भगवान् कर्ता है अथवा अकर्ता?

भगवान् कर्ता है अथवा अकर्ता?

प्रश्नभगवन्! गीता के अनुसार, निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’- मनुष्य तो निमित्त मात्र है, फिर उसे दोषी क्यों ठहराया जाता है? मोटर एक्सीडेण्ट होने पर भी कोई मोटर को दोषी नहीं ठहराता। वह तो चालक की कला की त्रुटि है। अतः भगवान से संचालित जीव को दोषी क्यों कहा जाता है? भगवान के इशारे के बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो मनुष्य को पाप का भागी बनाना कहाँ तक न्याय है?

उत्तर देखिये, वास्तव में भगवान ऐसा नहीं करते। योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि, अर्जुन! न वह प्रभु करता है, न कराता है और न क्रिया के संयोग को ही जोड़ता है। मान लीजिए वह न करता हो, न कराता हो किन्तु जुगाड़ तो लगा सकता है। किन्तु नहीं; वह क्रिया के संयोग को भी नहीं जोड़ता। इतने पर भी अर्जुन! जो लोग कहते हैं कि परमात्मा करता है उनकी बुद्धि मोह से आच्छादित है, इसलिए वे कुछ-न-कुछ कहते रहते हैं। वास्तव में भगवान नहीं करते।

इसी को स्पष्ट करते हुए अध्याय अठारह में वे कहते हैं कि शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक कार्य के होने में पाँच माध्यम हैं- कर्ता, न्यारे-न्यारे करण, नाना प्रकार की चेष्टायें, आधार और दैव। यह मन कर्ता है। जिन साधनों से कर्म किये जाते हैं, करण कहलाते हैं। यदि शुभ कर्म करते हैं तो विवेक, वैराग्य, शम, दम, एकान्त-देश का सेवन, धारावाही चिन्तन, प्रवृत्ति, आर्जव इत्यादि करण हैं। इनके द्वारा हम उधर प्रवृत्त होते हैं। यदि अशुभ कर्म होता है तो काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर, अनन्त चेष्टायें इत्यादि करण होंगे। इनके द्वारा ये कर्म रूप लेते हैं। इच्छायें अनन्त होती हैं, चेष्टायें भी नाना प्रकार की होती हैं लेकिन सबकी पूर्ति नहीं होती। उनमें से जिस इच्छा के साथ आधार मिल जाता है, अनुरूप वातावरण मिल जाता है, वही आधार है और पाँचवाँ हेतु दैव है। दैव होनी या प्रारब्ध को कहते हैं। शुभ या अशुभ कर्म के होने में बस ये पाँच कारण हैं, फिर भी जो कहता है कि कैवल्य स्वरूप परमात्मा कर्ता है, प्रेरक है, वह अविवेकी है। वह यथार्थ नहीं जानता अर्थात् भगवान नहीं करते।

महाभारत के युद्ध में उस अठारह अक्षौहिणी जनसमूह में, जो महाभारत की गणना के अनुसार लगभग चालीस लाख होता है, वर्तमान गणना के अनुसार छः अरब होता है, केवल अर्जुन ही भगवान का निकटवर्ती रहा जिसके लिए भगवान स्वयं ताल ठोंककर खड़े हो जाते हैं- निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्(गीता, 11/33) अर्जुन! तू निमित्त मात्र बनकर खड़ा भर रह। कर्ता-धर्ता तो मैं हूँ। मैं निश्चित कहता हूँ कि तुम्हारी विजय होगी। तेरे लिए मैंने पहले ही इनको मार रखा है। भीष्म, द्रोण, कर्ण इत्यादि सभी मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। इन मारे हुए को मार और यश प्राप्त कर।

लीजिए! एक स्थल पर कहते हैं कि कैवल्यस्वरूप परमात्मा को कर्ता माननेवाला मूढ़बुद्धि है, अविवेकी है, उसकी बुद्धि मोह से आच्छादित है, वह यथार्थ नहीं जानता अर्थात् भगवान नहीं करते और यहाँ भगवान स्वयं खड़े हो गये कि अर्जुन! तू निमित्त मात्र बनकर खड़ा भर रह। कर्ता-धर्ता तो मैं हूँ। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हारी विजय होगी। मुझ पर भरोसा रख। मेरे आश्रित हो।

अन्ततः वह महापुरुष कहना क्या चाहते हैं? वास्तव में भगवान और माया के बीच में ‘ग्रेविटी’ है, एक रेखा है। एक निर्धारित अवस्था तक माया प्रेरणा करती है, उसके पश्चात् ईश्वर प्रेरक हो जाता है। साधना के सही दौर में पड़कर निर्धारित सीमा पार कर लेने पर ईश्वर प्रेरक हो जाता है। जब तक साधक माया के क्षेत्र में है तब तक उससे प्रत्येक कार्य के होने में न्यारे-न्यारे करण ही माध्यम हैं। किन्तु जब साधक माया की परिधि पार कर ले जाता है, ईश्वरीय आकर्षण-क्षेत्र तक पहुँच जाता है, ऐसे पथिक की बागडोर इष्टदेव अपने हाथ में ले लेते हैं। ऐसे भक्त के लिए वे स्वयं कटिबद्ध रहते हैं और यहाँ तक कि जहाँ भगत मेरो पग धरै, तहाँ धरूँ मैं हाथ। पाछे लागा सदा रहूँ, कबहूँ न छाड़ूँ साथ।।इस अवस्था के पश्चात् यदि कोई पथिक स्वयं पतित होना चाहे तो हो नहीं सकता। भगवान उसे पतित होने ही नहीं देंगे। वे बचा लेंगे, जैसे नारद को बचाया। अर्थात् उस सीमा के पार होने के बाद भगवान करते हैं।

