सन्तो! यह मुरदों का गाँव

संसार में बच्चों का जन्मदिन मनाने का प्रचलन पाया जाता है। प्रतिवर्ष उनका जन्मोत्सव भी मनाने की परम्परा है। इतना ही नहीं, कोई साठ-सत्तर वर्ष के हो गये तब भी बर्थ-डे! ब्लड प्रेशर हाई है, हार्ट अटैक हो गया है, आई.सी.यू. में पड़े हैं तब भी जन्मदिन! महापुरुषों ने इन जन्मोत्सवों को बहुत महत्व नहीं दिया। आदि शंकराचार्य जी की ‘प्रश्नोत्तरी’ में है–

जातो हि को यस्य पुनर्नजन्म, को वा मृतो यस्य पुनर्नमृत्यु:।।१८।।

अर्थात् जन्म वही सराहनीय है जिसका पुनर्जन्म न हो। शरीर एक वस्त्र है। वस्त्र में जीवन तो होता नहीं, कैसी मृत्यु? वस्तुत: अन्तिम संस्कार का मिट जाना ही ऐसी मृत्यु है जिसका पुनर्जन्म या पुनर्मृत्यु नहीं है। ऐसा तब होता है जब द्रष्टा यह जीवात्मा अपने ही सहज स्वरूप परमात्मा का दर्शन, स्पर्श और उसमें स्थिति प्राप्त कर ले। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

        नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-

        न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।२/२२।।

अर्जुन! जैसे पुराने, जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों को फेंककर मनुष्य नया वस्त्र धारण कर लेता है, ठीक इसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी आत्मा शरीररूपी वस्त्र को त्यागकर नवीन शरीररूपी वस्त्र धारण कर लेता है। शरीर एक वस्त्र है। मान लें, किसी के ऊपर आक्रमण हो गया; आपने उसका कुर्ता-धोती या कोट-पैण्ट-टाई बचाकर रख लिया तो क्या उसके प्राणों की रक्षा हो गयी? कभी नहीं। ठीक इसी प्रकार शरीर भी आत्मा का एक वस्त्र ही है। इसकी सुरक्षा, इस वस्त्र का जन्मदिन मनाना, जो है नहीं, जिसे कल फट ही जाना है, फेंक ही देना है, प्रतिवर्ष इसका जन्मोत्सव अज्ञान नहीं तो क्या है?

इसीलिए पूर्वजों ने जीवनभर में मात्र दस-पन्द्रह अवसरों का चयन किया; जैसे–जातकर्म या जन्मना संस्कार! बच्चों के जन्म पर पुरोहित आकर सत्य क्या है, नित्य क्या है?; स: माने वह परमात्मा, स: अंश आकार– उसका आंशिक आकार नवजात शिशु के ऊपर छोड़ देता है। इस प्रकार से उच्चारण करता है कि वहाँ जो भी बैठे हैं, सबमें उन प्रभु का संस्कार दे देता है। इसके पश्चात् नामकरण संस्कार में भी वही मंत्र कि परमात्मा एक है, उसके तेज के अंशमात्र से सृष्टि का सृजन, पालन और परिवर्तन होता है, उसकी शरण जाओ।– एक संस्कार दे देता है। जब अन्नप्राशन का समय आता है तो पुर का हित चाहनेवाला पुरोहित पुन: वही संस्कार दुहरा देता है–

सहस्रशीर्षा पुरुष: सहस्राक्ष: सहस्रपात्।

भूमिं विश्वतो सर्वतस्पृत्वातिष्ठद्दशाङ्गुलम्।।

वह परमात्मा अनन्त हाथ, पैर, मुखवाला है। वही सर्वत्र व्याप्त है। पूर्व महर्षियों ने मानस-यज्ञ के द्वारा उसी प्रभु को प्राप्त किया। विधाता ने जिसका ध्यान धरा, इन्द्र ने जिसकी स्तुति की, सिवाय उस प्रभु के अन्य किसी का कोई अस्तित्व नहीं है; उसकी शरण जाओ। इसके साथ ही एक व्यवस्था दी गयी कि अब वस्त्र दान करो, अन्न दान करो। इससे पुरोहितों की परवरिश हो जाती है और दाता का भी कल्याण होता है– जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान।’ (मानस, ७/१०३ख)

दान कल्याण करता है। दान में अपनी वस्तु का मोह छोड़ देना होता है, उसे त्याग देते हैं। किन्हीं अंशों में हमने संसार को छोड़ा है, भले ही मुट्ठीभर संसार को त्यागा है हमने! दान परमात्मा की ओर है। धीरे-धीरे पुण्य की वृद्धि होती है तो वह सर्वस्व को त्याग देता है। यहाँ तक कि–

मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई।

भजन कृपा करिहहिं रघुराई।। (मानस, १/१९९/६)

त्याग करनेवाला मन का अर्पण कर देता है, तन का अर्पण कर देता है, सर्वस्व अर्पण कर देता है और बदले में उस प्रेमास्पद प्रभु को प्रसन्न देखना चाहता है। इससे यह भी अभ्यास कराया जाता है कि खाना खाते समय, वस्त्र पहनते समय, पानी पीते समय, सोते समय, जागते समय उस प्रभु का नाम स्मृति-पटल पर सदैव बना रहे; परमात्मा की विभूति का स्मरण, नाम हृदय में बना रहे। नहाते-धोते, चलते-फिरते परमात्मा की एक-न-एक विभूति का स्मरण बना रहे। कर्मकाण्ड के अवसरों पर पढ़े जानेवाले श्लोकों में मात्र इतना ही है। इस दुर्लभ मानव-तन की सार्थकता के लिए पूर्वजों ने बाल्यकाल से ही उत्तम संस्कारों की व्यवस्था दी है। वह जो अविनाशी तत्त्व है, उन्होंने उसकी प्राप्ति पर बल दिया; नश्वर शरीर की साज-सज्जा या इसके लिए बर्थ-डे जैसा आमोद-प्रमोद और उत्सव नहीं मनाया। जो है ही नहीं, उसका जन्म कैसा? षोडश संस्कारों में पढ़े जानेवाले पुरुषसूक्त के मंत्र वेदों का निचोड़ हैं, नारायण ऋषिकृत सूत्र हैं। यह भी गीता का ही सार-सर्वस्व है लेकिन इस सूक्त को पढ़नेवाले भी यह भूल गये कि हम क्या पढ़ रहे हैं और सुननेवालों को तो यह पता ही नहीं है कि पंडित क्या कह रहा है। धीरे-धीरे लोग इस पक्ष को भूलते जा रहे हैं कि इन संस्कारों का प्रयोजन क्या है?

शरीर एक वस्त्र है। आज बाजार से बिस्किट खरीदते हैं। कितना चमकीला कवर लगा रहता है उस पर। लेकिन घर आते ही आप वस्तु निकाल लेते हो और पैकिंग को चूल्हे में या कूड़ेदान में डाल देते हो। पैकिंग तो कुछ है ही नहीं, वह मूल वस्तु नहीं है। हमने पैकिंग को खरीदा भी नहीं था; उसका जन्मोत्सव?

