दीन कौन?
एक परमात्मा की शरण छोड़कर, उबक-तुबक कर कितना भी इकट्ठा कर लो आखिर दीन का दीन! किले ध्वस्त हो गये, चतुरंगिणी सेना चली गई… क्या किसी को उम्मीद थी?
एक बार पृथ्वी देवताओं, ऋषियों को लेकर पहुँची ब्रह्मा के पास कि भगवन्, हमारी रक्षा करो। देखते ही विधाता समझ गये कि इनका मसला क्या है।
ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई।
जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई।।
मेरा भी कोई बस नहीं चलेगा। जिसकी तुम दासी हो, पृथ्वी! वो अविनाशी है। हमारा तुम्हारा रक्षक है वह, उन प्रभु की शरण जाओ। सबने मिलकर प्रार्थना की–
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई।
तो पृथ्वी दीन, देवता दीन। सबकी शरणस्थली केवल भगवान हैं।
भरत को कैकई ने चक्रवर्ती सम्राट का पद तो दिलवा दिया, उसे हटाया भी किसी ने नहीं, लेकिन भरत दीन था। उसने कहा-
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।
भगवान राम के चरण-कमलों का दर्शन किये बिना, यह जी में जो जलन है, वह कभी नहीं दूर होगी। ‘कारन कवन’? जब वह गये चित्रकूट, रामजी तो नहीं आये लेकिन खड़ाऊँ मिल गया। भरत ने खड़ाऊँ को गद्दी पर बैठा दिया और-
नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।
यह लकड़ी की माला है, इसको रख दिया, अब बतावें माला, क्या करें? इस चप्पल को हमने रख दिया ऊपर, चप्पल बतावें, क्या करें? लकड़ी की खड़ाऊँ से पूछते रहे और राजकाज करते रहे। खड़ाऊँ बोलता है क्या?
ख्याल ही खड़ाऊँ है। प्रभु के चरण-कमलों को हृदयरूपी गद्दी पर बैठा लिया और जैसे-जैसे भगवान हृदय से जागृत होकर देखते हैं कि इस भगत को क्या जरूरत है?, इसका हित किसमें है?, वही सुझाव बराबर धड़ाधड़ मिलता रहेगा। आगे थोड़ी दूर पर मौत खड़ी है, भगवान कह देंगे- आगे मत बढ़, यहीं रुक जा। भगवान शून्य से, पेड़ से, पत्तियों से…. हर तरीके से साधकों को सावधान करते रहते हैं। कमी है तो साधक द्वारा आदेश-पालन करने की। किन्तु मोह का रस्सा इतना मजबूत है, आज तक ब्रह्मा भी नहीं तोड़ पाया।
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।
इसलिए भगवान के चरणों में जो ख्याल है, सुरत लग गयी वही खड़ाऊँ है। फिर साधना क्या, कैसे है?, संसार कितना जल गया, कितना बाकी है?, कितना पार हो गये, कितना दूरी? – भगवान सब एक-एक सूत का हाल बताते रहते हैं। ‘मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।‘
चौदह वर्ष बीत गये, राम जी नहीं आये तो-
कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।।
कारण क्या है, नाथ नहीं आये? हमें कुटिल समझकर भुला तो नहीं दिया?
रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की।।
किसी भगत से, सेवक से चूक भी हो गयी, भगवान ध्यान नहीं देते। उसका हृदय कैसा है, उस पर भगवान निर्भर करते हैं। ‘करत सुरति सय बार हिए की’– सौ बार हृदय की जो लगन है, श्रद्धा है, भगवान उस पर ध्यान देते हैं।
बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।
यह जो तिथि निश्चित की थी (अवधि माने समय होता है), यह बीत गया… चौदह साल। आज अन्तिम दिन बीत गया, भगवान् नहीं आये तो मैं प्राण त्याग दूँगा।
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।
बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत।।
राम के विरह के सागर में भरत का मन डुबकियाँ लगा रहा था, इतने में हनुमान पहुँच गये जैसे डूबते हुए व्यक्ति के लिए तुरंत जहाज आ गई हो- ‘आइ गयउ जनु पोत‘। जैसे डूबते हुए को नौका मिल गई हो, वह नौका आ गयी, हनुमान आ गये। हनुमानजी ने देखा- आँखों में आँसू थे। कुशवाली चटाई जो भरत चौदह साल पहले बिछा कर बैठे थे, उसी चटाई पर बैठे थे। वह घिस गयी थी, चौदह साल बहुत होता है। यहाँ थोड़ा-सा ऑटे-बॉटे लागत है तो गद्दा बदल देते हैं, बेडशीट बदल देते हैं, पलंग बदल देते हैं। चक्रवर्ती सम्राट के पद पर बैठा हुआ भरत! चटाई चौदह साल पहले बिछाई, घिस गई, तिनके इधर-उधर जा रहे थे, उसी पर बैठे मिले। बाहरी दिखावा तो जड़ जीव के हिस्से में पड़ गये। जब भगवान में लौ लग जाती है, उनका लक्ष्य – भगवान से सुरत की डोर न टूटे। भरत को होश हो, याद हो, तब तो शृंगार करे। शृंगार करने वाला तो कहीं चला गया।
एक महात्मा थे। उनसे भगवान ने कहा- एक वर्ष में फरसे से तुम्हारी गर्दन कट जायेगी। महात्मा ने साष्टांग दंडवत किया- प्रभु, सेवक पर इतनी बड़ी कृपा। मृत्यु का दिन एक वर्ष पहले बता दिया, अब मैं एक भी स्वास व्यर्थ नहीं जाने दूँगा सिवाय भजन के, राम नाम के।
वह डूबकर लग गये भजन में। महात्मा के भगत बहुत थे। वे आवें तो कहें- महाराज, यह खराबी, वह सही…। महात्मा बोलते- उसकी मौज से अच्छा ही हुआ। भगत बहुत खोपड़ी खायें तो महात्मा बोले- अरे! मैं तो कहूँ चलो गये रहो, फिर से कहो। भगत बोले- महाराज! ऐसा-ऐसा हो गया। महात्मा फिर कहते- हूँ… मैं तो कहूँ चलो गये रहो हूँ, फिर से कहो।
दो-चार बार कहकर लोग खुद ही ऊब जायें। महात्मा पागल नहीं थे, जी छुड़ाने के लिए ऐसा करते। भगत कहते- महाराज! भैंस बियाई है अठारह लीटर दूध वाली। महात्मा बोले- उसकी मौज से अच्छा हुआ। चार दिन बाद वह भगत दौड़कर आये, बोले- महाराज! पड़िया तो मर गई और भैंस ने दूध देना बन्द कर दिया। महात्मा बोले- चलो, उसकी मौज से अच्छा ही हुआ।
लोग कहते- फसल बहुत अच्छी है महाराज! महात्मा बोले- चलो उसकी मौज से अच्छा ही हुआ। लोग कहते- अरे महाराज! खलियान में तो आग लग गयी, गाँव भर का खलियान जल गया। महात्मा ने कहा- चलो, उसकी मौज से अच्छा ही हुआ। भला हो चाहे बुरा हो, उसकी मौज से अच्छा ही हुआ।
महाराज का एक अंतरंग भगत था। आश्रम में समय से झाड़ू लगाना, पानी भरना… सब काम वही करता था। उसका एक ही लड़का था, दुर्भाग्य से वह मर गया। महाराज को पता चला, दुःख तो महाराज को भी था। असह्य दु:ख था, एक भगत का लड़का मर गया लेकिन भगवान का विश्वास कैसे त्याग दें।
