गुरुमन्त्र
मंत्र एक उलझा हुआ प्रश्न है। मंत्र के नाम पर लोग कान में कुछ शब्द कहते हैं और फिर कहा जाता है कि इसे किसी से बताना मत, यह अति गोपनीय है। मंत्र के नाम पर तरह-तरह के उच्चारण लोग करते हैं। तैतीस करोड़ देवता, तैंतीस करोड़ ही उनके नाम और हर नाम एक मंत्र है। और उतने ही तैंतीस करोड़ भूत और भूत झाड़ने का एक मंत्र। प्रत्येक प्रांत में, जिले में, प्रत्येक गाँव मे ओझाओं का मंत्र अलग-अलग प्रकार का होता है।
एक बार एक ओझा ने कहा– मैं बिच्छू उतार दूँगा। हम बोले– कैसे? वह बोला– मंत्र से। हमने कहा– क्या है मन्त्र? वह बोला–
काला भैरव काली रात, भैरव रेंगे आधी रात।
अस्सी भट्टी का मद पीये और अस्सी बकरा खाए।
काली का पूत भैरव, जहाँ पठवा तहाँ जाए।
छूह्… बाचा गुरु दत्तात्रेय का बोल मंत्र सांचा….
और एक झापड़ मारा। हम बोले– उतर गई बिच्छी? डंक जो दर्द कर रहा था? वह बोले– दो-एक दिन में खुदै उतर जाई। उसको विश्वास हो गया कि हमने मन्त्र से झाड़ दिया और रोगी को विश्वास हो गया कि बिच्छू झाड़ दिया गया, अब उतर जाई।
सिख लोग कहते हैं– वाहे गुरु जी दा खालसा, वाहे गुरु जी फतेह…, एक ओंकार सतगुरु प्रसाद। बौद्ध कहते हैं– ‘बुद्धम् शरणम् गच्छामि, धम्मम् शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि।’ जैनी कहते हैं– ‘णमो अरि हंताणम, नमो सिद्धाणम, नमो आयरियाणं, णमो उवज्जायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं, एसो पंच नमुक्कारो, सव्व पावप्पणासणो। मंगलाणम च सव्वेसिं, पढमं हवई मंगलम्।।’ शैव कहते हैं– ‘ओम् नम: शिवाय।’ वैष्णव बोलेंगे– विष्णवे नम:। ओम् रां रामाय नम:। संन्यासी लोग ओम् लगाकर ५ देवताओं का मंत्र पढ़ते हैं- १. देवी का, २. गणेश का, ३. सूर्य का, ४. शंकर जी का, ५. विष्णु का। क्या मंत्र भी दो-चार, दस, बीस, पचास करोड़ हैं? क्या भगवान भी दो-चार हैं? गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं– भगवान एक हैं।
ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनँद रासी।।
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।।
भगवान एक है। वह व्यापक है। सवा कभी हुआ ही नहीं। एक से दो कभी नहीं हुआ तो यह बहुत से मंत्र कहाँ से आ गए? हमें यह देखना है कि आपके शास्त्रों में मंत्रों का क्या स्वरूप है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने मंत्र के रूप में ओम् के जप का निर्देश दिया है– ‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मन्‘ तथा ‘मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्।’ (९/१६)- मैं ही मंत्र हूं, मैं ही हवि हूँ।
एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम,
एको देवो देवकीपुत्र एव।
एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।। ( गीता माहात्म्य )
वास्तव में विशुद्ध मंत्र का आशय प्रभु के नाम से है जो योग-साधना अर्थात् भक्तिपथ का निर्वाह करता है। इसी के प्रभाव से ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ तथा परम तत्व परमात्मा भी सुलभ हो जाते हैं। यह है मंत्र।
संसार में मन्त्रों से कई आशय हैं, जैसे– परामर्श-सलाह देना। एक मंत्र कपटी मुनियों ने जपा है – साधु का वेश बनाकर, उल्टा-सीधा पढ़ाकर अपना उल्लू सीधा कर लेना। प्राय: राजा-महाराजाओं ने इसका आश्रय लिया है। एक मंत्र प्रभु का नाम है। इसका प्रयोग मांगलिक कार्यों में होता है, जैसे- भगवान राम का जब अभिषेक हुआ तो, ‘बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।।’ वेद मंत्र मुनि लोग पढ़ने लगे।
बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं।।
वेद मंत्र– जो अविदित है उसे विदित करानेवाली ऋचाओं का पाठ! मांगलिक कार्यों पर इसका उपयोग होता है जैसे– शादी-विवाह में, अभिषेक इत्यादि में।
भरत ने जब रामजी को मनाने का निर्णय किया तो अयोध्यावासी पीछे लग गए कि, ‘जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।।’- जहाँ राम हैं वहीं सारा समाज रहेगा। बिना रघुवीर के अयोध्या में हमारा क्या काम!
चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।।
ऐसा निश्चय करके, ऐसा मंत्र सुदृढ़ करके भरत के साथ पूरे अयोध्यावासी देव दुर्लभ निवास और सुख त्यागकर चल दिये।
एक मंत्र माने निर्णय लेना। सूर्पनखा जब भगवान राम के पास से नाक कटाकर आई तो बिगड़ी रावण के ऊपर कि,
करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।
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संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।।
तुम्हारे सिर पर शत्रु मंडरा रहा है, तुम्हें होश नहीं। देख, हमारे नाक की क्या दशा हो गई….. संगदोष से बड़े-बड़े यती नष्ट हो जाते हैं और कुमंत्र से राजा नष्ट हो जाता है।
यहाँ मंत्र माने सलाह, मशविरा। इसी से मंत्री पद बने हैं मंत्रालय बना है। सूर्पनखा गयी तो थी अपना ब्याह करने के लिए, लेकिन रावण को बताया– भैया, उनके साथ एक नारी है जो,
रूप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी।।
सौ करोड़ रति देवी भी उसके ऊपर बलिहारी है। मैं तुम्हारे लिए लेने गई थी कि भैया के लिए यह उपहार ठीक रहेगा, पर लक्ष्मण ने मेरे नाक-कान काट दिए।
सूर्पनखा विधवा थी। जब उसका पति मारा गया तब बिलखती हुई रावण के पास आई, बोली– तू भाई है कि शत्रु? मेरे पति को तुमने मार डाला, लोग मुझे विधवा कहेंगे।
रावण बोला– बहन! युद्ध के नशे में मैं पहचान नहीं पाया। हमारी जात भी कहीं विधवा-सधवा होती है क्या? हम हजारों स्त्रियाँ रखते हैं, तुम हजारों पुरुष रखो। जाओ, भाई खर-दूषण के साथ मनचाहा विहार करो।
वह मनचाहा विहार करते हुए पहुँच गई पंचवटी – खर-दूषन के पास। सूर्पनखा बहुत कुरूप थी। वेश बदलने में बड़ी माहिर थी। साज-सज्जा की विशेषज्ञ थी।
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।।
वह बड़ी दुर्दांत निशाचरी थी। ‘दारुन जस अहिनी‘–वह सर्पिणी के समान थी। सर्पिणी जिसको काट दे वह मौत देगी, यही उसका यश है। ‘सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु।’–अमृत की सराहना अमर करने में और विष की सराहना मार डालने में है। यह मार डालनेवाला यश उसके पास था। वह थी तो बड़ी दारुन।
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।।
रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।।
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँयोग बिधि रचा बिचारी।।
तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तम्हहि निहारी।।
मेरे अनुरूप रूप-सौंदर्य का पुरुष विधाता ने गढ़ा ही नहीं। आप भी बहुत सुंदर हैं, ऐसी बात नहीं है, लेकिन अब जन्म हुआ है तो जीना तो पड़ेगा ही। आओ, ब्याह कर लें।
राम बोले– भाई, हमारा ब्याह हो चुका है, यह है सीता। वह है राजकुमार लक्ष्मण। उधर गई तो लक्ष्मण बोले– अरे, तुम रावण की बहन, एक राजकन्या हो। महारानी बनते-बनते दासी क्यों बनना चाहती हो? मैं इन भैया-भौजी का सेवक हूँ। तुम भी मर जाओगी रात-दिन इनकी सेवा करते-करते। वह बोली– नहीं, मैं दासी नहीं हो सकती। लक्ष्मण बोले– तब भैया के पास जाकर प्रार्थना करो।
रामजी के पास आकर सूर्पनखा ने सोचा कि रोड़ा है यह सीता। उसने हमला कर दिया सीता पर। भगवान राम ने कहा– लक्ष्मण! यह है कौन? जरा इसके रूप-सौंदर्य का पता तो लगाओ।
नाक पर थोड़ा-सा झटका लगा तलवार का तो नाक कट गई तब कपट रूप तो भूल गई, असली रूप में आ गई।
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा।।
विकराल राक्षसी। रुधिर की धारा बहने लगी। असली वेशभूषा में आ गई।
इस प्रकार सूर्पनखा गई थी अपना ब्याह करने, रावण को मंत्र दे दिया, बोली– भैया, आपके लिए मैं स्त्री ढूँढ़ने गई थी। छल-छद्म-कपट कैसे भी अपना गोटी बैठा लेना, यह भी एक मंत्र है।
— सुबेल पर्वत पर–
दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेश मंत्र लगि काना।।
लोगों का विश्वास है गुरुजी ही मंत्र देते हैं लेकिन यहाँ विभीषण भगवान राम के कान में मन्त्र दे रहा है तो क्या विभीषण हो गया गुरु?
