वर्ण आत्मपथ की जागृति के पश्चात् ही शुरू होता है। वर्ण एक ही साधन–पथ के चार सोपान हैं और सारा संसार इन चारों वर्णों के अन्तर्गत है। बाहर (जातियों में) वर्ण हो ही नहीं सकता। स्मृतियाँ व्यवस्था थीं, कानून थीं; धर्म नहीं!
महाकुम्भ के पर्व पर चण्डीद्वीप हरिद्वार में दिनांक ०८–०४–१९८६ ई० की जनसभा में वर्ण–व्यवस्था का स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी द्वारा रहस्योद्घाटन।
भारत का एक उलझा हुआ प्रश्न है, जिससे सभी लोग त्रस्त हैं- वह है ‘जाति’। इन जातियों को लेकर ही देश का विभाजन हुआ, साम्प्रदायिक निर्वाचन की माँग उठी और आज भी विभिन्न प्रदेशों में उठ रही है। जातियों को लेकर ही दंगे होते हैं, मनुष्य एक दूसरे के खून का प्यासा हो जाता है और ऊपर से दुहाई देते हैं कि यह तो भगवान ने बनायी है। कहते हैं- ऐसा ‘गीता’ में लिखा है, जबकि एक भी श्लोक न तो ‘गीता’ में है और न किसी शास्त्र में, जो जातियों का विभाजन करता हो, मनुष्य को बाँटता हो।
आज हम सब इस प्रश्न पर विचार करेंगे कि वर्ण है क्या? क्या भगवान ने बँटवारा किया है? वर्ण के विषय में चारों वेदों में केवल एक ऋचा है, स्मृतियों में इसी की चर्चा है और ‘गीता’ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस पर पूरा जोर दिया है। आइए देखें कि शास्त्र कहते क्या हैं और हमने-आपने मान क्या लिया?
पहले सभी शास्त्र मौखिक थे। सर्वप्रथम कृष्ण द्वैपायन व्यास ने उन्हें लिपिबद्ध किया, भोजपत्रों पर लिखा। उन महर्षि ने चारों वेद, छः शास्त्र, भागवत महापुराण, महाभारत इन सबका संकलन किया। अन्त में उन्होंने विचार किया कि मैंने इतना लिख डाला है कि पढ़ते-पढ़ते मनुष्य का एक-दो जन्म ही बीत जाय, अतः इन सबमें सर्वोपरि शास्त्र कौन है? स्वयं उन्होंने निर्णय दिया-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।। (महाभारत, भीष्मपर्व, ४३/१)
गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है, जो स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निकली है- अन्य शास्त्र के विस्तार में जाने की क्या आवश्यकता? अतः गीता स्वयं में एक पूर्णशास्त्र है। ‘इति गुह्यतमं शास्त्रम्’ (गीता, १५/२०) कहकर भगवान ने इसे शास्त्र की संज्ञा दी है। परमात्म-धर्म का शुद्धशास्त्र गीता है। गीता सार्वभौम है। विश्व के प्रत्येक मानव का कोई निर्दोष शास्त्र है, तो गीता ही है।
अब गीता कहती क्या है? कोई व्यापारी गीता उठाता है तो कहता है, ‘व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।’ (गीता, २/४१)- गीता कहती है कि अपना-अपना व्यवसाय करो। क्षत्रिय के लिए कहती है- युद्ध करो। राजनीतिज्ञ कहते हैं- लाभ के लिए विदेशी कपड़ा बेचते हैं तो आप सकाम कर्मयोगी हैं, देश का कपड़ा देश में बेचें तो आप निष्काम कर्मयोगी हैं। कर्मयोग माने अपना-अपना धन्धा।
गीता पर लाखों विद्वान् व्याख्यान दिया करते हैं, हजारों टीकाएँ हैं- सैकड़ों टीकाएँ तो केवल संस्कृत में हैं, लेकिन आज तक कोई यह नहीं बता सका कि गीता ‘कर्म’ किसे कहती है? जिसे आप कर्म कहते हैं, गीता उसे कुकर्म एवं अचेत कर्म कहती है। गीता पढ़कर ही हम जानते हैं कि युद्ध हुआ था; किन्तु गीता में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है जो मारकाट का समर्थन करता हो। ऐसे ही पन्द्रह-पचीस प्रश्न हैं, जो हैं पूरब और हम-आप खोजा करते हैं पश्चिम। है हृदय की योग्यता, देखते हैं बाहर। उन्हीं में से एक प्रश्न है वर्ण-व्यवस्था। जिस जाति-प्रथा को आज तक वर्ण समझा गया, गीता उसे वर्ण कहती ही नहीं।
गीता के अध्याय ४/१३ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं’- अर्जुन! चार वर्णों की रचना मैंने की। विचार कीजिए, क्या सृष्टि का अर्थ केवल भारत होता है? भारत से बाहर भी क्या ये चारों वर्ण हैं? चारों वर्ण को भगवान ने बनाया, तो विश्व की अन्य जातियों को किसने पैदा किया? भगवान के कथन का अभिप्राय क्या है?
अभी मद्रास में सामूहिक धर्म-परिवर्तन की घटना हुई। हरिजन अपना धर्म बदलकर मुसलमान हो गए। लोग धर्माचार्यों के पास गये। निवेदन किया, ‘‘भगवन्! कुछ कीजिए।’’ उन्होंने निर्णय दिया- ‘‘वर्ण तो भगवान का बनाया हुआ है, मनुष्य को बदलने का कोई अधिकार नहीं है। हम कोई व्यवस्था नहीं दे सकते।’’
भगवान की व्यवस्था को तो बदलना नहीं चाहिए था; किन्तु लोग बदल रहे हैं। एक-दो नहीं, करोड़ों में बदलते जा रहे हैं। मात्र बारह हजार मुसलमान बाहर से भारत में आए थे और देश के विभाजन के पश्चात् भी भारत में उन्तीस करोड़ के लगभग हैं। जन्मना बढ़ते तो बारह हजार से बढ़कर लाख हो जाते, करोड़ में हो जाते, ये उन्तीस करोड़ आए कहाँ से? ये सब आपके ही सगे भाई हैं। आपने ही तो धक्का देकर इन्हें अपने से अलग कर दिया। चार वर्ण की ईश्वरीय आज्ञा को कम-से-कम आपने तो माना होता। चार के स्थान पर असंख्य जातियों-उपजातियों की सृष्टि कहाँ से हो गई?
धर्म-परिवर्तन की उपर्युक्त घटना पर दूसरे आचार्य ने कहा था कि यदि वर्ण बदले जायेंगे तो सनातन-धर्म नष्ट हो जायेगा। वर्ण-व्यवस्था तो हमारा सनातन-धर्म है कि तुम शूद्र बने रहो, हम वैश्य बने रहें; तुम क्षत्रिय बने रहो, हम ब्राह्मण रहें। यदि शूद्र न रहा तो सनातन-धर्म नहीं रहेगा; क्योंकि उसका एक अंग टूट जायेगा।
तीसरे आचार्य ने आशंका व्यक्त की कि धर्म-परिवर्तन से उनकी संख्या बढ़ जायेगी, वे पुनः अलग राष्ट्र की माँग करेंगे। देश की अखण्डता को खतरा है इसलिए सरकार को धर्म-परिवर्तन पर रोक लगानी चाहिए। अब सरकार तो धर्म-निरपेक्ष है, उसे तो बहुमत चाहिए- आपसे मिले या उनसे। अलग राष्ट्र की माँग वे क्यों करेंगे? माँग तो अल्पसंख्यक करते हैं और संख्या आपकी घटेगी।
वस्तुतः सनातन-धर्म की गठरी फट गयी है। दो-दो दाना चावल गिरता जा रहा है। यदि इन भ्रान्तियों का निवारण नहीं किया गया, तो एक समय ऐसा भी आयेगा कि गठरी बिल्कुल हल्की हो जायेगी।
यह सच है कि गीता के अनुसार वर्ण भगवान की सृष्टि है; किन्तु गीता में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है जो मनुष्य-मनुष्य में दरार डालता हो। योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि आप स्त्री हों अथवा पुरुष, शूद्र हों अथवा वैश्य, कोई पाप-योनिवाले कीट-पतंगादि ही क्यों न हों, जो सर्वभाव से मुझे भजता है, वह मुझे परमप्रिय है।
इतना ही नहीं, ‘अपि चेत्सुदुराचारो’- दुराचारियों का सिरमौर ही क्यों न हों, यदि ‘भजते मामनन्यभाक्’- अनन्य माने अन्य न अर्थात् एक मेरे सिवाय अन्य किसी देवता को न भजकर केवल मुझे भजता है, तो ‘साधुरेव स मन्तव्यः’– वह साधु मानने योग्य है, क्योंकि ‘सम्यग्व्यवसितो हि सः’ (गीता, ९/३०)- वह यथार्थ निश्चय से लग गया है। इसका परिणाम बताते हैं कि वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और सदा रहनेवाली शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लेता है। पुण्यात्मा तो लगते ही हैं, मूलतः गीता पापियों के लिए उद्धार की पद्धति है। यह मनुष्य-मनुष्य में किंचित् भी भेद का स्थान नहीं देती।