तीन दिन बाद वह आया, महाराज बोले- बेटा, तीन दिन आये नहीं। वह बोला- महाराज! जो लड़का रहा आठ साल वाला, वह मर गया। महाराज बोले- चलो, उसकी मौज से अच्छा ही हुआ। उसको इतना बुरा लगा, क्रोध में तमतमाया और चला गया घर।
घर जाकर लगा फरसा में धार लगाने। हमारा सर्वनाश हो गया, कहते हैं- उसकी मौज से अच्छा हुआ, आज इन बाबाजी को काट डालेंगे। हमें नहीं मालूम था बाबा लोग इतने निर्मोही होते हैं। अपने न खाकर इनको खिलाओ, घर का काम बिगाड़कर इनके यहाँ झाड़ू लगाओ, हमें नहीं मालूम था इतने निर्मोही होते हैं। कहते हैं, उसकी मौज से अच्छा हुआ, आज हम जरूर काट डालेंगे।
वह रातभर फरसा में धार लगाता रहा, एक पल नहीं सोया। पुत्र मोह इतना भंयकर होता ही है। फरसा लेकर चल दिया।
महात्मा लोग नित्यक्रियाओं से निवृत्त होने प्राय: थोड़ी दूर… एक-डेढ़ किलोमीटर दूर जाया ही करते हैं, यह नियम है। जंगल में रहने वाले महात्माओं का पक्का नियम होता है। वह रात-दिन का सेवक था, उसे मालूम था, पहाड़ उस पार किस झाड़ी में जाते हैं। वहाँ पहले ही से छिपकर बैठ गया, महाराज यहाँ आकर बैठेंगे और फरसे से गर्दन उतार दूँगा। कहते हैं, उसकी मौज से अच्छा हुआ। हमारा सर्वनाश हो गया, यह कहते हैं- अच्छा हुआ।
महात्मा का निश्चय था- हर समय एक स्वाँस व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। वह भजन में…., नाम जपते हुए आधी आँख बन्द, आधी आँख खुली चले जा रहे थे उसी झाड़ी की ओर। करीब पहुँचे थे कि एक गड्ढा पत्तियों से ढँका हुआ था, और भीतर खड़ी खूँटी थी पैनी। पूरे शरीर का वजन उसी पर पड़ गया, धम्म… तो खूँटी भीतर से तलुआ पार करके इस पार हो गयी। खून ही खून। महात्मा कराहते हुए बैठ गये, आँखों में आँसू भी थे, चेहरे पर मुस्कान भी थी।
अब झाड़ियों में से उस भगत ने देखा, सोचा- अरे, महाराज को तो खूँटी गड़ गयी, अब जरा पूछकर देखूँ कि उसकी मौज से कैसा हुआ। तो फरसा छिपाकर वह पहुँचा, बोला- अरे महाराज! आपको तो खूँटी गड़ गई। महाराज बोले- बेटा, उसकी मौज से बहुत-बहुत-बहुत अच्छा हुआ। तो चेला बिगड़ा- क्या बहुत अच्छा हुआ… टिटनेस हो जाई तो ऐंठ के मर जाओगे। और ठीक भी होगा तो छ: महीने से पहले नहीं होगा। पहले इतनी बढ़िया दवाईयाँ कहाँ थीं। पहले लोग मूँज की रस्सी तेल में डुबाकर, आग में जलाकर तेल टपकाया करें ताकि खून बन्द हो जाय।
महाराज बोले- बेटा! आज फरसा से मेरी गर्दन कटने वाली थी, लेकिन राम नाम के प्रभाव से गर्दन बच गयी, खूँटी ही गड़कर रह गयी। यदि एक पाँव कट गया होता तो भी हम फायदे में रहते। भला इस शरीर से भगवान् ने भजन करने का अवसर तो प्रदान किया। इसलिए बेटा बहुत-बहुत-बहुत अच्छा हुआ।
वह सनका, बोला- अरे महराज! आपकी गर्दन काटने तो हम ही बैठे थे। विश्वास न हो तो यह फरसा देखिए। तब महाराज बोले- तुम्हारी हैसियत है हमारी गर्दन काटने की! चला फरसा! काट गर्दन!! वह बोला- अब तो नहीं है महाराज। महात्मा बोले- तू नहीं बैठा था। हमारा काल तुम्हारे अन्दर प्रेरणा करके बैठा था। लेकिन राम नाम के प्रभाव से उस काल की गति बदल गई, मृत्यु वाला काल कट गया। मृत्यु जरूर आयी, खूँटी गड़कर रह गई। यदि खूँटी भी नहीं गड़ती तो हम कैसे पता पाते कि काल भी आने वाला था, इसलिए यह जरूरी था।