लंका में सुमेरु पर्वत पर जब राम की छावनी लग गई तो विभीषण कानों से लग के भगवान राम को मंत्र दे रहा था। वह यह बता रहा था– भगवन्! यह जो काली घटा छाई है, यह मेघमाला नहीं है। और जो यह बिजली चमक रही है, यह बिजली भी नहीं है।
लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंधर देख अखारा।।
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोई जनु जलद घटा अति कारी।।
रावण अखाड़ा देख रहा है। मेघडंबर छत्र तना है, वह काली घटा है।
मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका।।
मंदोदरी के कर्णफूल हिल रहे हैं, वही दामिनी (बिजली) की कौंध है।
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोई रव मधुर सुनहु सुरभूपा।।
मधुर ताल-मृदंग जो बज रहे हैं, वही बादलों की गर्जना के समान हैं।
मंत्र माने सलाह। भला विभीषण राम जी को कौन-सा मंत्र देता? यहाँ मंत्र माने परामर्श।
इहाँ बिभीषण मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा।।
विभीषण ने फिर एक मंत्र तैयार कर लिया। आप अतुल्य हैं, उदार हैं प्रभु।
मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन।।
जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि।।
विभीषण ने कहा– मेघनाद अपावन यज्ञ कर रहा है, सिद्ध हो गया तो शीघ्र जीतने में नहीं आएगा। उचित सलाह-मशविरा करना मंत्र कहलाता है।
विभीषण जब भगवान श्रीराम जी के शरण में आया तब वह बहुत ही उलझन में था। मेरे जेष्ठ भ्राता ने सीता माता का हरण किया है, क्या भगवान राम मुझ पर विश्वास करेंगे? क्या प्रभु मुझे शरण में रखेंगे? बानरी सेना के सेनापतियों ने भगवान राम को मना किया कि इस दुष्ट को मत रखो। लेकिन भगवान श्रीराम ने कहा- नहीं,
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं।।
विभीषण से गले मिले, समुद्र-तट से बालू उठाया और विभीषण का अभिषेक कर दिया, बोले- आओ लंकेश। विभीषण बोले– प्रभो, लंकेश तो रावण है! भगवान राम बोले– उसकी आयु पूरी हो गई विभीषण जी। अब इस भार को तो आप ही को वहन करना होगा। बराबर में बैठा लिया।
भगवान राम बोले- विभीषण जी, मेरी सेना इस समुद्र से कैसे पार हो, आप कोई उपाय बतायें क्योंकि आपका आना-जाना इस पार उस पार लगा ही रहता है।
विभीषण बोले– प्रभो! समुद्र से प्रार्थना करनी चाहिए। आपका बाण समुद्र को सुखा सकता है लेकिन नीति कहती है, मर्यादा कहती है कि सागर से प्रार्थना करनी चाहिए।
भगवान राम समुद्र के किनारे कुश की चटाई बिछाकर प्रार्थना करने बैठ गए तो लक्ष्मण एकदम बौखला गये। ‘मंत्र न यह लछिमन मन भावा।’ विभीषण ने जो मंत्र दिया था, वह लक्ष्मण को अच्छा नहीं लगा। ‘राम बचन सुनि अति दुख पावा।।’ सोचा, आज ही तो आया है, आज ही महामंत्री…. मंत्रणा देने लगा।
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिय सिंधु करिअ मन रोसा।।
यह उस रावण का भाई है जिसने माता सीता का अपहरण किया है। लक्ष्मण जी नाराज हो गये, बोले– प्रभो! देव का कौन भरोसा, समुद्र सुखाइए।
राम बोले– लक्ष्मण निश्चिन्त रहो, थोड़ा मुझे नीति का पालन कर लेने दो, फिर तुम जो कहते हो वही होगा।
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।
तीन दिन तो नीति का पालन किया, फिर कहा– लक्ष्मण, जरा धनुष-बाण तो लाओ। फिर वही किया रामजी ने जो लक्ष्मण कह रहे थे। तो यहाँ मंत्र माने एक सलाह होता है।
— रावण के पास मंत्र की प्रक्रिया बहुत ऊँची थी।
मंत्र आकर्षन कर दस भाला। अहिरावन चित डोल पताला।।
आकर्षण मंत्र… खींचनेवाला मंत्र… बुलानेवाला मंत्र… यह मंत्र रावण के पास था। अहिरावण पाताल लोक में रहता था। आकर्षण मन्त्र जपा रावण ने तो अहिरावण तुरन्त चला आया। पता नहीं किस वाहन से आया? तो यह है आकर्षण मंत्र।
प्रेरित मंत्र– चित्रकूट में भगवान श्रीराम ने जयंत के पीछे जब बाण छोड़ा तो ‘प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।।’ वह मार नहीं रहा था, केवल पीछा कर रहा था। बैल जब कम चलते हैं हल में तो पीछे से थोड़ा खोद देते हैं, उसी तरह भगवान राम के बाण ने उसको बैठने नहीं दिया कहीं पर।
धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।।
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही।।
सब जगह भ्रमित, व्याकुल। भय और शोक में विकल होकर पिता के पास भी गया लेकिन उन्होंने उसे अपने पास नहीं रखा।
नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता।।
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।
तब देवर्षि नारद जी ने कहा– राम जी की शरण में जाओ। वह घूम करके भगवान के चरणों में गिर गया और उसका उद्धार हो गया। यह था प्रेरित मंत्र।
