गुरुपूर्णिमा
गुरुपूर्णिमा साल भर में एक बार आती है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा कहते हैं। यह गुरु और शिष्य के मध्य बहुत ही पावन पर्व है। गुरु महाराज से शिक्षा लेकर दूर-दराज भजन चिन्तन रत साधक तथा पास में रहते हुए सभी साधकों और भक्तों के लिये यह पर्व बहुत ही महत्वपूर्ण है।
केवल प्रसाद पाना गुरुपूर्णिमा नहीं है। गुरुपूर्णिमा इसलिये मनाई जाती है कि गुरु का गुरुत्व शिष्यों में पूर्ण हो जाय। वर्षभर में कितनी प्रगति हुई, कितनी भूलें हुईं–उन सबका परिमार्जन गुरु महाराज के समक्ष हो जाय, साधना का पथ प्रशस्त हो जाय, साधना में तथा गुरु महाराज के प्रति मन में श्रद्धा की जो कमी आयी है, उस कमी की पूर्ति हो जाय। इसलिये गुरुपूर्णिमा का यह पर्व वर्ष भर में हुई कमी को दूर करता है।
साधक को प्राप्त अनुभवों का सूत्र तथा जो साधनात्मक प्रश्न बनते हैं, उनका समाधान प्राप्त करना तथा गुरु महाराज के दर्शन और पूजन के बाद उनसे प्राप्त निर्देशों का पालन करना, पुन: साधना में तत्पर होना, गुरु महाराज से आशीर्वाद प्राप्त करना गुरु पूर्णिमा में मिलनेवाली वस्तुयें हैं।
‘गु’ कहते हैं अंधकार को, ‘रु’ कहते हैं प्रकाश को। जो हमें अंधकार अर्थात् मोह से (संसार से) प्रकाश अर्थात् परमात्मा की ओर ले चलें, वह गुरु कहलाते हैं। ‘नास्ति तत्वं गुरो: परं‘–गुरु से अधिक कोई परम तत्व नहीं है। जो अविनाशी तत्व है, जिसका कभी विनाश नहीं होता, जो परम तत्व परमात्मा है वही परम गुरु है। जिसने उस परम तत्व परमात्मा की प्राप्ति कर ली, वही परम गुरु है। उसने अपने हृदय में उस गुरुत्व को प्राप्त कर लिया जो सबका मूल तत्त्व है, सत्य है, परमात्मा है। इसलिये सद्गुरु एक स्थिति है, जिनकी संसार भर में पूजा की जाती है।
— शिव आदि गुरु हैं–
तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना।।
भगवान् शिव आदि योगेश्वर हैं। देवर्षि नारद, महर्षि लोमश, भरद्वाज, याज्ञवल्क्य सबके गुरु भगवान् शंकर ही थे। शंकर आदि सद्गुरु थे। उन आदि योगेश्वर सदगुरु भगवान शिव के प्रति श्रद्धा निवेदन से ही गुरुपूर्णिमा की परम्परा का प्रादुर्भाव है। भगवान् श्रीकृष्ण, नारद सब सद्गुरु की स्थिति वाले महापुरुष थे।
गोस्वामी तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस में कहते हैं–
भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्त:स्थमीश्वरम्।।
मैं भवानी और शंकर की वन्दना करता हूँ जो श्रद्धा और विश्वास के रूप हैं। हमें उनमें श्रद्धा करनी है, उनमें विश्वास लाना है। उनके बिना सिद्धजन भी हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं जान पाते।
तुलसीदास जी का ईश्वर हृदय में वास करता है, बाहर नहीं। साधारण लोगों की कौन कहे, भजन इतना उन्नत हुआ कि सिद्धस्तर तक पहुँच गये– ऐसे सिद्धजन भी भवानी-शंकर की कृपा के बिना हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं पहचान पाते अर्थात् ईश्वर-प्राप्ति का उपाय शंकर और पार्वती में प्रीति है। अब हम उन्हें कहाँ पायें कि उनसे प्रीति करें और ईश्वर हृदय में मिले? अगले ही श्लोक में कहते हैं–
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्र: सर्वत्र वन्द्यते।।
‘गुरुं शंकररूपिणम्’– सद्गुरु शंकरस्वरूप हैं। उनके चरण-कमलों की मैं वन्दना करता हूँ जिनके आश्रित हो जाने पर टेढ़ा चन्द्रमा भी सीधा, परम कल्याणकारी फल देने वाला हो जाता है। ‘चन्द्रमा मनसो जात:’ (पुरुषसूक्त), ‘मन ससि चित्त महान’– मन ही चन्द्रमा है। यह टेढ़ा है। यह कभी काम में, कभी क्रोध में, विविध मोह में, राग-द्वेष में जहाँ-तहाँ छलाँगें भरता ही रहता है। ईश्वर का निवास-स्थल होकर भी यह मल-आवरण-विक्षेप से ढँका हुआ है। सद्गुरु के आश्रय से यह टेढ़ा चन्द्रमा, टेढ़ा चित्त भी परम कल्याणकारी फल देने वाला हो जाता है क्योंकि मन जिस प्रकार सीधा होता है, उस विधि को सद्गुरु बता देते हैं और उस पर चला भी देते हैं। सद्गुरु ही शंकर हैं।
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला।।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला।।
भगवान् शिव के गणों ने अपने गुरुदेव का शृंगार किया – सर्प पहना दिया, चन्द्रमा जटा में लगा दिया, विभूति लगा दिया, बाघम्बर पहना दिया, खोपड़ी लटका दिया। वह आदिकाल था, कहाँ पावें बढ़िया-बढ़िया चीज। बढ़िया-बढ़िया चीजें भी थीं लेकिन यह त्यागवृत्ति गुरु का सर्वोपरि शृंगार है। कुछ भी हो जाय, त्याग से अलग कभी नहीं होना चाहिए अन्यथा अगली पीढ़ी पर गलत प्रभाव पड़ेगा, सब नष्ट हो जायेंगे। इसलिये भोलेनाथ का शृंगार वैसा ही होता रहा, जैसा एक संत का होना चाहिए। टीप-टाप गृहस्थ, उलूल-जुलूल फकीर!
