दरबार में सच्चे सद्गुरु के
(दिनांक २९–११–२००९ ई० को चंदौली, उ०प्र० की विशाल जनसभा में पूज्य स्वामीजी का प्रवचन।)
दरबार बहुत देखे हमने, तेरे जैसा दरबार नहीं।
जब शीश झुका गुरु चरनन में, तब जन के सिर कोई भार नहीं।।
दरबार में सच्चे सद्गुरु के, दु:ख–दर्द मिटाये जाते हैं,
दुनिया के सताये लोग यहाँ, सीने से लगाये जाते हैं।
यह महफिल है मस्तानों की, हर शख्स यहाँ है मतवाला,
भर–भर के जाम इबादत के, यहाँ सबको पिलाये जाते हैं।
ऐ जगवालों क्यों डरते हो, इस दर पै शीश झुकाने को,
ऐ नादानों यह वह दर है, जहाँ शीश चढ़ाये जाते हैं।
इल्जाम लगानेवालों ने, इल्जाम लगाये लाख मगर,
तेरी सौगात समझ करके, हम सिर पै चढ़ाये जाते हैं।
ऐ जगवालों जिन प्यारों पर, है खास इनायत सद्गुरु की।
उनको ही संदेशा आता है, और वे ही बुलाये जाते हैं।।
इस दुनिया से मैं क्या माँगू, दुनिया तो एक भिखारन है,
मैं माँगू अपने स्वामी से, जो जगतपिता कहलाते हैं।
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सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता।
सोइ महि मंडित पंडित दाता।।
धर्म परायन सोइ कुल त्राता।
राम चरन जाकर मन राता।। (मानस, ७/१२६/१-२)
संसार में वह सबकुछ जाननेवाला है, वही गुनी है, वही ज्ञाता है, वही पंडित है, वही दानदाता है – उसके पास देने लायक सामग्री है, कौन? ‘राम चरन जाकर मन राता।’ राम, एक परमात्मा के चरणों में जिसका मन अनुरक्त है।
नीति निपुन सोइ परम सयाना।
श्रुति सिद्धान्त नीक तेहिं जाना।। (मानस, ७/१२६/३)
वही नीति में निपुण है, परम सयाना है अर्थात् समाज का सबसे सुलझा हुआ पुरुष है, वेदों का सिद्धान्त उसने भली प्रकार जान लिया है (भले ही वह अँगूठा छाप हो, चाहे उसने विद्यालय का मुख कभी न देखा हो तब भी वेदों का सिद्धान्त उसने भली प्रकार जान लिया है।) कौन? ‘राम चरन जाकर मन राता।’ राम, एक परमात्मा के चरणों में जिसका मन अनुरक्त हो गया है।
कोई जन्मपर्यन्त वेद पढ़े, निर्णय तो एक ही मिलेगा कि राम को भजो। तो आज ही से यदि भजते हैं तो काम चल गया आपका। बाल्मीकि कहाँ से गीता पढ़कर आये थे? केवल ‘मरा-मरा’ कहने से और एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर करने से उनका काम चल गया। मानस के निर्माता भगवान शिव ने बताया कि धार्मिक कौन है?–
सोइ कुल धन्य उमा सुनु, जगत पूज्य सुपुनीत।
श्री रघुबीर परायन, जेहिं नर उपज बिनीत।। (मानस, ७/१२७)
उत्तरकाण्ड मानस में उठाये गये प्रश्नों का उत्तर है, समाधान है। मानस के रचयिता भगवान शिव हैं तथा लोमश, याज्ञवल्क्य, भरद्वाज, बाल्मीकि, तुलसी इत्यादि मानस के अनुवादक हैं। मानस के निर्माता भगवान शिव कहते हैं कि हे पार्वती! वह सारा कुल कृतार्थ है जिस कुल में किसी एक का राम में, उन प्रभु के चरणों में अनुराग पैदा हो गया। बस इतना ही सम्पूर्ण धर्म है, इतना ही सबकुछ है। एक परमात्मा को धारण करना ही धर्म है।
रामचन्द्र के भजन बिनु जो पद चह निर्बान।
ग्यानवन्त अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान।। (मानस, ७/७८ क)
राम, एक परमात्मा के भजन के बिना यदि कोई निर्वाण चाहता है, परम कल्याण चाहता है तो वह बिना सींग-पूँछ का पशु है। उसमें और बैल में कोई अन्तर नहीं है। उसे पूँछ नहीं है, सींग नहीं है लेकिन है पक्का बैल। भला महापुरुष इससे अधिक कौन-सी ताड़ना दें! लोग कहते हैं कि हिन्दू वह है जो तैंतीस करोड़ देवी-देवता माने और एक ईश्वर को माननेवाला मुसलमान! मध्यकाल में शिक्षा पर प्रतिबन्ध लग जाने से इन भ्रान्तियों ने भारतवासियों का पीछा किया है, जबकि प्राचीन सभी महापुरुषों का एक मत रहा है कि–
सिव अज सुक सनकादिक नारद।
जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद।।
सब कर मत खगनायक एहा।
करिअ राम पद पंकज नेहा।। (मानस, ७/१२१/१२-१३)
शिव, ब्रह्मा, विष्णु, सनकादिक ऋषि, सप्तर्षि, देवर्षि नारद, व्यास और शुकदेव अनादिकाल से जितने महापुरुष होते आये हैं, सबका सिद्धान्त केवल एक है कि ‘करिअ राम पद पंकज नेहा’। सब एक ईश्वर का भजन बता रहे हैं किन्तु हिन्दू-धर्म के व्यवस्थापक कहते हैं कि एक ईश्वर कहीं लिखा ही नहीं है, एक ईश्वरवाला तो मुसलमान हो जायेगा।
रामचरितमानस में देवताओं का कहीं कोई स्वतन्त्र अस्तित्व ही नहीं है। राम–रावण युद्ध चल रहा था। देवता दूर से दृश्य देख रहे थे। रावण अभी जीवित था इसलिए वे ‘राम की जय’ कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। वे आये थे भगवान को श्रद्धा-सुमन चढ़ाने, इसलिए ‘बिकल बोलहिं जय जये।’ (मानस, ६/१०१/१० छन्द) ‘जय हो, जय हो’ बोल रहे थे। रावण ने कहा कि नमक हमारा खाते हो लेकिन तुम्हारी भाव-भंगिमा से प्रतीत हो रहा है कि तुम जय राम की चाहते हो। ठहरो, पहले तुम सबको ही देख लेता हूँ। रावण झपटा तो देवता भागने लगे। आकाश में छिटक गये। रामजी ने बाण मारा, रावण को आकाश से उतारा। युद्ध हुआ, रावण मारा गया, तब देवता समीप आकर स्तुति करने लगे–
कृत कृत्य बिभो सब बानर ए।
निरखंति तवानन सादर ए।।
धिग जीवन देव सरीर हरे।
तव भक्ति बिना भव भूलि परे।। (मानस, ६/११० छन्द)
भगवन्! ये वानर सौभाग्यशाली हैं जो आपकी सेवा में काम आये। हम देवताओं को धिक्कार है कि आपकी भक्ति के बिना आवागमन में भूले पड़े हैं। विचार करें कोई जंगल में भटक गया हो, उससे कह दें कि रास्ता दिखा दे। वह स्वयं रास्ता क्यों नहीं पकड़ लेता? कोई डूब रहा हो, उससे कोई कहता है कि ब्ाचा लो, तो क्या वह बचायेगा? बचाने लायक होता तो स्वयं न बच जाता।
हम देवता परम अधिकारी।
स्वारथरत प्रभु भगति बिसारी।। (मानस, ६/१०९/११)
