शास्त्र कुछ मानते भी हैं या नहीं?

मान्यता है कि पहले सभी शास्त्र मौखिक थे। शिष्य-परम्परा में सिखाये-रटाये जाते थे, जिन्हें सर्वप्रथम वेदव्यास ने लिपिबद्ध किया। जिनमें चार वेद, वेदान्त, भागवत, महाभारत और उसी के एक अध्याय रूप में गीता भी है। अन्त में उन्होंने विचार किया कि हमने इतना कुछ लिख डाला कि मनुष्य एक-दो जन्म पढ़ता ही रह जाय फिर भी वह एक निर्णय पर नहीं पहुँच सकेगा। इसलिए व्यास ने स्वयं निर्णय दिया कि गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। (महाभारत, भीष्मपर्व, ४३/१)- गीता ही धर्मशास्त्र है। एक अध्याय के रूप में जिसने इसे लिखा, उन महर्षि ने स्वयं इस एक अध्याय को एक शास्त्र माना। केवल इसी के पालन पर बल दिया। यहाँ तक कि वेद तथा अन्य ग्रन्थों की ओर संकेत तक नहीं किया, जबकि उन्होंने ही इन आर्षग्रन्थों का संकलन किया था। इतना ही नहीं, भगवान श्रीकृष्ण ने भी समर्थन दिया कि यह पूर्णशास्त्र है- इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ। (गीता, १५/२०) अर्थात् यह गोपनीय से भी परम गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। गीता शास्त्र है। इसको आचरण में ढालनेवाला कृतकृत्य हो जाता है। किन्तु इस शास्त्र में निर्दिष्ट विधि को त्यागकर जो मनमाना आचरण करता है उसके लिए न सुख है, न समृद्धि और न शान्ति। अस्तु हमारा-आपका, मानवमात्र का शुद्ध शास्त्र गीता है, जिसमें पुरुषोत्तम परमात्मा को छोड़कर अन्य किसी की पूजा का निर्देश नहीं है।

फिर भी यह जिज्ञासा रह ही जाती है कि अन्ततः श्रुति में लिखा क्या है कि आचार्य कहते हैं जो श्रुति, स्मृति, पुराण नहीं मानता उससे कुछ कहना अरण्यरोदन है। यों तो विशाल वैदिक वाङ्मय को इस लघु निबन्ध में समझाया नहीं जा सकता फिर भी उसका सारांश प्रत्येक को जानना चाहिए। वेद के पुरुषसूक्त की चर्चा इस लेख में हो चुकी है। उसी की तरह एक दूसरा सूक्त हिरण्यगर्भ सूक्त अथर्ववेद (४/२/७) में है। इसमें कहा गया है कि वह परमात्मा भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्– सभी प्राणियों का अकेला मालिक हुआ। उसी ने पृथ्वी और अन्तरिक्ष को धारण कर रखा है। उसके अतिरिक्त कस्मै देवाय हविषा विधेम– किस देवता के लिए हवि का विधान करूँ? इस प्रकार एक परमात्मा में निष्ठा वेद का प्रधान लक्ष्य है।

वेद के पश्चात् उपनिषद् साहित्य की महत्ता है। आइये देखें उपनिषदों का आशय क्या है-

तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः।

नानुध्यायाद् बहूंछब्दान्वाचो विग्लापन ँ् हि तदिति।। (बृहद., ४/४/२१)

बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार बुद्धिमान् ब्राह्मण को चाहिए कि परमात्मा को जानने के लिए उसी में बुद्धि को लगाये, अन्य नाना प्रकार के व्यर्थ शब्दों की ओर ध्यान न दे; क्योंकि वह तो वाणी का अपव्यय मात्र है।

इसी प्रकार मुण्डकोपनिषद् (२/२/५) देखें-

यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः।

तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुंचथामृतस्यैष सेतुः।।

अर्थात् जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी और उनके बीच का आकाश तथा समस्त प्राणोंसहित मन गूँथा हुआ है, उसी एक आत्मानम् जानथ– आत्मा को जानो। अन्याः वाचःअर्थात् दूसरी सब बातों को विमुंचथ– सर्वथा छोड़ दो। अमृतस्य एषः सेतुः– अमृत का यही सेतु है।

कठोपनिषद् (१/२/१५) में है कि सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति– सभी वेद उस परमेश्वर का प्रतिपादन करते हैं। इस प्रकार उपनिषदों का भी सार-सर्वस्व गीता में भगवान कहते हैं, वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः (गीता, १५/१५) सब वेदों द्वारा जानने योग्य मैं ही हूँ। गीता वही कहती हैं जो वेद में है अर्थात् एक परमात्मा का चिन्तन। यही गोस्वामीजी भी कहते हैं-

नीति निपुन सोइ परम सयाना।

श्रुति सिद्धान्त नीक तेहिं जाना।।

सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा।

जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।। (मानस, ७/१२६/३-४)

श्रुति का सिद्धान्त उसने भली प्रकार जान लिया, जिसका मन भगवान राम के चरणों में अनुरक्त है। श्रुति सिद्धान्त इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी।। (मानस, ७/१२२/२)। श्रुति का सिद्धान्त यही है कि राम भजो, एकमात्र राम को भजो, इसके अतिरिक्त प्रत्येक कार्य भूल जाओ। एक परमात्मा के स्थान पर गाय की पूजा श्रुति-सिद्धान्त नहीं है। उपनिषद् नहीं कहते, गीता नहीं कहती, मानस नहीं कहता; फिर भी कहते हैं कि श्रुति नहीं मानते। तुलसीदासजी कहते हैं- ‘राम को भजो’, तुलसी पीठाधीश्वर कहते हैं- ‘गाय को भजो।’