— व्यास पूर्णिमा–
वेदव्यास से पूर्व श्रुतज्ञान की परम्परा थी। उस परम्परा को लेखन से जोड़ते हुए लौकिक, पारलौकिक ज्ञान को महर्षि वेदव्यास ने लिपिबद्ध किया, पुस्तक का आकार दिया। पहले कानों से सुनो और स्मरण रखो, यही थी श्रुति और यही थी स्मृति। इसे व्यासजी ने लिपिबद्ध कर दिया। पुस्तकों की पूर्णता पर शिष्यों ने गुरुदेव की पूजा की थी तभी से गुरुपूर्णिमा प्रचलन में आई। इसलिए इसका नाम व्यास पूर्णिमा भी है।
वेदव्यास ने निर्णय दिया– जो कुछ हमने लिखा है, उनमें शास्त्र कौन?
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रसंग्रहै:।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि:सृता।।
गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है, पद्मनाभ भगवान के श्रीमुख से नि:सृत वाणी है; ‘किमन्यै: शास्त्रसंग्रहै’– फिर अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता? अर्थात् आपका धर्मशास्त्र आदिकाल से गीता ही रही है।
एक अन्य श्लोक में है कि–
एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम्
एको देवो देवकीपुत्र एव।
एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।।
संसार में केवल एक ही शास्त्र है – देवकीपुत्र भगवान् श्रीकृष्ण ने जो श्रीमुख से गायन किया – गीता। उस गीता में क्या सत्य बता दिया? तो आत्मा। उस परमात्मा को हम कैसे पुकारें? तो ओम्। अर्जुन! ओम् का जप कर और मेरे स्वरूप का ध्यान धर।
हम पूजा किसकी करें? परमदेव कौन? एकमात्र परमात्मा। उन्हें हम कैसे पुकारें? तो मंत्र एक ही है – ओम्। ओम् का जप कर, मेरा ध्यान धर। दुर्लभ मानव तन मिला है तो आपका कर्तव्य-पथ एक ही है– ‘कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा’– गीता में वर्णित उस परमदेव परमात्मा की सेवा। बस उनका सेवन करो।
परमतत्व, परमात्मा और सद्गुरु पर्यायवाची हैं। सद्गुरु सदैव स्थूल शरीर के आधार वाले होते हैं किन्तु सामान्यजन उन्हें पहचान नहीं पाते। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं–
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।। (गीता, ९/११)
सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वररूप मेरे परमभाव को न जाननेवाले मूढ़लोग मुझे मनुष्य-शरीर के आधारवाला और तुच्छ समझते हैं। सम्पूर्ण प्राणियों के ईश्वरों का भी जो महान् ईश्वर है, उस परम भाव में मैं स्थित हूँ; किन्तु हूँ मनुष्य-शरीरधारी। मूढ़ लोग इसे नहीं जानते। वे मुझे मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। उनका दोष भी क्या है? जब वे दृष्टिपात् करते हैं तो महापुरुष का शरीर ही तो दिखायी पड़ता है।
कैसे वे समझें कि आप महान् ईश्वरभाव में स्थित हैं? वे क्यों नहीं देख पाते?–इस पर कहते हैं–
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतस:।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता:।। (गीता ९/१२)
वे वृथा आशा (जो कभी पूर्ण न हो ऐसी आशा), वृथा कर्म (बन्धनकारी कर्म), वृथा ज्ञान (जो वस्तुत: अज्ञान है), ‘विचेतस:’– विशेष रूप से अचेत हुए, राक्षसों और असुरों के-से मोहित करनेवाले स्वभाव को धारण किये होते हैं अर्थात् आसुरी स्वभाववाले होते हैं इसलिये मनुष्य समझते हैं। असुर और राक्षस मन का एक स्वभाव है, न कि कोई जाति या योनि। आसुरी स्वभाववाले मुझे नहीं जान पाते; किन्तु महात्माजन मुझे जानते और भजते हैं–
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते।। (गीता १०/३)