अध्याय ४/१३ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्’– चार वर्णों की सृष्टि मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार भागों में बाँटा? श्रीकृष्ण कहते हैं, नहीं, ‘गुणकर्मविभागशः’– गुण के आधार पर कर्म को चार भागों में बाँटा। अब यदि आप कर्म समझ लें तो बँटवारा भी सही समझ जायेंगे; क्योंकि जो वस्तु बाँटी गयी है वह है कर्म। कोई कहता है- खेती करना कर्म है, तो कोई व्यवसाय को, देशसेवा-समाजसेवा को, अपनी नौकरी को कर्म बताता है। कोई कहता है, ‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः’ (गीता, १८/४५)- अपनी-अपनी ड्यूटी करो। वस्तुतः श्रीकृष्ण ने भी तो कुछ कहा होगा कि कर्म क्या है? यदि ज्यों-का-त्यों मान लें कि श्रीकृष्ण ने किसको कर्म कहा, तो आपको वर्ण के सम्बन्ध में कभी भी भ्रान्ति नहीं होगी।
गीता के अध्याय ३/८ में वे कहते हैं, ‘नियतं कुरु कर्म त्वं’– अर्जुन! तू निर्धारित किये हुए कर्म को कर। सिद्ध है कि कर्म बहुत से हैं, उनमें से कोई कर्म निर्धारित किया गया है। उस कर्म की विशेषता बताते हैं कि कर्म न करने से तेरी शरीर-यात्रा भी सिद्ध नहीं होगी। अतः कर्म कोई ऐसी वस्तु है जो उस पुरुष की शरीर-यात्रा को सिद्ध कराती है, पूर्ण कराती है। यह आत्मा जन्म-जन्मान्तरों से शरीरों की यात्रा ही तो करता चला आ रहा है। कीट-पतंग, देव-दानव तथा जड़-चेतन से गुजरता चला आया है। वस्त्र बदलता है, किन्तु यह कर्म इस प्रकार की नश्वर शरीर-यात्रा को पूर्ण कर इस आत्मा को वह अचल स्थिति दिलाता है जिसके पश्चात् शरीरों की यात्रा नहीं करनी पड़ती।
अब वह निर्धारित कर्म है क्या? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता के अध्याय ३/९ में कहते हैं, ‘यज्ञार्थात् कर्मणो’– अर्जुन! यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। वह हरकत कर्म है जिससे यज्ञ पूर्ण होता है। इस यज्ञ के अतिरिक्त संसार में जो कुछ भी किया जाता है, दिन-रात जिसमें लोग व्यस्त रहते हैं, क्या वह कर्म नहीं है? श्रीकृष्ण कहते हैं, नहीं ‘अन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’– यज्ञ की प्रक्रिया के अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है वह इसी लोक का एक बन्धन है, इसी लोक में बाँधकर रखने का उपाय है। ‘तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर।’– इसलिए अर्जुन! उस यज्ञ की पूर्ति के लिए तू संग-दोष से रहित होकर भली प्रकार कर्म का आचरण कर। अतः कर्म ऐसी विधा है जिसका आचरण संग-दोष के रहते नहीं किया जा सकता।
अब वह यज्ञ क्या है जिसे करना ही कर्म है? योगेश्वर श्रीकृष्ण यज्ञ की विशेषता बताते हैं कि इस यज्ञ से देवत्व की वृद्धि करो। दैवी सम्पद् ज्यों-ज्यों बलवती होगी, त्यों-त्यों तुम्हारी प्रगति होगी। इस प्रकार क्रमशः परस्पर उत्थान करते-करते परम कल्याण को प्राप्त हो जाओ। अतः यज्ञ कोई ऐसी वस्तु है जो परम कल्याण को सुलभ कराती है।
उस यज्ञ में किया क्या जाता है? इस पर अध्याय चार में कहते हैं- अर्जुन! बहुत से योगीजन श्वास का प्रश्वास में हवन करते हैं। इन्द्रियों को संयत कर, मन को विषयों से समेटकर एक इष्ट के ध्यान में लगाते हैं। साधना और सूक्ष्म होने पर श्वास-प्रश्वास की गति का निरोध कर प्राणायाम-परायण हो जाते हैं। प्राणों की गति का याम हो जाता है। श्वास नहीं प्राणों का, श्वास में उठनेवाले संकल्प-विकल्पों का निरोध हो जाता है। न भीतर से संकल्प उठते हैं और न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प भीतर प्रवेश कर पाते हैं। मन के अन्तराल में उठनेवाली तरंगों का ही दूसरा नाम संकल्प है। इस मन के निरोध के साथ ही परिणाम निकल आता है।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। (गीता, ४/३१)
पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, यज्ञ के अन्त में शेष उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला योगी सनातन शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। अर्जुन! यह सम्पूर्ण यज्ञ मन और इन्द्रियों की क्रिया से सम्पन्न होनेवाले हैं, केवल मन और इन्द्रियों के संयम से ही सम्पन्न होते हैं। उसी यज्ञ को उन्होंने पुनः स्पष्ट किया कि, ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’ (गीता, १०/२५), तो जौ, तिल, घी, वेदी इत्यादि भौतिक द्रव्यों से जो यज्ञ किया जाता है क्या वह यज्ञ नहीं है? श्रीकृष्ण कहते हैं (अध्याय ४ के ३९वें श्लोक में) कि अर्जुन! भौतिक द्रव्यों से सिद्ध होनेवाला यज्ञ अत्यन्त अल्प है, प्रारम्भिक शिक्षा के लिए प्रोत्साहन मात्र है और जो अभी श्रीकृष्ण ने बताया वह यज्ञ सब-का-सब केवल मन के संयम द्वारा होता है तथा परिणाम में ब्रह्म का दिग्दर्शन करा देनेवाला है। अब बाह्य किसी चीज से आपकी श्वास का निरोध होता हो तो कीजिए, प्राणों की गति का आयाम होता हो तो कीजिए। किसी हरकत से इन्द्रियों का दमन होता हो तो कीजिए। कदापि नहीं होगा। यह जब होगा तब चिन्तन से ही होगा। अतः यज्ञ का मतलब है आराधना, यज्ञ का अर्थ है चिन्तन की विधि और उस विधि को कार्यरूप देना कर्म है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण भी कहते हैं- अर्जुन! कर्म क्या है? अकर्म क्या है और विकर्म क्या है?- इस विषय में बड़े-बड़े विवेकी पुरुष भी मोहित रहते हैं इसलिए मैं इसे बताता हूँ, जिसे जानकर तू संसार-बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा। कर्म संसार-बन्धन से छुटकारा दिलाता है। उस कर्म का अर्थ है आराधना को कार्यरूप देना।
अर्जुन! जो पुरुष कर्म में अकर्म देखता है अर्थात् चिन्तन तो करता है किन्तु यह नहीं मानता कि करनेवाला मैं हूँ, चिन्तन तो गुणों के द्वारा प्रेरित होकर हमें करना पड़ रहा है, इष्टदेव हृदय से रथी होकर हमसे कराते हैं, मैं तो एक यन्त्रमात्र हूँ- इस प्रकार जो कर्म में अकर्म देखता है और ऐसा देखने की क्षमता का आ जाना ही अकर्म है, इस अकर्म को कर्म देखता है, समझता है कि मुझसे सही कर्म पार लग रहा है, इष्ट के आदेशों पर समर्पित वह व्यक्ति मनुष्यों में बुद्धिमान् है और वही सम्पूर्ण कर्म को करनेवाला है।
क्या हम कर्म करते ही रहेंगे अथवा कभी कर्म करने से छुटकारा भी मिलेगा? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता के अध्याय ४/१९ में कहते हैं, ‘यस्य सर्वे समारम्भाः’ अर्थात् सम्पूर्णता से आरम्भ किया हुआ कर्म इतना सूक्ष्म हो जाय कि ‘कामसङ्कल्पवर्जिताः’– कामना और संकल्पों का निरोध हो जाय अर्थात् मन संकल्प-विकल्प से रहित शून्य में टिक जाय, उस समय ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्’– जिसको हम नहीं जानते थे, जिसके लिए प्रयत्नशील थे, अजर-अमर-शाश्वत गुणधर्मोंवाला वह परमात्मा विदित हो जाता है। इसी अनुभूति का नाम है ज्ञान और उस ज्ञान में ‘दग्धकर्माणम्’– कर्म सदा-सदा के लिए जल जाते हैं। ऐसी अवस्थावालों को बोधस्वरूप महात्माजन पण्डित कहते हैं। यहाँ भी कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो हमारे चित्त को समेटकर संकल्पों से ऊपर उठा देती है। कर्म माने आराधना! सातवें अध्याय के अन्त में कहते हैं- जो मनुष्य जरा-मरण से छूटने के लिए मेरी शरण होकर यत्न करते हैं, वे सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं, सम्पूर्ण अध्यात्म को जानते हैं, पूर्ण रूप से मुझे जानते हैं और मुझे जानकर सदा के लिए मुझमें स्थित हो जाते हैं। कर्म जरा-मरण से छुटकारा दिला देता है। अर्जुन ने पूछा- भगवन्! वह सम्पूर्ण कर्म क्या है, सम्पूर्ण ब्रह्म क्या है और वह सम्पूर्ण अध्यात्म क्या है? योगेश्वर ने बताया, ‘अक्षरं ब्रह्म परमं’– जो अक्षय है, अमिट है वही परम ब्रह्म है। ‘स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते’– स्व अर्थात् अपने स्वरूप में स्थिर भाव, स्वरूप की उपलब्धि का भाव ही अध्यात्म है। कुछ कह देना अध्यात्म नहीं है। अधि माने आधिपत्य। स्वरूप की उपलब्धि होने पर व्यक्ति माया के आधिपत्य से निकल जाता है। आत्मा का आधिपत्य प्राप्त हो जाता है। यही अध्यात्म है। और ‘भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।’ (गीता, ८/३)- भूतों के वे भाव जो कुछ-न-कुछ रचना करते हैं, आपके संकल्पों के वे भाव जो आपके संस्कारों की सृष्टि करते रहते हैं, उनका रुक जाना ही कर्म की पराकाष्ठा है। कर्म कोई ऐसी वस्तु है जो आपके मन के अन्तराल में छिपे हुए संस्कारों का अन्त करके, भले और बुरे, शुभ और अशुभ संस्कारों पर विसर्ग- पूर्ण विराम लगाकर, उनका निरोध करके आपको अलग खड़ा कर देती है। अतः कर्म माने होता है चिन्तन।
अध्याय सोलह में कहते हैं कि काम, क्रोध और लोभ- ये नरक के तीन द्वार हैं। अर्जुन! इन तीनों को त्याग देने पर ही उस कर्म की शुरुआत होती है जो परमश्रेय को दिलानेवाला है। कर्म वह प्रक्रिया है, काम-क्रोध-लोभ त्यागने पर ही जिसमें प्रवेश मिलता है।
सांसारिक कार्यों में जो जितना अधिक व्यस्त है उसमें काम-क्रोधादि उतने ही सजे-सजाये दिखाई देते हैं। श्रीकृष्ण जिसे कर्म मानते हैं वह एकमात्र आराधना ही है। त्याग के बिना उसका आरम्भ ही नहीं होता। साधना के सिद्ध होते ही ज्यों-ज्यों ये विकार अन्दर से घटते जायेंगे, त्यों-त्यों कर्म में प्रवेश मिलता जायेगा।
इसी कर्म को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने चार भागों में बाँटा है; क्योंकि सहसा कोई एक साथ उस मंजिल को नहीं पा सकता। जिस प्रकार सांसारिक किसी विद्या को सीखने के लिए भी कई श्रेणियों से गुजरना पड़ता है। इसीलिए योगेश्वर कहते हैं, अर्जुन! चार वर्णों की सृष्टि मैंने की। वर्ण माने आकृति। इस जीवात्मा का वर्ण शुद्ध है, शाश्वत है, निर्दोष है, निर्लेप है, ‘आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्’ (गीता, ८/९) वही हमारा वर्ण है। वर्ण का अर्थ है आपका स्वरूप। चार वर्णों की सृष्टि की, तो क्या मनुष्यों को बाँटा? योगेश्वर कहते हैं- नहीं, ‘गुणकर्मविभागशः’ (गीता, ४/१३) गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा। कर्म माने चिन्तन, कर्म माने साधना की पद्धति। उस साधन-पथ को चार श्रेणियों में बाँटा। एक ही साधना के चार सोपान हैं, यथा-
१. यदि तामसी गुण है तो आलस्य, प्रमाद, निद्रा, कर्तव्य-कर्म में न प्रवृत्त होने का स्वभाव, अकर्तव्य कार्य से न निवृत्त होने का स्वभाव आप में स्वाभाविक रहेगा। ऐसी परिस्थिति में यदि आप आँख मूँदकर बैठ भी जाते हैं, तो दो घण्टे बैठकर दो मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पायेंगे। शरीर बेशक बैठा रहेगा लेकिन मन जिसे भजन में एकाग्र होना है हवा से बातें करेगा, संकल्पों का जाल बुनता रहेगा। इस आरम्भिक अवस्था में आप शूद्र हैं, क्षुद्र हैं, अल्पज्ञ हैं। ऐसी परिस्थिति में आँख मूँदकर बैठने का दम्भ न करें, बल्कि जो सीधा-सा नियम है इस वर्ण का कि उस पथ के जो ज्ञाता महापुरुष हों उनकी सेवा करें। ‘परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।’ (गीता, १८/४४)- मन-कर्म-वचन से उनकी सेवा में लग जायँ। यह साधना की पहली सीढ़ी है, उस कर्म-पथ का पहला हिस्सा है।
२. महापुरुष की सेवा से तामसी गुण धीरे-धीरे शान्त होते जायेंगे, राजसी गुणों का प्रवेश होने लगेगा और जब आधा राजसी का प्रवेश मिल गया तहाँ फिर आपके मन में टिकने की क्षमता आ जायेगी। तहाँ फिर ‘कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।’ (गीता, १८/४४) स्वभाव कहते हैं आदत को। जब आपके अन्तराल में तामसी गुणों का दमन हो गया, आधा राजसी गुण का भी प्रवेश आ गया तो स्वाभाविक चिन्तन होने लगेगा।
गो-रक्षा? तो क्या भैंस को मार डालें? नहीं! ‘गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।।’ (मानस, ३/१४/३) गो माने इन्द्रियाँ। आज गो माने इन्द्रियाँ कहना पड़ता है किन्तु वैदिक वाङ्मय में ‘गो’ शब्द जहाँ मुख से निकलता तो लोगों का ध्यान मस्तिष्क, हाथ, पाँव, नाक, कान – सहज ही इनकी ओर दौड़ जाता था।
एक मुसलमान कौव्वाली गा रहा था- ‘मुहम्मद न होते तो कुछ भी न होता।’ यदि मुहम्मद साहब न होते तो कुछ भी न होता। हमारे स्वामीजी ने सुना तो बोले कि ठीक ही तो कहता है। यदि मोह-मद न होता तो कुछ भी न होता, संसार में जन्म-मृत्यु का कारण ही न होता। उन्होंने मुहम्मद का अर्थ विकार लगाया, जबकि उधर मुहम्मद उनके आचार्य थे। ठीक इसी प्रकार ‘गो’ नाम का एक पशु भी है। उसका महत्त्व है तो आर्थिक किन्तु भ्रमवश लोग उसे धर्म मानकर पूजने में लगे हैं। इस भ्रान्ति का निराकरण किसी दूसरे दिन करेंगे।
यहाँ गो-रक्षा का अर्थ है मायिक प्रवृत्तियों से अपनी इन्द्रियों की रक्षा। काम-क्रोध, लोभ-मोह, आशा-तृष्णा इनके द्वारा गो बिखरकर टुकड़े-टुकड़े हो जाती हैं, योनियों का कारण बनती हैं और विवेक, वैराग्य, शम, दम, नियम, श्रद्धा और समर्पण के द्वारा इन्द्रियाँ संयत होती हैं, सुरक्षित होती जाती हैं। वाणिज्य का अर्थ है व्यापार, धन-संग्रह। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। प्रकृति के द्वन्द्व से शनैः-शनैः उस आत्मिक सम्पत्ति को अर्जित करें।
और खेती? जहाँ खेती या क्षेत्र का प्रश्न आया, योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।’ (गीता, १३/१) अर्जुन! यह शरीर ही क्षेत्र है, जिसमें भला अथवा बुरा बोया हुआ बीज संस्कारों के रूप में जमता है। इसलिए इस क्षेत्र की निराई करें। इसके अन्दर से विकारों को निकालकर फेंक दें और सही रखें। यह वैश्य श्रेणी का कर्म है- ‘वैश्यकर्म स्वभावजम्’ (गीता, १८/४४) आपके स्वभाव ने इसको जन्म दिया। स्वभाव परिवर्तनशील है। आज जो स्वभाव है, कल वह नहीं रहेगा। वाल्मीकि पहले हमलावर डाकू और हत्यारे थे। सन्त सत्पुरुषों का जब सान्निध्य प्राप्त हुआ तो ‘बालमीकि भये ब्रह्म समाना।’ (मानस, २/१९३/८)। क्या बदला था उनका? शरीर वही था, हाथ-पाँव वही थे, केवल गुण बदला तो स्वभाव बदल गया। गुण परिवर्तित हो गये।
३. इसी प्रकार जब तामसी गुण शान्त हो गये, सात्त्विक गुण में प्रवेश मिल गया, कुछ राजसी और सात्त्विक गुण का बाहुल्य आ गया तब आप ही क्षत्रिय हैं। सब भावों पर स्वामीभाव, शौर्य, तेज, दया और प्रकृति के द्वन्द्व में चिन्तन-पथ से पीछे न हटने का स्वभाव- यह क्षत्रिय के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं। वह साधक महान् विपत्ति आने पर भी हताश होकर चिन्तन-पथ से पीछे नहीं हटता। मीरा को जहर दिया गया। ‘लोग कहें मीरा भई बावरी, सास कहे कुलनासी।’ आज उस कुलवन्ती सास को कोई नहीं जानता लेकिन मीरा को दुनिया जानती है। लाख विपत्ति आने पर भी मीरा अपने कर्म-पथ से, इष्ट में श्रद्धा और समर्पण से कभी विचलित नहीं हुई। क्षत्रित्व की यह श्रेणी आपके स्वभाव के अन्तराल में जन्मी है।