अतः प्रत्येक पुरुष को चाहिए, चाहे वह गृहस्थ आश्रम में रहे या कहीं भी रहे, प्रातः-सायं नियमित रूप से उस आराध्य देव के स्वरूप का चिन्तन करे। रुचि के अनुसार किसी भी दो-ढाई अक्षर के नाम को ले ले। श्रीकृष्ण ने तो ओम् जपने का निर्देश दिया है, ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। (गीता, 8/13)- अर्जुन! ‘ओम्’ अक्षय ब्रह्म का परिचायक है। इसका तू जप कर और ध्यान मेरे स्वरूप का धर। मेरे अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तु का चिन्तन न करते हुए निरन्तर मेरा स्मरण कर। ध्यान मेरा और नाम ओम् का जप।- क्योंकि प्राप्ति के पश्चात् प्रत्येक महापुरुष का नाम वही होता है जिसे वह प्राप्त है। अतः परमात्मा श्रीकृष्ण एक योगेश्वर थे, सद्गुरु थे।

प्रश्नमहाराजजी! कृष्णकृष्ण कहना यदि अपराध है तो जो लोग कृष्ण का जप करते हैं, क्या वे भ्रम में हैं?

उत्तर देखिये, ‘कृष्ण कृष्ण जप’- ऐसा योगेश्वर श्रीकृष्ण ने नहीं कहा। इतना ही नहीं, अर्जुन को कृष्ण कहना अपराध प्रतीत हुआ।

प्रारम्भ में अर्जुन श्रीकृष्ण को सखा मानता था। बुद्धि में कुछ उनको तेज अवश्य मानता था किन्तु धनुर्धरों में अपने को ही सर्वश्रेष्ठ मानता था। श्रीकृष्ण का विराट् रूप देखने पर अर्जुन बहुत भयभीत हुआ। वह गिड़गिड़ाने लगा। क्षुद्र त्रुटियों के लिए क्षमायाचना करने लगा। कहने लगा- भगवन्! आपको न महर्षिगण जानते हैं और न देवता ही जान पाते हैं; क्योंकि आप ही सबके आदि कारण हैं। आप स्वयं ही अपने आपको जानते हैं। मैंने कभी आपको हे सखा!, हे यादव!, हे कृष्ण! कहकर सम्बोधित किया था।- इन त्रुटियों के लिए आप मुझे क्षमा करें। पिता जैसे प्रिय पुत्र की भूलों को क्षमा करता है, सखा जैसे सखा की भूलों को सहन करता है, इसी प्रकार मेरी उन त्रुटियों को भी आप क्षमा करें। जब अर्जुन ने ऐश्वर्य विभूतियुक्त उस परम स्वरूप को देखा तब उसने महसूस किया कि ये न कृष्ण (काले) हैं न गोरे, न सखा हैं न यादव। यह तो अनन्त, अव्यक्त, शाश्वत, सनातन, परात्पर ब्रह्म हैं। इस प्रकार अर्जुन ने कृष्ण कहने की अपनी भूल के लिए क्षमायाचना की। यह तो अर्जुन की अनुभूति थी कि कृष्ण कहने में उसे संकोच हो रहा था। क्योंकि वे रंग-रूप से परे हैं। कालान्तर में भाविक भक्तों ने उनका नाम भी जपना आरम्भ कर दिया और अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार उसका फल भी पाते हैं। ईश्वर का कोई भी नाम श्रद्धा और विश्वास से जपने से निश्चय कल्याण होता है।

अतः श्रद्धानुसार कोई भी दो-ढाई अक्षर का नाम ओम्, राम, शिव, कृष्ण में से लें। उसका चिन्तन करें और उसी के अर्थस्वरूप इष्ट का ध्यान करें। यदि सद्गुरु मिल जायेंगे तब तो सोने में सुगन्ध ही है। वे नाम का जो वास्तविक प्रवेश है, उसकी जागृति एवं संचार करा देंगे, जो यथार्थ है। नहीं तो यथाभिमतध्यानाद्वा।(पातंजल योगदर्शन, 1/39) जो आपके अभीष्ट मत में सहायक हो ऐसे किसी का भी स्वरूप पकड़ लें। किसी के भी रूप से सहयोग ले लें; जैसे- दत्त भगवान ने इनसे लिया, उनसे लिया। जो उपयोगी गुण थे, जो ध्यान की रक्षा में सहायक थे, ले लिया; जैसे- अर्जुन ने उर्वशी को मातृवत् देखा और सहयोग ले लिया, न कि उन सबका ध्यान धरने लगे। इससे आपका पुण्य और पुरुषार्थ बढ़ेगा, जिससे आप शनैः-शनैः प्रकृति के क्षेत्र से पार होते जायेंगे और जहाँ इष्ट के आकर्षण क्षेत्र में आप पहुँचे तहाँ फिर वह प्रभु ही संचालक हो जायेगा।

गीता के अध्याय नौ में श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! मैं अव्यक्त हूँ। सबमें समान रूप में व्यापक हूँ। मेरा न कोई प्रिय है न अप्रिय है किन्तु जो मेरा अनन्य भक्त है वह मुझमें है और मैं उसमें हूँ। अर्थात् भक्तों के लिए ही वे रथी हैं। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन (मानस, 7/112/1) अवश्य हैं; किन्तु सो केवल भगतन हित लागी(मानस, 1/12/5)- भक्त के लिए भगवान सदैव तत्पर हैं।

।। ओम्।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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