जो मुझ जन्म-मृत्यु से रहित, आदि-अन्त से रहित, सब लोकों के महान् ईश्वर को साक्षात्कारसहित विदित कर लेता है, वह पुरुष मरणधर्मा मनुष्यों में ज्ञानवान है अर्थात् अज, अनादि और सर्वलोकमहेश्वर को भली प्रकार जानना ही ज्ञान है और ऐसा जाननेवाला सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है, पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह उपलब्धि भी मेरी ही देन है। मैं परम का स्पर्श करके परम भाव में स्थित परमात्मस्वरूप हूँ। मैं अव्यक्त स्वरूप हूँ, शरीर के आधार वाला हूँ। अनन्तकाल से जो महापुरुष होते आये हैं, शरीर के आधार वाले ही हुए हैं।
कबीरदास जी कहते हैं– ‘अवधू जीवत में कर आसा’– जीते जी आप उम्मीद करो। ‘मुए मुक्ति गुरु कहे स्वार्थी झूठा दे बिस्वासा।’– मरने के बाद मुक्ति मिलेगी, ऐसा करो-वैसा करो, तो गुरु जी का कोई स्वार्थ अटका है। ये झूठा विश्वास दिलाते हैं। यह सम्भव नहीं है। जब कभी गुरु के गुरुत्व की स्थिति मिली है तो जीवन-काल में। आदि शंकराचार्य को अठारह वर्ष की आयु में गुरु का गुरुत्व प्राप्त हुआ, उन्हें स्थिति मिल गयी, शिवतत्त्व में स्थिति मिल गयी। पूछा गया कि पूजनीय कौन? आदि शंकराचार्य ने कहा– ‘शिवतत्त्वनिष्ठ:’– जो शिवतत्त्व में स्थित है वह महापुरुष। शंकराचार्य ने अपना स्वरूप बताया तो कहा– ‘शिवो केवलोऽहम्’– मैं शिवस्वरूप हूँ अर्थात् यह स्थिति सबके लिए सुलभ है।
भगवान् श्रीकृष्ण भवप्रत्यय योगी के रूप में थे। तीन दिन की साधना शेष रह गयी थी। इस जन्म में तीन दिन ध्यानस्थ रहे और स्थिति पा गये। उल्लेख आता है भागवत में कि पिछले दस जन्म से वे लगातार साधु रहे। एक जन्म में तो आयुपर्यन्त मौन रहे। ‘यत्र सायं गृह मुनि’ के रूप में भ्रमण करते थे। जहाँ शाम तहाँ घर।
‘‘इस तरीके से दसवें इस जन्म में साक्षात् परब्रह्म परमात्मा आपके साथ हैं। राजन्! विजय आपकी होगी, आप शोक मत करें। ऐसा देवर्षि नारद से सुना है।’’–अर्जुन ने युधिष्ठिर को सांत्वना देते हुए कहा। ये वनवास काल का प्रथम दिवस था। तो भगवान् श्रीकृष्ण एक महायोगेश्वर – स्थूल शरीर के आधार वाले…।
‘गुरुं शंकररूपिणम्’- शंकर महापुरुषों की एक स्थिति है। पूर्ण महापुरुष शिवस्वरूप हैं। ‘शंका अरि: स शंकर’– वे शंकाओं से मुक्त हैं, निर्लेप हैं इसलिए शंकर हैं।
महर्षि की स्थिति से पूर्व बाल्मीकि का मन कितना टेढ़ा था! सन्त सद्गुरु का सान्निध्य मिला तो ‘उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भये ब्रह्म समाना।।’ ब्रह्म की समानान्तर स्थिति वाले हो गये। अंगुलिमाल आरम्भिक जीवन में अत्यन्त क्रूर, दुर्दान्त दस्यु थे। एक महापुरुष का दर्शन हुआ, उनके प्रति समर्पण हुआ, जहाँ उस पथ पर दो कदम रखा, जीवन-काल में ही अरिहन्त पद को प्राप्त कर लिया। शरीर तो रहने का एक मकान मात्र है। इसमें यदि कुछ सीधापन-टेढ़ापन है, मन की वृत्तियों का है। वही मन सीधा हो जाता है जब सद्गुरु के आश्रित हो जाता है।
शंभु अर्थात् स्वयंभू = जो स्वयम् की स्थिति वाला है। शिव प्रकृति की सीमाओं से अतीत है इसीलिए उसे शिव कहते हैं–
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।।
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी।।
पुण्यात्मा शंकर जी के शरीर में जो निर्मल विभूति है, इन गुरु महाराज के ही चरणों की उपज है। शंकर जी में अनेकों विमल विभूतियाँ हैं, जैसे– वह आशुतोष, अवढरदानी हैं। ‘कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी।।’–उनके नाम के बल से शंकर जी स्वरूप से मुक्ति प्रदान कर देते हैं। वे भूतनाथ हैं – सभी जीवों के स्वामी। ये सभी विभूतियाँ गुरु महाराज के चरण रज की ही देन हैं।
शंकर तो पाप और पुण्य से परे होता है फिर पुण्यात्मा शंकर कैसा? सुकृति शंभु कैसा? वास्तव में कोई भी पुण्य और पाप से अतीत शिवतत्त्व में स्थित हुआ, किन्तु आरम्भ में तो वह साधक ही था। कोई पुण्यात्मा साधक ही गुरु महाराज के चरण रज का आश्रय लेकर, उनको हृदय में धारण कर शिवतत्त्व की स्थिति तय कर लेता है और उस निर्मल विभूति से संयुक्त हो जाता है। शिव एक स्थिति है।