इससे उन्नत होने पर जब केवल सात्विक गुण रह गया हो, तामसी और राजसी गुण एकदम शान्त हो गये हों आपके अन्तःकरण में, उस समय ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी योग्यता आपके स्वभाव में है।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।। (गीता, १८/४२)
मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, उस चिन्तन-पथ में इन्द्रियों को तपाने की क्षमता, धारणा-ध्यान और समाधि की क्षमता, अनुभवी उपलब्धि अर्थात् प्रत्येक कार्य में इष्ट का प्रत्यक्ष निर्देशन और उस निर्देशन में चलने की क्षमता – यह सब ब्राह्मण श्रेणी के कर्म स्वभाव से उत्पन्न हैं और स्वभाव में पाये जाते हैं।
विज्ञान का मतलब कोई कल्पना नहीं, इष्ट हृदयदेश से रथी होकर जिन संकेतों से मार्गदर्शन करते हैं उस प्रत्यक्ष अनुभूति (ईश्वरीय अनुशासन) का नाम विज्ञान है। पूज्य महाराजजी प्रायः कहा करते थे- हो! उस स्थान पर भगवान ने हमको बचा लिया। भगवान ने हमें यह बताया, यह आशीर्वाद दिया। हमने पूछा- क्या भगवान भी बातें करते हैं? उन्होंने बताया- हाँ हो! भगवान ऐसे बात किया करते हैं जैसे हम और तू आपस में बैठकर बातें करें, घण्टों बातें करें और क्रम न टूटे। कुछ देर बाद बोले, ‘‘काहे घबरात है, तोहूँ से बतिअइहैं।’’
वास्तव में जिस परमात्मा की हमें चाह है और जिस स्तर पर हम खड़े हैं, हमारी श्रद्धा ऐसी हो कि वह परमात्मा उसी स्तर पर उतर आवें, आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायँ और मार्गदर्शन करने लगें। जब तक भगवान हृदय-देश से रथी होकर मार्गदर्शन न करने लगें तब तक पूर्ण निवृत्ति दिला देनेवाली साधना का श्रीगणेश अभी हुआ ही नहीं। कुछ दिनों बाद वैसी कृपा मिलने भी लगी, जैसा गुरुदेव ने कहा था। इसी अव्यक्त का बोलना विज्ञान है। यह हमारे मन का ज्ञान नहीं, बेज्ञान का ज्ञान है, जिसे परमात्मा का संचार कहते हैं। इष्ट के चरणों में बिना लगाये स्वाभाविक डोरी लग जाती है। ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी योग्यता स्वभाव में ढल जाती है, उस समय ‘ब्रह्मकर्म स्वभावजम्’। यह ब्राह्मण श्रेणी का कर्म किसने दिया? आपके स्वभाव में ही यह जन्मा और स्वभाव परिवर्तनशील है।
ब्राह्मण श्रेणी भी दोषमुक्त नहीं है। ‘सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।’ (गीता, १८/४८)- धुएँ से अग्नि के समान सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से आवृत्त हैं। ब्राह्मण श्रेणी का ही कर्म क्यों न हो, सात्त्विक गुण मात्र शेष ही क्यों न हो, जब तक गुण जीवित हैं, प्रकृति जीवित है तब तक माया कामयाब हो जायेगी। इन चारों सोपानों से ऊपर ब्रह्म में स्थिति मिल जाने पर ‘न ब्राह्मणः न क्षत्रियो न वैश्यो न शूद्रः चिदानन्दरूपं शिवो केवलोऽहम्।’– वह न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है और न वैश्य है, न शूद्र। उसका चित्त परमानन्दस्वरूप है। कैवल्यस्वरूप शिवमात्र शेष रह जाता है।
योगेश्वर स्पष्ट करते हैं- अर्जुन! मैंने मनुष्यों को नहीं बाँटा। फिर बाँटा किसे? ‘कर्माणि प्रविभक्तानि’– कर्म को बाँटा गया है। कैसे बाँटा? ‘स्वभावप्रभवैर्गुणैः’ (गीता, १८/४१)- ये कर्म स्वभाव में पाये जानेवाले गुणों के आधार पर बनते हैं, उन गुणों के आधार पर कर्म को बाँटा है। जन्म के समय सभी मनुष्य हैं। जन्म से न कोई क्षत्रिय है न वैश्य, न ब्राह्मण और न शूद्र ही है। जो मेडिकल में बैठा ही नहीं वह किस बात का डाक्टर? जब भर्ती ही नहीं हुई तो श्रेणी कैसी?
जब तक आप इस चिन्तन-पथ को नहीं जानते, गीतोक्त कर्म- जो साधना की एक निश्चित विधि है, उसको नहीं जानते और जानकर उस पर दो कदम नहीं चलते, तब तक आप न शूद्र हैं, न क्षत्रिय हैं, न ब्राह्मण हैं और न वैश्य। तब तक आप कुछ भी नहीं हैं, जड़ जीव मात्र हैं। यदि आप उस विधि को समझकर चलना आरम्भ कर देते हैं तो आप चाहे अरब के निवासी हों चाहे ध्रुव प्रदेश के, आप उस दिन से शूद्र हैं। चिन्तन कर्म के प्रथम सोपान पर खड़े हैं अतः आप शूद्र हैं; फर्क इतना ही है कि शूद्र श्रेणीवाला अभी प्रारम्भिक स्तर पर है। जैसे आपका बड़ा लड़का एम.ए. में है और छोटा शिशु अभी प्रथम कक्षा में है, तो क्या आप छोटे से घृणा करेंगे? प्राप्ति के पश्चात् एक परमात्मा की एक ही जैसी अनुभूति सबके लिये है।
पूजा-विधि के नाम पर लोग प्रायः बहक जाते हैं- कोई देवी को पूजने लगता है, तो कोई देवताओं को; किन्तु अठारहवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपने-अपने स्वभाव मे पायी जानेवाली क्षमता के अनुसार कर्म का आचरण करके मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप परमसिद्धि को जिस प्रकार प्राप्त करता है, उस विधि को तू मुझसे सुन। कौन-सी विधि? उन्होंने विधि बतायी कि जिस परमात्मा से सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति हुई है, जो सर्वत्र व्याप्त है, हृदय-देश में निवास करनेवाला है, उस परमात्मा को अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म की क्षमता के अनुसार अर्चन करके अर्थात् सर्वांगीण समर्पण और चिन्तन से सन्तुष्ट करके मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप सिद्धि को प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण के अनुसार पूजन की विधि यही है कि केवल एक परमात्मा में श्रद्धा हो। जब तक एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर नहीं होती तब तक कर्म का आरम्भ ही नहीं होता। अतः जो लोग क्रिया आरम्भ करते समय ‘श्री गणेशाय नमः, देव्यै नमः’ इत्यादि कहते हैं, वे अभी भयंकर भ्रम में हैं।
इस प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मनुष्यों को नहीं, अपितु चिन्तन-पथ को चार सोपानों में बाँटा; क्योंकि सहसा कोई भगवत्प्राप्तिरूप परमसिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता, किन्तु लोग साधना में धैर्य के साथ क्रम-क्रम से इन सोपानों में टिक नहीं पाते। आगेवालों की स्थिति अच्छी देखकर तुरन्त नकल करने का प्रयास करने लगते हैं। साधुवेश में जहाँ दो-तीन वर्ष व्यतीत हुए कि अपने को ब्रह्म कहने लगते हैं, जिससे उन्हें सम्मान मिलने लगे। इससे सतर्क करते हुए श्रीकृष्ण गीता में अध्याय तीन के पैंतीसवें ष्लोक में कहते हैं कि ‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः’– गुणरहित होते हुए भी स्वभाव से उत्पन्न हुआ कर्मक्षमता हमारा धर्म है। उसे हमें धारण करना है, इसलिए वह धर्म है। यह हमारा दायित्व है। ‘परधर्मो भयावहः’– दूसरे का धर्म भय देनेवाला है। भय प्रकृति में है, आवागमन में है। वह प्रकृति में पहुँचानेवाला है। प्राइमरी का विद्यार्थी यदि एम.ए. कक्षा में बैठने लगे तो उत्तीर्ण होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, वह प्राइमरी की योग्यता भी खो देगा; क्योंकि उसने पढ़ा ही कब? इसलिए उन्होंने कहा- ‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः’।