* अब आइये पुराणों को देखें। किंवदन्ती है कि अठारह पुराणों को भी व्यास ने ही लिखा। लगता है व्यास कोई उपाधि है, जैसे आज के कथावाचकों को कहते हैं या ‘व्यासोवाच’ की कोई शैली है; क्योंकि सर्वत्र एक परमात्मा में आस्था दृढ़ानेवाले व्यासजी स्कन्दपुराण में कहते हैं कि शिव बड़े हैं। राम, श्रीकृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु, देवी-देवता सब उनके नौकर-चाकर हैं। वही व्यासजी विष्णुपुराण में कहते हैं कि भूल हुई! विष्णु बड़े हैं। देवीपुराण में कहते हैं कि देवियाँ ही सब कुछ हैं, उनके सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश सभी तुच्छ हैं। नहीं, नहीं, इन्द्र शाश्वत हैं, तो कहीं सूर्य बड़े हैं। लगता है कि पुराण के व्यास निर्णय नहीं कर पा रहे हैं। ‘एक परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं’ का उद्घोष करनेवाले व्यास को हो क्या गया?

पुराणों का एक दृष्टान्त पर्याप्त होगा। शिवपुराण में है कि एक बार ब्रह्माजी विष्णु के पास पहुँचे। तड़ककर बोले- देख! मैं सबका पिता हूँ, सबसे बड़ा हूँ, भगवान हूँ, मुझे प्रणाम कर। विष्णु बोले कि मेरी नाभि से कमल और कमल से तूँ पैदा हुआ, मुझे प्रणाम कर! मैं भगवान हूँ। वाद-विवाद हाथापाई में बदल गया। अस्त्र-शस्त्र निकल आये। इस झगड़े का तमाशा देखनेवाले देवताओं ने शिव को सूचना दी कि दोनों तो मरने-मारने को तत्पर हैं। इस पर शिव ने उन दोनों देवताओं के बीच एक खम्भा खड़ा कर दिया शिवलिंग। लड़ाई रुक गयी। बोले- हम दोनों के बीच यह स्तम्भ कहाँ से आ गया? चलो पता लगायें। ब्रह्मा हंस बनकर उसकी ऊँचाई नापने उड़े और विष्णु शूकर बनकर हजारों वर्षों तक पृथ्वी की खुदाई करते रहे, जबकि सूअर बिल खोदनेवाला जन्तु भी नहीं है।

उधर ब्रह्मा को एक केतकी का फूल झूठी गवाही के लिए मिल गया, जैसे आजकल लोग चकबन्दी में करते हैं। विष्णु से कहा कि हमने पता लगा लिया। फिर तो विष्णु ने प्रणाम किया। दोनों आपस में उलझे थे कि शंकरजी ने ब्रह्मा के पाँच सिरों में से एक को काट दिया। विष्णु ने बीच-बचाव किया कि न हम भगवान और न यह भगवान, जो जीत गया वही भगवान्। भगवान को भगवत्ता का बोध नहीं। जो स्वयंसिद्ध है, सहज है। मानो तो, न मानो तो भी है। आपके मानने न मानने से भगवान में उतार-चढ़ाव नहीं आता। बिधि न बनाये, हरि आप बनि आये। किन्तु यहाँ तीन-तीन दावेदार लड़ रहे हैं, जैसे एम.एल.ए. का इलेक्शन हो। लगता है कि यह उस जमाने के राजाओं तथा सामन्तों के झगड़े हों।

शैव सम्प्रदाय के पुराणों में है कि शिवभक्त रामभक्त को मार दे तो उसकी इक्कीस पीढ़ी तर जाती है। भला यह मानने लायक बात है? कहते हैं कि जो पुराण नहीं मानता उससे कुछ कहना अरण्यरोदन है। इसमें मानने लायक क्या है? शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर तथा गाणपत्य सम्प्रदायों का रक्तरंजित इतिहास मान लें? ‘शिवगीता’ में है कि जब रावण ने सीता का हरण कर लिया तब अगस्त्य मुनि से दीक्षा लेकर राम शिवाराधन में संलग्न हुए। शिव प्रकट हुए, तो राम काँपने लगे। देखा, ब्रह्मा, विष्णु, सभी देवता हाथ जोड़कर शिव के सामने चले आ रहे हैं। राम की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव बोले कि राम! डरो नहीं, सब राक्षस मेरे मुख में प्राप्त हो चुके हैं। तुम निमित्त मात्र होकर संग्राम करो, कीर्ति पाओगे। ‘इति श्रीशिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे रामाय वरप्रदानं नाम पंचमोऽध्यायः।’ कहने की आवश्यकता नहीं कि भगवान श्रीकृष्ण की गीता की पंक्तियों में अपनी बातें मिलाकर ‘शिवगीता’ बना लिया और मूल गीता के आशय से दूर खड़े हो गये। इसी प्रकार प्रत्येक सम्प्रदाय दूसरे देवताओं की निन्दा और अपनी प्रशंसा में पुराण लिखता गया। अनेक साम्प्रदायिक उपनिषद् भी लिखे गये, जैसे गणपत्युपनिषद्, कृष्णोपनिषद्, रामोपनिषद्, नारायणोपनिषद्, सूर्योपनिषद्, सावित्र्युपनिषद्, राधोपनिषद्, सीतोपनिषद्, रुद्रोपनिषद् और यहाँ तक कि अल्लोपनिषद्! इस प्रकार मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की वाणी को तोड़-मरोड़कर कुछ इतना अपनी ओर से मिला दिया गया है कि वास्तविकता उनके बीच में दबकर रह गई है। जनसाधारण के लिये तो सचमुच बहुत बड़ी समस्या है कि परस्पर विरोधी अनेकानेक ग्रन्थों के बीच किसे माने और किसे न माने? तिस पर यह धौंस कि वेद, पुराण, स्मृति और शास्त्र नहीं मानते!