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती।।
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू।।
श्री गुरु महाराज के चरण-नखों की ज्योति मणि और माणिक्य के तुल्य है। इसका स्मरण करने से हृदय में दिव्यदृष्टि का संचार होता है। साथ ही वे लोग बड़े भाग्यशाली हैं जिनके हृदय में गुरु महाराज के चरण आ जायँ।
मान लें, किसी ने श्रद्धापूर्वक स्मरण किया और हृदय में चरण आ ही गये तो उससे लाभ क्या? तो–
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।।
हृदय के निर्मल नेत्र खुल जायेंगे और ‘भव रजनी’ अर्थात् जन्म-मृत्यु के दोष और दु:ख मिट जायेंगे। इस प्रकार ध्यान गुरु महाराज के चरणों का ही करना है। उससे ‘सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।’– रामचरितमानस के प्रति सूझ पैदा हो जाती है। ‘गुपुत’– जो लिखने में नहीं आया और ‘प्रगट’- जो लिखने में आ गया; ‘जो जेहि खानिक’– जहाँ जो जिस स्थान में है अर्थात् परमात्मा के अन्तराल में जो विभूतियाँ छिपी हैं, वह सब विदित हो जायेंगी। कब? जब गुरु महाराज का चरण आपके हृदय में आ जायेगा। अर्थात् ध्यान सद्गुरु का और विदित होती हैं परमात्मा की विभूतियाँ, परमात्मा का स्वरूप; ब्रह्म की गहराइयों का हाल सूझेगा, रामचरितमानस के प्रति सूझ पैदा हो जायेगी।
वस्तुत: शास्त्र कोई विरला महापुरुष जानता है, यह उनके हृदय की वस्तु है और उनके निर्देशन में कोई विरला अधिकारी ही पढ़ता है। सब न पढ़ते हैं, न जानते हैं। शंकर महापुरुषों का सम्बोधन है इसीलिए महापुरुषों ने शंकर की बहुत महिमा का वर्णन किया है। रामचरितमानस में शिव अर्थात् सदगुरु की महिमा का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं–
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।।
सत्-रज-तम – त्रिगुणमयी प्रकृति के ये तीन नगर हैं, तीन पुर हैं। इनका अन्त करने वाला त्रिपुरारि है अर्थात् त्रिगुणातीत, स्वरूपस्थ महापुरुष! यदि वह कृपा न करें तो मेरी भक्ति कोई नहीं पा सकता।
सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई।।
सेवा शिव की करें, भक्ति राम की मिलेगी। और भी है–
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।।
बिना छल, मन-वचन और कर्म से निश्छल होकर ‘बिस्वनाथ’- विश्व के जो नाथ हैं (स्वामी हैं, गुलाम नहीं) उनके चरण-कमलों में प्रीति– ‘राम भगत कर लच्छन एहू’–यह रामभक्त के लक्षण हैं। ध्यान धरा हमने शिव के चरणों का, और भक्ति पूरी हो गयी राम जी की, कितना विचित्र है! भोजन आप करें और पेट हमारा भर जाय! किन्तु अध्यात्म में ठीक ऐसा ही है–
संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।
शंकाओं से जो मुक्त हैं, शिवतत्त्व में स्थित सद्गुरु महापुरुष से विमुख होकर मेरी भक्ति चाहता है वह मूढ़ है, नरकगामी है। उसकी बुद्धि अत्यन्त अल्प है।
परमात्मा राम ने एक बार सभा बुलाई। उस विशाल जनसभा में भगवान ने कहा कि आप सबसे एक अत्यन्त गोपनीय रहस्य का उद्घाटन करने जा रहा हूँ, हाथ जोड़कर कह रहा हूँ! परम ब्रह्म परमात्मा को हाथ जोड़ने की क्या आवश्यकता थी? अनुरोध इसलिए कि जीवमात्र के लिए उनकी करुणा है। जो बात वह कहने जा रहे हैं, गले के नीचे उतरने वाली नहीं है।
गुरु को जब हम-आप देखते हैं तो उनका शरीर ही तो दृष्टिगोचर होता है। ‘वे शिवस्वरूप में स्थित महापुरुष हैं’–यह हठात् समझ में नहीं आता जब तक प्रभु करुणा कर समझा न दें। भले तत्काल समझ में न आये, देर से समझ में आये किन्तु सत्य यही है इसलिए विनय के साथ कह रहे हैं कि–
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर, भगति न पावइ मोरि।।