एक जन्म तो यह है– शरीर का आविर्भाव! इससे भी बड़ा जन्म वह है जिसके पीछे मृत्यु नहीं है। ऐसा जन्म है आत्मिक जागृति। एक बार जागृति हो गयी तो वह आत्मा शनै:-शनै: सहायता करते हुए ले चलेगा। जहाँ से वह प्रसारण करते हैं (भक्त के हृदय से), जहाँ उस मूल के आमने-सामने खड़ा किया, आपमें दृष्टि बनकर संचारित हो जायेंगे, सामने स्वयं हो जायेंगे और उन्हें जानकर उसी भाव को जो प्राप्त हो गया, उसने उस अविनाशी पद को प्राप्त कर लिया, उसने उस सर्वज्ञ पद को प्राप्त कर लिया जिसका कभी विनाश नहीं है। वह सर्वज्ञाता है।

इसीलिए गौतम बुद्ध ने कहा कि तपस्या के परिणाम में आज हमने उस अविनाशी पद को प्राप्त कर लिया जो पूर्व महर्षियों ने प्राप्त किया था। बुद्ध ने वही पाया जो उनके पूर्व के महाऋषियों ने पाया था। कौन थे पूर्व महाऋषि? जो आपके थे वही! बाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र! इसलिए कि सत्य कभी बदलता नहीं! ऐसा नहीं कि बुद्ध का कोई अलग सम्प्रदाय रहा हो। भगवत्पथ में कोई सम्प्रदाय होता ही नहीं। अन्तर इतना ही है कि कोई साधक आरम्भिक स्तर पर है, कोई मध्य में, कोई प्राप्ति के समीप और कोई पा गया। उसी जन्म के लिए भजन किया जाता है।

जा मरने से जग डरे, सो मेरो आनन्द।

कब मरिहौं तब पाइहौं पूरन परमानन्द।।

जिस मरने से जग डरता है, मनुष्य डरते हैं, सन्त कहते हैं– वह तो हमारा आनन्द है। एक ही चाह रह गयी है कि मैं कब मरूँ और उस पूरण परमानन्द को प्राप्त कर लूँ। लेकिन वह मृत्यु है कैसी? किसी ने गले में फन्दा लगाया और मर भी गया तो क्या परमानन्द प्राप्त हो गया? फन्दा लगाने का एक पाप उसने और कर लिया। उसके प्रारब्ध में यदि दस जन्म लेना नियत है तो इस पाप के बदले उसने दो और बढ़ा लिया। इस प्रकार से शरीरों का अन्त कभी नहीं होता– काटे बहुत बढ़े पुनि, जिमि तीरथ कर पाप।।’ (मानस, ६/९७) इसलिए–

जीवत में मरना भला, जो मर जाने कोय।

मरने से पहले मरे, अजर अमर सो होय।।

शरीर जिन्दा रहे और मृत्यु हो जाय–जीवत में मरना भला’, किन्तु उस मरने की विधि कोई जान ले तब तो! जो मर जाने कोय।’–और शरीरान्त से पहले जो मृत्यु हो जाय तो वह अजर-अमर-शाश्वत-सनातन स्थिति प्राप्त कर लेगा। उसी को जीवन्मुक्त कहते हैं कि जीवन शेष है और मुक्ति मिल जाय। सन्त कबीर कहते हैं–

अवधू! जीवत में कर आशा।

मुये मुक्ति गुरु कहे स्वारथी, झूठा दे बिसवासा।।

जीते जी मुक्ति की आशा करो। ‘मरने के बाद मुक्ति मिल जायेगी’– यदि ऐसा कोई गुरु कहता है तो गुरुजी का कोई स्वार्थ अवश्य छिपा होगा।

जीवत मन बस हुआ नहीं तो, पुनि देवे बहु त्रासा।

जहँ आशा तहँ बासा, मन का यही तमासा।।

जहाँ की आशाएँ मन में रँगी है, वहीं भविष्य में निवास मिलता है, जन्म मिलता है। यदि जीते जी स्वरूप की उपलब्धि नहीं हुई तो सिद्ध है कि संस्कार बाकी हैं, जन्म लेना पड़ेगा। एक मिनट बाद प्राप्ति होनी है और एक मिनट पहले ही शरीर की आयु पूरी हो गयी तो जन्म लेना पड़ेगा। यह मुक्ति नहीं है। मुक्ति जीते जी ही मिलती है–

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।

य: प्रयाति त्यजन्देहं याति परमां गतिम्।। (गीता, ८/१३)

ओम्’ जो अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, उसका जाप कर, मेरे स्वरूप का ध्यान करते हुए त्यजन्देहं’–देहाध्यास का त्यागकर जो ऊपर उठ जाता है वह तत्क्षण परमगति को प्राप्त कर लेता है। देह के होने का कारण है संस्कार। देहाध्यास त्यागने का अर्थ है संस्कार की उस रील का शान्त होना। अन्तिम संस्कार का मिट जाना और मन का अचल स्थिर ठहर जाना एक ही बात है। भीतर संस्कार है और आप चाहे मन को रोक लें– ऐसा नहीं हो सकता। जैसा संस्कार है, वैसा स्फुरण पैदा हो जायेगा इसलिए देह का अध्यास त्यागा जाता है। याति परमां गतिम्’– वह परमगति प्राप्त कर लेता है। अत:,

मन मरा माया मरी, हंसा बेपरवाह।

जाको कछू चाहिये, सोई साहनसाह।।

मन के ऊपर की माया अंकित होती है। माया जिस पर बैठकर कार्य करती है, वह धरातल है मन। जब मन ही मिट गया तो माया टिकेगी कहाँ? जब मन मरा तो माया मिटी, तहाँ हंसा’–यह आत्मा, भक्त निश्चिन्त, निर्द्वन्द्व हो जाता है। यदि परमात्मा अप्राप्त होता तो हमें उसकी चाह अवश्य होती। वह भी जब चाहने के लिए अलग नहीं बचा तो भक्त शाहंशाह है, स्वामियों का भी स्वामी है।

इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:।। (गीता, ५/१९)

उन पुरुषों द्वारा जीवित अवस्था में ही समस्त संसार जीत लिया गया जिनका मन समत्व में स्थित है। अब समत्व की स्थिति का संसार जीतने से क्या सम्बन्ध है? भगवान कहते हैं– वह ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर साधक का मन भी निर्दोष और सम हो गया; तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:’–इसलिए वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। अनपढ़ कबीर ने वही पाया जो संदेश भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में दिया। जो भी होना है, जीते जी होना है। सत्य कभी और रहा हो कबीरकाल में, कुछ दूसरा हो गया हो, आगे कुछ और हो जायेगा– ऐसी बात नहीं है। प्राप्तिवाला महापुरुष समाज में कभी दरार डाल ही नहीं सकता।

वैदिक ऋषियों ने संसार को मर्त्यलोक कहा। सभी मरणशील हैं। जिन्हें आप जिन्दा देखते हैं, वह भी श्मशान जाने की कतार में खड़े हैं। मान लें कोई साठ वर्ष का है जिसे पैंसठ वर्ष तक जीना है, उसे मणिकर्णिका जाने में पाँच ही साल तो बचे हैं। वह प्रतीक्षा-सूची में ही तो है। बार-बार होनेवाली मृत्यु से कैसे बचें? वैदिक ऋषि कहते हैं कि इसके लिए परमात्मा में प्रवेश पाओ। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति’–उसी को जानकर आप मृत्यु से परे जा सकते हो। नान्य: पन्था विद्यते अयनाय’– इसके लिए दूसरा कोई रास्ता नहीं है। गोस्वामीजी कहते हैं– एक परमात्मा का सुमिरन करो। कबीर ने भी इसी निर्णय पर बल दिया–