‘जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो।’ (मानस, ७/१०९/८)– जब देवताओं के पास दु:ख विद्यमान है तो आपको सुखी कहाँ से कर देंगे। आपके किसी भी शास्त्र में – भागवत, गीता, रामायण, उपनिषद् इत्यादि में कहीं भी दो भगवान की चर्चा आयी ही नहीं। हर जगह है ‘ईश्वर एक’। देवता आपके हृदय की दैवी वृत्ति है। ज्यों-ज्यों दैवी सम्पद् के गुणों का उत्कर्ष होगा, परमदेव परमात्मा का देवत्व आपमें उतरता जायेगा, अर्जित होता चला जायेगा। परमदेव परमात्मा के सम्मुख दैवी सम्पद् भी अपना परिणाम देकर शान्त हो जाती है, इसीलिए भजन एक परमात्मा का! क्योंकि–
बारि मथे घृत होइ बरु, सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धान्त अपेल।। (मानस, ७/१२२ क)
पानी मथने से घी निकल आये, बालू पेरने से तेल निकल आये– यह असम्भव कदाचित् सम्भव हो जायें, किन्तु ‘बिन हरि भजन न भव तरिअ’– एकमात्र हरि का भजन किये बिना कोई भव का पार पाता ही नहीं। फिर भी लोग देवताओं के पुजारी हैं। आरम्भ में हम भी तैंतीस करोड़ देवताओंवाले भगवान के विराट् स्वरूप की पूजा किया करते थे, किन्तु गुरु महाराज की शरण में आने पर बोध हुआ कि हृदय में दैवी सम्पद् का उत्कर्ष ही देवपूजा है।
भगवान राम ने कागभुसुण्डि को संतोष देते हुए कहा–
एक पिता के बिपुल कुमारा।
होहिं पृथक गुन सील अचारा।।
कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता।
कोउ धनवंत सूर कोउ दाता।।
कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा।
सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।।
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना।
जद्यपि सो सब भांति अयाना।। (मानस, ७/८६/१-५)
एक पिता के कई लड़के अलग-अलग शील-स्वभाव, गुणधर्मवाले होते हैं। कोई पंडित, कोई तपस्वी, कोई धनवंत, कोई शूरवीर, कोई ग्याता तो कोई दानदाता किन्तु कोई ऐसा भी पुत्र है जो मन-क्रम-वचन से पिता का भक्त है। वह सपने में भी दूसरा धर्म नहीं जानता। ऐसा पुत्र पिता को प्राणों के समान प्यारा हो जाता है, यद्यपि वह उक्त सभी गुणों से हीन है।
एहि बिधि जीव चराचर जेते।
त्रिजग देव नर असुर समेते।।
अखिल बिस्ब यह मोर उपाया।
सब पर मोहि बराबरि दाया।।
तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया।
भजै मोहि मन बच अरु काया।।
पुरुष नपुंसक नारि वा, जीव चराचर कोइ।
सर्व भाव भज कपट तजि, मोहि परम प्रिय सोइ।। (मानस, ७/८७ क)
इसी प्रकार जगत् के जितने भी जीव हैं– पशु-पक्षी, देवता, नर, असुर इत्यादि, यह सम्पूर्ण विश्व मेरा जन्माया हुआ है, सब पर मेरी बराबर दया है। इनमें भी जो मद-माया का त्याग करके मुझे भजता है, वह पुरुष हो, नपुंसक हो, नारी अथवा नर हो, चराचर जगत् में कहीं भी जन्म लिया हो, उत्तरी ध्रुव में जन्मा हो या यूरोप में या भारत में; जो सम्पूर्ण भावों से मुझे भजता है वह मुझे परमप्रिय है। जो मेरा भजन नहीं करता, वह विधाता ही क्यों न हो, मुझे उतना ही प्रिय है जितना समस्त जीव! इसलिए भजन एक परमात्मा का करना चाहिए। ये मंदिर, तमाम तीर्थ सभी उचित हैं, भजन की जगह हैं, परमार्थ की पाठशालायें हैं।
तीर्थाटन साधन समुदाई।
जोग बिराग ग्यान निपुनाई।।
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना।
संजय दम जप तप मख नाना।।
भूत दया द्विज गुर सेवकाई।
बिद्या बिनय बिवेक बड़ाई।।
जहँ लगि साधन बेद बखानी।
सब कर फल हरि भगति भवानी।। (मानस, ७/१२५/४-७)
सारे तीर्थों का भ्रमण, साधनों का समुदाय, जोग, वैराग्य और ज्ञान में दक्षता, प्राणियों पर दया, परोपकार इत्यादि जितने साधन वेद ने कहे हैं (ये सभी साधन वेदवर्णित हैं, गलत नहीं हैं), ये जितने भी साधन हैं सबका फल एक हरि की भक्ति है।
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन।
जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन।। (मानस, ७/४८/२)
ज्ञान, दया, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, समस्त तीर्थाटन– ये सब धर्म हैं, श्रुतियों और संतजनों ने इन्हें धर्म कहा है, लेकिन ‘सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई।।’ (मानस, ७/११९/१८)– इन सबका फल है हरि की भक्ति, जो बिना संत के आज तक किसी ने पाया ही नहीं।
लक्ष्मण ने भगवान राम से पूछा– प्रभो! सुख का स्रोत क्या है? भगवान ने बताया– ‘भगति तात अनुपम सुख मूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।।’ (मानस, ३/१५/४)– अनुपम सुख की मूल भक्ति है। लक्ष्मण ने कहा– प्रभो! वही प्रदान कर दें। भगवान ने कहा कि उसे तो मैं भी नहीं दे सकता। वह तो तभी मिलती है जब संत अनुकूल हों। परमात्मा परम धाम है, लेकिन उन परमात्मा की जागृति संतों से है।
संसार भर के विद्यालयों में, शिशु कक्षा की पुस्तकों में तमाम चित्रकथायें हुआ करती हैं। जिस देश की जैसी संस्कृति है, वैसे ही चित्र पढ़ाये जाते हैं। कहीं ‘क माने कबूतर’ तो कहीं ‘ए माने एप्पल’! बच्चा प्राथमिक कक्षाओं में गया तो कहते हैं– भेड़िया आया, मुन्नी ने स्टिक उठाया, भेड़िये ने दुम दबाया और भाग गया। शौर्य जगाने के लिए या विभिन्न जानकारियों के लिए बाल-पुस्तकों में चित्रों का अम्बार लगा रहता है, किन्तु वही बच्चे जब स्नातक, परास्नातक, शोध की कक्षाओं में पहुँचते हैं तब वे सोच भी नहीं सकते कि ‘ए’ का मतलब ‘एप्पल’ होता है अथवा ‘क’ माने कबूतर होता है। अबोध बच्चों को अक्षर-ज्ञान कराने के लिए चित्र सर्वोपरि हैं। यह शिक्षकों की सूझ है, बच्चों की साधना है। इसी तरह ये प्रार्थना-स्थल मंदिर इत्यादि जन-साधारण के लिए चित्रकथा ही हैं।