अध्याय १८/४७ में पुनः इसी की पुष्टि करते हुए योगेश्वर कहते हैं कि, अर्जुन! स्वभाव से उत्पन्न कर्म को करके तू सम्पूर्ण पापों से छूट जायेगा। मतलब यह है कि क्रम-क्रम से ही चलना चाहिए। गीता में वर्ण अन्तःकरण की स्थितियों का एक चित्रण है और सबके हृदय में उसकी व्यवस्था है। जो उस कर्मपथ को समझकर चलना प्रारम्भ कर देता है उसके लिए वर्ण की योग्यता सुलभ है, चाहे वह विश्व में कहीं का जन्मा हो, निश्चय ही प्राप्त करता है। और जब तक कर्म प्रारम्भ नहीं करता तब तक वह किसी भी वर्ण का नहीं है। वह मोहरूपी निशा में अचेत पड़ा हुआ है। वह रात-दिन जो दौड़-धूप करता है, प्रयास मात्र है।
गर्हित जाति-प्रथा के समर्थन में पुरुषसूक्त की जिस वैदिक ऋचा का उदाहरण दिया जाता है, उसकी समीक्षा भी आवश्यक है। इस सूक्त में ऋषि ने बताया कि वह परमात्मा अनन्त हाथ, पैर, आँख और मुँहवाला है। उन्होंने पुनः कहा- वह परम पुरुष चार पैरोंवाला है, जिसके एक चरण में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड- सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, पर्वत, समुद्र और नक्षत्र हैं। ऋषियों ने कितने ही प्रकार से उस परम पुरुष की कल्पना की- ‘कतिधा व्यकल्पयन्’ उन्होंने पुनः कल्पना की कि उस परमात्मा के पैर के बराबर कौन? जाँघ के बराबर कौन? भुजाओं के बराबर कौन और मुख के बराबर कौन है? अगली ऋचा में उन्होंने कल्पना की-
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
उरू तदस्य यद्वैश्यः पदभ्यां शूद्रोऽजायत।।
अर्थात् पद में शूद्र है, जाँघ में वैश्य है, बाहु में क्षत्रिय है और उस परमात्मा के मुख सहस ब्राह्मण हैं। भला जो सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है, उसके हाथ-पैर कहाँ? जब मनु को दर्शन दिया तो ‘बिस्वबास प्रगटे भगवाना।’ (मानस, १/१४५/८)- विश्व में जहाँ प्रकृति थी, मनु के लिए पुरुषत्व में विलीन हो गई।
एक बार जिन प्रभु के चरणों को धोने से गंगाजी निकल पड़ीं- जो तीनों लोकों को तारने की शक्ति रखती हैं, जिन चरणों से भरत लिपटे रहे, जिन चरणों में लक्ष्मीजी एकाधिकार से बैठी हैं कि कोई अनधिकारी छूने न पाये, जिन चरणों का रज मस्तक पर धारण कर ऋषि-मुनि अपने को धन्य मानते हैं, जिनका चरणोदक लेकर हम-आप कृतार्थ हो जाते हैं, भगवान के पावनं पावनानाम् उन्हीं चरणों से एक ऐसा कीटाणु निकला कि यदि वह भगवान को छू दे तो भगवान गन्दे हो जायँ, वह है शूद्र! यह धोखा नहीं है तो क्या है? यह कुरीतियों और रूढ़ियों का कृत्य है, अशिक्षित जनता के बीच फैलाया हुआ विचार है। शिक्षा के आते ही मूर्खों को चलानेवाला वह तरीका आक्रोश में बदल गया है।
काशी विश्वनाथ मन्दिर में हरिजन-प्रवेश पर एक धर्माचार्य ने यह घोषणा की- ‘‘शंकरजी नष्ट हो गये, भगवान भ्रष्ट हो गये, अब उस मन्दिर में जाने से अधोगति में जाओगे। हमने नया मन्दिर बना दिया है। इसमें दर्शन करो। इसमें शंकरजी शुद्ध हैं।’’ कितनी भयंकर भ्रान्ति है। शास्त्र का एक भी सूत्र नहीं कहता कि बाहर जातियों का बँटवारा भगवान ने किया। हाँ, हम-आप अवश्य बाँट ले रहे हैं। तीन से तेरह और तेरह से सवा लाख हो जाते हैं। भाई-भाई तो लड़ते ही हैं। अफ्रीका में यह फूट अधिक है, कबीले अधिक हैं और अफ्रीका आज भी गुलाम है। वही कबीला सिस्टम यदि आपके ऊपर रहा तो गुलामी आपके सिर पर मँडरा रही है।
वस्तुतः इस वैदिक ऋचा का वही आशय है जो योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में व्यक्त किया है। भजन की आरम्भिक अवस्था में सभी शूद्र हैं, परमात्मा के चरण-स्थल पर हैं। उन चरणों की सेवा करते-करते भजन-पथ में अपने पाँवों पर खड़े होने की क्षमता आ जाती है तो हम-आप वैश्य हैं, मानो शिशु जाँघों पर खड़ा होने लगा। उस समय आत्मिक सम्पत्ति को अर्जित करने की ओर हम अग्रसर हैं। क्षत्रिय- क्षय कहते हैं काटने को, त्रि माने तीनों गुण। इन तीनों गुणों से निर्मित प्रकृति को काटने की क्षमता आ गई तब वही साधक क्षत्रिय है। ‘बाहू राजन्यः कृतः’– उस समय वह इष्ट के भुजाओं के बल पर होता है, अर्जुन की तरह और जब ब्रह्म की अनुभूति प्राप्त कर लेता है, उस समय परमात्मा उसमें प्रवाहित हो जाता है। वह ब्रह्म में प्रवेश पा लेने की सारी योग्यतावाला है, इसलिए ब्राह्मण है। उस महापुरुष की बुद्धि मात्र यन्त्र है। उसके माध्यम से परमात्मा ही निर्णय देता है, बोलता है इसलिए ब्राह्मण को परमात्मा का मुख कहा गया है।
नोट– भगवान सर्वांगीण पवित्र हैं; किन्तु उन प्रभु के अंगों में से कोई अंग-विशेष मनुष्य के हित में विशेष सहायक और पवित्र है तो चरण, लेकिन उसी चरण-स्थल पर उपजता है घृणाजनक शूद्र! कैसे सम्भव है? सुधीजन विचार करें।
वर्ण के सन्दर्भ में एक प्रचलित श्लोक गीता से मिलता-जुलता है; किन्तु स्मृतियों से रंगा मस्तिष्क वैसा नहीं समझ पाता।
जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते।
वेदाध्यायी भवेद् विप्र ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः।।
अर्थात् इस धरा-धाम पर जन्म लेनेवाला हर एक प्राणी शूद्र है। ‘संस्काराद् द्विज उच्यते’- जब संस्कार प्राप्त कर लेता है तो वह द्विज है। संस्कार का यह अर्थ नहीं है कि कुछ मन्त्र पढ़कर यज्ञोपवीत डाल लिया और हो गये संस्कारी। सः माने वह परमात्मा और उसका आंशिक प्रवाह आपके हृदय में आ जाता है; संचित की पर्त पर, मन के अन्तराल में उस परमात्मा का बीजारोपण हो जाता है तहाँ वह द्विज है। उसने द्वितीय जन्म प्राप्त किया है। एक प्रकार का जन्म गर्भवास है, जिसमें चराचर जगत् के प्राणी आ जाते हैं। इसके ठीक विपरीत आत्मा का अपना निर्मल और शाश्वत स्वरूप है, उसमें प्रवेश पा जाना दूसरे प्रकार का जन्म है। यद्यपि उसने अभी प्रवेश ही पाया है, आरम्भ ही किया है; किन्तु वह निश्चित ही स्वरूप पा जायेगा। श्रीकृष्ण कहते हैं कि, अर्जुन! इस निष्काम कर्मयोग में बीज का नाश नहीं होता। साधन शुरू भर कर दें, बीजारोपण मात्र कर दें फिर माया के पास ऐसा कोई यन्त्र नहीं है जो उस सत्य को मिटा दे। माया केवल कुछ अवरोध डाल सकती है, विलम्ब कर सकती है; किन्तु उतने से साधन को मिटा नहीं सकती।
इसलिए उस थोड़े से साधन के प्रभाव से हर जन्म में वह वही साधन करता है। जहाँ से छूटता है, वहीं से आरम्भ करता है। जन्म लेकर विषयों में उलझा होने पर भी पिछले जन्म में जहाँ से साधन छूटा था, उसके बुद्धिसंयोग को अनायास ही प्राप्त कर लेता है, चिन्तन करता है और दो-चार जन्म के हेरफेर के पश्चात् वहीं पहुँच जाता है जिसका नाम परमगति है, परमधाम है। इसलिए ‘संस्काराद् द्विज उच्यते’– सः माने वह परमात्मा, उसका आंशिक आकार जहाँ हृदय-देश में जागृत हुआ, बीजारोपण मात्र हो गया तहाँ वह द्विज है। उसने द्वितीय निर्मल जन्म प्राप्त किया। अब उसे मुक्त होना ही होना है।
‘वेदाध्यायी भवेद् विप्र’– चिन्तन और सूक्ष्म हुआ, तहाँ वह अव्यक्त प्रभु अपनी जानकारी प्रदान करने लगता है। जो तत्त्व विदित नहीं था वह विदित होने लगता है। वह परमात्मा अपनी अनुभूति देने लगता है, स्वयं को जताने लगता है। अनुभूति में इष्ट जैसा रास्ता बताते हैं, जो निर्देश देते हैं, उस निर्देश का जो अध्यायी है- भली प्रकार उसका अध्ययन कर, उस पर स्थिर रहकर जो चलता है, इष्ट के निर्देशन के अनुरूप चलने की क्षमता जिसमें आ जाती है वही वेदाध्यायी है, विप्र है। वह भली प्रकार ब्रह्म के परायण है। अब उसके आचरण में लेशमात्र भी त्रुटि नहीं है, वह विप्र है।