सेवक उन्हें लाद-लूदकर लाया और सेवा करने लगा। सेवक तो था ही। तो होनी कैसी भी हो,
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
कागभुसुण्डजी कहते हैं कि- गरुड़ जी, यदि भगवान कृपा कर दें तो सिर पर सुमेरू पहाड़ भी गिरना है तो रजकण बनकर गिरेगा। भगवान की कृपा से विष अमृत हो जायेगा और शत्रु मित्र हो जायेंगे। अथाह भवसागर गाय के खुर के बराबर हो जायेगा, और अग्नि शीतलता प्रदान करने वाली हो जायेगी।
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं।।
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।।
भगवान् के नामजप को मंत्र कहते हैं। मंत्र एक महान मणि है। असाध्य कुअंक लिखा है, मृत्यु लिखी है, मृत्यु जीवन में बदल जायेगी, दु:ख सुख में बदल जायेगा, शत्रु मित्र बन जायेंगे, विपत्ति संपत्ति हो जायेगी, ग्रहदशा कट जायेगी।
जब भरतजी को देखा हनुमानजी ने-
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात।
राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात।।
जटा का मुकुट था, ‘कृस गात’– खान-पान से बढ़ने वाला भरतजी का शरीर वह तो गल गया। चौदह वर्ष से कायदे से खाना तो खाया ही नहीं था। जटा उलझ गयी थी, वही मुकुट था। कंठ पर नाम था, आँखों में अश्रु थे, कृस गात था – इस दशा में हनुमान जी ने देखा भरत को, तो अपार हर्ष हुआ।
देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।।
शरीर रोमांचित हो गया, आँखों से अश्रु छलकने लगे। रावन को सजा-सजाया देखा तो लंका फूँक दिया। भरतजी को भजन में तल्लीन देखा तो हनुमानजी के प्रेमाश्रु ही नहीं रुक रहे थे। हरिभक्तों को देखकर भक्तों को अपार हर्ष होता ही है। हनुमानजी ने कहा-
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरन्तर गुन गन पाँती।।
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।।
जिसके विरह में रात-दिन सोचते रहते हो वह भगवान् आ गये। इतना सुना कि राम आ गये, भरतजी उछल कर खड़े हो गये, गले से लिपट पड़े, बोले- हाल-चाल बताओ। तुरन्त भरतजी ने कहा-
एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।।
नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।।
मैं तुमसे उऋण नहीं हूँ तात, अब भगवान् का चरित्र सुनाओ। हनुमानजी ने कहा- अब चरित्र मत सुनो, वह जो चिड़िया उड़ रही आकाश में, वह है पुष्पक विमान, उसी में हैं राम। स्वागत की तैयारी करें।
भरत जी झोपड़ी से बाहर निकल कर आये तो पुष्पक उतर गया। अपार वानरी सेना उसी में थी- ‘पदुम अठारह जूथप बंदर।’। उस युद्ध में राक्षस तो मर गये, फिर कभी नहीं उठे लेकिन वानर एक भी नहीं मरा क्योंकि भगवान् ने शुरू में ही कहा था, तुम लोगों का विचार है कि मैं रावण का वध कैसे करूँगा, यदि तुम युद्ध देखना चाहते हो तो चलो। सब तैयार हो गये। इसलिये मर भी गये थे लेकिन अन्त में जीवित हो गये।
सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर।।
भालू-बन्दर तो सब जीवित हो गये। जो युद्ध के पहले दिन मर गया था वह भी जीवित हो गया, और निशाचर एक भी नहीं। भला अमृत भी पक्षपात करता है? यह पक्षपात कैसा? रामजी के राज्य में जीवों के साथ इतना पक्षपात? उसका कारण था- सभी असुर ‘राम राम कहि तनु तजहिं, पावहिं पद निर्बान।’ राम कहाँ, मारो राम को…., राम-राम कहकर तो असुर मरे थे, वह तो चले गये धाम। और राक्षस-राक्षस कहकर वानर मरे थे इसलिए बेचारे पड़े थे वहीं पर।