यह जीव अबोध जन्मता है। यदि सत्संग नहीं मिला तो ९० वर्ष का वृद्ध भी अबोध ही है। आयु के दिन पूरे कर लेने से कोई वृद्ध नहीं हो जाता। आदि शंकराचार्य १८ वर्ष की आयु में ७५ वर्ष के मंडन मिश्र के समक्ष शास्त्रार्थ के लिए उपस्थित हुए तो मिश्रजी डाँटकर बोले– ‘कुतो मुण्डी?’ अर्थात् अभी कल के बच्चे, तुमने मूड़ कैसे मुड़ा लिया? अभी संन्यास कैसे ले लिया? संन्यास तो बुजुर्गों के लिए होता है। शंकराचार्य जी ने कहा– भगवन्! वस्तुत: जो ज्ञान-वृद्ध हैं, वही वृद्ध कहलाते हैं। ईश्वर के साक्षात् के साथ मिलनेवाली जानकारी का नाम ज्ञान है। केवल आयु के दिन पूरा कर लेने से कोई वृद्ध नहीं होता। शरीर तो एक वस्त्र है। इस वस्त्र की आयु पूरी हुई है, बाल सफेद हुए हैं। यदि ज्ञान का स्रोत नहीं मिला तो अभी आप बालक हैं, मैं वृद्ध हूँ। अस्तु, इन मंदिरों में ज्ञान के स्रोत की जागृति के लिए चित्रकथाएँ होती हैं। जितने भी मंदिर हैं, जिनमें पूर्व महापुरुषों की प्रतिमाएँ हैं, ये नाम-घर हैं, प्रार्थना-घर हैं, पूजा-स्थलियों के नाम हैं, आध्यात्मिक शिक्षा के संस्थान हैं। सब मिलाकर ये गुरुओं की शिक्षा के द्वार हैं, गुरुद्वारे हैं।
विक्रमादित्य के समय से मंदिरों का उल्लेख मिलता है। पहले मंदिर की छतें सपाट हुआ करती थीं, समतल हुआ करती थीं। कुछ दिनों में भक्तों के हृदय में श्रद्धा जगी कि छत पर घूमने से भगवान के सिर के ऊपर चरण पड़ते हैं इसलिए इन पर गुम्बद बना दें। ठीक है, इससे भक्तों के पाँव तो नहीं पड़ेंगे किन्तु मिस्त्री तो जाता है मरम्मत करने, सफाई-कुटाई करने; उसका पाँव तो अवश्य पड़ता होगा। ‘प्रभु तरु तर कपि डार पर, तेहि किये आप समान।’ मानस में है कि भगवान राम वृक्ष के नीचे, छाया में विराजमान थे और सभी बंदर ऊपर पेड़ की डालों पर थे इसलिए मंदिर पर चढ़ जाना कोई अपराध नहीं है। भगवान कहाँ नहीं हैं! ‘देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।।’ (मानस, १/१८४/६) इसलिए विश्व में जहाँ जैसी स्थापत्य कलायें थीं, वैसे ही मंदिर बन गये। किसी का नाम चर्च, किसी का मंदिर, किसी का मस्जिद, किसी का नाम गुरुद्वारा, कहीं नाम-घर….. और सब मिलाकर ये परमात्मा की पाठशालायें हैं। किसी न किसी स्तर तक ये सभी पढ़ाते हैं। भगवान से सम्बन्ध जोड़ने के लिए, अचेत सोई हुई आत्माओं को जगाने के लिए पूर्वजों ने यह व्यवस्था दी है, उचित है। लोग कहते हैं कि हिन्दू मूर्तिपूजक है। मुसलमान क्या हैं? ताजिया लेकर चलना…. वह भगवान है क्या? किसी मजार पर चादर चढ़ाना, मजार पर सिर पटकते रहना – यह क्या है? सृष्टि में ऐसा कोई संस्थान नहीं है जहाँ मूर्तिपूजा न हो।
छिति जल पावक गगन समीरा।
पंच रचित अति अधम सरीरा।।
क्षिति माने पृथ्वी, आकाश, जल, वायु और अग्नि! कोई अग्नि को प्रणाम कर रहा है, कोई आकाश की ओर हाथ उठाकर प्रणाम कर रहा है – यह मूर्तिपूजा ही है। पुस्तक हो, दीवाल हो, कुछ भी हो, सब मूर्तिपूजा है। भगवान तो वहाँ हैं नहीं। अचेत सोई हुई आत्माओं को जगाने के लिए, प्रभु से श्रद्धा जोड़ने के लिए पूर्वजों ने यह व्यवस्था दी है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्यवस्था को कई तरह से प्रोत्साहन दिया, जैसे– बचपन में वह ठुमक कर नाचने लगे, लोग ‘गोविन्दा-गोविन्दा’ गाने लगे। वह आठ वर्ष के हुए तो रासलीला करने लगे। माता पार्वती रासलीला देखने चलीं तो भोलेनाथ ने कहा कि मैं भी चलना चाहता हूँ। पार्वती ने कहा– नहीं प्रभो! वहाँ केवल स्त्रियाँ ही जा सकती हैं। भोलेनाथ ने कहा– यह कौन-सी बड़ी बात है! एक साड़ी ले आ। उन्होंने उसे ओढ़ लिया। सब सखियाँ तो मुँह खोलकर बैठी थीं लेकिन भोलेनाथ के साथ समस्या थी कि मुँह खोलें तो ऊपर चन्द्रमा है, गंगा की धारा है, सर्प भी लहरा रहा है, जटाजूट है। पोल खुल जाती। भगवान कृष्ण ने कहा कि घूँघट में यह कौन-सी सखी आ गयी है! उन्होंने उछलकर घूँघट हटा दिया, देखा तो भोलेनाथ। कृष्ण भगवान ने सादर चरण स्पर्श किया, कहा– प्रभो! आपने भी कृपा कर दी? शंकरजी बोले– कन्हैया! कैलाश में हमारा मन नहीं लग रहा था तो चले आये। भगवान तो आपके भीतर प्रसुप्त हैं, रहस्यमय हैं। उस रहस्य को उद्घाटित करना, प्रभु के प्रति श्रद्धा जागृत करना यही रासलीला है।
‘जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा।।’ (मानस, २/९२/४)– इस जीवात्मा को जगा हुआ तब समझना चाहिये जब सारे विषयों से वैराग्य हो जाय और प्रभु से श्रद्धा जुड़ जाय। इसके लिए आपको कुछ छोड़ना नहीं है। तिनका भी उठाते हैं तो अनुरागपूरित हृदय से उठायें, श्रद्धा के साथ नाम का स्मरण करें, आप सही दिशा में हैं। यह आरम्भिक कक्षायें हैं लेकिन भजन का स्तर जब उठ जाता है, भजन जब हृदय से जागृत हो जाता है उस समय की साधना केवल गीता है। गीता ही आदि धर्मशास्त्र है। सृष्टि बाद में उत्पन्न हुई, मनुष्य नाम बाद में आया, गीता पहले ही प्रसारित हो गयी थी। भगवान कहते हैं– अर्जुन! इस अविनाशी योग को आदि में मैंने सूर्य से कहा। सूर्य ने इसे ही अपने पुत्र महाराज मनु से कहा। मनु से जायमान होनेवाले ही मनुष्य कहलाते हैं। वहीं से मनुष्यों का उद्गम है। मनु आदिपुरुष हैं इसलिए आप आदमी कहलाते हैं। मनु महाराज ने जो उपदेश पिता से सुना, उसे स्मृति में धारण कर लिया और स्मृति की परम्परा देते हुए इक्ष्वाकु से कहा। उनसे राजर्षियों ने जाना। इस महत्वपूर्ण काल से यह अविनाशी योग इसी पृथ्वी में लुप्त हो गया था। योग अविनाशी है, इसका विनाश तो कभी होगा नहीं, किन्तु मनुष्य उसे भूल अवश्य गया था। वही पुरातन योग अर्जुन मैं तेरे प्रति कहने जा रहा हूँ, क्योंकि तू मेरा प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है। इस प्रकार विशुद्ध मनुस्मृति गीता है। यह परमात्मा के श्रीमुख की वाणी है, उनके मुख से सीधा प्रसारण है। भगवान की वाणी ही शास्त्र कहलाता है इसीलिए इतने वर्ष बीत गये फिर भी गीता के श्लोकों में सींक बराबर भी कोई अन्तर नहीं आया है और यह आज भी सुरक्षित चली आ रही है। गीता संस्कृत में है। आरम्भ में बच्चे-बच्चे भी संस्कृत ही बोला करते थे लेकिन मध्यकाल में संस्कृत पर कड़े प्रतिबन्ध लग गये। आज अधिकांश लोग संस्कृत नहीं समझते। उनको गीता के आशय से परिचित कराने के लिए ‘यथार्थ गीता’ प्रकाश में आ गयी है। यह भी भगवान की प्रेरणा से लिखी गयी है। यह आपलोगों का आदिशास्त्र, पूर्वजों का सम्मानित शास्त्र और आज के विश्व का सम्पूर्ण शास्त्र है। इस धर्मशास्त्र को आप लें। चार-छ: बार केवल इसका अर्थ पढ़ लेंगे तो धर्म को लेकर आपको न कोई संदेह है, न भविष्य में रहेगा।