शिवस्वरूप महापुरुष के बिना कोई मेरी भक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। यदि परमात्मा को प्राप्त करना है तो ध्यान सद्गुरु के चरणों का ही करना होगा।
बहुत से लोग केवल गुरु-गुरु जपते हैं कि जब सब गुरु ही हैं तो भगवान की क्या आवश्यकता? हो गया भजन! कुछ लोग गुरु के चरणों का ध्यान नहीं धरते, कहते हैं– हमारे गुरु तो सीधे भगवान ही हैं। किन्तु इन दोनों मान्यताओं का खण्डन करते हुए परमात्मा श्री राम कहते हैं–
संकर प्रिय मम द्रोही, सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहिं कलप भरि, घोर नरक महुँ बास।।
भगवान शंकर का तो प्यारा है, सद्गुरु के ऊपर निर्भर है लेकिन ‘मम द्रोही’– परमात्मा को नहीं चाहता, उनका सुमिरन नहीं करता; अथवा परमात्मा का प्रेमी हो गया और शिव का द्रोही है कि परमात्मा ही गुरु हैं, हमें गुरु की क्या आवश्यकता? ‘ते नर करहिं कलप भरि, घोर नरक महुँ बास।’– ऐसे लोग एक कल्प अर्थात् एक जन्म तक घोर नरक में वास करेंगे। इसके पश्चात् वह रास्ते पर ही आयेंगे क्योंकि ईश्वर-पथ में कभी बीज का नाश नहीं होता। यदि एक बार क्रिया जाग्रत हो गयी, इस पथ को समझकर आपने दस कदम रख दिया, अगले जन्म में वहीं से साधन आरम्भ करेंगे जहाँ से साधन छूटा था। माया में ऐसा कोई यन्त्र नहीं है जो इस सत्य को मिटा दे। माया केवल विलम्ब कर सकती है इसलिए वह एक कल्प अवश्य भोगेगा! इसलिए ध्यान सद्गुरु के चरणों का और उसके द्वारा परमात्मा की प्राप्ति का विधान है। सतत् सुमिरन बना रहना चाहिए, प्रभु से प्रार्थना बनी रहे।
पंचवटी में लक्ष्मण ने परमात्मा राम से पूछा कि प्रभो! माया क्या है? ब्रह्म क्या है? ज्ञान-वैराग्य क्या है और सुख का मूल क्या है? भगवान राम ने कहा–
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो सन्त होइँ अनुकूला।।
लक्ष्मण! अनुपम सुख की मूल तो भक्ति है। लक्ष्मण ने कहा– तो प्रभो प्रदान करें! राम ने कहा– नहीं लक्ष्मण! इसे सीधे तो मैं भी नहीं दे सकता। ‘मिलइ जो सन्त होइँ अनुकूला।’– वह भक्ति तभी मिलेगी जब कोई सन्त अनुकूल हो। उधर शंकर बिना कोई भक्ति नहीं पा सकता और यहाँ कहते हैं– सन्त बिना कोई पा नहीं सकता, स्वयं मैं भी नहीं दे सकता। अत: ईश्वर-पथ में ध्यान सद्गुरु के स्वरूप का ही करना चाहिए।
सन्त भक्तों में मीराबाई के पश्चात् सहजो बाई एक प्रख्यात संत हुई हैं, उनका भजन है–
हरि ने जनम दियो जग माहीं, गुरु ने आवागमन छुटाहीं।
हरि ने करम भरम में गेरी, गुरु ने काटी ममता बेरी।
हरि ने पाँच चोर दियो साथा, गुरु ने लइ छुड़ाइ अनाथा।
हरि ने मो सो आप छिपायो, गुरु दीपक दै ताहि दिखायो।
राम तजूँ पै गुरु न बिसारूँ, गुरु के सम हरि को न निहारूँ।
हरि की कृपा होय तो नहीं होय तो होय।
सहजो गुरु की कृपा बिना भव पार न पावे कोय।।
उन्होंने कहा- हरि की कृपा होय तो उचित, न होये तो कोई विशेष नुकसान नहीं किन्तु ‘सदगुरु की कृपा बिना भव पार न पावे कोय।’।
हरि ने जन्म दिया है जग में, कृपा करके दुर्लभ तन दिया लेकिन आवागमन बना रहा, गुरु ने आवागमन छुड़ाया।
हरि ने जन्म तो दिया, लेकिन पीछे लगा दिया पाँच चोर – रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द – पंच विकार। गुरु ने इसको संयमित करके इससे मुक्ति दिला दी।
हरि ने जन्म तो दिया लेकिन करम और भरम में गिरा दिया। जिधर देखो उधर भ्रम ही भ्रम है। और है ही क्या दुनिया में। और ‘गुरु ने काटी ममता बेड़ी’– भ्रम तब तक है जब तक हमारी ममता है।
भगवान् ने जन्म तो दिया, अपने आपको छिपा लिया। तो ‘हरि ने मो सो आप छिपायो, गुरु दीपक दै ताहि दिखायो।’ देख ले, यह रहे भगवान्। इसलिये,
हरि की कृपा होय तो नहीं होय तो होय।
सहजो गुरु की कृपा बिना भव पार न पावे कोय।।
गुरु की कृपा बिना कोई भव पार नहीं पाता।