सन्तो! यह मुरदों का गाँव।

केहि कर जप तप सुमिरन करिहौ, कोई अमर ठाँउ।

सन्तो! यह …….।।

पीर मरे पैगम्बर मरि गये, मरि गये जिन्दा जोगी।

राजा मरिहैं परजा मरिहैं, मरे वैद अरु रोगी।।

सन्तो! यह …….।।

चाँद सुरुज तारागण मरिहैं, मरिहैं धरनि अकासा।

चौदह भुवन चौधिरी मरिहैं, तिनहूँ की का आसा।।

सन्तो! यह …….।।

नाम अनाम रहे सदा ही, दूजा तत्त्व कोई।

कहत कबीर सुनो भाई संतों, खोज करो तुम सोई।।

सन्तो! यह …….।।

कबीर एक महापुरुष हुए हैं। भगवत्-पथ में माता-पिता की कुलीनता का कोई नियम नहीं है। शृंगी ऋषि मृगों के झुण्ड में पड़े मिले थे। व्यास निषादवंशीय कुँवारी कन्या के लड़के थे। हनुमानजी के पिता होने के कई दावेदार थे। ठीक इसी प्रकार संत कबीर भी काशी में लहर तालाब के किनारे पड़े मिले। जुलाहा दम्पत्ति नीरू और नीमा समीप से जा रहे थे। उन्हें बच्चे का रुदन सुनाई पड़ा। उन्हें सन्तान नहीं थी, बड़ा हर्ष हुआ। बच्चे को उठा लिया, उसे पाला-पोसा। उसका नाम कबीर रखा। क्रमश: वह बढ़ने लगा।

कबीर जन्म-जन्मान्तरों के चले हुए पथिक थे। वह सत्गुरु की तलाश करने लगे। उनकी श्रद्धा एक महापुरुष रामानन्द जी के प्रति हुई। वह उनकी कुटिया में गये। साम्प्रदायिक भेदभाव में पले शिष्यों ने उन्हें जुलाहा समझकर भगा दिया। कबीर एक संस्कारी पुरुष थे। उन्होंने देखा कि गुरुजी तो कम ही बोलते हैं, उनके शिष्य ही अधिक विरोध करते हैं। वह सोचने लगे– किस उपाय से गुरुजी का सान्निध्य प्राप्त करूँ। उन्होंने अध्ययन किया। गुरुजी प्रात: चार बजे ही गंगा-स्नान को जाया करते थे। वह जिन सीढ़ियों से गंगा में उतरते थे, कबीर उस सीढ़ी पर लेट गये। अँधेरे में बहुत दिखाई नहीं पड़ रहा था। गुरुजी अभ्यासवश सीढ़ियाँ उतर रहे थे। उनका पाँव कबीर के ऊपर पड़ा। उनके मुख से ‘राम-राम’ निकल पड़ा। कबीर ने उसी को गुरुमंत्र मान लिया। रामानन्द ने कबीर को शिष्य स्वीकार लिया। अब वह आश्रम आने-जाने लगे। रामानन्दजी के शिष्यों में रैदास, पीपाजी, विशुद्धानन्द इत्यादि कई अच्छे वैष्णव सन्त हुए; किन्तु इन सबमें कबीर साहब का स्थान सर्वोपरि रहा। अस्तु, भगवत्पथ में माता-पिता की कुलीनता का कोई सहयोग नहीं होता। जन्म-जन्मान्तरों से चलनेवाला पथिक कहीं भी जन्म ले सकता है। ऐसा ही जन्म महापुरुष ईसा का भी सुनने में आता है।

कबीर के चिन्तन का नाम राम था। स्वयं उन्हीं के अनुसार–

जीव सीव सब प्रगटे, वे ठाकुर वे दास।

कबीर और जाने नहीं, एक राम नाम की आस।।

इधर अपार जीवों की शृंखला, उधर शिव कल्याण-तत्त्व की मान्यता! कबीर और किसी को नहीं जानता। उसे आशा है तो एक राम-नाम से है। किन्तु राम-नाम में अनुरक्त भक्त के लक्षण क्या हैं?

जे जन भीगे राम रस, विकसित कबहुँ रुख।

अनभव भाव दरसिये, तेहिं नर सुख दुख।।

जो कोई भी जन अर्थात् भक्त राम के रस में सराबोर हो गया, वह सदा विकसित रहता है; कबहूँ रुख’– उसके जीवन में कभी उदासी आती ही नहीं। क्या प्रमाण है कि हम राम-रस में भींगे हैं? अनभव भाव दरसिये, तेहिं नर सुख दुख।’– भावों के प्रवाह के साथ अनुभव न मिले तो उसके लिए न सुख है, न दु:ख है। संकल्पों की लहर के साथ भगवान योगक्षेम प्रदान करने लगें, वह बताने लगें कि कौन संकल्प गलत जा रहा है, कौन सही?–यदि ऐसी जागृति नहीं है तो उस भक्त के लिए सुख-दु:ख कुछ है ही नहीं। वह प्राप्ति के लिए प्रयास मात्र है। अभी उसने पाया नहीं है। तुलसी (मन) बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै’– यह अयुक्त मन तभी वश में होता है जब स्वयं प्रेरक प्रभु उतर आयें, आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायँ और हमारी रोकथाम करने लगें। उसी का नाम है अनुभव! भव से अतीत करा देनेवाली जागृति! कबीर के आराध्य भगवान राम थे–

कुसल कहत कहत जग बिनसे, कुसल काल की फाँसी।

कह कबीर एक राम भजे बिनु, बाँधे जमपुर जासी।।

लोग परस्पर कुशलक्षेम पूछते हैं। कोई कहते हैं कि लड़के को अच्छी नौकरी मिल गयी, कुशल है। किसी ने कहा– नाती-पनाती पैदा हुआ है, पदोन्नति मिल गयी; यह कुशल, वह कुशल! कबीर कहते हैं, यह कुशल है या काल का फन्दा? क्योंकि ‘यह कुशल….वह कुशल…’ कहते-कहते आयु के दिन पूरे हो गये। जिस कमी की पूर्ति के लिए यह मानव-तन मिला, उसके लिए सोचने का अवसर नहीं मिला और हम काल कवलित हो गये। कबीर कहते हैं– ऐसी परिस्थिति में यदि तुम एकमात्र राम का भजन नहीं करोगे तो बरबस जकड़कर यमलोक पहुँचा दिये जाओगे। कौन-से राम? राम की परिभाषा कबीर ने दी–

एक राम घट घट में लेटा, एक राम दसरथ का बेटा।

एक राम का सकल पसारा, एक राम सब जग से न्यारा।।

सुनने में ऐसा लगता है कि कबीर चार राम का वर्णन कर रहे हैं; किन्तु ऐसी बात नहीं है। यहाँ कबीर एक ही राम की चार स्थितियों का वर्णन कर रहे हैं। सृष्टि में राम एक हैं। सृष्टि अनन्त है लेकिन भगवान केवल एक हैं। वह रहता कहाँ है?–तो एक राम घट घट में लेटा’सब घट मेरा साइयाँ’– उस प्रभु का निवास हृदय में है। कबीर ने कोई नया निर्णय नहीं दिया। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! जानते हो, ईश्वर कहाँ रहता है? गीता के आरम्भ में भगवान ने नहीं बताया। उस समय तो अर्जुन के प्रश्न ही प्रश्न थे। अठारहवें अध्याय तक जाते-जाते जब उसके प्रश्न हल हो गये, वह शान्त हो गया। भगवान ने देखा, इसमें अब पात्रता आ गयी है, समझने की क्षमता आ गयी है, तब उन्होंने बताया–