इसीलिये ‘विनयपत्रिका’ (पद १७३) में गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि बहु मत मुनि बहु पंथ पुराननि जहाँतहाँ झगरो सो। अनेक मत सुने (जबकि वेद का एक मत है) पुराणों में बहुत से पन्थ हैं। ये जहाँ-तहाँ आपस में झगड़े हैं। गुरु कह्यो रामभजन नीको मोहिं लगत राज डगरो सो।– गुरुदेव ने कहा कि एक राम का भजन करो- यही मुझे अच्छा लगा, यह राजमार्ग जैसा है। कल्पना कीजिये, गोस्वामीजी के समय का राजमार्ग! सम्राट अकबर का शासनकाल था वह! उस युग-जमाने के बीहड़ रास्तों की तुलना में राजमार्ग कि राजा के चलते समय फूल बिछ जाते थे, इत्र का छिड़काव, न मच्छर, न मक्खी, न किसी से पूछना और न कोई भटकाव- ऐसा ही है एक परमात्मा का भजन।

इसी को मानस में लिखते हैं कि दम्भिन्ह निज मति कल्पि करि, प्रगट किए बहु पंथ। (७/९७)- दम्भियों ने बहुत से पन्थ प्रगट किये। विनयपत्रिका में कहते हैं कि ‘बहु पंथ पुराननि’- पुराणों ने बहुत पन्थ प्रकट कर दिये अतः उन्हीं पुराणपन्थियों को गोस्वामीजी ने दम्भी कहा। आजकल शिक्षित वर्ग प्राचीन रूढ़ियों पर उँगली उठाता है तो निरक्षर आचार्यगण झूठ कह बैठते हैं, ‘‘राम राम! घोर कलियुग आ गया! धर्म- कर्म कैसे होगा?’’ मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। (मानस, ७/९७/३)- कलियुग में तो ऐसा कहेंगे ही किन्तु गोस्वामीजी का आक्रोश स्पष्ट ही उन लोगों के प्रति है जिन्होंने एक वैदिक मार्ग के स्थान पर बहुपन्थ प्रकट कर दिये। वेद कहते हैं, नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (शुक्लयजुर्वेद, ३१/१८)- इस एक मार्ग के अलावा दूसरा कोई पन्थ है ही नहीं। पुराण कहते हैं- बहुत से पन्थ, फिर भी आप कहते हैं कि पुराण नहीं मानते!

धर्म के तथाकथित ठेकेदार इन्हीं पुराणपन्थियों ने स्मृतियों के नाम से कानून बनाकर अधिकांश जनता को शिक्षा से वंचित रखा। कदाचित् किसी ने पढ़ ही लिया तो उसकी जिह्वा काट दो, सुन लिया तो कान में रांगा, शीशा पिघलाकर भर दो। फिर भी किसी ने सचाई बताई तो उसको अलग सम्प्रदाय घोषित कर सनातन-धर्म से निष्कासित कर दिया। गौतम बुद्ध ने कहा कि रात्रि के पिछले प्रहर में मैंने उस अविनाशी पद को प्राप्त किया जिसे ऋषियों ने पाया था। मैंने सर्वज्ञता प्राप्त की। (ठीक वही बात जो गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा सर्वज्ञ है, अविनाशी है।) तो बोले- ये बौद्ध हैं। महावीर स्वामी ने कहा, आत्मा अजर-अमर है। इन्द्रिय-संयम करो। तीर्थ बाहर नहीं, तीर्थस्वरूप किसी तीर्थंकर महापुरुष की सेवा करो और उनके बताये रास्ते पर चलो- इन त्रिरत्नों का पालन करो तो आत्मा को जानोगे। – सच बताया तो बोले यह तो जैन है। कोई नंगी तलवार लेकर पीछा करता हो, सामने जैन मन्दिर में जाने से प्राणरक्षा होती हो तो शिर दे देना किन्तु जैन-मन्दिर में न जाना! बौद्ध स्तूप या विहार में गये तो धर्म नष्ट हो जायेगा। जबकि महावीर भी वही बताते हैं जो गीता कहती है कि आत्मा ही शाश्वत है, सत्य है। कश्मीर से प्रयाग तक आर्यावर्त है, रहने योग्य है। शेष स्थान में रहनेवालों को यहाँ वालों से धर्म सीखना चाहिए; क्योंकि ब्राह्मण-धर्म यहाँ संगठित था और इसके आगे बिहार इत्यादि जो बुद्ध और महावीर स्वामी की स्थली है- कहते हैं म्लेच्छ देश है।

कबीर ने सच बताया तो बोले- वेद नहीं पढ़ा है, गँवार है, कबीरपन्थी है। दयानन्द ने वेद लिया, तो बोले- आर्यसमाजी है। नानक ने सच कहा कि सिमरहु जासु बिसम्भर एकै– विश्व का भरण-पोषण करनेवाला एक परमात्मा है, उसी का सुमिरण करो, तो बोले- सिख है। ईसा ने कहा, ‘परमात्मा एक है, उसी में सुख है, शान्ति है, अनन्त जीवन है। संसार भर के लोगो! मेरे पास आओ, तुम्हें भी अनन्त जीवन मिलेगा।’ तो बोले, ‘यीशु मसीह पढ़ा रहा है, बहका रहा है।’ मुहम्मद ने कहा कि ‘खुदा जर्रे जर्रे में है, तुम्हारे दिल के भीतर की प्रत्येक हरकत देख रहा है, उससे कोई बड़ा नहीं, उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं’, तो बोले- म्लेच्छ है। यद्यपि इन सब महापुरुषों के पीछे आज एक-एक सम्प्रदाय बन गया है, जिनमें कुरीतियाँ अधिक जुड़ गई हैं; किन्तु मूल रूप से इन विचारधाराओं के प्रवर्तक उपर्युक्त सभी महापुरुष वही एक बात कहते हैं जिसकी शोध सर्वप्रथम आपके वैदिक ऋषियों ने की- श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः– अमृत-अंश विश्वभर के लोगों सुनो! मैंने प्रकाशस्वरूप उस परमात्मा को जान लिया है। एक उसी को जानकर मृत्यु से बचा जा सकता है। इसके अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है।