— अनुसुइया आश्रम में प्रथम गुरुपूर्णिमा–
गुरु महाराज की शरण में हम चित्रकूट आये। चित्रकूट एक वैष्णव बाहुल्य तीर्थ है, रामजानकी के हजारों मंदिर हैं। सबके यहाँ अन्नकूट मनाया जाता था। रामनवमी, रासलीला, जन्माष्टमी सारे त्यौहार मनाये जाते थे लेकिन गुरुपूर्णिमा कहीं नहीं मनाई जाती थी। एक दिन एक पंडित आये, जो आश्रम के भक्त थे। वे चित्रकूट क्षेत्र में ग्रामीण अंचल के जाने-माने पंडित थे। उन्होंने आते ही महाराज को प्रणाम किया और कहा- महाराज! परसों गुरुपूर्णिमा है। महाराज ने सुना तो कहा– पंडित, कैसी गुरुपूर्णिमा? पंडित बोला– महाराज! यह व्यास पूर्णिमा है। वेदव्यास ने श्रुतज्ञान की परम्परा को लेखन से जोड़ते हुए लौकिक, पारलौकिक सारे ज्ञान को लिपिबद्ध किया। लेखन की पूर्णता पर शिष्यों ने गुरुदेव की पूजा की थी, तभी से गुरुपूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा मनाई जाती है।
पंडित तो इतिहास बता कर चले गये। तीसरे दिन जो शिष्य थे चार-छ: वहाँ पर, उन्होंने परामर्श किया। जंगल से जंगली फूल ले लाये… छोटे-छोटे फूल… तो माला बना ली, बेल-पत्र पर ॐ-ॐ लिख दिया। चन्दन का टुकड़ा तो महात्माओं के यहाँ होता ही है तो चन्दन घिसा और विधिवत कटोरी में लिया। फूल और माला थाली में रखकर चले आये। गुरु महाराज ने पूछा– का है रे आज? कैसे सनक गये हो? तो वे बोले– गुरु महाराज! आज गुरुपूर्णिमा है, हम भी अपने गुरु महाराज की पूजा करेंगे, चरण धोयेंगे।
गुरु महाराज बोले– मैं गोड़ न धोवइहों।…. अच्छा तो एक नाखून धो लो। दाहिने पैर का अंगूठा धोया और लोगों ने चरणामृत लिया। फूल सिर पर रख दिया, चन्दन लगा दिया विधिवत् और,
‘कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि।।’,
‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरु: साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:।।’
पढ़कर शिष्यों ने साष्टांग दण्डवत् प्रणाम कर लिया, धूनी से विभूति खा लिया, लगा लिया। हो गयी गुरुपूर्णिमा।
कुछ देर बाद महाराज बोले– क्यों रे, जब गुरु पूर्णिमा मना ही लिया तो हलुवा बनना चाहिए। तो एक किलो गाय का घी (डालडा का आविष्कार तब नहीं हुआ था, तब की बात है।), एक किलो गेहूँ का आटा, एक किलो चीनी – यही वहाँ हलवा बनाने का माप है। विधिवत् हलवा बना। तीन आदमी और पहुँच गये थे। छ: पहले से थे, हो गये नौ। नौ आदमियों ने वह हलवा प्रसाद लिया और भण्डारा हो गया।
दूसरा साल आया तो पन्द्रह दिन पहले से ही कोई-कोई शिष्य रटने लगे– अब इतने दिन बाकी हैं, अब इतने दिन बाकी हैं। गुरु महाराज तो भूल ही गये थे। महाराज ने कहा– क्यों रे, क्या रोज-रोज फुसर-फुसर करते हो। वे बोले– महाराज, अब इतना दिन बचा है गुरुपूर्णिमा में। गुरु महाराज जी बोले– हाँ तोरे हरामी की, हलवा मुँहे लग गया है।
हलवा माने दुर्लभ वस्तु। उन दिनों कोई मिठाई नहीं थी गुड़ छोड़कर। गुड़ भी कभी कभार, पन्द्रह दिन में एक-दो बार। तो गुरु महाराज बोले– हलवा मुँहे लग गया, इसके मारे रटत हो। गुरुपूजा नहीं पेट-पूजा के लिये याद किये हो। उस बार पन्द्रह आदमी हो गये। थोड़ा प्रचार हो गया था न, इसलिए। तीसरे साल फिर हुए साठ लोग। क्रमश: दो-तीन सौ हो गये। अन्तिम गुरु पूर्णिमा में छ: कुन्तल आटे की पूड़ी बनी। जंगल में उन दिनों इतना भी बहुत था। उसी के अनुपात से कोहड़े का साग और सब कुछ।
गुरु महाराज के शरीर काल में गुरुपूर्णिमा छ: कुन्तल तक पहुँच गई। महाराज कहें– हो, बहुत भीड़ हो गयी थी। पत्ते-पत्ते पर आदमी रहा है। सब खूब खाये। यहाँ से वहाँ तक पंगत बैठी। और उसमें कत्थक लोग, गानेवाले-नाचनेवाले भी आ गये। कर्बी शहर है, चित्रकूट तीर्थ है तो जहाँ-तहाँ वैष्णव संतों के यहाँ रामलीला, रासलीला हुआ ही करती है। तो नचनिया-गवैया रहते ही हैं तीर्थों में, वे भी पहुँच गये। उन्होंने विधिवत् भजन सुनाया।