गीता में भगवान ने कहा– अर्जुन! जानते हो ईश्वर कहाँ रहता है? ‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।’– सभी प्राणियों के हृदय में ईश्वर का निवास है। ईश्वर हृदय में है तो हम पूजा करने कहाँ जायें? ‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।’– अर्जुन! उस हृदयस्थ ईश्वर की शरण जाओ। उसकी कृपा से तुम परम शान्ति प्राप्त कर लोगे, उस स्थान को पा जाओगे जो अमर है, शाश्वत है। तुम रहोगे, तुम्हारा घर रहेगा और तुम्हारा जीवन रहेगा। यह गीता की देन है इसलिए आरम्भ में श्रद्धा के केन्द्र मंदिर, मस्जिद भले ही हों, जब हृदयस्थ ईश्वर की जागृति आयेगी तो आपको हृदय में ही पूजा करनी होगी और उसकी विधि है गीता।
संत कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे, किन्तु उनमें योग-साधना जागृत थी। उन्होंने वही निर्णय दिया जो गीता दे रही है–
कबीर दुनिया देहरे, शीश नवावन जाय।
हिरदय में हरि जी बसें, तू ताही लौ लाय।।
यह दुनिया दीवारों में शीश झुकाने जाती है। तुम्हारे प्रभु हृदय में विराजमान हैं, उन्हीं में लौ लगाओ। श्रीकृष्ण कहते हैं– हृदयस्थ ईश्वर की शरण जाओ। कबीर ने नया क्या कह दिया! कबीर ने वही कहा जो पहले से गीता में है, जबकि कबीर अनपढ़ थे। महापुरुषों को भगवान पढ़ाते हैं। भजन एक परमात्मा का। अगर परमात्मा परम धाम है तो सद्गुरु ही उसके प्रवेश-द्वार हैं। सद्गुरु ही भजन की जागृति, पूर्तिपर्यन्त पथ हैं; क्योंकि योग-साधना वाणी से कहने पर भी नहीं आती, लिखने में भी नहीं आती। यह किसी अनुभवी सद्गुरु के द्वारा किसी अनुरागी साधक के हृदय में जागृत हो जाया करती है।
संसार में तरह-तरह के दरबार लगे हुए हैं। एक से एक राजा, महाराजा, सुल्तान, बादशाह – सबके दरबार ही तो थे। विश्वविजयी सिकन्दर का दरबार, महान सम्राट अशोक का दरबार, अलाउद्दीन खिलजी का दरबार, महाराणा प्रताप, महाराजा दशरथ इत्यादि का दरबार…….लेकिन सर्वोपरि दरबार सद्गुरु का होता है।
दरबार बहुत देखे हमने तेरे दर सा दरबार नहीं।
जब शीश झुका गुरु चरनन में तब जन के सिर कोई भार नहीं।।
संसार में बहुत से दरबार देखे, तरह-तरह की साज-सज्जावाले; किन्तु सद्गुरु-जैसा दरबार सृष्टि में नहीं है। राजा–महाराजा सबको इस दरबार में आना ही पड़ता है। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ नंगे पाँव वशिष्ठजी के दरबार में गये। शृंगी ऋषि के आशीर्वाद से उनकी मनोकामना की पूर्ति हुई। इसलिए दूसरे दरबारों से इनकी कोई तुलना नहीं है। जब सद्गुरु के चरणों में शीश झुक गया तब साधक के सिर पर कोई भार ही नहीं रह जाता। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–
अनन्याश्चिन्त्यन्तो मां ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।। (गीता, ९/२२)
अर्जुन! अनन्य माने अन्य न, मुझे छोड़कर अन्य किसी देवी-देवता को न भजते हुए केवल मुझे समर्पण के साथ भजता है, उस भक्त के योगक्षेम की व्यवस्था मैं करता हूँ अर्थात् योग सिखाना, प्रकृति के अनन्त खोह-खंदकों से निर्विघ्न निकाल ले जाना, दर्शन, स्पर्श, प्रवेश और स्थिति दिलाना– यह सारा भार मैं स्वयं वहन करता हूँ। यही इस पद में है कि जब गुरु के चरणों में शीश झुका तो सेवक की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। उसका कर्त्तव्य केवल इतना रह जाता है कि आदेश को समझे और चलता जाय। उस दरबार में पहुँचता कौन है? दुनिया के सताये लोग ही वहाँ पहुँचते हैं–
दरबार में सच्चे सतगुरु के दु:ख–दर्द मिटाये जाते हैं।
दुनिया के सताये लोग यहाँ सीने से लगाये जाते हैं।।
सच्चे सद्गुरु के दरबार में दु:ख-दर्द मिटाये जाते हैं। बारहमासी में है–
ब्रह्मवेत्ता वक्ता सुरति गुरु के लच्छन जान।
इच्छा राखे मोक्ष की ताहि शिष्य पहिचान।।
गुरु ब्रह्म से संयुक्त हो, ब्रह्मस्वरूप हो, वह ब्रह्म के विषय में व्यक्त कर सकता हो और जिस साधक में भजन जागृत हो जाय, उसकी सुरति को पकड़कर भजन में लगा सके– यह सद्गुरु के लक्षण हैं। जिसे केवल मोक्ष की इच्छा हो, यह शिष्य की पहचान है। गुरु एक स्थिति है। ‘नास्ति तत्त्व: गुरो: परम्।’– जो अविनाशी तत्त्व है, वह परम तत्त्व परमात्मा ही सद्गुरु है। गुरु एक स्थिति-विशेष है। उनके पास पहुँचते कौन हैं? इस पर कहते हैं–
दुनिया के सताये लोग यहाँ सीने से लगाये जाते हैं।
ऐसे लोग जिनका कोई ठिकाना न हो, सब जगह से ठुकराये गये हों, ऐसे निष्कासितों को सद्गुरु अपना लेते हैं। भाग्य में कुसंस्कार होंगे तो वह भी कट जायेंगे। सद्गुरु की कृपा से सुसंस्कारों का सृजन हो जायेगा। संत सहजोबाई कहती हैं–
हरि की कृपा होय तो, नहीं होय तो होय।
सहजो गुरु की कृपा बिन, भव पार न पावै कोय।।