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता, १८/६१)

अर्जुन! वह ईश्वर सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के हृदय-देश में निवास करता है। वह इतना समीप है तो लोग उसे देखते क्यों नहीं? भगवान बताते हैं कि मायारूपी यंत्र में आरूढ़ होकर भ्रमवश लोग भटकते ही रहते हैं इसलिए ईश्वर को नहीं जानते। इस यन्त्र पर लोग स्वयं ही कूदकर चढ़ जाते हैं जिससे वह चक्कर लगाते ही जा रहे हैं, ईश्वर को नहीं पहचान पाते। जब ईश्वर हृदय में ही है तो हम शरण किसकी जायँ? अगले ही श्लोक में भगवान कहते हैं–

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता,१८/६२)

अर्जुन! उसी हृदयस्थित ईश्वर की शरण में जाओ। सर्वभावेन’– ऐसा नहीं कि थोड़ा भाव संकटमोचन में, थोड़ा पशुपतिनाथ में, कुछ मैहर देवी तो कुछ कामाख्या देवी में भाव रखें। तब तो हम बारह आने लीक हो गये। हृदयवाले परमात्मा के हिस्से में चौथाई श्रद्धा भी नहीं रह गयी तो कल्याण कैसे हो? इसलिए सर्वभावेन’– मन को समग्र रूप से चारों ओर से समेटकर हृदयस्थित ईश्वर की शरण में जाओ।

मान लें, हम सारे पूर्वाग्रहों को छोड़कर हृदयस्थित ईश्वर की शरण में चले ही गये तो उससे लाभ क्या? भगवान बताते हैं– तत्प्रसादात्परां शान्तिम्’– उसके कृपा-प्रसाद से तुम परम शान्ति प्राप्त कर लोगे और उस स्थान को प्राप्त कर लोगे जो शाश्वत है। तुम रहोगे, तुम्हारा जीवन रहेगा, तुम्हारा घर रहेगा। ऐसा नहीं कि घर में हर साल चूना पोतो। इसकी जरूरत नहीं रह जायेगी। शाश्वत शान्ति जो सदा रहेगी, तुम्हें मिलेगी। इस प्रकार गीता के अनुसार भगवान का निवास-स्थान हृदय! शरण उसी प्रभु की! कबीर पढ़े-लिखे तो नहीं थे लेकिन उन्होंने अपने अनुभव में पाया तो निर्णय दिया– एक राम घट घट में लेटा’– वह सबके हृदय-देश में निवास करता है।

राम होगा हृदय-देश में! वह हमारे उपयोग में कैसे आये? इस पर सन्त कबीर कहते हैं– सरल-सा उपाय है, एक राम दसरथ का बेटा’। यह मानस है। दसों इन्द्रियों की निरोधमयी प्रवृत्ति ही दशरथ है। विषयों के भोग से तो कभी इन्द्रियों का संयम होगा ही नहीं। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।’ यदि एक ट्रक हो गया तो दूसरे की बुकिंग करा लोगे। दो फैक्ट्री हो गयी तो तीसरे की योजना बन जायेगी। भोगों से भी चित्त कहीं तृप्त होता है? चित्त और भी भड़क उठता है। कहीं से कोई क्षति होने लगती है तो ब्लडप्रेशर हाई होने लगता है। इन्द्रियों का निरोध, इन्द्रियों का संयम सधता है एक प्रभु के सुमिरन से। शरीर रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है। जब मन की लगाम हमारे हाथ में हो, भगवान के सुमिरन से हमारा स्तर इतना उन्नत हो जाय कि हम इसे जिधर चाहें उधर चलायें, यही है दस रथ! दसों इन्द्रियों की लगाम हमारे हाथ में हो जाय। जहाँ संयम सधा तो भगवान जानते हैं कि यह केवल मुझे पुकार रहा है, वह तुरन्त प्रकट जो जायेंगे, आपसे बातें करेंगे। स्तर और उन्नत हो जाने पर आप गिरना चाहें तब भी वह आपको गिरने नहीं देंगे। जो राम हृदय में लेटा है, वही दसों इन्द्रियों के संयम के साथ प्रकट हो जाता है।

एक राम का सकल पसारा’

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! मेरे तेज के अंशमात्र से सारी सृष्टि का संचालन है। वही कबीर कहते हैं– एक राम का सकल पसारा’। राम तो एक ही हैं लेकिन यावन्मात्र जो कुछ जगत् है, यह पट-प्रसार उन्हीं के तेज के अंशमात्र से है। इतना कुछ करने पर भी वह द्रष्टा है। एक राम सब जग से न्यारा’– सबमें रहते हुए भी वह सबसे अतीत है, निर्लेप है, परे है। इस प्रकार संत कबीर ने भगवान का निवास, भगवान की जागृति, भगवान की विभूति और सबका पालन-पोषण करते हुए भी सबसे निर्लेप भगवान की महिमा का गायन किया। उनके आराध्य एकमात्र राम थे। रमन्ते योगिन: यस्मिन् राम।’–जो सबके हृदय में रमण करता है और जिसमें योगीलोग रमण करते हैं, उसका नाम राम है।

सम्पूर्ण विश्व में भजन का अर्थ लोग इतना तो जानते ही हैं कि अविनाशी शाश्वत कोई ऐसी सत्ता है जो ज्योतिर्मय है, सर्वोच्च है, उसे पुकारो। उन्हें यह बताना नहीं पड़ता कि भजन किसका करो; लेकिन भारत में यह बताना आवश्यक है कि भजन किसका करें! हम भी सर्वप्रथम यही बताते हैं क्योंकि सबसे अधिक देवताओं की पूजा आरम्भ में हम भी करते थे। श्रीकृष्ण का विराट् स्वरूप, जिसमें देवता ही देवता हैं, उसकी पूजा हम करते थे। उस चित्र को खरीदते समय हमने दुकानदार से पूछा था कि कोई देवता इसके बाहर तो नहीं है? उसने कहा– अरे! इसके बाहर कोई हो भी नहीं सकता। इस प्रकार सकल देवताओं की पूजा से तो हमने भजन शुरू किया था। आज लोग तो दो-चार-दस देवताओं के पुजारी हो। इससे क्या हो गया? पूरा भारत ही देवपूजक है। एक भगवान की पूजा तो महात्माओं के सान्निध्य के बाद ही शुरू होती है। हाँ, संसार में अधिकांश देशों में एक भगवान के पुजारी हैं। जिन्हें आप भगवान मानते हो, उन देवताओं की पूजा अज्ञान की देन है। भगवान राम कहते हैं–

एक पिता के बिपुल कुमारा।

होहिं पृथक गुन सील अचारा।।

कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता।

कोउ धनवंत सूर कोउ दाता।। (मानस, ७/८६/१-२)

एक पिता के बहुत से पुत्र हैं। उनमें से कोई पंडित है तो कोई शूरवीर; कोई ज्ञाता है तो कोई दानदाता है। एक से एक गुणी हैं किन्तु उन्हीं में कोई ऐसा भी है जो इन गुणों से तो हीन है लेकिन मन-क्रम-वचन से पिता का भक्त है।

सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना।

जद्यपि सो सब भाँति अयाना।। (मानस, ७/८६/५)