मई सन् उनहत्तर में गुरु महाराज का शरीर छूट गया, हम लोगों पर तो वज्रापात पड़ गया। फिर उनका भण्डारा किया, वार्षिक भण्डारा भी किया। गुरुमहाराज की पुण्यतिथि जगतानन्द (बरैनी-मीरजापुर) में मनाई जाने लगी, क्योंकि यहाँ गुरु महाराज के दो-चार पुराने भक्त थे–एक डॉक्टर साहब थे, एक चन्दन गुरु, और भी कई…। सृष्टि एक तरफ से कल्ला फेंकती है, थोड़ा बढ़ता है, दूसरी तरफ से पौधा फिर सूखने लगता है, मुरझाने लगता है। बाल पकता है, स्वास ठण्डी हो गयी कि गया। ये क्रम चलता ही रहता है। जो-जो दिग्गज हमें दिखाई पड़े, सब चले गये।
हमें भण्डारे की व्यवस्था का अनुभव नहीं था। जगतानन्द में अनुसुइया महाराज भण्डारे की व्यवस्था देखते थे किन्तु वे मनमौजी थे। जब मौज आवे, उठकर चल दें। एक बार दशहरे पर गुरुमहाराज का वार्षिक भण्डारे के अवसर पर वे वहाँ से चले गये तो हमने डाक्टर साहब से कहा- देखो, हमने तो कभी भण्डारा किया नहीं, हम जानते नहीं क्या होता है। हम भण्डारे पर कभी ध्यान ही न दें। लोग आते हैं, खाते हैं, जाते हैं… बस… कोई मतलब नहीं। जैसे बनता हो, बनाओ अपने ढंग से। हमको इसका कोई तजुर्बा नहीं है।
वह भण्डारा हमारे सिर पर पड़ गया था। हमारा विचार था, हम कभी भण्डारा नहीं करेंगे। क्यों करें? गुरु महाराज थे तो हम गुरुपूजा करते थे। अब हम भण्डारा नहीं करेंगे। किन्तु वहाँ के भक्तों ने हमको ही गुरु बनाकर बैठा दिया…. जबरदस्ती…. हम हुए नहीं, अब भी नहीं हैं। जब कोई पूजा करता है तो हम गुरु महाराज को सौंप देते हैं कि आपन सम्भालो।
गुरु महाराज ने कहा था– मैं मरिहौं न। मैं कभी नहीं मरूँगा। कोई गोली मार देई तो शरीर छूट जाई। तो हमने पूछा– महाराज! गोली से शरीर छूटने में और खटिया में बुखार से मरने में फर्क क्या है? शरीर छूटना था सो तो छूट गया। तब गुरु महाराज बोले– हो, बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि हुए, किसी का तो शरीर नहीं दिखाई देता। राम हुए, कृष्ण हुए, बुद्ध हुए…. कोई यहाँ जीवित नहीं दिखाई पड़ता। शरीर तो किसी न किसी बहाने से छोड़ना ही पड़ेगा तो हमने यही बहाना सोचा है।
एक दिन कोई बात हो गई, मेरा लड़कपन था, पता नहीं हमारे मुँह से क्या निकल गया, गुरु महाराज बोले– तू बात का कहत है, मोके गोली मारत है। मैं कैसे बताऊँ, छेदत चली जात है। हम बोले- अरे, हम ही गोली मार दिये। और गुरु महाराज ने शरीर त्याग दिया, दूसरे-तीसरे दिन। तो हम बोले– कहत रहे गोली से मरिहौं, यही गोली रही। तू बात का कहत है, मोके गोली मारत है। मैं कैसे बताऊँ, छेदत चली जात है।
शरीर तो चला जायेगा, लेकिन सहज-स्वरूप से, आत्मस्वरूप से, सूक्ष्म-स्वरूप से मैं सदा विद्यमान रहूँगा। कोई जहाँ से भी प्रणाम करेगा, मैं उसको देखूँगा, उसका कल्याण करूँगा। मैं कभी नहीं मरूँगा। अत्रि महाराज आज भी विद्यमान हैं, वैसे ही मैं भी रहूँगा।
अनुसुइया निवास के क्रम में एक बार महाराज को बुखार आने लगा। गुरु महाराज ने सोचा– आगरा चलें, वहाँ भगत हैं। थोड़ा बुखार आ रहा है। चार दिन दवाई कर, सबको देख-सुनकर चला आऊँगा। जब पहुँच गये बहुत खुश हुए आगरा वाले, बोले– महाराज जी आ गये, संतजी आ गये। शाम को सभी दर्शन करने पहुँचे।
रात के लगभग दो बजे अनुभव में अत्रि महाराज पहुँचे, बोले– जब शरीर की इतनी चिन्ता करोगे तब भजन कैसे होगा? चलो, आश्रम चलो। तो महाराज ने कहा– भगवन्! आपने क्यों कष्ट किया, वहीं से संकेत कर देना चाहिए था, मैं चला आता। अत्रि महाराज बोले– यदि हम न आते तो आता कौन। वहाँ है कौन? या तो मैं हूँ, या तुम हो। और वहाँ कोई नहीं है।