दुनिया के सताये हुए यहाँ अपनाये जाते हैं; जैसे– लहर तालाब पर फेंके गये कबीर सद्गुरु की शरण पा गये। शृंगी ऋषि मृगों के झुण्ड में पाये गये, विभाण्डक ऋषि ने उन्हें उठा लिया। रामजी के अवतार का कारण शृंगी ऋषि बने। शकुन्तला जंगल में फेंकी हुई कन्या के रूप में एक ऋषि को मिली, ऋषि के आश्रम में उसका पालन-पोषण हुआ, वह भारत की महारानी हुई। भरत उन्हीं का लड़का था जिसके नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। तुलसीदासजी का जन्म हुआ तो माँ मर गयी। ज्योतिषाचार्यों ने घोषित किया कि यह अनिष्टकारी है– बाप मर जायेगा, इसका पालन-पोषण करनेवाले मर जायेंगे अत: इसे जंगल में फेंक दो। उन्हें जंगल में फेंक दिया गया। चुनिया नाम की एक गरीब महिला ने उनका पालन किया। इसी बीच तुलसीदास जी के पिता मर गये। कुछ काल बाद चुनिया भी मर गयी। लोग कहते कि जो दूध पिलाता है, यह उसी को काट खाता है। यह लड़का नहीं तक्षक है। वह भिक्षा माँगने जाते तो लोग दरवाजा बंद कर लेते। एक मंदिर के पुजारी ने भी दरवाजा बंद कर लिया। नरहर्यानंद नामक एक महापुरुष उधर से निकले। उन्होंने पूछा– यह बालक रोता क्यों है? लोगों ने बताया– यह अभागा है महाराज! यह दूबेजी का लड़का है। अब इसके आगे-पीछे कोई नहीं है। जो भी इसे दाना-पानी देता है, मर जाया करता है। नरहर्यानंदजी ने उनका पालन-पोषण किया, काशी में शिक्षा की व्यवस्था दी। वही अभागा बालक तुलसीदास के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार दुनिया के सताये हुए लोग संतों के यहाँ सीने से लगाये जाते हैं।
भजन एक नशा है। इसमें बड़ी मस्ती है–
यह महफिल है मस्तानों की हर शख्स यहाँ है मतवाला।
भर–भर के जाम इबादत के यहाँ सबको पिलाये जाते हैं।।
भजन का अपना एक अपूर्व आनंद है– ‘पीवत नाम रस प्याला, मन मोर भयो मतवाला।’ भजन में मीरा की लौ लग गयी, तो ‘लोग कहें मीरा भई बावरी, सास कहे कुलनाशी रे।’ मीरा बावरी नहीं थीं। उन्हें तो भजन की मस्ती का नशा था।
सभी नशे संसार के उतर जात परभात।
नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।।
यह नशा प्राप्तिपर्यन्त उत्तरोत्तर बढ़ता ही चला जाता है। साधारण नाम ध्यान में, ध्यान समाधि में बदल जायेगा और आनंद उत्तरोत्तर बढ़ता ही चला जाता है। इस प्रकार संतों का यह दरबार भजन के मस्तानों की महफिल है। इस महफिल में ‘भर–भर के जाम इबादत के यहाँ सबको पिलाये जाते हैं’– इबादत अर्थात् सम्पूर्ण योग-साधना, जाम अर्थात् प्याला। भजन की जागृति का प्याला यहाँ सबको भरपूर पिलाया जाता है। महापुरुष के द्वारा ही यह जागृति होती है। भजन लिखने में नहीं आता, कहने में नहीं आता। केवल आरम्भिक स्तर का पाठ्यक्रम लिखने में आता है। शुद्ध योग-साधना, भजन किसी अनुभवी महापुरुष के द्वारा किसी-किसी अनुरागी के हृदय में जागृत हो जाया करता है। सद्गुरु के माध्यम से आपके अंदर जो सुषुप्त आत्मा है वह जागृत हो जायेगी। जिस परमात्मा की हमें चाह है, जिस सतह पर हम बैठे हैं, उनसे श्रद्धा से सम्बन्ध जुड़ा; क्योंकि महापुरुष में वह परमात्मा जागृत हैं इसलिए वह परमात्मा आपकी आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जाते हैं, मार्गदर्शन करने लग जाते हैं। इसका नाम है भजन की जागृति। गुरु महाराज वाणी से तभी तक उपदेश करते हैं जब तक हृदय से उपदेश करना शुरू न कर दें। जब वह हृदय से उपदेश करने लगते हैं तो ८०% हृदय से और १०–२०% वाणी से करते हैं। सद्गुरु रथी हैं, आत्मा जागृत है, भगवान प्रेरक हैं – ये सब पर्यायवाची हैं। सम्पूर्ण योग-साधना की जागृति, क्रमश: उन्नति करते हुए लक्ष्य तक की दूरी तय करने में संरक्षण प्रदान करना सद्गुरु के क्षेत्र की वस्तु है। यही इबादत का जाम है जो सबको पिलाया जाता है। चाहे कोई ऊँची जाति में जन्मा हो, सवर्ण या अवर्ण हो, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। वह इस्लाम का अनुयायी हो, ईसाई या यहूदी हो, इससे भी अंतर नहीं पड़ता। सद्गुरु की दृष्टि में सम्प्रदाय, मजहब कुछ भी महत्व नहीं रखते। ये सम्प्रदाय तो गुरु-घराने हैं। जहाँ साधना जागृत हुई तो सब सिमट जाते हैं। एक इकाई, एक साधना, एक रक्षक, एक प्रेरक और परिणाम में दर्शन और स्थिति एक-जैसी। यह सम्पूर्ण साधना आपको गीता में मिलेगी। सांसारिक दृष्टिवाले इस दरबार में आने से हिचकते हैं–
ऐ जगवालों क्यों डरते हो इस दर पै शीश झुकाने को।
ऐ नादानों यह वह दर हैं जहाँ शीश चढ़ाये जाते हैं।।
घर-गृहस्थी में उलझे हुए लोग सद्गुरु के दरबार में जाने से डरते हैं कि घर-गृहस्थी की व्यवस्था के लिए समय नहीं मिलेगा; किन्तु यदि इस दरबार में जाने से आप डरते हैं तो वास्तव में अभी अबोध बालक हैं। आयु चाहे जितनी हो जाय, जब समझ नहीं है तो अबोध ही हैं, इसलिए इन पंक्तियों में है कि इस दरबार में आने से हिचकना नहीं चाहिए। यह वह दरबार है जहाँ शीश भेंट किया जाता है, चढ़ाया जाता है। किसी ने शीश काटकर रख ही दिया तो कौन सीखेगा सद्गुरुओं की विद्या? शीश चढ़ाने का तात्पर्य है कि अपने सिर के विचारों का, मन का सर्वांगीण समर्पण; जिसका आशय है कि आप अपनी बुद्धि से सोचना बन्द करें। गुरु महाराज क्या कहते हैं, उसे समझें और चलते जावें। शीश का यह समर्पण जब तक आपमें सद्गुरु के प्रति प्रेम नहीं है, श्रद्धा नहीं है, तब तक नहीं होगा।
यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
शीश उतारे चरण धरे, सो पैठे घर माहिं।।
– – –
प्रेम बिकन्ता मैं सुना, जो सिर सांटे लेइ।
लोभी सीस न दे सकै, नाम प्रेम का लेइ।।
प्रेम को बिकता हुआ हमने सुना, यदि कोई सिर के मोल ले कि सिर दो और प्रेम लो। लोभी व्यक्ति शीश नहीं दे पाता। वह प्रेम का केवल रट लगाता है। वह वास्तव में प्रेम को नहीं जानता। कुछ न कुछ कामना है तो प्रेम कहाँ!