‘ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः’– उसी इष्ट के निर्देशन में चलते-चलते साधक जब मूल का स्पर्श प्राप्त कर लेता है, उसे विदित कर लेता है, वह ब्राह्मण है। इस प्रकार अत्रि-स्मृति केवल इतना बताती है कि यह पुरुष कैसे बनता है, वर्ण कैसे बनते हैं? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र का श्रेणी विभाजन नहीं है। लोक में नहीं है।
वास्तव में ये साधन-पथ के चार सोपान हैं। आरम्भ में निकृष्ट, मध्यम, उससे उन्नत होने पर उत्तम और अति उत्तम- इस प्रकार एक ही पथिक को इन चार सोपानों से गुजरकर उस शाश्वत-सनातन ब्रह्म में प्रवेश पाना होता है। यह साधन-पथ है, धर्माचरण है।
याज्ञवल्क्य-स्मृति का कहना है कि सभी प्राणी माता से समान रूप से जन्म लेते हैं। उनमें से जिनका उपनयन संस्कार कर दिया जाता है, वे द्विज हैं। आठ में ब्राह्मण, ग्यारहवें में क्षत्रिय, बारहवें में वैश्य का उपनयन होता है और जिनका संस्कार नहीं होता, वह शूद्र है। यदि मन्त्र पढ़ने से अथवा जनेऊ पहनने से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बनता है तो क्यों नहीं सबके लिए मन्त्र पढ़े गये। उपवीत धारण करते समय यह मन्त्र पढ़ा जाता है-
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।। (ब्रह्मोपनिषद्)
इस मन्त्र को पढ़ने से आठ वर्ष के बालक को क्या मिलता है? वास्तव में यह मन्त्र सामाजिक व्यवस्था थी, धर्म से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। उन दिनों इस संस्कार द्वारा बालक को विद्याध्ययन का अधिकार दिया जाता था। बारह वर्ष वाले को शस्त्र-संचालन और रक्षा विभाग में प्रवेश दिया जाता था। जिस प्रकार आज का कोई बच्चा नेवी में चला जाता है तो कोई किसी ट्रेनिंग में और विशेषज्ञ बनकर निकलता है।
आजकल ये व्यवस्थायें सरकार के हाथ में चली गयीं। अध्ययन-अध्यापन, धनोपार्जन-हेतु उद्योग और नौकरियाँ, रक्षा का दायित्व योग्यता और सामाजिक समानता पर आधारित हो चला है। राजा बदल गया, राजतन्त्र बदल गया और वह तरीका भी बदल गया कि केवल उपनयनवाला ही पढ़े। स्मृतियों में निषेध था कि शूद्र को पढ़ानेवाला, धर्म का उपदेश करनेवाला अन्धतामिस्र नरक में जायेगा। आज सभी पढ़ रहे हैं, पढ़ा रहे हैं।
बाह्य वर्ण महाराजा मनु ने बनाया और बल दिया कि वर्णों में रहने से मोक्ष मिलता है। मोक्ष के लिए घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं होती। यदि ऐसा ही था तब स्वयं महाराजा मनु ने उस कल्याण के लिए घर क्यों छोड़ा, नैमिषारण्य में जाकर तपरत क्यों हुए? उन्हें तो राज-धर्म और क्षत्रिय-धर्म का पालन करना चाहिए था।
प्राचीनकाल में शनैः-शनैः सभ्यता आयी। महाराजा मनु ने उसकी व्यवस्था की। कुछ लोगों को पढ़ने-लिखने और नियम बनाने के कार्य में नियुक्त किया, जो ब्राह्मण कहलाये। कुछ को शस्त्र-संचालन और सुरक्षा का भार दिया, वे क्षत्रिय कहलाये। कुछ को धन-सम्पत्ति संग्रह और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति में लगाया, जो वैश्य कहलाये और इन सब की सेवा में नियुक्त लोग शूद्र कहे गये। किन्तु आज महाराजा मनु और उनके अनुयायी चले गये। इस व्यवस्था को कार्यरूप देनेवाली स्टेटों का सन् १९५२ में उन्मूलन हो गया, सत्ता जनता के हाथ में आ गई।
व्यवस्था बदल गई, दण्ड-विधान बदल गया, पुराने कानून दफना दिये गये, कोई नाम भी नहीं लेता, नाम लेने से कुछ होनेवाला नहीं तब इन व्यवस्थाओं की क्यों दुहाई देते हैं? ये स्मृतियाँ समाज में अब कण्टक हैं, एक दरार हैं।
सौभाग्य की बात तो यह है कि इन स्मृतियों में लिखा है कि इसे किसी को मत दिखाना, कोई छूने न पाये। गर्भाधान से लेकर चिता तक का जिसे मन्त्र मालूम हो, वही इन्हें पढ़ने का अधिकारी है। उसे बता सकते हो क्योंकि उसे जरूरत है। वह यही सब करेगा। लाखों ब्राह्मणों में से दस-पन्द्रह इसके जानकार थे, शेष सभी तो उनके संकेतों पर चलते थे। इसलिए ब्राह्मण का कदापि दोष नहीं है। दोष तो कतिपय लोगों का था, जो राजा के बगल में बैठकर उपाधि मन्त्रीपद पाये हुए थे। लिखा है- राजा प्रातः उठकर ब्राह्मणों का पूजन करे और उनसे पूछकर हर कार्य करे। वास्तविक राजा तो वे थे। दोष तो उनका था, जिन्होंने धर्म की दुहाई देकर नरक का आतंक दिखाकर राजसत्ता के माध्यम से शत प्रतिशत निरक्षर जनता का मनमाना शोषण किया। स्मृतियों में सामाजिक व्यवस्था के अनेक उपयोगी सूत्र भी हैं किन्तु हमारा विनीत निवेदन है कि पूर्वजों की प्रत्येक उपयोगी-अनुपयोगी व्यवस्था को धरोहर मानकर रूढ़ि पालने का कोई उपयोग नहीं है।
यह जाति-पाँति, ऊँच-नीच, छूआछूत इत्यादि मनुष्य के अन्तःकरण में स्थित राग-द्वेष से उत्पन्न काम-क्रोध-मोह-अहंकार-दम्भ-द्वेष इन प्रकृतिजन्य विकारों की देन है। जगत् सदैव अपने को श्रेष्ठ घोषित करता आया है। भाई-भाई लड़ते आये हैं। यह गुटबन्दी अज्ञान और अविवेक की उपज है। पूरा विश्व काले-गोरे, लाल-पीले रंग को लेकर बँटा हुआ है। परस्पर दमन के लिए शस्त्रों की होड़ लगी है, शीतयुद्ध का वातावरण बना है। कभी यह जाति और जमीन को लेकर है तो कभी व्यवसाय और आकृति को लेकर है। होता जरूर है और होते भी रहेंगे; किन्तु इनका धर्म से सम्बन्ध नहीं है।
आज जातिवादी कौन नहीं है? जाति, सम्प्रदाय, भाषा और क्षेत्रीय संकीर्णताओं को आधार बनाकर चुनाव में टिकट दिया जाता है, उसी जाति के लोग चुनाव-प्रचार में भेजे जाते हैं, उन्हीं से प्रभावित होकर आप भी मत देते हैं। कर्मचारियों के चयन में भी जातिवाद से क्या आप अपरिचित हैं? बात कहने की नहीं, आचरण में ढालने की है। दोष हमारा-आपका है, जिसे हम-आप कभी सरकार की आरक्षण नीति में ढूँढ़ते हैं तो कभी उसके लिए धर्म को दोषी ठहराते हैं। वैसे शास्त्रों में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है कि भगवान ने कभी मनुष्यों को विभाजित किया हो; ऊँच-नीच, छूत अथवा अछूत बनाया हो।
गीता के अनुसार संसार भर में मनुष्य दो प्रकार के होते हैं- न चार प्रकार के, न तीन प्रकार के, न तेरह और न सवा लाख। मनुष्य केवल दो प्रकार के हैं- एक देवताओं-जैसा, दूसरा असुरों-जैसा। या तो वह नास्तिक होगा अथवा आस्तिक। परमात्मा की ओर अग्रसर होगा अथवा माया की ओर। प्रकृति में विश्वासवाला है तो असुरों-जैसा है और यदि परमतत्त्व परमात्मा के देवत्व के लिए प्रयत्नशील है तो देवताओं-जैसा है। संसार में यही दो जातियाँ हैं, जो अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियों आसुरी सम्पद् और दैवी सम्पद् पर आधारित हैं, जिनका उल्लेख गीता के सोलहवें अध्याय में है। उस कसौटी पर आपका एक सगा भाई असुर और दूसरा देवता हो सकता है। यही कारण था कि श्रीकृष्ण के कुछ सगे रिश्तेदार असुर थे। वे स्वयं देवता थे, परमात्म-तत्त्व में स्थित भगवान थे। योगशास्त्रों के अनुसार जाति का इतना ही स्वरूप है। बाहर न कोई जाति है और न बाँटने का तरीका ही है।
स्मृतियाँ व्यवस्था थीं, धर्म नहीं!
