रामेश्वर-दर्शन का प्रभाव

प्रश्नएक बार एक भक्त ने आकर प्रणाम किया एवं अति विनीत स्वर में बोला कि महाराजजी! मै गंगोत्री का जल लेकर दस बार रामेश्वर जा चुका हूँ और अब पुनः ग्यारहवीं बार दर्शनहेतु जा रहा हूँ। वैसे तो रामेश्वरदर्शन का प्रभाव गोस्वामीजी ने इतना बताया है कि

मम कृत सेतु जो दरसनु करिही।

सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।। (मानस, 6/2/4)

अर्थात् एक बार रामेश्वर का दर्शन कर लेने पर मानव भवसागर से पार हो जाता है। उसे साधनश्रम नहीं करना पड़ता। यथा

जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि।

सो सायुज्य मुक्ति नर पाइहि।। (मानस, 6/2/2)

भगवन्! गंगाजल चढ़ाने से सायुज्य मुक्ति प्राप्त हो जाती है परन्तु मेरे चित्त में तो अभी तक शान्ति नहीं मिली।

उत्तर महाराजजी ने हँसते हुए अत्यन्त गम्भीर स्वर में उत्तर देना प्रारम्भ कर दिया कि तीर्थ-माहात्म्य के द्वारा कल्याणकामना तो अपने भावों की देन है। हर व्यक्ति परम कल्याण एवं शान्ति पाने के लिए प्रयत्नशील है; किन्तु उनके साधनीय स्तर अलग-अलग हुआ करते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में हमें बाह्य तीर्थों को मान्यता देनी पड़ती है परन्तु क्रमागत साधना के विकास के साथ ही साथ इन तीर्थों का रूप भी बदल जाता है। जैसा कि आप रामेश्वर का अर्थ समझ रहे हैं, साधन-पथ में बढ़ने के लिए यही उदीयमान लक्षणों के अंकुरण हैं, लेकिन कल्याण प्राप्त करने के लिए यह प्रयास पर्याप्त नहीं है। इसीलिए यथार्थ की पृष्ठभूमि में प्रयोगात्मक साधना प्रारम्भ करनी पड़ती है। द्रष्टव्य है-

नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भवसागर तरहिं। (मानस, 6/सोरठा, 2)

भगवन्! आपका नाम ही वह सेतु है जिसपर चढ़कर मनुष्य भवसागर पार हो जाता है। इस नाम का उतार-चढ़ाव श्वास के ऊपर है। यहाँ इसी आशय को स्पष्ट किया गया है।

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं।

ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।। (मानस, 6/2/1)

रामेश्वर का अर्थ होता है राम और ईश्वर। राम सबके मानस में रमण करनेवाली सर्वव्यापी सत्ता है और इस स्वर के सर्वथा निरोध में ही वह दिखाई पड़ती है। ईश्वर का आशय इस स्वर से है। श्वास के उतार-चढ़ाव में नाम का अनवरत भजन करने से, स्वर के सर्वथा निरोधकाल में उस व्यापक सत्ता का साक्षात्कार हो जाता है। वस्तुतः जिस महापुरुष ने स्वर का साक्षात्कार कर लिया है, उसी को यह स्थिति सुलभ हुई है।

जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि।

सो सायुज्य मुक्ति नर पाइहि।। (मानस, 6/2/2)

प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ही ज्ञान है और यह ज्ञान ही गंगा है। स्वर के माध्यम से ज्ञान का स्पर्श जब उस चेतन सत्ता से हो जाता है, तदुपरान्त तादात्म्य स्थापित करने की स्थिति प्राप्त हो जाती है, जिसे सायुज्य मुक्ति कहते हैं। सायुज्य मुक्ति का अर्थ है- प्रभु के समस्त ऐश्वर्यों को प्राप्त कर लेना। लक्ष्य की प्रत्यक्ष जानकारी के बाद ही प्रभु के समस्त ऐश्वर्य अपने में आ जाते हैं। जैसा कि-

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। (मानस, 2/126/3)

उपरोक्त परम पावनी गंगा ही मुक्तिदात्री है। लौकिक चक्षुओं से दृश्यमान होनेवाली गंगा तो छिटपुट मलों को ही धोती है, जो अलगाव होते ही पुनः बढ़ने लगता है; परन्तु इस गंगा का अवगाहन शाश्वत शान्ति से मेल कराता है। अतः रामेश्वर के दर्शनार्थ किसी महापुरुष की शरण एवं सान्निध्य परम आवश्यक है, जिसकी कृपा से शनैः-शनैः उस प्रयोगात्मक पथ पर हमें वह स्थिति सुलभ हो सकती है।

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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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