प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय।।
प्रेम किसी बगीचे में पैदा नहीं होता, बाजार में नहीं बिकता। आप चाहे राजा हों चाहे प्रजा, शीश दें और प्रेम लें। जहाँ सद्गुरु का स्वरूप दो मिनट के लिए भी आप अपने ध्यान में पकड़ ले जायेंगे तो आपकी आत्मा में भजन जागृत हो जायेगा। वैसे–
इल्जाम लगानेवालों ने इल्जाम लगाये लाख मगर।
तेरी सौगात समझकर के हम सिर पर चढ़ाये जाते हैं।।
कोई भजन करने लगता है तो लांछन लगानेवालों की कतार लग जाती है। मीरा जब भजन करने लगीं तो सब पीछे पड़ गये। सास ने कहा– यह कुल में कलंक पैदा हो गयी। आज उस कुलरक्षिका सास को कोई नहीं जानता, मीरा को संसार जानता है।
इसी प्रकार का कथानक कबीर का है। जब उनकी साधना की महिमा फैलने लगी तब काशीनरेश ने कहा कि मैं भी उनका सत्संग सुनूँगा। दरबारी विद्वान बिगड़ खड़े हुए– सत्संग ही सुनना है तो उन महामहोपाध्याय का सुनिये, जिन आचार्य की महिमा दिग्-दिगान्तर तक फैली है उनसे सुनिये। वह तो जुलाहा है। लावारिश पड़ा मिला था, संस्कारविहीन है। राजा ने कहा– कुछ भी हो, मैंने उनका बहुत नाम सुना है, मैं तो अवश्य सुनूँगा।
दरबारियों ने सोचा कि राजा साहब नहीं मानेंगे, तब उन्होंने एक षड्यंत्र रचा। एक नर्तकी को पैसे देकर उसे सिखाया कि जब कबीर बाजार में आवें तो उनका चरण पकड़कर ऐसा-ऐसा बोलना। उसने वैसा ही किया। लगी विलाप करने कि मैं चार दिन से भूखी मर रही हूँ, हमारा पुराना धन्धा ही ठीक था। आपने हमको रक्खा क्यों? रक्खा है तो हमारे खाने-पीने की व्यवस्था क्यों नहीं करते? तब तक जिन लोगों ने उसे सिखाया-पढ़ाया था, सड़क पर आ गये और कहने लगे– देवीजी! क्या बात है? उसने कहा कि इन्होंने हमें रक्खा क्यों? हमारा धन्धा छुड़ाया क्यों? अब हमें खाने को क्यों नहीं देते? लोगों ने कहा– देखो इस भांड़ को, इसके तपस्या की पोल खुल गयी। है तो जुलाहा, धर्म क्या जानेगा!
कबीर ने देखा कि मामला कुछ आगे बढ़ा हुआ लगता है। अत: उन्होंने कहा– आप भूखी क्यों मर रही हैं? कुटिया में अन्न-जल है। आप चलें। वह नृत्यांगना कबीर के पीछे-पीछे चल पड़ी। शरारती भी साथ-साथ चल पड़े। कुटिया करीब आ गयी तो वे रुक गये और कहा कि इस कुपात्री के जमीन में पाँव मत रखो अन्यथा हमलोगों को भी पाप लग जायेगा, फिर से नहाना पड़ेगा। वे वहीं से लौट गये।
कबीर ने उस महिला से कहा– माताजी! एक महीने से मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि प्रभु, ऐसी कृपा करें कि आप रहें, हम रहें और कोई भी हमारे पास न आये। यहाँ आनेवालों में से कोई कहता है कि लड़का नहीं है, कोई कहता है कि परीक्षा दी है, कोई कहता है कि बिटिया का ब्याह है, कोई पद का अर्थ समझना चाहता है, तो कोई भजन….. दिनभर भीड़-भाड़! इसलिए ऐसी कृपा कर दें कि हमारे पास कोई न आये। लगता है भगवान ने सुनवाई कर ली, कृपा करके आपको भेज दिया। अब आप इस कुटिया में जीवनपर्यन्त रहें। वह महिला समझ गयी कि यह अच्छे महापुरुष हैं।
चौथे दिन राजा साहब के यहाँ सत्संग सुनाने जाना था। कबीर जानते थे कि यह इसीलिए तो आयी है, अत: बोले– चलिये माई, वहाँ पर सत्संग है। वह भी पीछे-पीछे चल पड़ी। दरबारियों ने पता लगाया कि वह साथ में आ रही है तो राजा से कहा कि कबीर बड़ा निर्लज्ज भी है। उसका कोई भरोसा नहीं। आजकल वह एक नर्तकी के साथ रहता है, कहीं उसे लेकर आपके दरबार में न आ जाय। इतने में कबीर दिखाई पड़े। वह नर्तकी भी पीछे-पीछे आ रही थी। राजा साहब के यहाँ भी उसने एक-दो बार नृत्य किया था। वह उसे पहचान गये। बोले– मंत्रीप्रवर! बहुत हो गया, इन्हें विदा करें। किसी नर्तकी का साथ कर लिया तो क्या हो गया, किन्तु हमारे पास आते समय तो मर्यादा से आना चाहिये था। कबीर बड़ी शान्ति से वापस घूम गये।
उस नर्तकी के लिए यह सब असहनीय था। उसने दरबारियों का दिया हुआ पैसा फेंक दिया और बोली– यह महापुरुष हैं। चार दिन से हमने इनकी विधिवत् परीक्षा ली। यह पैसा आपके दरबारियों ने ही हमें दिया था कि तुम कबीर के सम्बन्ध में ऐसा कहना। यह सुनकर राजा सिंहासन से उठकर कबीर के पास आये और उनसे सत्संग सुनाने की प्रार्थना की। कबीर ने कहा– राजन्! आज इतना सत्संग काफी है। राजा को कान का कच्चा नहीं होना चाहिये। सत्संग फिर कभी होगा।
यह है इल्जाम लगाना! लेकिन भगवान् की भेंट समझकर अच्छे महात्मा उसे स्वीकार कर लेते हैं जो कालान्तर में इतिहास बन जाता है। इतना ही नहीं, बल्कि–
ऐ जगवालों जिन प्यारों पर है खास इनायत सद्गुरु की।
उनको ही संदेशा आता है और वे ही बुलाये जाते हैं।।
ऐ संसार के लोगो! ध्यान से सुनो। जिन प्यारों पर सद्गुरु की विशेष कृपा रहती है, भगवान की ओर से उन्हीं को संदेशा आता है, भगवान की वाणी उन्हें ही मिलती है और वे ही बुलाये जाते हैं। कबीर कहते हैं– ‘गगन मंडल में पिया गोहराइन, आवागमन की फिकर मिटी।’ वे सौभाग्यशाली होते हैं जिन्हें भगवान ने पुकारा, आकाशवाणी दी कि तुम हमारे हो। जिन पर सद्गुरु की कृपा होती है, उनको ही संदेश आते हैं। अन्त में कहते हैं–