मंत्र का तात्पर्य एक तो है राजनीति की गठन पर मंत्रालय, मंत्रिमंडल और उचित सलाह मशविरा का नाम मंत्र है किंतु जो शास्त्रों में है, जिस मंत्र को लेने के लिए हम तरस रहे हैं, जिस मंत्र के जाप करने से भगवान भी वश में हो जाते हैं, वह मंत्र केवल प्रभु का नाम है। तो,
ब्रह्म राम तें नामु बड़, बर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महँ, लिय महेस जियँ जानि।।
परब्रह्म परमात्मा, राम – इनसे भी नाम बड़ा है। नाम वरदाता है। तुम नहीं मांगोगे तब भी नाम जपोगे तो फल दे देगा। वह वरदानी है- ‘बर दायक बर दानि’।
‘रामचरित सत कोटि महँ’-सौ करोड़ राम-चरित्रों में से शंकर जी ने छांटकर इस राम नाम को अलग किया है। तो,
नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सतकोटि अपारा।।
सौ करोड़ रामचरितमानस है, उतनी ही विधियों से राम का अवतार है। भगवान शिव ने सौ करोड़ नामों में से छांट के इस राम नाम को अलग किया इसलिए,
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।
मैं उस राम नाम की वंदना करता हूँ जो अग्नि, सूर्य और चंद्रमा में जो प्रकाश है, उसी की उपज है, उसी से प्रकाशित है। यह महान मंत्र है।
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।।
महामंत्र, जिसका शंकर जी जप करते हैं, काशी में मरने वालों की मुक्ति का हेतु भी यह राम नाम ही है। राम नाम मंत्र ही नहीं, महामंत्र है। राम और ब्रह्म से भी बड़ा है। नाम ब्रह्म और राम को प्रकट करने की क्षमता रखता है इसलिए नाम बड़ा है। इससे बड़ा मंत्र कोई नहीं। इसको शिव जपते हैं। काशी में मरने वाले जीवों को भगवान शिव राम नाम मंत्र के प्रभाव से मुक्त कर देते हैं इसलिए,
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।।
महान मणि है यह मंत्र। ‘बिषय ब्याल के’– विषरूपी विषधर के असाध्य कुअंक, विषयों के कुसंस्कार – जो अनंत योनियों के कारण हैं, दु:ख के कारण हैं – इनको भी यह मिटा देता है। भाग्य में कुअंक, विषयरूपी विष के जो कुसंस्कार पड़े हैं, उसे भी यह काट देता है, विषमुक्त कर देता है। जो जीव मौत की ओर जा रहा था, उसे यह नाम जीवन प्रदान कर देता है इसलिए महान मणि है।
मंत्र एक परम तत्व परमात्मा के एक नाम का जाप है।
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।।
यह मंत्रों का भी राजा है, मंत्रराज है। राजयोग… जो निश्चित मुक्ति दे दे, फिर कुछ भी भोगने की इच्छा न रहे। राजरोग… सारे विश्व के डॉक्टर सिर पर खड़े हो जाएं तब भी न बचा सकें; निश्चित मौत। यह राजमंत्र है, निश्चित प्रभु का दर्शन करा के दम लेगा, तो मंत्रराज- जो मंत्रों का राजा है। तो, ‘मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा’ लेकिन पूरे संयम के साथ, ‘पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।’–पूरे परिवार के साथ जो आपका पूजन करते हैं।
मंत्र जाप करने के लिए यम-नियम चाहिए। संयम के साथ अनुष्ठान करें तो, ‘मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।’-मेरे नाम का जाप – यही वेदों ने प्रकाशित किया है।
— लोमस जी कागभुसुण्ड से–
मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राम मंत्र तब दीन्हा।।
बालक रूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना।।
मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरित मानस तब भाषा।।
लोमस के यहाँ पहुँच गए कागभुसुंडि। वह पहले टाल देना चाहते थे। कागभुसुंडि ने जब बहुत हठ किया, तो बोले– कौवे की तरह काँव-काँव लगा रखा है, जाओ, चांडाल पक्षी कौवा हो जाओ।
श्राप को हमने शीश चढ़ाया। मुझे न भय लगा, न दीनता आई, न हर्ष ही हुआ।
लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।
तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।
सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ।।
मैं हर्ष के साथ उड़ चला। तब मुनि चिन्ता में पड़ गए–
रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी।।
अति बिसमय पुनि मुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई।।
वे पछताने लगे, सादर बुला लिया और फिर बहुत सांत्वना दिया। फिर वही राम मंत्र दे दिया। हर हालत में प्रभु का एक नाम – ये राजमंत्र है। ब्रह्म और राम से भी बड़ा है यह महामंत्र। लेकिन जपने की एक विधि है।
— महाराजा मनु–
द्वादश अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।
बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग।।
द्वादश अक्षर…. लोग कहते हैं–‘ओम् नमो भगवते वासुदेवाय’ में बारह अक्षर हैं। ओ..म..भ..ग..व..ते… ऐसे गणित लगाते हैं। ऐसा कुछ नहीं है। पाँच कर्मेंद्रियाँ, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और मन और बुद्धि। अब चित्त और चित्त की वृत्ति। चित्त और चित्त का प्रवाह… चित्त का वेग। इसका नाम है मन, बुद्धि, चित्त और चित्ती। फिर कालांतर में लोगों ने इसको चार भागों में बाँट लिया–मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार – चतुष्टय अंत:करण। लेकिन उपनिषद के ऋषियों ने दो ही भागों में रखा – मन और मन की प्रवृत्ति।