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।।
रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूटे भव बंधन।।
सारे असुर राम-राम जपते हुये मरे, राम के आकार में परिवर्तित हो गये, राम स्वरूप हो गये, राम में विलय हो गये। वहाँ कोई असुर था ही नहीं। और जो लड़का-बच्चा जपते-जपते मरे रहे, वह सब जीवित हो गये, जाओ देखो लड़का बच्चा।
निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू। सुमिरहु मोहि डरपहु जनि काहू।।
मेरा सुमिरन करो, किसी से मत डरना। न ग्रह, न राहु, न केतु, न शुक्र, न शनिश्चर, न भूत-प्रेत….. किसी से डरने की कोई आवश्यकता नहीं।
‘सुमिरहु मोहि डरपहु जनि काहू’– जहाँ एक भगवान् का सुमिरन होता है वहाँ राहु, केतु, शनिश्चर, ग्रहदशा भूत-प्रेत,जंत्र, मंत्र, तंत्र पहुँचते ही नहीं। उनके निकट भी नहीं आते। तो वहाँ राक्षस थे कहाँ, जिनको जिन्दा कर दें। वे राम के रूप में विलय पा चुके थे। ये लड़कों-बच्चों की चिंता वाले पड़े थे, सब जीवित हो गये।
वास्तव में दोनों दलों के ऊपर अमृत की वर्षा हुई, राम की सेना, बन्दर-भालू सब उठ गये, निशाचर एक भी नहीं जीवित हुआ। तब तो अमृत ने भी पक्षपात कर दिया, लेकिन ऐसा नहीं है , यह है मानस। आसुरी वृत्ति सदा के लिये शान्त हो गयी, राम के आकार में परिवर्तित हो गयी जिसके बाद जीवन में कभी अशान्ति नहीं रहती। साधक अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है, फिर मायारूपी नारी का प्रभाव साधक के ऊपर नहीं पड़ता। यह तभी संभव है जब इष्ट अर्थात् सद्गुरु हृदय से जागृत होकर अनुभव के माध्यम से साधक को उठायें बैठायें हर परिस्थिति में साथ रहें तथा धीरे-धीरे असुर अर्थात इन विकारों को शान्त करें। ब्रह्मआचरणमयी वृत्तियाँ ही वानरी सेना है, पूर्णत: विकसित हो जाती हैं। जब तक साधक आत्मस्थिति को नहीं प्राप्त कर लेता, तब तक यह साथ देती रहेंगी। स्वरूप की प्राप्ति के बाद यह भी विलय हो जायेंगी।
वानर बोले- हम भी अयोध्या देखेंगे। रामजी बोले- बैठो फिर। क्या गजब का विमान था! ‘पदुम अठारह जूथप बंदर’- अठारह पदुम तो सेनापति थे! और एक-एक सैन्य में कितने रहे होंगे? हमें लगता है जो आप लोगों की गिनती है, उससे परे… अपार….। जब गिनती भूल जाय तो अपार। आगे गिनती न हो तो अपार। अपार वानर बैठे पुष्पक में।
जब अयोध्या में सबको उतार दिया, रामजी ने पुष्पक से कहा- तुम अपने मालिक कुबेर के पास जाओ। पुष्पक ने सादर प्रणाम किया और चला गया। लाख वर्ष रावन घूमा, रामजी वानर दल के साथ अयोध्या आये, बाल-बियरिंग भी नहीं घिसा, मोबिल ऑयल भी कम नहीं पड़ा, न पेट्रोल भरना पड़ा…. क्या आविष्कार थे। अब सब वैज्ञानिक बने घूमते हैं। कभी भी दुनिया में आविष्कार कम नहीं रहे, आविष्कार सदैव रहे। पूर्वजों के आविष्कार के सामने आज की दुनिया के आविष्कार नगण्य है।
— सीता दीन थी।
हनुमान जी जब लंका गये सीता की खोज के लिए, अशोक वृक्ष के पल्लवों के बीच में बैठकर सीताजी को उन्होंने देखा।