ऐसा पुत्र पिता को प्राणों के समान प्रिय होता है। ठीक इसी प्रकार–

एहि बिधि जीव चराचर जेते।

त्रिजग देव नर असुर समेते।।

अखिल बिस्व यह मोर उपाया।

सब पर मोहि बराबरि दाया।। (मानस, ७/८६-६-७)

यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही उत्पन्न किया हुआ है। सब पर मेरी समान दयादृष्टि है। इनमें से कोई आपको प्यारा भी है? भगवान कहते हैं–

तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया।

भजै मोहि मन बच अरु काया।। (मानस, ७/८६/८)

पुरुष नपुंसक नारि वा, जीव चराचर कोइ।

सर्ब भाव भज कपट तजि, मोहि परम प्रिय सोइ।। (मानस, ७/८७क)

इनमें से जो कोई कपट का त्याग करके सम्पूर्ण भाव से मुझे भजता है, वह मुझे परम प्रिय है – वह स्त्री, पुरुष या नपुंसक कोई भी हो; वह देव, दानव, मानव, तिर्यक् कोई भी हो। यदि वह भजन नहीं करता तो देवाधिदेव ब्रह्मा ही क्यों न हो, भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई।।’ (मानस, ७/८५/९)– वह भी मुझे उतना ही प्रिय है जितने सभी जीव; कूकर-शूकर-मृग इत्यादि। यहाँ भगवान राम देवताओं को भी मनुष्यों की आबादी बताते हैं, उन्हें जन्म लेनेवाला, मरनेवाला बताते हैं। यही भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं– अर्जुन! देवलोक में भी ऐसा कोई नहीं जो इस प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों से अतीत हो। प्रकृति के अन्तर्गत वस्तुओं की पूजा प्रकृति की ही पूजा है। इसलिए भजन एक भगवान का करना चाहिए।

रामचन्द्र के भजन बिनु, जो चह पद निर्बान।

ग्यानवंत अपि सो नर, पसु बिनु पूँछ बिषान।। (मानस, ७/७८क)

राम, एक परमात्मा के भजन बिना यदि कोई कल्याण चाहता है, वह बिना सींग-पूँछ का पशु है। उसमें और बैल में कोई अन्तर ही नहीं है। इससे अधिक खरी-खोटी गोस्वामीजी क्या कहते! हैं तो हम भले-चंगे मनुष्य; किन्तु संज्ञा पशु की मिल रही है। अस्तु, प्राचीनकाल से जितने महापुरुष या अवतार हुए हैं, उन सबका उद्घोष है कि सत्य नित्य केवल एक आत्मा है। यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील है। वह आज है तो कल नहीं रहेगा। मरणधर्मा की पूजा कर आप मृत्यु ही पायेंगे। अविनाशी की पूजा से अविनाशी पद मिलेगा इसलिए एक भरोसा एक बल एक आस बिस्वास।’ (दोहावली, २७७)–एक परमात्मा का ही भजन करना चाहिए, एकमात्र वही शाश्वत है। इसी आशय का यह भजन भी है–

सन्तो! यह मुरदों का गाँव।

हम-आप खाते-पीते, भले-चंगे यहाँ पर बैठे हैं; किन्तु कबीर कहते हैं– नहीं, यह तो मुर्दों का गाँव है। सब मणिकर्णिका घाट के लिए प्रतीक्षारत हैं, सभी श्मशान की ओर उन्मुख हैं। आज नहीं तो कल सबको जाना ही है। कबीर ने कोई अपशब्द नहीं कहा। यही तो पूर्व महर्षियों ने, वैदिक ऋषियों ने कहा। इस लोक को मर्त्यलोक कहा। यह मरणधर्मा प्राणियों की निवास-स्थली है। कबीर ने इसे गाँव कहा। गाँव छोटा होता है, लोक बड़ा होता है।

रामचरितमानस का प्रसंग है। एक बार कागभुसुण्डि को भगवान ने दर्शन दिया। वह पशोपेश में पड़ गये– क्या यही हैं भगवान? जितना दिखायी दे रहा है, क्या इतनी ही है भगवान की कुल महिमा! भगवान ने उनका अभिप्राय समझ कृपा का सूत्र बढ़ा दिया। प्रभु मुस्कराये, भुशुण्डिजी चले गये भगवान के मुख में। भगवान के उदर में उन्हें एक नवीन सृष्टि का साक्षात् हुआ–

उदर माझ सुनु अण्डज राया।

देखेउँ बहु ब्रह्माण्ड निकाया।। (मानस, ७/७९/३)

अगनित लोकपाल जम काला।

अगनित भूधर भूमि बिसाला।। (मानस, ७/७९/६)

भगवान के उदर में उन्होंने अनन्त लोकों को देखा, अनन्त ब्रह्माण्डों को देखा। भगवान के उदर में अनन्त ब्रह्माण्ड भ्रमण कर रहे थे। सबमें आबादी थी–

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता।

भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता।। (मानस, ७/८०/१)

हर ब्रह्माण्ड के ब्रह्मा, विष्णु, महेश, मनु और दिग्पाल भिन्न ही थे। इतना ही नहीं, बिबिध रूप भरतादिक भ्राता।’– हर ब्रह्माण्ड में भाई लक्ष्मण, भरत इत्यादि अलग-अलग ही थे।

भिन्न भिन्न मैं दीख सबु, अति बिचित्र हरिजान।

अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु, राम देखेउँ आन।। (मानस, ७/८१क)

हमने असंख्य भुवनों का भ्रमण किया, किन्तु राम देखेउँ आन’–यदि एकरस, एकमुद्रा में कोई दिखायी पड़ा तो वह केवल भगवान थे। ब्रह्मा भी वृद्ध और युवा होनेवाले! विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्रमा सभी परिवर्तनशील। प्रति ब्रह्माण्ड राम अवतारा’– हर ब्रह्माण्ड में हमने प्रभु का अवतार भी देखा अर्थात् भगवान सबको सुलभ हैं, सबको उपलब्ध हैं।

आपके ब्रह्माण्ड में यह चन्द्रमा है, यह सूर्य है जिन्हें हम-आप देखते हैं। दूसरे ब्रह्माण्ड के अलग ही सूर्य, असंख्य तारें! सूर्य भी एक तारा ही तो है। इस अनन्त ब्रह्माण्ड में आपकी पृथ्वी एक गाँव जितनी ही तो है। यही सम्पूर्ण सृष्टि नहीं है। यह तो अनन्त का ही एक अंश है, इकाई है, टुकड़ा मात्र है इसीलिए कबीर कहते हैं– यह मुरदों का गाँव।’

केहि कर जप तप सुमिरन करिहौ कोउ अमर ना ठाँव।

अब आप किसका जप करेंगे? किसके लिए तप करेंगे? मनसहित इन्द्रियों को किसके लिए तपायेंगे? आप किसका सतत सुमिरन करेंगे? यहाँ मृत्यु से परे अमर कोई स्थान है ही नहीं। जो कुछ है मरणशील है। यह आज है तो कल लुप्त हो जायेगा। यहाँ सबकुछ अस्तित्वविहीन है। अत: आप ही बतायें, किसका जप करेंगे? प्रश्न उठता है– यहाँ जो भी दिखायी देता है, सब मुर्दा है? कबीर कहते हैं– हाँ,