तो द्वादश… यह अक्षय हो जाए, संयत हो जाए, यह संयम सध जाए। इनको नियमित, संयमित करके द्वादश अक्षर मंत्र जपो। ‘द्वादश अक्षर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।’ इस संयम को साधते हुए मंत्र को जपो।
बड़े अनुराग सहित जप रहे थे मनु और माता शतरूपा। ‘बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग।’ जो श्वास में वास करता है, उस परम देव परमात्मा के चरणों में मन लग गया तो यह छत्तीस करोड़ देवता भजने की जरूरत नहीं है। हमें हनुमान जी को खुश करना तो हनुमान जी, हनुमान जी। देवी को खुश करना है तो देव्यै देव्यै…., ओम गणपतये नम:…– ऐसा कुछ नहीं है। सृष्टि के सारे के सारे देवता एक साथ खुश हो जाएंगे इस मंत्र से। मंत्र बहुत छोटा है और उसके वश में ब्रह्मा, विष्णु, महेश सब हैं।
मंत्र परम लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब।
महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब।।
ब्रह्मा-विष्णु-महेश और सारे देवता….तैंतीसों करोड़ देवी-देवता सब उसके वश में हो जाते हैं जब इंद्रिय-संयम के साथ आप मंत्र का जाप करो। जब संयम के साथ आगे बढ़ोगे, संयम सधा और मंत्र जहाँ जपोगे तहाँ फिर देखने में मंत्र छोटा, पर उसके वश में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सारे तैंतीस करोड़ देवता, परब्रह्म परमात्मा – सब वश में हो जाएंगे।
परमात्मा के भजन की तीन श्रेणी है। पहले तो जीव अचेत है। ‘मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।’–वह मोहरूपी रात्रि में निश्चेष्ट पड़ा है। रात-दिन दौड़-धूप करता है, मात्र स्वप्न देखता है। लेकिन जब यह जाग जाय,
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।
इस जगतरूपी रात्रि में योगी जाग जाता है। परम + अर्थ = जो शाश्वत धर्म का प्रत्याशी है, और विधाता के प्रपंच के वियोगी हो जाते हैं।
भगवान कृष्ण कहते हैं– अर्जुन! ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।’- इस जगतरूपी रात्रि में सभी प्राणी अचेत पड़े हैं, संयमी पुरुष जाग जाता है, जब भजन जागृत हुआ।
भजन वैसे तो जागृत होता नहीं। मंत्र लिखने में नहीं आता, वाणी से भी नहीं। जाप तो ओम्, राम का ही करना पड़ेगा। लेकिन यह एक अवस्था ऐसी आती है जहाँ नाम मंत्र की संज्ञा पा जाता है। जिस विधि से भगवान आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जाएं, मार्गदर्शन करने लगें, हमें भजन की विधि पढ़ावें, दृढ़ावें – परमात्मा की उस प्रशक्ति की सुनवाई प्रथम चरण है कि प्रभु आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जाए, विधि संचार करने लगे। विधि प्रसारण कि जब क्षमता आ गई तो ब्रह्मा। यह है संरचना। सृष्टि अनादि है, अस्त-व्यस्त, अचेत है। अब वह जागृत हो गयी और विधि के अनुसार जब साधना थोड़ी उन्नत हुई तो योगक्षेम करने लगते हैं, रक्षा करने लगते हैं।
तो, परमात्मा की वह प्रशक्ति जो परवरिश करती है, भरण-पोषण करती है उस प्रशक्ति का नाम है विष्णु। विश्व अणु से विष्णु। विश्व के जिस किसी अणु पर आप खड़े हों, उस अणु से ही जागृत होकर आपका योगक्षेम, परवरिश, भरण, पालन-पोषण, सुरक्षा प्रदान करने लगते हैं तो यह परवरिश करने वाली प्रशक्ति का नाम है विष्णु।
और फिर उन्हीं के वरदहस्त के नीचे साधना और उन्नत हुई, मूल का स्पर्श किया तो संहार करने वाली प्रशक्ति का नाम है शिव। प्रकृति की सीमाओं से अतीत इसलिए शिव। इस क्षण संहार हुआ। एक भी संस्कार बाकी है तो जैसा संस्कार है, जन्म लेना पड़ेगा। जब संस्कार है ही नहीं तो पुनर्जन्म कौन देगा? तो अंतिम संस्कार का मिटना – यह और तुम्हारे जन्म-मृत्यु के कारण का सदा के लिए मिट जाना एक साथ घटित होता है। तो उन्हीं परमात्मा की वह प्रशक्ति जो संहार करती है उसका नाम है शिव। लेकिन शिव शब्द के दो प्रयोग हैं। एक तो परमात्मा की वह प्रशक्ति जो संहार करती है। दूसरा संहार का क्षण पूरा होते-होते जो स्थिति शेष बचती है, वह है परमात्म तत्व, कल्याण तत्व, परम तत्व, पुरुषोत्तम, अविनाशी तत्व, शिवतत्व (जो प्रकृति की सीमाओं से अतीत वो शिव तत्व।) संहार के साथ प्रकट होने वाली वस्तु। तो शिव के उभय प्रयोग हैं। एक तो परमात्मा की वह शक्ति जो संहार करती है, दूसरी वह जो संहार के साथ जो अवशेष छूटता है। प्रकृति के जन्म-मृत्यु का कारण खत्म हुआ तो अवशेष बचा परमात्मा, व्याप्त ब्रह्म का दर्शन और स्थिति। वह है शिवतत्व, कल्याण तत्व।