धर्म एक है और मानवमात्र को एकता के सूत्र में बाँधता है। एक ईश्वर, एक नाम, एक धाम, एक प्रार्थना-स्थल, एक शास्त्र, एक महापुरुष के स्थान पर आज का समाज बिखरता जा रहा है। क्रिया के नाम पर वेद द्वारा निर्धारित और इन सबका सारांश श्रीकृष्णोक्त गीता द्वारा निर्धारित और नियत कर्म को छोड़कर, सत्य को छोड़कर बाकी सबकुछ करता है। अभी समाचार-पत्रों में था कि कोई बीस वर्ष से काँटों पर सो रहा है। पूछिये क्यों? तो कहते हैं- भजन कर रहे हैं। कोई सूरज की ओर देखता है, तो भजन कर रहा है। कोई एक पैर से खड़ा है, तो भजन कर रहा है। कोई नाक दबा रहा है, तो कोई कान में उँगली डाल रहा है, कहता है- यही भजन है। और कैसे भजन करें तो बताते हैं कि सिर के बल खड़े हो जाओ। नहीं बना तो बोले- गुदाद्वार से पानी खींचो। न कोई साधना निश्चित हो पायी और न कोई लक्ष्य; फिर भी धर्माचार्य कहते हैं कि जो वेद-पुराण नहीं मानता उससे कुछ कहना ही बेकार है। क्यों, वेद-पुराण में यही सब लिखा है? कुछ भी कहो, कुछ भी करो और कह दो कि वेद में लिखा है। वेद को बदनाम करना, वेद-पुराण के नाम पर भ्रान्तियों का सृजन कर जनता का भयादोहन करना अब तो छोड़ो।

कहते हैं- शास्त्र को मानो। कौन-सा शास्त्र मानें? रामचरितमानस से बताओ तो कहेंगे वाल्मीकि ने तो ऐसा लिखा है, वहाँ से बताओ तो कहेंगे गीता में ऐसा लिखा है, गीता का सही अर्थ बताओ तो कहेंगे वेद में तो ऐसा है, वेद की बात करो तो कहेंगे गरुड़पुराण में ऐसा लिखा है। आप शास्त्र मानते कहाँ हो? जिन महर्षि ने वेद लिखा, अधिकांश शास्त्र लिखा, वह कहता है- गीता शास्त्र है, उसी को मानो, तो आप कहते हैं- स्मृति मानो! वह भी एक नहीं सतयुग के लिये मनुस्मृति, द्वापर के लिये शंखस्मृति, त्रेता के लिए गौतमस्मृति और कलि के लिये पाराशर-स्मृति प्रमाण है। फिर भी अन्य सैकड़ों स्मृतियाँ हैं। पता नहीं किस युग के लिये वे लिखी गयी हैं?

लिखते हैं- स्मृतियाँ वेद की ही व्याख्या हैं इसलिए उन्हें प्रमाण मानो। वेद प्रमाण नहीं रह गया, गीता प्रमाण नहीं है, राम-कृष्ण प्रमाण नहीं रहे, कलियुग में स्मृति प्रमाण हो गई। कहते हैं, जो वेद में है वही स्मृति में है। इसलिये थोड़ा देखें कि स्मृतियों में क्या है? याज्ञवल्क्य-स्मृति (२०६-२०७) में उभयोमुखी गोदान का वर्णन है कि गाय ब्याते समय जब बछड़े का खुर, शिर निकल रहा हो उस समय गाय का मुख एक ओर तो बछड़े का मुँह दूसरी ओर रहता है। उस क्षण गोदान करने से गाय और बछड़े के शरीर में रहनेवाले साढ़े तीन-तीन करोड़ रोयें बराबर युगों तक स्वर्गवास मिलता है। वाराहपुराण के एक सौ बारहवें अध्याय में तथा अग्निपुराण (२१०/३३) में इस दान की महिमा गायी गयी है। विचार कीजिये कि जिस क्षण परिवार के बच्चे बड़ी आशा लगाये गाय के ब्याने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वह मुहूर्त आया तो स्वर्ग का ठेका लिये आ गये धर्म के ठेकेदार! मन्त्र पढ़कर गाय हाँक ले गये। बच्चों को एक दिन पायस भी खाने नहीं दिया। स्वर्ग तो जब मिलेगा तब मिलेगा, पूरे परिवार को नरक तो इनके आने से हो गया। कहते हैं जो स्मृति में है वही वेद में है। क्या यही वेद में लिखा है?

पाराशर-स्मृति (१/३६) में लिखा है कि यह स्मृति दो उद्देश्य से बनायी गयी है- (१) ब्राह्मणों के हित के लिये और (२) धर्म की स्थापना के लिये। जब इतने के लिये ही लिखी गयी है तो जिसका हित है वह पढ़े! सबसे क्यों मनवाते हो? यह स्मृति किस धर्म की स्थापना करने जा रही है? लिखते हैं कि शूद्र यदि ब्राह्मण की सेवा छोड़कर कोई अन्य कार्य करे तो उसे नरक होता है (२/१९)। गाय का दूध पीने से, वेद के एक वाक्य पर भी विचार करने मात्र से शूद्र को निश्चय ही नरक होता है (१/७५)। यह सनातन- धर्म है। (२/२०) शूद्र को सारहीन अन्न खाना चाहिए। शूद्र के घर का दूध, दही, घृत, मधु, गुड़ इत्यादि ब्राह्मण खा सकता है; किन्तु उसके घर में न खाये, नदी के किनारे ले जाकर खाये। वेद-वेदांग के जाननेवाले पाराशर ऋषि ने यह व्यवस्था दी। जब वेद-वेदांग में यही लिखा है तो भगवान ही बचाये। लगता है ऋषियों के नाम पर इन स्मृतियों को लिखकर धूर्तों ने वेद को भी बिगाड़ा है। इसीलिये गीता में श्रीकृष्ण ने ‘वेदवादरताः’ कहकर लोगों को समझाया कि जो संसार-वृक्ष को उसके मूल परमात्मासहित जान लेता है वही वेदवित् है (गीता १५/१)। पोथी पढ़नेवाले को श्रीकृष्ण ने वेदज्ञ नहीं कहा जबकि उनके समय में भी इस पुस्तक को कण्ठस्थ करनेवाले, श्रुतिधर कहलानेवाले लोग थे। श्रीकृष्ण ने उनके पास जाने की सलाह नहीं दी बल्कि तत्त्वदर्शी महात्मा के पास जाने की सलाह दी कि- तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।। (गीता, ४/३४) इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने यह भी बताया कि तत्त्व क्या है और तत्त्वदर्शिता क्या है? उस तत्त्व को जानने की विधि क्या है?- जिससे पाँच-पचीस तत्त्व की गणना में आप कहीं भटक न जायँ। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में वैदिक साधना को ही इतना क्रमबद्ध कहा है कि भटकने की कोई गुंजाइश उन्होंने छोड़ा ही नहीं। फिर भी कहते हैं- अरण्यरोदन है।