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।
सीताजी ने अपने अभीष्ट पद पर दृष्टि गड़ा रखा था। ‘निज पद‘ माने अपने पाँव में नहीं, ‘निज पद‘= अपना परमधाम, अभीष्ट पद पर दृष्टि थी, भगवान् के चरणों में दृष्टि थी, मन रामजी के चरणों में लीन था।
हनुमान जी से परिचय हुआ, सीताजी को विश्वास हो गया कि राम के ही दूत हैं तब सीताजी ने संदेश दिया रामजी को-
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।
‘दीन दयाल बिरिदु संभारी‘– प्रभु, आप दीनों पर दया करने वाले हैं, अपनी बिरुदावली को संभालें और मेरा भयंकर संकट हर लें प्रभु। तो सीता दीन थी। लंका में थीं तो दीन होना ही चाहिये था, लेकिन दीन की परिभाषा यह नहीं कि वह असुरों से घिरी हुई थीं।
हनुमान जी जब वापस गये, राम जी ने पूछा- कैसी हैं सीता? तुमने देखा? हनुमान जी बोले- हाँ। राम बोले- कुछ संदेश दिया? हनुमान जी ने कहा- प्रभु, सीताजी ने कहा है-
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी।।
मन-क्रम-वचन से मैं चरणों की अनुरागी हूँ तो कौन-सा ऐसा अपराध है जिससे आपने मुझे त्याग दिया?
सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
विशाल विपत्ति है प्रभु, बगैर कहे ही भली है।
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।
एक-एक क्षण एक-एक कल्प के समान बीत रहे हैं। शीघ्र ही चलिए और अपने भुजाओं के बल से असुरों को जीतकर सीताजी को ले आइए।
भगवान राम ने कहा- हनुमान, तुम हमारा समय नष्ट कर रहे हो, कारण कि-
बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
मन-क्रम-वचन से मेरे चरणों का अनुरागी है, मेरी गति है, स्वप्न में भी विपत्ति उसका स्पर्श नहीं कर सकती। एक तरफ तो कहते हो- मन-क्रम-वचन से चरणों की अनुरागी है, दूसरी तरफ कहते हो, सीता पर विपत्ति बिसाल है। चरण-अनुरागी को विपत्ति असंभव है। होनी ही नहीं चाहिये। सपने में भी विपत्ति का आभास भी नहीं होना चाहिए।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
हनुमान जी ने कहा- प्रभो! आपका भजन-सुमिरन जिन क्षणों में नहीं होता, वही विपत्ति, काल है। और कोई विपत्ति नहीं है। तो भईया, भजन नहीं करोगे तो विपत्ति ही विपत्ति है। और भजन करोगे तो कोई विपत्ति नहीं। और भजन करने के लिये कुछ त्यागना नहीं है। सब काम तो करते ही हो, एक काम जो जरूरी था, जिसके लिये दुर्लभ मानव तन मिला है, जो अति आवश्यक था मानव मात्र के लिये – एक प्रभु में श्रद्धा स्थिर करके नाम का जाप करो। चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाना खाते, पानी पीते, शौच जाते और जब तक जागो, स्मृति-पटल पर नाम बना रहे, सोने में सुहागा है। सुबह-शाम बैठकर आधा घण्टा समय अवश्य देना चाहिये। बस इतना ही करो।
और हम बड़े विद्वान हैं, हम बड़े भगत हैं – ऐसा अभिमान हुआ ही करता है। जब तक हम अलग, प्रभु अलग हैं, कहाँ हम बड़े भक्त हैं? जब तक दर्शन, स्पर्श और प्रवेश न मिल जाय तब तक पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। अर्जुन को जब-जब अभिमान हुआ, भगवान् ने पटकनी दिलवा दिया, दिमाग ही ठण्डा हो गया। तो भजन एक प्रभु का।