पीर मरे पैगम्बर मरि गये, मरि गये जिन्दा जोगी।

पीर कहते हैं गुरु को! गुरु भी गुरुत्व प्रदान कर लोप हो जाते हैं– जहाँ गुरु चेला, पुरुष अकेला।’ पैगम्बर कहते हैं अवतार को! अवतार योगी के हृदय में होता है। उसकी व्यवस्था सबके हृदय में है। जो भी चिन्तन में डूबता है, उसके हृदय में वह प्रकट हो जाते हैं। अवतार साधक की उँगली पकड़कर चलायेंगे, स्वरूपपर्यन्त दूरी तय करायेंगे; किन्तु स्थिति दिलाकर अवतार भी शान्त हो जाता है। इसके उपरान्त अवतार का प्रयोजन नहीं रह जाता– पीर मरे पैगम्बर मरि गये’। और मरि गये जिन्दा जोगी’– सब तो मर गये लेकिन जोगी जिन्दा है। जैसा शंकराचार्य कहते हैं– वही मृत्यु सराहनीय है जिसके पीछे मृत्यु न हो और वही जन्म सराहनीय है जिसका पुनर्जन्म न हो। महापुरुष जब आत्मिक परिवेश में आ जाता है, उस दिन से वह जिन्दा है। उसने अपना निज जीवन पा लिया; किन्तु जब तक आत्मस्थिति नहीं मिल जाती, उसे भी जन्मना-मरना पड़ेगा। है तो वह जिन्दा, उसका सर्वथा नाश तो कभी नहीं होगा। थोड़ा भी बीज पड़ गया तो माया में ऐसा कोई यंत्र नहीं है कि उसे मिटा दे। वह नष्ट तो नहीं होगा किन्तु जब तक मंजिल नहीं मिल जाती, उसे भी जन्मना-मरना पड़ेगा।

राजा मरिहैं, परजा मरिहैं’ प्रजा तो बेचारी मरने के लिए ही होती है। कोई बीमारी से मर गया तो कोई निर्धनता से ऊबकर मौत को गले लगा लेता है। न झण्डा ही झुका और न उन गरीबों के यहाँ जाकर किसी ने जाँच ही किया कि परिवार का भरण-पोषण करनेवाला तो मर गया, अब पीछेवालों को दो रोटी मिलने का प्रबन्ध है या नहीं। अत: प्रजा का क्या; किन्तु राजा! उनके चारों ओर से पहरा लगा है, कर्मचारी सुरक्षा में लगे हैं, योद्धाओं की कतार लगी है, इन सबके बावजूद राजा भी मर गये।

दमिश्क का सुल्तान बड़ा पराक्रमी और प्रतापी था। उसके राज्य का बड़ा लम्बा विस्तार भी था। एक दिन उसने स्वप्न देखा– मौत का पंजा उसकी पीठ पर पड़ा, ‘बड़े वेग से मेरे पास आ जाओ। ठीक समय पर और ठीक जगह पर!’ भला मौत का पंजा जिसके शरीर पर पड़ा हो, उसके पूरे शरीर में सिहरन पैदा हो गयी। घबराहट से चीख निकल गयी। तुरन्त खतरे की घण्टी बज उठी। रात दो बजे ही सेना तैयार हो गयी। सेनापति ने पूछा– जहाँपनाह! हुआ क्या? उन्होंने अपना स्वप्न सुना दिया। सबकी गर्दनें लटक गयीं। कोई शत्रु हमला करता तो वे मुँहतोड़ जवाब देते! अब मौत को कोई कहाँ ढूँढ़े! सोच-विचारकर निर्णय लिया गया कि इस महल में ही कुछ है। आप किसी तीव्रगामी घोड़े से बहुत दूर निकल जाइये। सेनापति ने ही घोड़े का चयन किया।

अकेला बादशाह! चल पड़ा वेग से घोड़े को दौड़ाते हुए! दोपहर हो आयी। गर्मियों की चिलचिलाती धूप, लेकिन वह मरुस्थल में भागा जा रहा था। शाम होते–होते वह हल्की-सी झाड़ियों में पहुँचा। अब न तो घोड़े में दस कदम चलने की क्षमता रह गयी थी और न सवार में हाँकने की! वह घोड़े से उतरकर एक वृक्ष के नीचे बैठ गया। वह विचार करने लगा– वाह! बहुत दूर आ गये। इतने में मौत का हाथ पड़ा, आवाज आयी– तुम बड़े वेग से आये, ठीक समय पर आये और ठीक जगह पर आ गये। उसके प्राण-पखेरु उड़ गये। भला मौत से भी भागा जा सकता है? सारे प्रयास विफल हो गये। इंदिराजी के चारों तरफ पहरा लगा हुआ था, पहरा ही काल बन गया–

आसपास जोधा खड़े, सबहिं बजावैं गाल।

मंझ महल से ले चला, ऐसा काल कराल।।

यही है राजा मरिहैं परजा मरिहैं’। और मरे वैद अरु रोगी’– रोगी का क्या ठिकाना! इलाज चल रहा है। डॉक्टर बोल देंगे–एक्सपायर्ड! एकान्त में बैठकर वे चाय भी पी लेंगे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। रोज मरीजों को मरते देख कितना शोक मनायें? रोगी तो मौत के मुख में था ही, ठीक होने के स्थान पर वह मौत की ओर खिसक गया; किन्तु वैद्य जो जीवन देनेवाले हैं, वह भी मरते हुए देखे जाते हैं।

संसार में एक से बढ़कर एक यशस्वी वैद्य हुए हैं। कहा जाता है कि समुद्र-मंथन से एक वैद्य प्रकट हुए– धन्वन्तरि। वे भगवान के अवतार कहे जाते थे। उनके जीवन में एक घटना घटित हुई। राजा परीक्षित को शाप था कि आठवें दिन तक्षक नाग के काटने से उनकी मृत्यु होगी। धन्वन्तरि को ज्ञात हुआ। उन्होंने दवा की झोली उठायी और चल पड़े राजा को बचाने। उधर तक्षक भी राजा को डँसने चला। रास्ते में ही दोनों की भेंट हो गयी।

तक्षक ने कहा– ‘‘वैद्यजी! कहाँ की तैयारी है?’’ वैद्य ने कहा– ‘‘हमारे राजा बड़े धर्मात्मा हैं। शापवश आज उन्हें तक्षक काटेगा, मैं उन्हें जिलाने जा रहा हूँ।’’ तक्षक अपने वेश में आ गया। उसने कहा– ‘‘तक्षक तो मैं हूँ। मैं इस पीपल वृक्ष को काटता हूँ, आप इसे जिलायें!’’ हरा-भरा विशालकाय वृक्ष! तक्षक के डँसते ही धुआँ निकलने लगा, पत्तियाँ जहर से काली पड़कर खनखनाने लगीं। धन्वन्तरि ने दवा का प्रयोग किया। वृक्ष पुन: हरा-भरा लहलहाने लगा।

तक्षक चिन्ता में पड़ गया। उसने सोचा, तब तो मेरा वहाँ जाना हाr व्यर्थ है। वह वैद्य की प्रशंसा कर पूछने लगा– ‘‘गुरुजी! आपकी पहुँच कहाँ तक है?’’ वैद्य बोले– ‘‘बेटा तक्षक! मेरी दृष्टि में पड़ा व्यक्ति मर ही नहीं सकता।’’ तक्षक ने कहा– ‘‘वैद्यराज! जहाँ आपकी दृष्टि न पड़े वहाँ?’’ धन्वन्तरि ने कहा– ‘‘वहाँ मेरा कोई वश नहीं है।’’ तक्षक ने तीन बार चरण स्पर्श किया और आगे निकल गया।