इन्हीं स्मृतियों में साठ प्रतिशत से भी अधिक समाज को शूद्र घोषित करके न कभी ढंग से खाने-पीने दिया, न कमाने दिया; क्योंकि कमा लेगा तो ब्राह्मणों को सतायेगा। यदि किसी प्रकार वह कमा ही ले तो यज्ञ करने के नाम पर लूट लो। वह कभी पढ़ने न पाये, अशिक्षित और तिरस्कृत बनाये रखो। मन्दिर में न जाने पाये, नहीं तो परमात्मा को टिटनेस हो जायेगा। बनारस में चला गया तो उस मन्दिर के शंकरजी मर गये। धर्माचार्यों ने दूसरा मन्दिर बनवाया कि इसमें शंकरजी शुद्ध हैं, उस मन्दिर के शंकर अशुद्ध हैं।

कौन कहता है कि काशी विद्वानों की नगरी है? जिस काशी में भगवान शिव ने रामचरितमानस को ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ कहकर प्रमाणित किया उसी मानस में है कि काकभुशुण्डिजी अपने पिछले शूद्र-तन में उज्जैन गये तो वैदिक ब्राह्मण गुरु ने उन्हें शिव का मन्त्र दिया। वे शिव-मन्दिर में बैठकर जाप कर रहे थे। उस मन्दिर के शिव शूद्र के प्रवेश से मरे नहीं बल्कि गुरु की अवहेलना पर शाप दिया, आशीष प्रदान किया; जबकि स्मृतियों में है कि वेदवाक्य पर विचारमात्र से शूद्र नरक में जायेगा। गीता में भगवान कहते हैं कि स्त्री-पुरुष, वैश्य, शूद्र, ब्राह्मण अथवा कोई भी पापयोनिवाला हो, मेरी शरण होकर परमगति को प्राप्त होता है। अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से अर्थात् अन्य न – गाय-बैल, देवी-देवता, भूत-भवानी, नागनाथ-साँपनाथ किसी को न भजकर केवल मुझे भजता है, वह साधु मानने योग्य है; क्योंकि वह सही निर्णय के साथ लग गया है। वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है- यह है गीता का धर्मात्मा। गीता की दृष्टि में शूद्र भी धर्मात्मा बन सकता है, स्मृति में है कि उसे निश्चित ही नरक होगा। गीता कहती है कि स्त्रियाँ भी भगवान की भक्ति करें, किन्तु स्मृतियाँ कहती हैं- स्त्रियाँ केवल पति की भक्ति करें। पति की अनुमति न हो तो भगवान की भक्ति कभी न करें। यदि करती हैं तो अपने पति को अल्पायु बनाती हैं तथा मरने पर नरक में जाती हैं (पाराशर-स्मृति ४/१७), फिर भी कहते हैं स्मृति को मानो।

स्मृति में लिखा है कि थोड़े से अन्न को कौआ-कुत्ता जूठा कर दें या गाय-गधा सूँघ लें तो उस अन्न का त्याग कर दें; किन्तु वेद-वेदांग के जानकार पाराशर मुनि ने कहा कि अन्न अधिक है तो नहीं फेंकना चाहिए। जितने में लार लगी है, वह फेंक दें। शेष अन्न सोने के पानी से धोकर आग में तपाकर तथा ब्राह्मणों द्वारा वेदध्वनि से शुद्ध होता है (पारा. ६/७१-७४)। अमेरिका का गेहूँ भारत न आता तो लोग भूखों मर जाते, किन्तु इस तरह की शुद्धि किसी ने नहीं की फिर भी कहते हैं कि स्मृति मानो!

कुएँ या तालाब का पानी यदि खराब हो गया हो, तो उसमें से सौ घड़ा जल बाहर फेंककर पंचगव्य डालने पर शुद्ध होता है (पारा., ७/५)। आज कोई पंचगव्य नहीं डालता। क्लोरीन, ब्लीचिंग, पोटाश इत्यादि केमिकल्स हो गये हैं। पंचगव्य डालने से तो कालरा के कीटाणुओं को खुराक मिलती है, इसीलिए पहले गाँव के गाँव हैजे से साफ हो जाते थे। लिखा है कि ब्राह्मण-हत्या का दुगुना पाप गर्भपात कराने पर लगता है, उस स्त्री का त्याग कर देना चाहिए (४/२०), जबकि आजकल सिलाई मशीन ईनाम में मिलता है। गर्भपात ही नहीं, वन्ध्याकरण का लक्ष्य पूरा न करने पर वेतन रुक जाता है, पदोन्नति नहीं होती। वस्तुतः यह व्यवस्था है, धर्म नहीं।

