भगवान् को दाढ़ी क्यों नहीं?

भगवान् को दाढ़ी क्यों नहीं?

(एक जिज्ञासु भाविक ने प्रश्न किया है कि भगवान् को दाढ़ी क्यों नहीं है?)

बन्धुओ!

आपकी जिज्ञासा स्वाभाविक है कि भगवान् है कैसा? इसी तरह की जिज्ञासा कभी माँ पार्वती जी को हुई थी। उन्होंने भगवान् शिव से प्रश्न किया था, रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई।।– राम अयोध्या नरेश के पुत्र थे अथवा अलख अविनाशी कोई अन्य?’’ शंकर जी नाराज हो गये। वे कहने लगे, ‘‘कहहिं सुनहिं अस अधम नर, ग्रसे जे मोह पिसाच। पाषंडी हरि पद बिमुख, जानहिं झूठ न साच।। हे पार्वती! तुमने जो प्रश्न किया कि राम कौन हैं?, ऐसा अनर्गल निकृष्ट प्रश्न तो कोई अधम मनुष्य ही कर सकता है, जिसे मोहरूपी पिशाच ने ग्रस रखा है। जो पाखण्डी है, हरिपद से विमुख है, वही ऐसा प्रश्न कर सकता है- बातुल भूत बिबश मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।।’’

इस प्रकार भगवान् भोलेनाथ ने पन्द्रह-पचीस खरी-खोटी सुनाया किन्तु माता पार्वती शान्त भाव से बैठी रहीं। शंकर जी ने सोचा कि बात क्या है? मेरी ताड़ना का इस पर प्रभाव क्यों नहीं पड़ा? यह प्रश्न इसका है भी कि नहीं? तब शंकर जी ने ध्यान धर के देखा। शंकर जी के पास वह यंत्र था कि इसके मन में क्या है? सब पकड़ लिया। वे बहुत प्रसन्न हुए। जब ध्यान टूटा, तब बोले, ‘रामकृपा ते पारवति, सपनेहुँ तव मन माहिं। सोक मोह संदेह भ्रम, मम विचार कछु नाहिं।।हे पार्वती! भगवान् की असीम अनुकम्पा से तुम्हारे मन में न शोक है, न सन्देह है, न भ्रम है। तुम्हें तो शंका है ही नहीं। किन्तु तुमने जो पूछा है, संसार के हित में है इसलिए सुनो कि भगवान् हैं कैसे?

आदि अन्त कोउ जासु न पावा।

मति अनुमानि निगम अस गावा।।

यह भगवान् जन्मा कब से, रहेगा कब तक?- यह तो आज तक कोई नहीं जाना; किन्तु अपने विवेक-विचार से वेदों ने इस प्रकार गायन किया कि-

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।

कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।

आनन रहित सकल रस भोगी।

बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।

वह तन के बिना स्पर्श करता है, बिना आँखों के देखता है, बिना पैर के सर्वत्र चलता है, बिना हाथों के सर्वत्र कार्य करता है। असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।।– इस प्रकार भगवान् के कृत्य अलौकिक हैं। अब बनाओ न भगवान् का चित्र बिना हाथवाला, बिना पैरवाला!

जिन भगवान् भोलेनाथ शिव ने रामचरित मानस की रचना की, उन महापुरुष ने स्वयं बताया कि राम का स्वरूप कैसा है? वह बिना पैर के चलता है, बिना हाथों के काम करता है, बगैर शरीर के स्पर्श करता है। वह अरूप है, अमूर्त है, कण-कण में व्याप्त है, जिसका निवास हृदय-देश में है- सब के उर अंतर बसहु, जानहु भाउ कुभाउ। लेकिन वह है सदा किशोर। न तो वह अबोध बालक है कि लड़खड़ाता रहे, न वह वृद्ध है कि भूल करता रहे, भ्रमित हो जाय। भगवान् सदा किशोर और अमूर्त है।