जिस मार्ग से धन्वन्तरि को जाना था, तक्षक एक सुन्दर-सी छड़ी का रूप बनाकर निश्चेष्ट पड़ गया। वैद्यराज ने चिकनी-सी छड़ी देखी। उसका एक सिरा कुछ मुड़ा हुआ था। उन्हें लगा, यह थैली टाँगने लायक है। झोला हाथ में लिए-लिए कुछ दर्द भी हो रहा था। झोला लटकाकर ज्योंही वैद्य ने कन्धे पर छड़ी रखा, तक्षक ने उनकी पीठ में डँस लिया। उनकी दृष्टि वहाँ पहुँच ही नहीं पायी, वहीं ढेर हो गये। वह गये थे जीवन देने, स्वयं ही चले गये। ‘मरे वैद्य अरु रोगी’– अवतार की स्थितिवाले वैद्य भी चल बसे। कुछ लोग सूर्य-चन्द्रमा इत्यादि की पूजा करते हैं। कबीर कहते हैं–

चाँद सुरुज तारागन मरिहैं, मरिहैं धरनि अकासा।

काल आने पर चाँद, सूर्य, ग्रह, उपग्रह, तारे भी अपनी कक्षा से डोल जाते हैं, एक ग्रह दूसरे में समा जाते हैं। यह पृथ्वी और आकाश भी परिवर्तित हो जायँगे। ऐसी परिस्थिति में आप किसका भजन करेंगे?

चौदह भुवन के चौधिरी मरिहैं, तिन्हहू की का आसा।

चौदहों भुवन के निर्माता ब्रह्मा भी अपनी आयु पूरी कर शान्त हो जाते हैं। जब उन्हें भी मर ही जाना है तो हम उनसे कौन-सी आशा करें? भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–

आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म विद्यते।। (गीता, ८/१६)

सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा और उनसे उत्पन्न चौदहों भुवन, चराचर जगत्, दिति-अदिति की सन्तानें, यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील है, जन्मने और मरनेवाला है; किन्तु अर्जुन! मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। जब ब्रह्मा भी समय पूरा हो जाने पर अपने लोकों सहित शान्त हो जाता है तो हम किसका जप-तप सुमिरन करें? उस प्रभु को देखा नहीं है कि उनका ध्यान धर लोगे? तो हम क्या करें? कबीर कहते हैं– उन प्रभु के नाम का सुमिरन करो।

नाम अनाम रहे सदा ही, दूजा तत्त्व कोई।

नाम अनाम है, अनिर्वचनीय है, वाणी का विषय नहीं है। जो नाम वाणी से कहा जाता है, ‘राम…राम…राम…’ ऐसा नहीं।

नाम रूप गति अकथ कहानी।

समुझत सुखद परति बखानी।। (मानस, १/२०/७)

गोस्वामीजी कहते हैं– नाम और रूप दोनों की गति अकथनीय कथानक है। ये समझने में सुखदायी हैं किन्तु इन्हें व्यक्त नहीं किया जा सकता। कबीर ने इसी नाम पर बल दिया है–

शब्द शब्द सब कोई कहै वह तो शब्द विदेह।

जिभ्या पर आवे नहीं निरखि परखि कर लेहु।।

पूरा संसार शब्द-शब्द की रट लगाये पड़ा है। कोई कहते हैं– शब्द ही ब्रह्म है, शब्द का आदेश मानो! किन्तु जिससे कल्याण होना है, वह शब्द विदेह है। भजन इतना उन्नत हो जाय कि देहाध्यास शान्त हो जाय। देहाध्यास जिस क्षण शान्त हुआ, वह शब्द आपके हृदय में जागृत, प्रसारित हो जायेगा। उस शब्द का उच्चारण इस जिह्वा से करते नहीं बनता। जो उच्चारण होता है, वह शब्द है ही नहीं। वह वाणी का विषय नहीं है। उसे निरखा और परखा जाता है। वह अपौरुषेय परमात्मा की वाणी है। उसके संरक्षण में चलने का नाम भजन है। यह नाम अनाम है और रहे सदा ही’–सदैव रहनेवाला है, शाश्वत है। दूजा तत्त्व कोई’– दूसरा कोई सार तत्त्व कहीं भी नहीं है, न सृष्टि में न अन्यत्र ही। इसलिए,

कहत कबीर सुनो भाई सन्तो! खोज करो तुम सोई।।

कबीर कहते हैं– सन्तो! ध्यान दो। तुम उसी की शोध करो। कबीर की अधिकांश वाणी सन्तों को सम्बोधित कर कही गयी है। वह जानते थे कि जिस स्तर की बात वह कर रहे हैं, उसे समझने की क्षमता सबमें नहीं हो सकती। जिनमें वह क्षमता पायी गयी, वह थे संत या अवधू बेगम देश है मेरा’ अथवा कोई पण्डित ज्ञानी’। अवधू, ज्ञानी, पण्डित– सभी संत के पर्याय हैं। उन्हें ही लक्ष्य कर कबीर यहाँ कहते हैं कि सन्तो! उस शब्द की खोज करो जो विदेहावस्था में विदित होता है, जो एक परमात्मा के नाम जप की अत्युत्कृष्ट अवस्था में जागृत हो जाता है।

राम नाम में अन्तर है, कहीं हीरा है कहीं पत्थर है।

आरम्भ में जिह्वा से जपा जानेवाला ‘राम-राम’ कण्ठ से और तदनन्तर श्वास से जपा जाता है। वही परावाणी के प्रवेश के साथ अनिर्वचनीय हो जाता है और जहाँ परा की क्षमता आयी, अपौरुषेय वाणी उतरने लगेगी, भगवान योगक्षेम करने लगेंगे। उनके निर्देशों को देखो, समझो और लगो।

खोज करो तुम सोई’–कबीर कहते हैं, केवल एक उसी भगवान का भजन करो। सृष्टि में ऐसा किञ्चित् भी स्थान नहीं है जो काल से बचा हो। सब काल-कवलित हैं, कोई अमर ठाँऊ’; इसलिए प्रभु के उस नाम का सुमिरन करो जो सीधा उन्हें पुकारता हो।

प्रश्न खड़ा होता है कि हम इस मृत्युलोक में क्यों बने हुए हैं? हम मुर्दों के गाँव के नागरिक क्यों हैं? हम भवाटवी में क्यों भटक रहे हैं? हम अभय पद के नागरिक क्यों नहीं हैं? इन्हीं कारणों की ओर इस पद में कबीर ने संकेत किया है और यही रामचरितमानस में गोस्वामीजी ने अंगद-रावण संवाद के प्रसंग में बताया।

रावण ने भगवान श्रीराम को मनुष्य कहा। अंगद बिगड़ खड़ा हुआ। उन्होंने कहा– रावण! मैं तुम्हें मार सकता हूँ; किन्तु इससे मेरा अपयश होगा क्योंकि मुर्दों को मारने से कोई यश नहीं होता। तू मुर्दा है–

कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा।

अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा।। (मानस, ६/३०/२)