गुरु महाराज कहें– हो, सतयुग से लेकर दूसरा कोई पूर्णत्व प्राप्त महापुरुष वहाँ हुआ ही नहीं। कई युगों के बाद अत्रि महाराज ने हमारा नाम बताया। आगे गुरु महाराज ने कहा– अत्रि महाराज आज भी अपनी जगह में विद्यमान हैं, हमको दर्शन दिया है। अनुसुइया माई भी विद्यमान हैं। मैंहूँ मरिहौं नहीं, यहीं रहिहौं। तो हम बोले– जब आप यहाँ हैं ही तो हम क्यों अपने ऊपर जिम्मेदारी लें। हमसे कोई आशीर्वाद माँगता है, तो हम कह देते हैं– जाओ गुरु महाराज से ले लो। आपकी श्रद्धा ही कृपा बनकर लौटेगी, और आपको मिल जायेगी। और गुरु महाराज के प्रति जो श्रद्धा थी, अदब था, उठना-बैठना-चलना, सामने से गुजरना, आज भी वही बना हुआ है। और एक सींक बराबर गलत कदम रख दिया तो जैसी डाँट उन दिनों पड़ती थी, वैसी डाँट आज भी विद्यमान है।
गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर दसियों हजार की भीड़ अनुसुइया आश्रम में हो जाया करती थी। सैकड़ों माताएँ भी सपरिवार महाराजजी के दर्शनार्थ एकत्र हो जाती थीं। जब घर जाने की अनुमति हो, तो दो-एक महिलायें निवेदन करती थीं कि महाराजजी! अब मैं यहीं रहकर आपके सान्निध्य में भजन करूँगी। संसार में मेरा कोई नहीं रह गया है।
महाराजजी कहते– देखो हो! का कहत है? वैराग सवार है। घर में रहिहैं तो मारे गृहस्थी के साल भर फुरसत न मिली और इहाँ वैराग चढ़ा है, मरकट वैराग! अरे हम इहाँ अपने बहिन को रहने की अनुमति दें, माई को रखें अथवा बिटिया को रहने दें तो लोग का जनिहैं कि माई-बहिन हैं। लोग तो इहै कहिहैं कि बाबा मेहरिया रखे हैं। यद्यपि शुद्धं लोकविरुद्धम् न करणीयम्। हालाँकि मन-क्रम-वचन से तनिको दोष नहीं है फिर भी जो लोकदृष्टि के विरुद्ध है वह नहीं करना चाहिए। उससे समाज में गलत संस्कार पड़ते हैं।
‘‘नहीं! महाराजजी! आप महापुरुष हैं। आपको कोई कुछ नहीं कहेगा। यहाँ पर हमारा मन बहुत लगता है। यहीं भजन करने की आज्ञा दीजिए।”– महिलाओं के ऐसा कहने पर महाराजजी कहते–
‘‘हूँ! चामे की धोकरी कुत्ता रखवार। ताजा उतारा चमड़ा है, कितना ही वफादार कुत्ता है, ऊ जरूर छुई। जबै मौका पाई, दाँत जरूर लगाई। स्वभाव है न। अरे! मैं साधू हूँ, मोके कउनो फरक नाहीं। दो-चार औरउ ऐसन हैं जिनके ऊपर संगदोष का प्रभाव नहीं है, मोरे स्वरूप हैं; लेकिन जो नये साधक हैं उनके तो गुण-स्वभाव पुराने हैं। ‘गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानन्द।’ दस-बारह साल में तो साधक लाइन पकड़ता है, तब कहीं खतरा टलता है। अबै तो ई सब कुम्हड़ बतिया हैं। संग से जती नष्ट होई जात है। जो भाग! घर ही से भजन कर। मनै से आवा-जावा कर। कल्यान मैं करिहौं। साँझ-सबेरे मोर रूपवा देखा कर। कउनो एक नाम जपा कर। राम-राम जप। जो और पति की सेवा कर। जवन तैं इहाँ पइहै वह मैं वहीं दे देइहौं।” इस प्रकार सान्त्वना देकर उन्हें घर भेज देते थे।
महाराजजी प्राय: भाविकों से कहते थे कि ‘ओम्’, ‘राम’, ‘शिव’–किसी भी दो-ढाई अक्षर के नाम को चुन लो। सबका आशय एक है। ‘ओम्’ पर अधिक बल देते थे, कहते थे, ‘‘मोरे रूपवा देखा कर। शरीरिया से कहूँ रहो, मनवा से आवा-जावा करो। सुबह-शाम, साँझ-बिहान जब याद आवै तब-तब मन से पहुँच जाया करो। जब भी मोरे रूप को एक भी मिनट हृदय में रोक लोगे तो जिसका नाम साधना है, वह भजन मैं तुम्हें प्रदान कर दूँगा। तुम्हारे हृदय से ही प्रेरणा करके भजन की प्रशस्त पटरी पर मैं खड़ा कर दूँगा; भगवान खड़ा करते हैं। ‘तुलसिदास (मन) बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै।’ तुम एक मिनट ध्यान तो धरो। ‘ओम्’ जपो तो।”
तो यह गुरुपूर्णिमा है। जब हमारी कोई पूजा करता है तो हम सीधे गुरु महाराज की ओर ही बढ़ा देते हैं कि आप अपना आशीर्वाद दिया करो, गुरुपूर्णिमा सम्पन्न कराया करो।
।। बोलिये गुरुदेव भगवान की जय।।
(‘अमृतवाणी भाग-8’ से उद्धृत)