इस दुनिया से मैं क्या माँगू, दुनिया तो एक भिखारन है।
मैं माँगू अपने स्वामी से, जो जगतपिता कहलाते हैं।।
गुरु महाराज कहा करते थे– हो, मेरे स्वरूप से लोग क्या-क्या पा जाते हैं, यह मैं भी नहीं जानता। मैं बैठा भर हूँ, सारी आपूर्ति भगवान स्वयं करते हैं। इस दुनिया से क्या माँगा जाय, दुनिया तो स्वयं एक भिखारिन है। भगवान शिव कहते हैं–
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।। (मानस, ३/३८/५)
हे पार्वती! मैं अपना अनुभव कहता हूँ कि सत्य केवल हरि हैं, हरि का भजन है, जगत् तो एक स्वप्न मात्र है। कोई स्वप्न घड़ी दो घड़ी का होता है और यह ८०-८५ साल का है। इसके बाद तो यह जगत् भी एक स्वप्न बन जायेगा। फिर तो ‘सोइ पुर पाटन सोइ गली बहुरि न देखा आइ।’ जो नश्वर है, उसमें आप पायेंगे भी क्या!
राजा रंक सभी दुनिया के, छोटे बड़े मजूर।
हरिश्चन्द्र हरि भजन बिनु, अंत धूरि का धूरि।
यारों एक दिन मौत जरूर।।
जब सिंहासन छोड़कर चले ही जाना है तो फिर यहाँ है क्या? कोई महाराजा ऐसा नहीं हुआ जिसकी इच्छाओं की पूर्ति हो गयी हो। त्रैलोक्य विजेता रावण भी अधूरे अरमानों को लेकर चला गया। इच्छा अथाह समुद्र है। एक वस्तु मिलेगी तो दूसरी अनेक इच्छाओं को खड़ा कर देगी। ‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।’– हर लाभ एक नवीन लोभ को जन्म देता है, न कि वह तृप्ति प्रदान करता है। इस संसार से तृप्त होकर आज तक कोई गया ही नहीं। इसलिए दुनिया से मैं क्या आशा करूँ? यदि माँगना है तो अपने स्वामी से माँगें जो जगत्-पिता हैं, संसार का भरण-पोषण करनेवाले हैं।
‘सिकन्दर जब चला दुनिया से, दोनों हाथ खाली थे।’ लगभग ३२ वर्ष की आयु में सिकन्दर चल बसा। वह विश्वविजय की योजना बनाते रह गया। उसकी मृत्यु के १२ वर्ष पश्चात् उसका तेरह वर्षीय राजकुमार, महारानी, माता, चाचा सब मार दिये गये क्योंकि सिकन्दर ने जिन क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की थी उसके चार सेनापतियों ने उन्हें बाँट लिया और वे जानते थे कि यदि इस कुल का कोई भी जीवित है तो मालिक वह कहलायेगा, हम तो उसके नौकर ठहरे। इसलिए जिसमें सिकन्दर ने जन्म लिया था, उस वंश का मूलोच्छेद हो गया। क्या यही दिन देखने के लिए सिकन्दर ने विजय अभियान छेड़ा था। दुनिया में जो कुछ भी है, ‘काल जो बैठा मंच पर, आज मसाने दीठ।’ परमपिता परमात्मा से माँगते ही वे आपूर्ति करने लगते हैं।
एक राजा साहब ने कहा– मेरे राज्य में भूखा-नंगा कोई न रहे। सबको अन्न-वस्त्र की व्यवस्था और छाया होनी चाहिये। मंत्रियों ने व्यवस्था दे दी। नदी के किनारे एक महात्मा पड़े हुए थे। उनके पास कुछ था ही नहीं। मंत्रियों ने कहा– महाराज, आप भी कुछ लीजिये। लेकिन उन्होंने कुछ स्वीकार ही नहीं किया। अब वे करें क्या? उन्होंने महाराज साहब से निवेदन किया कि आपके राज्य को रामराज्य तो हम नहीं कह सकते लेकिन रामराज्य के बाद यदि कोई राज्य है तो वह आपका है। यहाँ सबके घर पर छाया है, वस्त्र है, भोजन है, दूध-दही-घी की प्रचुरता है, शान्ति है; किन्तु एक व्यक्ति ऐसा है जिसके पास कुछ नहीं है फिर भी वह कुछ लेता ही नहीं। महाराजा ने कहा– यदि केवल एक मामला है तो इसे मैं देखूँगा। वह महात्मा के पास गये। सेवकों से कहा कि इनको यह जमीन दे दी जाय। महात्मा ने सिर हिला दिया। राजा ने कहा– लगता है कम है, इन्हें गाँव दे दो। उन्होंने पुन: सिर हिलाया तो महाराज ने कहा– यह भी कम प्रतीत होता है, इन्हें पाँच गाँव दे दिया जाय। महात्मा ने स्वीकार नहीं किया तो मंत्रियों ने कहा– इतना कोई नहीं पाया। मालिक स्वयं दे रहे हैं ले लो नहीं तो पछताओगे। महात्मा ने कहा– अगर वह मालिक हैं तो मैं अवश्य माँगूँगा, लेकिन जो वह देते हैं वह मैं नहीं लूँगा। जो मुझे जरूरत है, मैं वह माँगूँगा। राजा बोले– ठीक है, ठीक है, माँग लो। महात्मा ने कहा– मुझे ऐसा मालिक चाहिये जो स्वयं न खाये, मुझे खिलाये। मैं सो जाऊँ तो वह जगकर पहरा दे। मैं जहाँ-जहाँ जाऊँ वह साथ-साथ चले और जिस वस्तु की जरूरत हो उसकी आपूर्ति करता रहे। राजा ने कहा– यदि मैं आपके पीछे-पीछे चलूँ तब तो राजकाज रुक जायेगा। हाँ, यह हो सकता है कि मैं जो खाऊँगा, आपको भी खिलाऊँगा। जो पहनूँगा, आपको भी पहनाऊँगा। हम सोयेंगे तो आप भी सोयेंगे। सिपाही लोग पहरा देंगे। महात्मा बोले– नहीं राजन्! हमें ऐसे ही स्वामी उपलब्ध हैं जो स्वयं नहीं खाते और हमें खिलाते हैं। मैं सो जाता हूँ तब भी वह जगकर पहरा देते रहते हैं। मैं जहाँ जाता हूँ, वह मेरे साथ-साथ चलते हैं। कदाचित् कोई आवश्यकता पड़ी तो वह उसकी तुरन्त पूर्ति करते हैं। राजा ने कहा– भगवन्! क्या ऐसे स्वामी मुझे भी मिल सकते हैं? महात्मा ने कहा– अवश्य! उन्होंने राजा को धर्मशास्त्र गीता पकड़ा दिया और कहा– साल–छ: महीने इसके अनुसार अभ्यास करो। एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर करके दो-ढाई अक्षर के किसी नाम का जप करो, सुबह-शाम हमें भी देख लिया करो कि कैसे हैं गुरुजी! साल–छ: महीने देख ले गये तो उनमें भी भजन जागृत हो गया। अस्तु दुनिया की व्यवस्थायें तो सदैव घटती-बढ़ती रहती हैं, किन्तु भगवान की प्रदत्त व्यवस्था सदैव सुचारु रूप से चलती रहती है।