कौल अर्थात् वाममार्गी! जो सीधा अपने आत्मपथ पर अग्रसर है, वह स्वपथ पर है; किन्तु वाममार्गी तजि श्रुति पंथु बाम पथ चलहीं।’ (मानस, २/१६७/७)– भूत-भवानी, धूत-पोंगड़ा में भटका हुआ है। काम बस’– हृदय में इच्छाओं का अम्बार लगा है, कृपन’– जो भजन नहीं करता! गीता में भजन करनेवालों को उदार कहा गया (गीता, ७/१८)। विमूढ़’– तू अत्यन्त मूढ़ है, जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम’ (मानस) तब भी तेरी समझ में नहीं आता।

अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा।’–रावण! तू अत्यन्त दरिद्र है। सोने की लंका थी। विश्व का वैभव, रत्न कहलानेवाली सामग्री लंका में थी फिर भी अंगद ने उसे दरिद्र कहा। दरिद्र वह है जिसके पास आत्मिक सम्पत्ति न हो। रावण वास्तव में आत्मिक सम्पत्ति से वंचित था। मीरा के पास धन की कमी नहीं थी, हिन्दुओं के सबसे प्रतिष्ठित राजघराने की साम्राज्ञी थी। भगवान के विरह में उसने आभूषणों का परित्याग कर दिया, तुलसी की माला और तम्बूरा ले लिया। धीरे-धीरे परमात्मा में उसकी लौ लग गयी। उसने कहा–

पायो जी मैं तो राम रतन धन पायो।

वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु किरिपा करि अपनायो।

राम-नाम ऐसी वस्तु है जिसका मूल्य कोई चुका ही नहीं सकता। उसके समान कुछ है ही नहीं! क्या देकर उसे लोगे? इसे तो सद्गुरु ने कृपा करके हमें प्रदान किया है। क्या विशेषता है इसमें?–

खाय खूँटे चोर लूटे, दिन दिन बढ़त सवायो।

जितना रगड़ करेंगे, नाम की उतनी ही अभिवृद्धि होती जायेगी। अंतत: नाम नामी से मिला देगा जो अक्षय धाम है, अनन्त जीवन है, शाश्वत शान्ति है। वह अविनाशी है तो आपका भी पद अविनाशी रहेगा। वह लक्ष्मीपति है तो लक्ष्मी सदैव आपकी सेवा में रहेगी। यह ऐसा धन है जिसे पाने के बाद आप कभी निर्धन नहीं होंगे। सांसारिक धन-वैभव का क्या ठिकाना!सोइ पुर पाटन सो गली, बहुरि देखा आइ।’–मर-खपकर जिस वैभव का संग्रह किया, मृत्यु के पश्चात् लौटकर उसे देख भी नहीं सकते। यह जीवन जन्म-मृत्यु के बीच का एक पड़ाव है। यहाँ कोई थोड़ा ऊपर बैठकर आयु के दिन व्यतीत करता है तो कोई फुटपाथ पर! धन वह है जो हमारी आत्मा का सहयोग करे, सहज स्वरूप दिलाये, सदा रहनेवाली समृद्धि प्रदान कर दे। वह धन प्रभु के नाम का है। रावण! तू उससे हीन है इसलिए अति दरिद्र है। तू अयसी है। तुमने जो कृत्य किये हैं, वे कुकृत्य हैं। लोग यशोगान करें, तुममें ऐसा कुछ भी नहीं है।

अति बूढ़ा’–रावण की बहुत लम्बी आयु थी। अंगद ने कहा– वैसे भी तू बहुत बूढ़ा हो चला है, तुझे मारने से क्या यश मिलेगा? इतना ही नहीं, तू तो–सदा रोग बस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी।।’ (मानस, ६/३०/३)– रावण! तू तो रोग से भी आक्रान्त है। विचारणीय है रावण के शरीर में कोई बीमारी नहीं थी। शरीर से वह बड़ा बलिष्ठ था। युद्ध में उसका पराक्रम कम नहीं था, फिर भी अंगद ने उसे रोगी कहा। एक रोग शारीरिक होता है, जैसे– फोड़ा-फुन्सी या बुखार हो जाय; किन्तु दूसरा रोग मानस रोग है जो अधिक भयानक है–

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।

तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।

काम बात कफ लोभ अपारा।

क्रोध पित्त नित छाती जारा।।

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई।

उपजइ सन्यपात दुखदाई।। (मानस, ७/१२०/२९-३१)

मोह सम्पूर्ण व्याधियों का मूल है। काम वात है, क्रोध पित्त है, लोभ कफ है। अहंकार अति दुखद डमरुआ’– अहंकार गाँठ का दु:खदायी रोग है। तृष्ना उदरबृद्धि अति भारी।’– तृष्णा उदर-सम्बन्धी रोग है। इस प्रकार उन्होंने पन्द्रह-पच्चीस रोगों का नाम गिनाया और कहा– मानस रोग कछुक मैं गाये। हहिं सबकें लखि बिरलेन्ह पाये।।’ (मानस, ७/१२१/२)–ये मन के रोग हैं, आवागमन में भ्रमण करानेवाले भवरोग हैं। हमने कुछ रोगों का ही वर्णन किया है; सभी को तो कोई विरला ही देख पाया है। रावण के पास ये सभी रोग थे। वह सदा रोगबस’ था। रोगमुक्ति का उपाय उसने किया ही नहीं। वह संतत क्रोध के वशीभूत था, विष्णु-विमुख था; विश्व में जो अणुसत्ता परमात्मा हैं, उनके विमुख था। वह श्रुति और सन्तों का विरोधी भी था–

तनु पोषक निन्दक अघ खानी।

जीवत सव सम चौदह प्रानी।। (मानस, ६/३०/४)

केवल शरीर को ही सर्वस्व समझकर इसी के भरण-पोषण में जो जीवन काटता है, वह तनु पोषक’ है। वह जीते जी मुर्दा ही है; क्योंकि शरीर छूट जाने पर फिर कोई योनि ही मिलेगी। उसने तन तक की चिन्ता की, शाश्वत की ओर ध्यान ही नहीं दिया। इसी प्रकार निन्दा करनेवाले, पाप की खान– ये सभी यद्यपि हिल-डुल रहे हैं, वस्तुत: मुर्दा हैं। मृत्युलोक का नागरिक होने का कारण ये मानस-रोग हैं।

ठीक यही सन्त कबीर कहते हैं– सन्तो! यह मुरदों का गाँव।’ इस मरणधर्मा संसार में आप किसका जप करेंगे? किसके लिए आप मनसहित इन्द्रियों को तपायेंगे? यहाँ कोई अमर ठाँऊ’–मृत्यु से मुक्त कोई स्थान नहीं है। इसलिए आप एकमात्र परमात्मा का नाम पकड़ो, उसका सुमिरन करो। नाम जपते-जपते अनाम की स्थिति में स्वाँस में छिपा शब्द जागृत हो जायेगा, उसे निरखो और परखो। आपकी सारी दरिद्रता दूर हो जायेगी। आप अपना धाम पा जायेंगे।

सन्त कबीर ने एक परमात्मा के चिन्तन पर बल दिया है। कुछ लोग उन्हें निर्गुण उपासक कहते हैं; किन्तु निर्गुण नाम की कोई उपासना होती ही नहीं। उपासना जब भी चलती है, सगुण से होती है। उपासना के परिणाम में जो स्थिति मिलती है वह गुणातीत है। तीनों गुणों से अतीत वह सत्ता निर्गुण कहलाती है। उस समय वहाँ भगवान निराकार कहलाते हैं, न कि निराकार कोई मत या पंथ है।

।। श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-4’ से उद्धृत)

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