मनुष्य-मनुष्य के बीच भयंकर घृणा फैलाने का काम स्मृतियों ने किया है। जन्म पर आधारित जाति-प्रथा इन्हीं की देन है। सभी स्मृतियाँ महाभारतकाल के बाद की हैं और कुछ तो गौतम बुद्ध के पश्चात् लिखी गयीं। इनमें मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य और पाराशर-स्मृति अधिक प्रसिद्ध हैं। इतिहास के विद्वान् जानते हैं कि महाभारतकाल और आज के बीच न तो कोई मनु नामक राजा हुआ और न गौतम बुद्ध के पश्चात् याज्ञवल्क्य नामक ऋषि। वैदिक युग के आप्तपुरुषों के नाम पर इन स्मृतियों की रचना करके बीच के बुद्धिजीवी वर्ग-विशेष ने अपने अनुकूल परिस्थिति बना ली, प्रशासनिक व्यवस्था गढ़ ली और राजकीय संरक्षण में इसी जाति-व्यवस्था को धर्म के नाम पर प्रचार कराया। धर्म से इन स्मृतियों का कुछ भी लेना-देना नहीं है।
मनुस्मृति का कथन है कि प्रारम्भ में एक अण्डा था। उस अण्डे में जो प्राणी था, उसने अपने पराक्रम से अण्डे को फोड़ लिया। जो निकला, उसका नाम था ब्रह्मा। ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो भाग कर आधे से स्त्री, आधे से पुरुष बनाया और संसार के विकास के लिये मुख, बाहु, जंघा और चरण से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनाया। उस ब्रह्मा ने मनु को उत्पन्न किया। मनु ने दस महर्षियों को और उन महर्षियों ने सात मनुओं, देव-दानव, सुख-दुःख, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, जल-थल, जड़-चेतन जीवों को उत्पन्न किया। श्रीरामचरितमानस की कसौटी पर यह सब विधि-प्रपंच है- ‘बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।’ (१/५/४) ब्रह्मा ने अपनी सृष्टि के संचार के लिये इन वर्गों की रचना की। यह प्रपंच है, न कि कोई शाश्वत व्यवस्था। इस प्रपंच के किसी एक अंश की पूजा करने से क्या होगा? इस प्रपंच से हम बाहर कहाँ निकले, जबकि स्वयं ब्रह्मा भी अपने लोकसहित मरणधर्मा हैं।
लगे हाथ इन ब्रह्माजी की सृष्टि देखिये। दृषद्वती नदी से लेकर सरस्वती नदी के बीच का भू-भाग ब्रह्मावर्त कहलाया, जो आजकल कानपुर के पास बिठूर कहलाता है। मथुरा से लेकर तक्षशिला तक पांचाल प्रदेश ब्राह्मणों का पवित्र देश है। विन्ध्याचल से हिमालय की तलहटी तक मध्यदेश है और उसके दक्षिण म्लेच्छ देश है। इतने में ही जगत् की उत्पत्ति का वर्णन समाप्त हो गया। इन ब्रह्मा को इतना भी ज्ञात नहीं था कि हिमालय के पार चीन और जापान भी हैं, समुद्र में बड़े-बड़े द्वीप उभरे हैं। वास्तव में न किसी ब्रह्मा ने सृष्टि रची थी और न उस स्मृतिकार को भूगोल का ही ज्ञान था। जीव-जन्तुओं की रचना में भारतीय पशु-पक्षियों के नाम तो गिनाये गये हैं किन्तु कंगारू, जेबरा, जिराफ का नाम कहीं नहीं है और लिख मारा कि संक्षेप में सृष्टि का प्रकरण समाप्त हुआ।
इन ब्रह्माजी ने पवित्र-अपवित्र बताकर स्थान-स्थान में भूखण्डों में भेद तो डाला ही, उन्होंने यह भी बताया कि आपके शरीर का कौन-सा भाग शुद्ध है और कौन-सा अशुद्ध – नाभि से ऊपर शुद्ध और नीचे अशुद्ध। ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुआ था इसलिए वह सम्पूर्ण संसार का स्वामी है। शूद्र चरण से पैदा होने के कारण अपवित्र है, दास है। शूद्र का नाम घृणासूचक रहना चाहिए। शूद्र से बात करना पड़े तो दाहिना कान छूते रहें; क्योंकि ब्राह्मण के दाहिने कान में अग्नि, जल, वेद, सूर्य, चन्द्रमा, तीर्थ और गंगा-जैसी नदियाँ निवास करती हैं – यह पाराशर-स्मृति की खोज है। क्या बेवकूफी है। यह शुद्ध और अशुद्ध की कल्पना, ऊँच और नीच की कल्पना, स्वामी और दास की कल्पना, घृणा और द्वेष की कल्पना, मन्त्र पढ़कर शुद्ध होने की कल्पना इन्हीं स्मृतियों की देन है।
स्मृतियों की मान्यता है कि माता-पिता कामवश जो सन्तान उत्पन्न करते हैं वे पशु सदृश हैं; किन्तु वेदाध्यायी द्वारा गर्भाधान मन्त्र से संस्कारपूर्वक जो बच्चे पैदा होते हैं, वे द्विज हैं। विचार करना होगा कि कितने लोगों के पिता वेदाध्यायी रहे हैं। लिखा है कि संस्कार से बच्चे सुडौल होते हैं और देश हो गया गुलाम! कैसा सुडौल? ब्राह्मण होने का एक अन्य सूत्र भी स्मृतियों में मिलता है कि जो वेद पढ़ता है, वह ब्राह्मण है। वेद की एक शाखा मात्र पढ़ता है, वह भी ब्राह्मण ही है। सतयुग में मनुस्मृति प्रमाण थी और कलियुग के लिए पाराशर-स्मृति बनायी गई है। शूद्र इन स्मृतियों के पढ़ने का अधिकारी नहीं है और अन्त में यह भी लिख दिया कि स्मृति पढ़ने का और वेद पढ़ने का एक ही फल है। वेद पढ़ें या न पढ़ें, पाराशर-स्मृति ही पढ़ लीजिए तो आप वेद के ज्ञाता हो गये। कहाँ अपौरुषेय वेद परमात्मा की वाणी और कहाँ पाराशर-स्मृति, कलियुग के ऋषियों की लिखी किताब! यदि किताब पढ़ने से ब्राह्मण बनता है, तो सबको पढ़ाकर अपनी संख्या क्यों नहीं बढ़ा लेते? अब तो सौभाग्य से सबको पढ़ने का अधिकार भी मिल गया है। जब एक अध्याय वेद पढ़ने से ही ब्राह्मण होता है, तो सबको बना क्यों नहीं लेते? इन स्मृतिकारों को यह भी ज्ञात नहीं है कि युग कहीं बाहर नहीं होते, युगों का उतार-चढ़ाव गुणों के आधार पर अन्तःकरण में होता है-
बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। (मानस, ७/१०३/६)
हृदयँ राम माया के प्रेरे।। (मानस, ७/१०३/१)
मनुस्मृति का उल्लेख है कि यदि शूद्र द्विजातियों को क्रूर वचन कहे तो उसे जिह्वोच्छेदन का दण्ड देना चाहिए। जलती हुई दस अंगुल की लौह सलाख उसके मुँह में डाल देनी चाहिये; क्योंकि उसकी उत्पत्ति जघन्य स्थान से हुई है। यदि शूद्र किसी ब्राह्मण को धर्म का उपदेश करे, तो राजा उसके मुँह और कान में खौलता हुआ तेल डलवा दे। यदि उच्चवर्णों के साथ बैठना चाहे, तो उसके चूतड़ का मांस कतरवा ले।
यदि चाण्डाल रात को घर में रह गया हो, तो प्रातः घर में से खाद्य-सामग्री निकालकर घर में आग लगा देनी चाहिए, फिर वहाँ पर लिपाई करके ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए और बीस गाय दान देनी चाहिए, तभी आप शुद्ध होंगे अन्यथा कुम्भीपाक नरक में जाएँगे। घर तो आपने फुँकवा ही दिया, खाद्य-सामग्री दूसरे दिन खा गये, बीस गायें दान में भी ले ली- अब उस गरीब के पास बचा क्या? शूद्र इतना त्याज्य है; किन्तु उसके यहाँ का दूध, घी, अन्न, मधु और सुन्दर स्त्री ग्राह्य है- ‘स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि’।
भोजन करते ब्राह्मण को कुत्ता अथवा शूद्र देख भर ले तो वह भोजन राक्षस खा जाते हैं। खिलानेवाला भी नरक में जाता है। शूद्र को जूठा अन्न, पुराना वस्त्र, सारहीन अन्न, पुराना ओढ़ना और बिछौना देना चाहिए। यदि वह वेद के एक वाक्य पर भी विचार करता है तो विचारमात्र से अन्ध-कुम्भीपाक नरक में जायेगा। न कभी कायदे से खाने दिया और न पहनने दिया। भगवान से भी उन्हें वंचित रखा इन स्मृतियों ने।
इसी कट्टरता की देन है कि केरल चला गया ईसाइयों के हाथ में – दस प्रतिशत सवर्ण बचे हैं वहाँ और अपनी सम्पत्ति कौड़ियों के भाव बेचकर बम्बई की ओर भाग रहे हैं। कोल-भील जंगली जातियाँ ईसाई बन रही हैं, क्योंकि आप उन्हें अछूत कहकर भगा रहे हैं और वे गले लगा रहे हैं। छूने और खाने से आपका धर्म नष्ट हो जाता है लेकिन जब कोई शूद्र ईसाई बनकर लौटता है तो आप उसे साहब-साहब कहते हैं, कुर्सी पर बैठाते हैं, छिपकर आहे भरते हैं और दुहाई भी देते हैं कि धर्म-परिवर्तन हो रहा है।
स्मृतियों की व्यवस्था दी थी ऋषियों ने। मनुस्मृति के अनुसार, ‘जो उपनयन संस्कार के पश्चात् २५ वर्ष की आयु तक गुरुकुल में निवास कर लेता है, वह ऋषि है और उस ऋषि को चाहिए कि विवाह करे।’- भूल जाइए कि ऋषि अत्रि, दुर्वासा और चन्द्रमा-जैसे जितेन्द्रिय होते थे। एक विद्यार्थी जिसने अभी-अभी आचार्य की डिग्री ली, वही ऋषि है।- प्राचीन ऋषियों के स्थान पर कृत्रिम ऋषि पैदा हो गये। आज स्थान-स्थान पर गुरुकुल खुले हुए हैं, वहाँ कोई संस्कृत पढ़ने नहीं जाता। क्यों नहीं सभी अपने बच्चों को ऋषि बना लेते!