आपके मन में बहुत देर से एक प्रश्न उठ रहा होगा कि पुराणों में, स्मृतियों में मानने लायक कुछ है भी या नहीं? देखिये, बुद्धिजीवी वर्ग सदा से ही समाज पर शासन करता आया है। उन्हीं द्वारा निर्मित उस जमाने का कायदा-कानून, रहन-सहन इन स्मृतियों में अंकित हैं। ये प्राचीन व्यवस्थाएँ थीं। अपने विकास का इतिहास देखने के लिए उनका रहना जरूरी है; किन्तु उस जमाने के कानून को, उस युग की सभ्यता को वर्तमान समाज पर थोपना कहाँ का न्याय है? रही इनमें से कुछ लेने की बात, तो आप भी वही ग्रहण करें तो गोस्वामी तुलसीदासजी ने किया है- श्रुति पुरान सब ग्रन्थ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।। (मानस, ७/१२१/१४) लिखी हो कोई बात इन पुराणों में, गोस्वामीजी उसे देखते भी नहीं। नानापुराण निगमागमसम्मतं केवल एक बात उन्हें दिखायी देती है कि एकमात्र परमात्मा ही समस्त सुखों का स्रोत है। ‘रघुपति भगति’ बिना कहीं सुख है ही नहीं और तुलसी पीठाधीश्वर कहते हैं गाय सुख देगी। वेदमत सोधि, सोधिसोधि कै पुरान सबै…’– गोस्वामीजी ने वेद छान डाला, पुराणों को मथ डाला; लेने लायक बात केवल एक मिली कि ‘रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।’

* आचार्य अपनी पुस्तिका में लिखते हैं कि भारतीय संस्कृति में पशु भी पूजा जाता है, जैसे- गणेश के प्रतीक हाथी को पूजते हैं, शंकर का प्रतीक मानकर नीलकण्ठ पूजा जाता है, उसी प्रकार गाय को भी विष्णु की सजीव प्रतिमा मानकर उसका समर्थन करें तो आपत्ति क्या है? सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।। (मानस, १/७/२)

देखिये, जितनी आसानी से लोग यह चौपाई कह देते हैं, उतनी आसान बात नहीं है। पूज्य परमहंसजी महाराज (गुरुदेव) कहते थे कि साधनाकाल में एक स्तर ऐसा भी आता है, महाराजजी को भी आया था कि जड़-चेतन में सर्वत्र इष्ट दिखायी देने लगता है। यही देखकर महाराजजी ने दातुन करना कुछ दिनों के लिए बन्द कर दिया था। उन्हें लगता था, जैसे रोआँ उखाड़ने में शरीर को कष्ट होता है वैसे ही पेड़ को कष्ट होता है इसलिए दातुन कुछ दिन नहीं किया। किन्तु यह भी बीच की ही एक अवस्था है। आगे जाने पर यह भी एक अज्ञान ही लगता है। ऐसा होता है कि साधक को जहँ तहँ देख धरें धनु बाना। (मानस, २/१३०/७) भगवान ही सर्वत्र दिखाई देते हैं। गोस्वामीजी के शब्दों में- उमा जे राम चरन रत, बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत, केहि सन करहिं बिरोध।। (मानस, ७/११२ ख) जब साधना की सही प्रक्रिया में पड़कर केवल राम के चरण में रति शेष रह जाती है, काम-मद-क्रोध शान्त हो जाते हैं, ऐसा ही व्यक्ति जगत् को सीयराममय देख सकता है। सब न देखते हैं, न जानते हैं, केवल मान लेने से जगत् सीयराममय दिखाई नहीं देता। जानना कुछ और है और मानना कुछ और।

पशु-पक्षियों की पूजा हमारी संस्कृति नहीं बिखराव है, उदारता नहीं आत्मघात है। यह पुराण एवं स्मृतिकालीन विकृति है, न कि भारतीय संस्कृति। यह बीच में आयी एक भँवर है न कि स्वच्छ धारा। शिक्षा को कैदकर स्मृतियों ने मानव-समाज को मूर्ख बनाकर रखा और फिर पेड़ पूजो, पत्थर पूजो, भूत पूजो, साँप पूजो- जो भी चाहा, भोलीभाली जनता को भय दिखाकर मनवा लिया कि नीम में शीतला माई, महुए में वृत्रासुर, बरगद में ब्रह्म तो गाय की तरह पीपल में पूरा देवलोक- ‘पात्रे पात्रे देवानाम्’ पत्ते-पत्ते में देवता, चेचक में शीतला – इस प्रकार विधाता के सृष्टि को, नश्वर कलेवरों को हजारों तरीके से पुजवा दिया। यह सब वाममार्ग है न कि भारतीय संस्कृति।

हमारी संस्कृति भगवान राम द्वारा प्रदत्त है, भगवान श्रीकृष्णप्रदत्त है। परमप्रभु श्रीराम ने अयोध्या की विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि यदि परलोक चाहते हो अथवा यहीं सुख और समृद्धि चाहते हो तो मेरी बात ध्यान से सुनो, हृदय में दृढ़तापूर्वक ग्रहण कर लो। इन दोनों बातों के लिए एक ही रास्ता है, गरीब-अमीर सबके लिए सुलभ रास्ता है। कौन? भगति मोरि– मेरी भक्ति करो। न सीता की, न हनुमान की, न गाय की, न भैंस की, केवल मेरी भक्ति करो।

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू।

सुनि मम बचन हृदयँ दृढ़ गहहू।।

सुलभ सुखद मारग यह भाई।

भगति मोरि पुरान श्रुति गाई।। (मानस, ७/४४/१-२)

यही पुराण और श्रुतियों ने गायन किया है। एक परमात्मा की भक्ति हमारी संस्कृति का पहला चरण है और दूसरे चरण में है वह सामाजिक मर्यादा जिसे राम ने स्थापित किया- भाई से भाई का कर्तव्य, पिता-पुत्र का कर्तव्य, मित्र-शत्रु एवं समाज के प्रति दायित्वबोध। इतना ही तो भारतीय संस्कृति है।

इसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में बताया कि आत्मा ही शाश्वत है, अविनाशी है, अमृतस्वरूप है, वही सनातन है। हमलोग कौन हैं? आत्मा के उपासक हैं। गाय के नहीं, देवी-देवता के नहीं, ईंट-पत्थर के नहीं। यदि आप आत्मा को विदित करने की क्रिया नहीं करते, तो आप सनातनधर्मी कैसे? आत्मा को विदित करने की जो क्रिया योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं, उसमें गाय की पूजा तो नहीं है। यान्ति ब्रह्म सनातनम् (गीता, ४/३१)- आत्मा, परमात्मा, भगवान, ब्रह्म सब पर्याय हैं। श्रीकृष्ण भी बताते हैं उसी एक परमात्मा की पूजा। यही भारतीय संस्कृति का प्रथम पक्ष है और योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कैसे मित्र का रथ हाँका, दीनों को कैसे अपनाया, कैसा संगठन-कौशल था उनमें; सफल समृद्ध और जीवन्त जीवन-शैली- यह है हमारी संस्कृति का दूसरा पक्ष। कौआ पूजना, उल्लू पूजना यह हमारी संस्कृति नहीं है, बीच में आई हुई एक कुरीति है।

इन्हीं कुरीतियों की देन है कि सोमवार को शंकर का व्रत, मंगलवार को हनुमान की पूजा, बुध को गणेशजी, गुरुवार को बृहस्पति भगवान, शुक्र को सन्तोषी माता का व्रत, शनि को शनि ग्रह की शान्ति और रविवार को सूर्योपासना होती है। कहते हैं- भारतीय संस्कृति है। सातों दिन देवताओं की पूजा के लिये बाँट दिये गये। भगवान के लिए पूरी जिन्दगी सोचने का कोई दिन ही नहीं बचा। कहीं एकल उपासना, तो कहीं युगल सरकार की उपासना, तो कहीं पाँच-पाँच देवताओं की एक साथ उपासना। कहते हैं- भारत की समन्वयवादी संस्कृति है। संस्कृति यह नहीं, यह तो विकृति है।

कहते हैं- जाति-व्यवस्था भारतीय संस्कृति है। सीधे क्यों नहीं कहते कि आपसी फूट भारतीय संस्कृति है? पहले तो इन स्मृतियों-पुराणों ने पूरे संसार को चार वर्णों में बाँटा, जिसमें ब्राह्मण को सरस्वती देवी की, क्षत्रिय को दुर्गा की, वैश्य को लक्ष्मी की और शूद्र को काली की पूजा करनी चाहिए। भगवान का कहीं नाम ही नहीं। कहते हैं- यह भारतीय संस्कृति है। कायस्थ चित्रगुप्त की पूजा करें तो लुहार विश्वकर्मा जयन्ती मनावें, भंगी लोग वाल्मीकि जयन्ती मनावें। भगवान की पूजा के लिये किसी को आदेश नहीं, जबकि राम और श्रीकृष्ण के आदेशानुसार सिवाय एक परमात्मा के किसी को पूजने का विधान ही नहीं है।

इन पुराणपन्थियों के अनुसार सम्पूर्ण ऋद्धि-सिद्धि के दाता गणेश हैं और सम्पूर्ण ज्ञान की देवी सरस्वती हैं। मनुष्य को और चाहिये क्या? या तो ज्ञान या समृद्धि! यह दोनों गणेश और सरस्वती से मिलेगा फिर भगवान की आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है? क्या यही है भारतीय संस्कृति? हर तिथि के लिये अलग-अलग व्रत, प्रत्येक नक्षत्र का अलग-अलग व्रत। कहते हैं द्वितीया को अशून्य शयन व्रत करना चाहिए। जैसे विष्णु की शैया पर सदैव लक्ष्मी रहती हैं, उसी प्रकार इस व्रत को करने से पुरुष की शैया स्त्री से और स्त्री की शैया पुरुष से कभी खाली नहीं रहती। क्या यही है संयम-प्रधान भारतीय संस्कृति? श्रुति कहती है- यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति (कठोपनिषद्, १/२/१५), यहाँ प्रलोभन देते हैं कि शैया खाली नहीं रहेगी। यह संस्कृति नहीं, विषय-लोलुपों द्वारा जोड़ी गई विकृति है, उन्हीं की कृति है।

इतनी स्पष्ट और प्रशस्त भारतीय संस्कृति होते हुए भी लोग नश्वर कलेवरों की पूजा में भटक गये। यह पुराणों और स्मृतियों की देन है; बल्कि यह कहना सचाई के अधिक नजदीक होगा कि इन ग्रन्थों को विकृत बनानेवालों का षड्यन्त्र है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि केवल एक परमात्मा का अस्तित्व है, बाकी किसी का अस्तित्व है ही नहीं। अस्तित्व की पूजा करनेवाला आस्तिक और नश्वर कलेवरों को पूजनेवाला नास्तिक है; फिर भी बहुत से आचार्य अनजाने ही अस्तित्वविहीन देवी-देवता, पशु-पक्षी इत्यादि नश्वर कलेवरों की पूजा में लगे हैं। मज्झिम निकाय में है कि महात्मा बुद्ध के समय में कूकरव्रती, गोव्रती अनेक सम्प्रदाय भारत में थे। कोई केशकम्बली था अर्थात् बालों को बढ़ाकर कम्बल का काम लेता था, तो कोई कुछ करने को ही भजन मानता था। कुत्ते की तरह रहनेवाले कूकरव्रती थे। गोव्रती के बारे में गौतम बुद्ध से पूछा कि, ‘‘भन्ते! हमारा यह साथी वर्षों से गाय की तरह चलता-फिरता, मुख से बाँ-बाँ करता, नाद में मुँह डालकर खाता और सिर से खुजलाता है। गाय की रहनी को इसने पूरी तरह जीवन में ढाल लिया है। बताइये इसकी क्या गति होगी?’’ गौतम बुद्ध ने कहा- यह न पूछते तो अच्छा था। बहुत आग्रह करने पर कहा कि जो गाय का ही चिन्तन करता रहा, उसकी एक ही क्रिया को ढालने में तन्मय रहा तो निःसन्देह उसे अगला जन्म गाय का लेना पड़ेगा। जब मृग का चिन्तन करने से जड़भरत को मृग बनना पड़ा, तो गौतम बुद्ध ने क्या गलत कहा? इसी तरह एक ब्राह्मण सात सौ बछिया, सात सौ बकरी, सात सौ भेड़ की बलि देकर भगवान को प्रसन्न करना चाहता था, बुद्ध ने उसे समझा-बुझाकर रोका। वह उनका शिष्य महाकश्यप हुआ।