शंकर जी के शरीर में श्मशान की विभूति रहती है। जब एक भी संस्कार बाकी नहीं तो हृदय हो गया श्मशान। जीवाणु है ही नहीं। उस वक्त ईश्वरीय विभूति शेष बचती है इसलिए शंकर श्मशान की विभूति अपने तन में रमाए रहते हैं।
अवढरदानी अर्थात् अति शीघ्र द्रवित होनेवाले, असीम दानदाता। भूतनाथ… भूत माने जीवित प्राणी। प्राणी मात्र की शरणस्थली है तो वह महापुरुष। और जो इस शिव तत्व में स्थित हैं वही होते हैं सदगुरु। इसलिए शंकर आदि सतगुरु हैं। ‘नास्ति तत्वम् गुरोर्परम्’- जिसका कभी विनाश नहीं होता, परम गुरु है। जिसने उस गुरुत्व को प्राप्त कर लिया हो वह सद्गुरु। शिव, सद्गुरु, पुरुषोत्तम, परमात्मा – यह पर्यायवाची शब्द हैं। इसलिए गुरु एक स्थिति है; यह नहीं कि हम भी गुरु, आप भी गुरु। तो गुरु महाराज के चरणों में जहाँ श्रद्धा से डोरी लग गई, एक नाम का जाप जहाँ किया तो कुछ ही समय बाद वह विधि जागृत हो जाएगी। भगवान पढ़ाने लगेंगे, भगवान योगक्षेम करने लगेंगे, आपके जन्म-मृत्यु के कारण का संहार कर देंगे और अंतिम कारण जहाँ खत्म हुआ, उसके पूर्ण होते-होते जो अवशेष बचा वह शिवतत्व, कल्याणतत्व, आत्मतत्व है, वही सद्गुरु हैं, वही सद्गुरु का स्वरूप होता है।
सत्य से संयुक्त हों, दूसरों में सत्य प्रसारित करने की क्षमता हो, उन्हें सद्गुरु कहते हैं। गुरु एक स्थिति है। भगवान कृष्ण भी गुरुर्गरीयान्– गुरुओं के भी परम गुरु है, परम पूजनीय हैं।
तो भगवान का नाम ही मंत्र है। यह साधारण नाम जब प्रभु की प्रेरणा से उनके वरदहस्त के नीचे आ जाता है, उस दिन से यह मंत्र कहलाता है। नाम तो लाखों लोग लिखकर गंगा में बहा देते हैं, फाइल की फाइल तैयार कर लेते हैं, लेकिन वह मंत्र नहीं है। इसलिए एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर करके एक नाम का जाप करो।
मंत्र एक जागृति है। यह वाणी से कहने में नहीं आता। यह अनिर्वचनीय है। यह वाणी का विषय ही नहीं है। यह एक जागृति है। जहाँ स्वरूप पकड़ा तो सद्गुरु जो वाणी से कहते हैं, वह हृदय से कहने लगेंगे। वाणी से महापुरुष तभी तक बोलते हैं जब तक हृदय से बोलना शुरू नहीं करते हैं। इसका नाम है भजन की जागृति।
भगति तात अनुपम सुख मूला। मिलहिं जो संत होहिं अनुकूला।।
वह मिलेगी तभी जब संत अनुकूल हों। यह जागृति कि आत्मा ही जागृत हो जाए, प्रभु जागृत हो जाएं, मार्गदर्शन करने लगे – यह जागृति किसी सद्गुरु के द्वारा ही संभव है। इसलिए,
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई।।
— सद्गुरु अनिवार्य हैं।
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन।।
दान करो, दया करो, इंद्रियों का दमन, मन का शमन, जहाँ तक सत्पुरुषों ने कहा है, यह धर्म है। तीर्थाटन धर्म है। दान, दया, सारे संयम, सारे व्रत-उपवास धर्म हैं, लेकिन यह धर्म हमें पहुँचाएंगे भक्ति के पास।
सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहुँ पाई।।
सब का फल हरि की भक्ति है किंतु ‘सो बिनु संत न काहुँ पाई।’–बगैर संत के आज तक किसी ने प्राप्त किया ही नहीं।
लक्ष्मण! अनुपम सुख की मूल भक्ति है। तो लक्ष्मण बोले– भगवन्, प्रदान कर दें। राम बोले- सीधा तो मैं भी नहीं दे सकता। ‘मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।’-जिनके संशयों का अंत हो चुका हो, वह संत हैं। वहीं से प्राप्त होगा इसलिए प्रारम्भ नाम और रूप से करें–
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी।।
नाम और प्रभु का स्वरूप दोनों की गति अकथनीय कथानक है। समझने में सुखदाई है, वर्णन नहीं किया जा सकता।
सब जानते हैं भगवान अनिर्वचनीय है, अमूर्त है, अरूप है लेकिन गोस्वामी जी का कहना है– नाम भी अमूर्त है, अरूप है, अचिंत्य है, अकथनीय कथानक है। यह भी एक जागृति है। तत्वदर्शी महापुरुष के शरण-सानिध्य में टूटी-फूटी सेवा, उनके निर्देशन के अनुसार साधना जहाँ पार लगी, उनका दो मिनट भी स्वरूप पकड़ में आ गया, श्रद्धा से संबंध जुड़ गया तो भजन जागृत हो जाएगा। फिर आत्मा से ही वह परम प्रभु परमात्मा अभिन्न होकर खड़े हो जाएंगे, पढ़ाने लगेंगे।
भगवान पढ़ाते हैं, सद्गुरु पढ़ाते हैं, आत्मा जागृत है, आत्मा पढ़ाती है – यह सब पर्यायवाची शब्द है। लेकिन ये जागृति सतगुरु से है।
एक ही नाम को चार श्रेणियों से जपा जाता है – बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती, परा। खूब नाम जपो। राम-राम, ओम्-ओम्….. व्यक्त है तो बैखरी। हरि-कीर्तन करो, झूम के करो – सब सही है। फिर जब शांत-एकांत में बैठो तो बैठकर चिंतन से जपो। ये कंठ से उच्चारण करते हैं। हल्का जीभ का सहारा दो, उच्चारण अवश्य करो। सुनो भी, पर पड़ोसी कोई हो तो उसको न सुनाई पड़े। वह है मध्यमा।