और गुरु कौन है? मनुस्मृति के अनुसार जो गर्भाधान से लेकर चिता तक का कृत्य करता है, उसे गुरु कहते हैं। गुरु मर जाय तो गुरु-पत्नी में गुरुभाव रखो, वह भी मर जाय तो गुरु के भाइयों में और उनके पश्चात् गुरु के लड़कों में गुरुभाव रखो जिससे ब्रह्मधाम की प्राप्ति होती है। इस प्रकार मात्र पेट को लेकर नयी परिभाषायें गढ़नेवाली स्मृतियाँ शाश्वत उस सनातन-धर्म के अनुयायियों के विनाश का कारण बन गईं, भ्रम का सृजन कर गयीं। भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के समय साथ में आनेवाले इतिहासकार मेगस्थनीज ने लिखा है कि क्षत्रिय लड़ रहे थे और बगल में ही किसान अपना खेत जोत रहे थे। लोग अपने धन्धे में लगे थे; क्योंकि स्मृतियों में लिखा है कि शस्त्र केवल क्षत्रिय ही उठायेगा। हाँ, दान में प्राप्त हुए वस्तु पर आपत्ति आती हो तो ब्राह्मण शस्त्र भी उठा सकता है। ब्राह्मण सेना के पीछे रहकर स्वस्तिवाचन करते थे और युद्ध में प्रस्थान करनेवाले राजाओं से प्रचुर दान-दक्षिणा करा लेते थे। लिखा है कि राजा सारा खजाना ब्राह्मणों को दान कर, पुत्र को राज्य देकर युद्ध के लिये प्रस्थान करे। यह स्मृतियाँ भारत की गुलामी और मानव-मानव में घृणा का कारण बनीं। लिखा है कि सबसे नीच है कसाई, दस कसाई के बराबर एक तेली होता है, जबकि तेली कोई पाप नहीं करता। गेहूँ, चना पीसना और सरसों पेरना वनस्पति का एक प्रयोग जैसा है; किन्तु तेल को बहते देखकर उन्हें लगा कि सरसों रोता है। दस तेली के बराबर एक कलवार होता है जो इसी प्रकार मदिरा बनाता है, दस कलवार के बराबर एक वैश्योपजीवी होता है और दस वैश्योपजीवियों के बराबर एक राजा होता है। इस प्रकार राजा सबसे नीच होता है। यदि ऐसा ही था तो मनुस्मृतिकार ऋषियों ने राजा मनु की पूजा क्यों की? वास्तव में यदि कोई मनु रहा होता, तो ऐसा लिखनेवाले को जीवित न छोड़ता। इनका मनु तो कथा का एक पात्र है, जैसे- कालिदास का मेघदूत। सौ वर्ष के क्षत्रिय और दस वर्ष के ब्राह्मण में भी ब्राह्मण पिता और क्षत्रिय पुत्र है।
लिखा है कि अग्नि में किये जानेवाले हवन की अपेक्षा ब्राह्मण के मुँह में किया गया हवन श्रेष्ठ है। श्राद्ध में भोजन करनेवाला अन्धा ९० सद्ब्राह्मणों को, काना ६० ब्राह्मणों को, फूलवाला १०० ब्राह्मणों को और पाप रोगी दाता के एक हजार ब्राह्मणों को खिलाने का फल नाश करता है। विकलांगों के प्रति यह दृष्टिकोण मानवता का अपमान है।
किसका अन्न खाया जाय और किसका नहीं? इस पर लिखते हैं- सूद लेते वैश्य, लुहार, कारीगर, कलपुर्जे बनानेवाले का अन्न अर्थात् आज की भाषा में बैंक कर्मचारियों, डॉक्टर और इंजीनियरों का अन्न, वेतन लेकर शिक्षा देनेवालों का अन्न, नगर में मिलनेवाला अन्न, न बेचनेवाले का अन्न, नट-दर्जी-केवट-सुनार और नपुंसक का अन्न अर्थात् आज के परिवेश में परिवार नियोजन करानेवालों का अन्न और कुत्ता पालनेवालों का अन्न नहीं खाना चाहिए। हाँ, कुत्ता हिरण पकड़कर लाता हो तो उसमें कोई दोष नहीं है। राजा और राज्य कर्मचारियों का अन्न तेज को, सुनार का अन्न आयु को और चमार का अन्न यश को नष्ट करता है। चिकित्सक का अन्न पीव, व्यभिचारी का अन्न वीर्य, सूद लेनेवाले का अन्न विष्टा, शस्त्र बेचनेवाले का अन्न मल के समान होता है। इनका अन्न खा लेने पर सात दिन तक गो-मूत्र में पके जौ पर निर्वाह करने से शुद्धि होती है। आदमी-आदमी में अन्तर डालना और फूट डालकर राज्य करना इन्हीं व्यवस्थाकारों की देन है।
इन स्मृतियों में लहसुन, प्याज, गाजर, सूरन, टमाटर, मूली, हींग, गोंद इत्यादि खाने का तो निषेध है; किन्तु देव-पितृ कार्यों में पशु-पक्षियों को मन्त्र पढ़कर काटना चाहिए। और मन्त्र कौन पढ़ेगा? लिखा है, ब्राह्मण द्वारा शूद्रकन्या से उत्पन्न संतान का संस्कार कर देने से नापित (नाई) बन जाती है। प्रत्येक मांगलिक अवसरों पर ब्राह्मण के साथ नाई की उपस्थिति इसी दुरभिसन्धि का परिणाम है। शूद्रों में उनका अन्न भक्षणीय बताया गया है।
दक्षिणा कितनी दें? लिखा है, यज्ञ में थोड़ी दक्षिणा देने से इन्द्रिय, यश, स्वर्ग, आयु और पशुओं का नाश हो जाता है। ब्राह्मण का धन चुरानेवाला स्वयं मूसल लेकर अपने वध के लिये राजा से निवेदन करे। यह मात्र जीने-खाने की व्यवस्था थी, धर्म नहीं। लिखा है- ब्राह्मण किसी भी जाति की कन्या से विवाह कर सकता है; किन्तु यदि शूद्र ब्राह्मणी रख ले तो उसे स्वयं अपना लिंग और अण्डकोष अपने हाथ में लेकर नैर्ऋत्य दिशा में हाथ कर तब तक चलना चाहिए जब तक वह मर न जाय। यह मात्र सुरक्षा-व्यवस्था है।
वैसे तो ब्राह्मण को तिनके से भी न मारने का विधान है; किन्तु भूल से किसी ने मार दिया तो उसका पाप दूर कैसे हो? इसके लिए उसको जलती हुई अग्नि में सिर नीचे करके तीन बार कूदना चाहिए। राजा अन्य जातियों को प्राणदण्ड दे सकता है, किन्तु सिर मुड़ाना ही ब्राह्मण के लिए प्राणदण्ड है। प्रत्येक प्रकार का पाप करनेवाले को भी दण्ड न दें, क्योंकि ब्राह्मण स्वयं अपनी तपस्या और मन्त्रों से शुद्ध होता है।
दोष उन व्यवस्थाकारों का भी नहीं है, जिन्होंने अपने युग-जमाने के लिए इन कानूनों की संरचना की। दोष तो हमारा-आपका है जो आज भी इसे मानते हैं। सचाई तो यह है कि इन्हें न मानते हुए भी मानने का खोखला दावा करते हैं। उन्हें गाली देने की अपेक्षा अपने को सुधारना अधिक उपयोगी होगा।
हाँ, यह बात अलग है कि हम बिजली बनाते हैं तो लाईन मैन, लोहा ठोकते हैं तो लोहार, सोना गढ़ते हैं तो सुनार- यह कोई जाति नहीं, व्यवसाय के नाम हैं। इस प्रकार के वर्गीकरण सदैव होते रहे और होते रहेंगे; लेकिन भगवत्-पथ में न कोई जाति है और न सम्प्रदाय। ‘अपि चेत् सुदुराचारो’ (गीता, ९/३०)- अत्यन्त दुराचारी भी इस कर्म का सच्चा अधिकारी है। अस्तु, यदि छुआछूत, ऊँच-नीच, जाति और सम्प्रदाय है तो वह धर्म नहीं और इनको माननेवाला अभी धर्मी नहीं है। परमात्मा एक है और उसकी एक-जैसी अनुभूति सबके लिए है। उसकी अनुभूति पा लेनेवाला महात्मा समाज में कभी दरार नहीं डाल सकता। केवल अधूरी जानकारी और नासमझी के कारण लोग ऐसा समझते और करते हैं।
।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय।।
(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)