तात्पर्य यह है कि एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी श्रद्धा को बिखेरना न तो धर्म है और न भारतीय संस्कृति, फिर भी कोई जगद्गुरु देवी की पूजा बताता है, तो कोई जगद्गुरु विष्णु की, तो कोई गाय की। चार-चार आदमियों का संगठन और लिखते हैं जगद्गुरु! भारत में इस समय सैकड़ों जगद्गुरु है जबकि जगत् एक ही है। आदि शंकराचार्य ने ‘एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति’ का उपदेश दिया तो उनकी गद्दी पर बैठनेवाले शंकराचार्यों ने भूत-भवानी इन सबकी स्तुति में इतना कुछ लिख डाला कि आदि शंकराचार्य का सिद्धान्त ही छिप गया। इसी तरह गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा कि कोई भी क्यों न हों तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। (मानस, ७/१२३/७) तो उनकी गद्दी पर बैठनेवाले कहेंगे कि गाय तार देगी।

इन आचार्यप्रवरों को अपने ऊपर तथा समाज के ऊपर तरस आनी चाहिये कि जिस प्रपंच को छोड़कर विरक्त हुए, उसी जाति-पाँति, सम्पत्ति की पुष्टि में अपना जीवन गँवा रहे हैं। ब्राह्मण ही भगवान का अधिकारी है, ब्राह्मण के लिये ही भगवान अवतार लेते हैं- ऐसा कहकर वे आज के शिक्षित समाज में हँसी के पात्र बनते जा रहे हैं। रातभर कथा तो कहेंगे रामायण की रामहिं सुमिरिअ गाइअ रामहिं। (मानस, ७/१२९/६); किन्तु सवेरे पूजा करेंगे- गणानां त्वा गणपति ँ्हवामहे।, या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता, ….. मायारूपेण संस्थिता। न जाने कौन-कौन सी चालीसा पढ़ने बैठ जाते हैं।

अतः बन्धुओ! एक परमात्मा का सुमिरन करें, यही धर्म है। उस परमप्रभु का यद्यपि कोई नाम नहीं है, कोई रूप नहीं है फिर भी साधनकाल में सम्बोधन के लिये भारतीय मनीषियों ने उसे ही पुरुषोत्तम, ब्रह्म, भगवान, आत्मा इत्यादि नामों से अभिहित किया है। परमात्मा से अभिप्राय सर्वत्र व्याप्त उसी सार्वभौम सत्ता से है जो किसी देश-विशेष, काल-विशेष, जाति-विशेष, सम्प्रदाय-विशेष से सर्वथा अतीत हो बल्कि समान रूप से सबका हो, भले ही भाषा-भेद से उसे कोइ गॉड या अल्लाह कह ले। जिस तरह जल, आग, पानी, वाटर इत्यादि भिन्न-भिन्न नामों से भी एक ही वस्तु प्राप्त होती है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न भाषाओं के नाम भी उसी एक परमार्थ सत्ता के पर्याय हैं, अनुवाद मात्र हैं। प्राप्तिवाला हर महापुरुष एक ही बात कहता है कि परमात्मा एक है, उसके शोध की स्थली हृदय-देश है और विधि है मनसमेत इन्द्रियों को उस परमात्मा में लगाना। मानव मात्र का इतना ही धर्म है, यही भारतीय संस्कृति है और यही मोक्ष का उपाय भी है। अतः हम-आप एक उसी की आराधना में सलग्न हों जिसमें कल्याण निहित है। गोस्वामीजी कहते हैं-

बाक्यज्ञान अत्यन्त निपुन भवपार न पावै कोई।

निसि गृहमध्य दीप की बातन्ह, तम निबृत्त नहिं होई।।

जबलगि नहिं निज हृदि प्रकास, अरु बिषयआस मनमाहीं।

तुलसिदास तबलगि जगजोनि भ्रमत सपनेहुँ सुख नाहीं।। (विनयपत्रिका, पद १२३)

कोरी व्याख्यानबाजी से कुछ नहीं। पहले विषयों से आसक्ति हटाइये और कुछ ऐसा कीजिए कि आपके हृदय में वह प्रकाशरूप परमात्मा जागृत हो जाय, जिसकी अनुभूति आपके पूर्वजों ने, वैदिक ऋषियों ने की है।

कैसे जागृत हो वह प्रकाश? गोस्वामीजी बताते हैं- श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती। (मानस, १/चौपाई ५) उपनिषद् कहते हैं- तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् (मुण्डक उप०, १/२/१२) अतः निर्धारित क्रिया में लगें- यह भारतीय संस्कृति है।

अन्त में हम आभारी हैं आप सबके, जिन्होंने मनोयोग से इस पुस्तिका को पढ़ने में अपना बहुमूल्य समय दिया, साथ ही आभारी हैं चित्रकूट के महाराज प्रज्ञाचक्षुजी के, जिन्होंने अपने चित्त की गाँठ को खोलकर समाज को सनातन-धर्म पर कुछ कहने और जानने का अवसर दिया।

।। बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

Q & A
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