तीसरा क्रम है पश्यन्ति वाणी का जप। शांत बैठकर देखो, स्वास कब अंदर गई, कब आई, कितनी रुकी, फिर कब लौटी – उसको पहचानो। दो-चार बार जब मन देखने लगे, मन जब भली प्रकार अपने कर्तव्य का निर्वाह करने लगे तो आहिस्ते से चिंतन में नाम डाल दो। सांस आई तो ओम्, गई तो ओम्। ऐसी खरी ड्यूटी दो कि एक भी श्वास हमारी जानकारी के बगैर व्यर्थ न जाने पाए। कुछ दिन तो ढालना पड़ता है चिंतन से, फिर ढला-ढलाया मिल जाएगा। श्वास सिवाय नाम के और कुछ कहती ही नहीं है। केवल देखा भर करो। हर महापुरुष ने आदेश दिया है कि श्वसन क्रिया पर सुरत को स्थिर करो। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं–
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो:।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण: ।
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स:।।
अर्जुन! बाहर के विषयों, दृश्यों का चिन्तन न करते हुए, उन्हें त्यागकर, नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थिर करके, ‘भ्रुवो: अन्तरे’ का ऐसा अर्थ नहीं कि आँखों के बीच या भौंह के बीच कहीं देखने की भावना से दृष्टि लगाये। भृकुटी के बीच का शुद्ध अर्थ इतना ही है कि सीधे बैठने पर दृष्टि भृकुटी के ठीक मध्य से सीधे आगे पड़े। दाहिने-बायें, इधर-उधर चकपक न देखें। नाक की डाँड़ी पर सीधी दृष्टि रखते हुए (कहीं नाक ही न देखने लगें) नासिका के अन्दर विचरण करनेवाले प्राण और अपान वायु को सम करके अर्थात् दृष्टि तो वहाँ स्थिर करें और सुरत को श्वास में लगा दें कि कब श्वास भीतर गयी? कितना रुकी? (लगभग आधा सेकण्ड रुकती है, प्रयास करके न रोकें।) कब श्वास बाहर निकली? कितनी देर तक बाहर रही? कहने की आवश्यकता नहीं कि श्वास में उठनेवाली नामध्वनि सुनायी पड़ती रहेगी।
इस प्रकार श्वास-प्रश्वास पर जब सुरत टिक जायेगी तो धीरे-धीरे श्वास अचल, स्थिर ठहर जायेगी, सम हो जायेगी। न भीतर से संकल्प उठेंगे और न बाह्य संकल्प अन्दर टकराव कर पायेंगे। बाहर के भोगों का चिन्तन तो बाहर ही त्याग दिया गया था, भीतर भी संकल्प नहीं जाग्रत होंगे। सुरत एकदम खड़ी हो जाती है तैलधारावत्। तेल की धारा पानी की तरह टप-टप नहीं गिरती, जब तक गिरेगी धारा ही गिरेगी। इसी प्रकार प्राण और अपान की गति एकदम सम, स्थिर करके इन्द्रियों, मन और बुद्धि को जिसने जीत लिया है; इच्छा, भय और क्रोध से रहित, मननशीलता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ मोक्षपरायण मुनि सदा ‘मुक्त’ ही है।
नासिका में विचरते हुए स्वास को देखो। स्वास सिवाय नाम के और कुछ कहती ही नहीं है। देखा भर करें तो जो मन भाग-दौड़ कर रहा था, अब वो अपना कर्तव्यपालन करने लगा तो संकल्प कौन करेगा! इसका नाम है अजपा। उस वक्त वायु से तेज चलने वाला मन सिमटकर नाम के अंतराल में स्थायित्व ले ले तो ये मंत्र की अधिकतम सीमा, पराकाष्ठा, परिपक्व अवस्था है परा।
मन अन्तर स: मन्त्र। जब नाम अंतर से, अपने अन्तराल में स्थान दे दे और यह मंत्र जब प्रभु पढ़ाने लगें कि अब स्वास ठीक लगी बेटा… अब गड़बड़ हो रहा, अब सावधान हो जा… अब लग – ये है मंत्र की जागृति, भजन की जागृति।
इस तरीके से यह जो जागृति हुई आपमें, गोपनीय है। वही जानता है जिसमें जागृत है। सूरत में, स्वास में टिक गई तो वही जानता है जिसकी टिकी है। ‘कै जाने जीव आपना कैर जनावै पीव।’ तो मंत्र एक जागृति है, वास्तव में गोपनीय है। ‘नाम रूप गति अकथ कहानी।’- कहने में आता ही नहीं।
गोपनीय है ही, जब वाणी से निकलना ही नहीं है। लोगों ने इससे बड़ा लाभ उठाया। कपटी मुनि ने प्रतापभानु को भरमा दिया– ‘छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी।।’ क्योंकि ‘जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाउ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ।।’–योगयुक्त मंत्र का प्रभाव तब फलीभूत होता है जब किसी को बताया ना जाए। कदाचित् बता देते तो सी.आई.डी. विभाग सक्रिय हो जाता, राजा के प्राण बच जाते, राज बच जाता। और नहीं बताया तो परिणाम निकला कि सर्वनाश हो गया।
‘मंत्र गोपनीय है।’ कपटी मुनियों ने इसका बड़ा लाभ उठाया। कालनेमि ने हनुमान जी को भरमा रखा था। हनुमान जी जब उधर से गुजरे तो कालनेमि रावण का अनुचर, पीछे से चला। हनुमान जब चल दिए तो पीछे से रावण ने बुलाकर उसको भेजा और वह हनुमान जी से पहले पहुँच गया–
अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया।।
सर, वाटिका तैयार। मंदिर तैयार। अपने बैठने की चौकी तैयार। वेश भी बना लिया – ‘मैं तो राम ही राम पुकारू और नाम नहीं जानू… सीताराम सीताराम सीताराम….’
हनुमान भी आ गए झाँसे में, सोचा, कोई महापुरुष हैं, प्रणाम कर लें। जहाँ प्रणाम करने आये, कालनेमि बोला- आओ हनुमान।
हनुमान बोले– प्रभो! आप हमें पहचानते हैं?