सत्संग में पली हुई एक कन्या का विवाह हो गया। वह ससुराल चली गयी। एक संन्यासी उधर से गुजरे। भिक्षा माँगा तो बहू ने भिक्षा दी। उसका आना, विनम्र होकर खड़ा होना, प्रणाम करना, भिक्षा देना और उसकी श्रद्धा-भावना को देखकर महात्मा को लगा कि बहू किसी भले घर से इस घर में आयी है। उन्होंने पूछा– ‘‘बेटा, तुम्हारी उमर कितनी है?’’ वह बोली– ‘‘महाराज, पाँच साल।’’ उसकी सास दरवाजे के पीछे से छिपकर सुन रही थी। जब नई-नई बहू आती है तो सास साल-छ: महीने तक परीक्षा लेती ही रहती हैं। उसने सुना तो सोचा कि अरे! यह है तो २२ साल की युवती, और कहती है ५ साल! महात्मा बोले– ‘‘तुम्हारे पतिदेव की आयु कितनी है?’’ उसने कहा– ‘‘महाराज, दो साल।’’ ‘‘और ससुरजी की?’’ उसने कहा– ‘‘छ: महीने।’’ महात्मा ने पूछा– ‘‘और सास की उमर कितनी है?’’ बहू ने कहा– ‘‘उनका तो अभी जन्म ही नहीं हुआ है।’’
बुढ़िया सास बड़े जोर से चिल्लायी– ‘‘दौड़ो, दौड़ो गाँववालो! हमारी बहू पागल हो गयी है। मैं ६० वर्ष की हूँ, यह कहती है कि हमारा जन्म ही नहीं हुआ है। इसके ससुर ६५ वर्ष के हैं तो यह कहती है कि छ: महीने के हैं। हमारा पुत्र २५ वर्ष का है तो यह कहती है कि २ साल का है। स्वयं यह २२ वर्ष की है तो कहती है ५ वर्ष की हूँ।’’ भीड़ जुट गयी। तरह-तरह की चर्चायें होने लगीं।
उन महात्मा ने कहा– ‘‘बेटा! तुमने जो कहा, वह किस आधार पर?’’ बहू बोली– ‘‘भगवन्! शरीर तो एक वस्त्र है। ‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय’– पुराने जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों को फेंककर मनुष्य जैसे नया वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही यह आत्मा शरीररूपी वस्त्र को त्यागकर नया शरीर धारण कर लेता है। ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणम्’– शरीरों का यह अन्तहीन क्रम चलता ही आ रहा है। कागभुसुण्डिजी ने कहा कि उन्होंने किस-किस योनि में जन्म नहीं लिया, किन्तु कौवे के शरीर में उन्हें रामभक्ति जागृत हुई। इसलिए वास्तविक आयु है आत्मिक जागृति। भजन की जागृति मुझमें पाँच साल से है। मेरे पति देवता में भी भजन दो वर्ष से विधिवत् जागृत हो गया है। छ: महीने से हमारे ससुरजी भी भजन की जागृति में हैं। हमारी सासजी थोड़ा समय और लेंगी, जागृति तो इनमें भी अवश्य हो जायेगी।’’ तब सास ने सोचा कि बहू तो बहुत ही समझदार है।
इस ईश्वर-पथ में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं है। भजन में आवश्यकता मानव-तन की है, श्रद्धा और मन की है। आपका सम्पूर्ण धर्मशास्त्र गीता है। यह आदिशास्त्र है। इसका भाष्य ‘यथार्थ गीता’ है! चार बार यदि इसको आद्योपान्त पढ़ लेंगे तो न सन्देह है, न भविष्य में कभी होगा। साधना समझ में आ जायेगी। गीता के अनुसार साल–छ: महीने अभ्यास हुआ तो भगवान गुरु भी ढूँढ़कर दे देंगे। और यदि सद्गुरु ही मिल गये तो शेष क्या रहा! ‘सदगुर मिलें जाहिं जिमि, संसय भ्रम समुदाइ।’ (मानस, ४/१७) इसीलिए भगवान का खूब भजन करो, गीता पढ़ो, दो श्लोक रोज पढ़ो। केवल अर्थ-अर्थ भी चार बार पढ़ लोगे तो स्पष्ट हो जायेगा कि मैं कौन हूँ?, अशुद्ध हूँ कि पवित्र?, भजन किसका करें, कैसे करें, क्यों करें? – सबका समाधान मिल जायेगा। गीता के अनुसार अभ्यास चला तो भगवान सद्गुरु का भी परिचय दे देंगे। उठाने-बैठाने-चलाने लगेंगे, भजन जागृत हो जायेगा।
आदिशास्त्र गीता के ही कारण भारत विश्वगुरु रहा है। गीता आपको बतायेगी कि धर्म क्या है! एक परमात्मा ही सत्य है। उसे धारण करने की विधि नियत कर्म और उसे आचरण में ढालना ही धर्माचरण है। यह धर्म न छूने से खत्म होता है, न पानी पीने से, न खाने से। हमारी श्रद्धा टूट भी जायेगी तो जहाँ से साधन छूटा था, अगले जन्म में वहीं से साधना आगे बढ़ जायेगी। श्रद्धा टूटने का अर्थ है– किसी भोग में हमारी वृत्ति बहक गयी। जिस कामना को लेकर वृत्ति विचलित हुई, वह वस्तु मिलेगी, भोगने में आयेगी। उसका कार्यकाल शान्त होते ही जहाँ से साधना छूटी थी, वहीं से पुन: आरम्भ हो जायेगी। भगवान कहते हैं– अर्जुन! इसमें आरम्भ का नाश नहीं है, बीज का नाश नहीं है। इसलिए ‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।’– इस धर्म का स्वल्प अभ्यास भी जन्म-मृत्युरूपी महान भय से उद्धार करनेवाला होता है।
।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-7’ से उद्धृत)