किशोरावस्था दाढ़ी का अंकुर फूटने से एक सेकेण्ड पहले की अवस्था है, यौवन से ओतप्रोत, ओजस एवं स्फूर्ति का अक्षय भण्डार, अजस्र स्रोत! आपकी, जीवमात्र की व्यवस्था। सुरक्षा में सदैव सन्नद्ध। इसीलिए भगवान् की संकल्पना किशोर के रूप में की गई। वस्तुतः वह अमूर्त है, अरूप है, अनिर्वचनीय है, जैसा पूर्व के समस्त महापुरुषों के वाङ्मय में है।

अनादि वैदिककाल से जितने भी अवतार, महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने प्रभु को प्रत्यक्ष देखा, सबने एक ही स्वरूप बताया कि वह अनिर्वचनीय है। सर्वज्ञ, शाश्वत, अकाल पुरुष है। भगवान् बुद्ध के लिए लोगों ने अफवाह फैला रखा है कि वे भगवान् को नहीं मानते; किन्तु महापुरुष ने स्वयं निर्णय दिया कि मैंने आज उस अविनाशी पद को प्राप्त किया है जो मुझसे पूर्व महर्षियों ने प्राप्त किया था। मैंने आज सर्वज्ञ पद को प्राप्त किया जो मुझसे पूर्व महर्षियों ने प्राप्त किया था। मैंने आज सर्वज्ञ पद को प्राप्त किया- उस परमतत्त्व का इतना ही तो स्वरूप है। यही गीता कहती है कि आत्मा अविनाशी है, सर्वज्ञ है; किन्तु काला, गोरा, हल्का, भारी, जन्म और आयु परमात्मा में ऐसा कुछ नहीं है। भगवान् बुद्ध, महावीर स्वामी सबने एक ही निर्णय दिया कि वह अन्तर्दृष्टि से पकड़ में आता है, ध्यान-समाधि की स्थिति में विदित होता है और भक्त को अपने में समाहित कर लेता है। ऐसी परिस्थिति में जहाँ भौतिक आकार ही नहीं है, वहाँ दाढ़ी किसको और कहाँ जमेगी?

वैसे जिन देखा सो कहा नहिं, कहा सो देखा नाहिं। रहिमन अगम बात के, कहन सुनन को नाहिं।। जिन्होंने उस परमसत्ता का दिग्दर्शन किया, उन्होंने कहा नहीं और जो कहते हैं, उन्होंने देखा नहीं तो भगवान् के भौतिक स्वरूप का रेखांकन कैसा?

भगवान् कोई व्यक्ति नहीं बल्कि आपके हृदय में छिपा हुआ ज्योतिर्मय तत्त्व है। भजन के द्वारा, चिन्तन के द्वारा वह पहले बातें करता है, क्रमशः उँगली पकड़कर योगक्षेम करता है। आपमें दृष्टि बनकर संचारित हो जायेगा, सामने स्वयं दर्शन देगा, जानकारी देगा। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। अपने में स्थिति प्रदान कर देगा; क्योंकि मन बस होई तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजे।। वह प्रभु ही यह सब कुछ करने में सदैव तत्पर रहता है इसीलिए भगवान् को किशोर कहा गया और किशोरावस्था की भावना करके मन्दिरों में मूर्तियाँ रची गईं। यह प्रतीकात्मक है। यह बाल, गोपाल एवं अनभिज्ञ प्राणियों के मन में साधना का सूत्रपात् करने की विधा है। जब अन्दर की साधना जागृत हो जाती है, साधक हृदय में ही सिमट जाता है, बाहर नहीं झाँकता। अतः मानव मात्र को इस पर ध्यान देना चाहिए। हमारे पूर्व महापुरुषों ने इस प्रश्न में अकारण उलझना उपयोगी नहीं माना। भगवान् बुद्ध से एक सज्जन ने प्रश्न किया कि, क्या हमें भगवान् को दिखा सकते हैं? बुद्ध ने कहा कि मैं दिखा तो नहीं सकता, हाँ तुम्हें प्राप्त करा सकता हूँ। वह अमूर्त है। उसे पाना है तो तुम हमारे साथ ध्यान करो। अतः सभी को एकमात्र प्रभु, एक परमात्मा की प्राप्ति का उद्योग करना श्रेयस्कर है।

।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान् की जय।।

(‘अनछुए प्रश्न’ से उद्धृत)

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