कालनेमि बोला– अच्छी तरह पहचानता हूँ। मैं तपोबल से देख रहा हूँ, राम-रावण युद्ध हो रहा है, लक्ष्मण को शक्ति लगी है। एक वैद्य ने तुमको भेजा है। विजय रामजी की होगी। उस दुष्ट राक्षस की आयु पूरी हो गई है। हनुमान, तुम ऐसा करो, रात भर यही विश्राम करो। हनुमान बोले– अरे, मैं यहाँ विश्राम करूँगा तो रामदल में अंधेरा हो जाएगा।
कालनेमि बोला– अरे, तुम्हारे जैसे अंतरंग भगत में इतना अविश्वास कहाँ से आ गया हनुमान? जहाँ राम रहते हैं, सदा प्रकाश रहता है। वहाँ अंधेरा हो ही नहीं सकता। खैर कोई बात नहीं, तुम सर मज्जन करके आओ और हमसे गुरुमंत्र ले लो।
लगे हनुमान मंत्र लेने। तालाब में जहाँ पाँव रखा तो मगर ने पकड़ लिया। उठाकर पटका तो उसमें से दिव्य गंधर्वी प्रकट हुई, वह बोली– हनुमान जी! प्रभु को किसी संजीवनी की आवश्यकता नहीं थी। मेरे उद्धार के लिए आपको भेजा है। लेकिन सावधान हनुमान जी! ये रावण का अनुचर राक्षस है, मुनि नहीं है– ‘मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा।।’-आपकी हत्या करने के लिए यह मौके की तलाश कर रहा है।
हनुमान जी ने कहा– तुम निश्चिन्त रहो। यह मेरी हत्या करने नहीं आया बल्कि खुद मरने आया है। जाते ही हनुमान जी ने कहा–
कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछे हमहिं मन्त्र तुम्ह देहू।।
महाराज, गुरु दक्षिणा ले लो, फिर मंत्र देना।
वह बोला- नहीं बेटा, पहले तू मंत्र ले ले।
हनुमान बोले- नहीं नहीं, पहले दक्षिणा ले लो, फिर मन्त्र।
वह बोला- ला क्या देता है….
हनुमान बोले- जरा चरण इधर बढ़ाइये।
जहाँ चरण बढ़ाया, पाँव पकड़ कर पटक दिया हनुमान ने और आगे बढ़ गये। यदि यह मंत्र गोपनीय रहा होता तो हनुमान देर से निकलते उस भ्रमजाल से। इसलिए गोपनीय मंत्र की आड़ पकड़कर लोगों ने बहुत धोखा दिया है समाज को।
धृतराष्ट्र से उनके मंत्री चार्वाक ने आकर कहा- राजन्! आप पांडवों को मरवा डालो। आपके बच्चे पाण्डवों की अपेक्षा पीछे होते जा रहे हैं। पाण्डव तरक्की पर तरक्की किए जा रहे हैं।
धृतराष्ट्र बोला- कैसे मरवाएँ?
चार्वाक बोला- राजन्, आप संतों की भाषा बोलिए कि यह संसार झूठा है, नश्वर है, दो कौड़ी का है, यह जीवन निरर्थक जा रहा है, मैं तो तपस्या करूँगा। मुझे राजपाट से कोई प्रयोजन नहीं है।
तब धृतराष्ट्र ने ‘प्रिय अनुजपुत्रों-प्रिय अनुजपुत्रों’ की झड़ी लगा दी। लाक्षागृह बना डाला। वहाँ भगवान का वरदहस्त था, इसलिए पाण्डव सुरक्षित निकल गए। तो यह बहुत खतरनाक मंत्र हैं। इससे बहुत लोगों ने काम लिया।
भगवान बुद्ध जब घर से निकले ही थे, पहले दिन ही जब वनवास में कदम रखा, भगवा वस्त्र पहने एक संन्यासी दिखाई दिया। बुद्ध ने कहा– आप संन्यासी नहीं हो सकते। यह धनुष-बाण और यह आड़ में छुपाई हुई छुरी… तुम तो हमें वधिक लग रहे हो।
वह बोला– मैं वधिक ही हूँ।
बुद्ध बोले– यह भेष क्यों बनाया?
शिकारी बोला– इस भेष से मृग विश्वास करके जल्दी करीब आ जाते हैं तो मेरा काम जल्दी हो जाता है।
बुद्ध बोले– ओह, उनके विश्वास को भी तुमने धोखा दिया। कितना अत्याचार! संतों के वेश को भी तुमने बदनाम किया। लो, यह मेरे वस्त्र तुम ले लो, अपने वस्त्र हमें दे दो।
राजकीय पोशाक थी, उसने खुशी-खुशी उनको ले लिया। जब बदल लिया तो बुद्ध ने कहा– फलाने जगह दुकान में जाकर दिखाना, तुम्हें खूब धन मिल जाएगा जिससे तुम कोई दूसरा धंधा करना।
इसलिए हमें उसी नाम को जपना है जिसे जपने के लिए हमारे महापुरुषों ने कहा है। दो-ढाई अक्षर का एक परम प्रभु का नाम – ओम् या राम में से कोई एक। गुरु महाराज का कहना था कि भजन एक छुपी हुई वस्तु है। कितनौ बेटा राम-राम करो, सब ऊपर ही ऊपर है। कहीं कुछ नहीं। किसी तत्वदर्शी महापुरुष के द्वारा यह जागृति हो जाया करता है। भजन एक जागृति है। ओम्, राम, शिव, किसी दो-ढाई अक्षर के नाम का जाप करो। कहीं भी चले जाओ, घर में रहो कहीं रहो, सुबह और शाम पाँच मिनट भी यदि गुरु का स्वरूप पकड़ लोगे तो जिसका नाम भजन है, वह घर से ही जागृत हो जायेगा।
सुबह-शाम ओम् अथवा राम किसी दो-ढाई अक्षर के एक नाम का जाप चलते-फिरते, खुरपी चलाते, खाना खाते, पानी पीते स्मृति-पटल पर आया करे, स्मरण बना रहे तो सोने में सुहागा है। सुबह-शाम बैठकर आधा घंटा-बीस मिनट समय अवश्य दो। नियम खंडित कभी भी नहीं होना चाहिए चाहे लाश पड़ी रहे तो जिसका नाम मंत्र है, मैं यहाँ बैठे-बैठे दे दूँगा, तुम घर बैठे-बैठे पा जाओगे।
!! बोलिये गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-8’ से उद्धृत)