रेगिस्तान में पचासों किलोमीटर कुआँ नहीं, पानी नहीं, नदी है ही नहीं लेकिन वो कैसे जिन्दे हैं? जीवित तो हैं कायदे से। लोगों ने प्याऊ लगा रखी है, पानी पिलाने वाले अड्डे बना रखे हैं। कोई भी भूखा-प्यासा आया तो उसको अन्न-जल मिलेगा।
एक प्यासा आदमी, अब प्राण गये तब प्राण गये, इस दशा में पहुँच चुका था, और चला ही जा रहा था। उसने सोचा कि बैठ गया तो मौत ही मौत है। चलता रहूँ, शायद कहीं पहुँच जाऊँ। जीवन की आशा की डोरी पकड़े चला जा रहा था।
एक कुआँ दिखाई पड़ा, चार लड़कियाँ खड़ी थी उस पर। वह बोला- प्राण संकट में हैं, जल्दी पानी पिलाओ। तो एक लड़की उठी, बोली- अंजली रोपो तो पिलावें। जहाँ अंजली रोपा तो दूसरी ने टोका, कहा- इसके हाथ से जल मत पिओ मुसाफिर, जन्म भर पछताओगे, रोने को आँसू नहीं मिलेंगे। वह बोला- बात क्या है? वह बोली- हमारा पिओ। उसने पूछा- आप कौन हैं? और यह कौन हैं? वह बोली- यह है बुद्धि। बुद्धि का क्या ठिकाना, आज सही, कल गलत, परसों सही। यह उठा-पटक लगा ही रहता है बुद्धि में। मेरा नाम विद्या है। विद्याविहीन बुद्धि किस काम की? ‘विद्याविहीन: पशुरस्ति को वा‘– विद्या से हीन है तो पशु में और उसमें फर्क ही क्या है।
उसने अंजली रोपा और विद्या जब पानी पिलाने लगी तो तीसरी बोली- मत पियो मुसाफिर, बहुत पछताओगे। मेरा जल पियो। वह बोला- आप कौन? वह बोली- मैं हूँ लक्ष्मी। मेरे हाथ से जल पियो। विद्या का क्या भरोसा! चाहे कैसा भी विद्वान हो, इन लक्ष्मीपतियों के यहाँ कम्प्यूटर ही तो चलाता है, और क्या करता है! एक-एक सेठ के पास दो-चार सौ पढ़े-लिखे कर्मचारी होते हैं।
जहाँ अंजली रोपा तो चौथी ने टोका- मत पियो मुसाफिर, लक्ष्मी का क्या ठिकाना। यह है चंचला, आज इस घर में, कल उस घर में, परसों गायब। ‘काल जो बैठा मेड़ियाँ आज मसाना दीठ।‘ लक्ष्मी का क्या ठिकाना, मेरा पानी पियो। वह बोला- आप कौन? वह बोली- मैं हूँ होनी, किस्मत, भाग्य। फिर उसने होनी का पानी पिया।
चित्तवृत्ति कभी बुद्धि के भरोसे, कभी विद्या के भरोसे, कभी लक्ष्मी के भरोसे आस लगाये ही रहती है। लेकिन यदि भाग्य में नहीं है तो नहीं मिलेगा। और भाग्य आपकी मुठ्ठी में है, कर्म के आधीन है-
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।।
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।।
भगवान के नाम का जप करो, यह मंत्र महान मणि है। असाध्य कुअंक, घोर नरक और यातना कर्म में लिखी हैं तो बदल जायेगी, दु:ख सुख में बदल जायेंगे, शत्रु मित्र हो जायेंगे, होनी बदल जायेगी। अन्यथा-
होनी के हाथ में तू एक खिलौना है।
उसने जो सोच लिया बस वही होना है।।
होनी अवश्यंभावी होती है, लेकिन मंत्र महान मणि है। तो होनी का पानी पीने का एक ही तरीका है – एक प्रभु में श्रद्धा स्थिर करके, समर्पण के साथ एक प्रभु के नाम का जाप करो। मृत्यु जीवन में बदल जायेगी, दु:ख सुख में बदल जायेंगे।
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।।
सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।
बुद्धि, कीर्ति, सुगति, विभूति, उपकार की भावना जिसने जब जिस प्रकार जहाँ से भी प्राप्त किया, वह सब सत्संग के प्रभाव से ही प्राप्त किया है। लोक और वेद में और कोई दूसरा उपाय नहीं है।
।। बोलो श्री गुरुदेव भगवान की जय।।
(‘अमृतवाणी भाग-8’ से उद्धृत)