शब्द सो प्रीति करै सोई पावै

शब्द सो प्रीति करै सोई पावै

सन्त कबीर का एक भजन है– शब्द सो प्रीति करै सोई पावै।परमात्मा को, ईश्वर को, उस शाश्वत धाम को वही प्राप्त कर पायेगा जो शब्द से प्रीति करेगा। पहले भजन प्रस्तुत है–

शब्द सो प्रीति करै सोई पावै।

इस धरती की चार दिशा हैं, काया भेद लखावै।

बिनसे धरती बिनसे काया, तब जिव कहाँ समावै।।

शब्द सो प्रीति….।।

स्वाँसा सुमिरे घड़ी विचारे, लगन शब्द में राँचे।

जब जियरा के काल गरासे, कौन नाम कहि बाँचे।।

शब्द सो प्रीति….।।

त्रिकुटी मध्ये ध्यान लगावै, अजपा जाप जपावे।

सुरति समानी अधाधुन्ध में, बिन जाने का जावे।।

शब्द सो प्रीति….।।

साधु वही जो सेवा जीते, सेवा सदगुरु पावै।

बलिहारी वहि सत्य गुरु की, जो वह गुफा लखावै।।

शब्द सो प्रीति….।।

जो कुछ कहूँ अकह से न्यारा, ताहि देखि लव लावै।

कह कबीर एहि गति के योगी, बहुरि न भव जल आवै।।

शब्द सो प्रीति….।।

सन्त कबीर के अनुसार परमात्मप्राप्ति का साधन-स्रोत शब्द से प्रीति है। अब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि शब्द क्या है? तो–

शब्द हमारा आदि का, शब्दै पैठा जीव।

कूड़ा केरी  टोकरी, घोड़ा  खाया घीव।।

सन्त कबीर कहते हैं कि हमारा शब्द आदि का है। आदि, अनादि परमात्मा है। हमारा शब्द उस परमात्मा का है, उससे संचालित है, प्रसारित है। उस शब्द का आश्रय लेकर जीव अपने स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। शब्दै पैठा जीव– उस शब्द में प्रवेश कर जीव पूर्ण हो जाता है। यह शरीर कूड़े की टोकरी है। ये इन्द्रियाँ रात-दिन विषय-भोगों का कचरा, मल-आवरण-विक्षेप का ही तो संग्रह करती हैं।

घोड़ा खाया घीव– घोड़ा घी नहीं खाता! इसे उलटवाँसी न कहें तो क्या कहें? किन्तु अध्यात्म में ऐसा ही है। सन्त कबीर ने मन को घोड़े की संज्ञा दी है। यह अयुक्त मन क्रमश: सिमटकर उस सारतत्त्व परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। किसी भाविक ने कबीर से पूछा–

कौन ज्ञान है कौन ध्यान है, को है पारख बानी।

काहे लिये तुम ज्ञान कूटत हो, को है अंतर्यामी।।

आप किसके लिए ज्ञान-ध्यान की बातें करते हैं? अन्तर्यामी कौन है? सन्त कबीर ने बताया–

मनै ज्ञान है  मनै ध्यान है, मन है  पारख बानी।

मनै लिये हम ज्ञान कूटत, मोर मनवै अंतर्यामी।।

मन से ही ज्ञान है, मन से ही ध्यान है और मन में ही उस पारखवाणी का सूत्रपात् होता है। परन्तु यह मन अत्यन्त चंचल, दुष्ट और धूर्त है। इस मन ही के लिए मैं ज्ञान की चर्चा करता हूँ। सारे उपक्रम इसे संयत करने के लिए ही है और जब यह कूटस्थ हुआ तो मोर मनवै अंतर्यामी– मेरा मन ही वह अन्तर्यामी पद पा लेता है।

सन्त कबीर ने नया कुछ नहीं कहा। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के उसी मन्तव्य को दुहरा दिया जो आदिशास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता में है–

इहैव  तैर्जित: सर्गो  येषां  साम्ये स्थितं  मन:

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिता:।।५/१९।।

उन पुरुषों द्वारा जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया। किनके द्वारा? जिनका मन समत्व में स्थित है। क्यों? समत्व की स्थिति का संसार जीतने से क्या सम्बन्ध है? श्रीकृष्ण कहते हैं– निर्दोषं हि समं ब्रह्म– वह ब्रह्म निर्दोष और सम है और इधर इसका मन भी निर्दोष और सम की स्थितिवाला हो गया इसलिए यह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। कबीर कहते हैं– मनवै अंतर्यामी; योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– मन ब्रह्म में स्थित हो जाता है।

प्राप्तिवाला प्रत्येक महापुरुष एक ही बात कहता है। अन्तर इतना ही है कि कभी बोलचाल की भाषा संस्कृत थी तो कबीर ने सहज बोलचाल की भाषा हिन्दी में उसी तथ्य को प्रस्तुत किया। प्राप्तिवाले महापुरुष भाषा से कभी नहीं चिपके। उन्होंने उस भाषा का प्रयोग किया जो बहुसंख्यक जनता के कानों तक, हृदय तक पहुँच सके। बुद्ध विद्वान् थे किन्तु क्षेत्रीय सामयिक भाषा पाली में उन्होंने अपना उपदेश प्रसारित किया। भगवान महावीर राजकुमार थे, पूर्ण विद्वान् थे किन्तु जनता को हृदयंगम कराने के लिए इन्हीं तथ्यों को अर्द्धमागधी में प्रस्तुत किया। गुरुनानक ने अपनी क्षेत्रीय लोकवाणी में उपदेशों का प्रसारण किया। भाषाएँ भले ही अलग रही हों, प्रत्येक महापुरुष का तथ्य, निष्कर्ष और स्तर एक है। अनुभव में मिलने वाले शब्दों पर कबीर पुन: बल देते हैं–

शब्द हमारा आदि का, पल पल करहू याद।

अन्त फलेगी मोहलीऊपर की सब बाद।।

हमारा शब्द आदि का है। सबका आदि मूल है परमात्मा, अत: यह शब्द परमात्मा से संचारित है, प्रसारित है। इसे पल-पल याद करें कि वे कहते क्या हैं? उसे समझें और उनके निर्देशों का पालन करें। उसकी अवहेलना न करें। अन्त में आपके भीतर जो सारतत्त्व है वही फलीभूत होगा, ऊपर वाला दिखावा तो बकवास है, व्यर्थ है। इसी आशय का कबीर का यह पद है– शब्द सो प्रीति करै सोई पावै।

लौकिक गुरु दीक्षा के रूप में शिष्य के कान में धीरे से कोई मंत्र या शब्द कह देते हैं और शिष्य से वही जपने के लिए कहते हैं। इस प्रक्रिया को कान फूँकना भी कहते हैं। अनुसुइया आश्रम में आने वाले भाविक भी पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना करते थे कि इसी तरह उन्हें भी शिष्य बना लें। गुरुदेव भगवान कहा करते थे– ‘‘हो! मैं कान नहीं फूँक सकता। कान फूँकने से कुछ होता ही नहीं। कान से सुनकर भी तुम उसे अपनी बुद्धि के अनुरूप ही ग्रहण करोगे। सन्त उपदेश करते हैं। मैं उपदेश करूँगा, उसे तुमलोग श्रवण करो।’’ इस प्रकार गुरुदेव दूर बैठकर उपदेश किया करते थे और कहते थे– ‘‘उपदेश के अनुसार तुमलोग पालन करोगे, थोड़ी-सी भी साधना यदि हृदय से पार लगी, श्रद्धा की डोरी लगी तो जिसका नाम भजन है, मैं तुम्हें दे दूँगा। तुम हजारों किलोमीटर दूर भी रहो तब भी मैं उसे तुम्हें यहाँ बैठे-बैठे दे दूँगा। केवल साँझो-विहानों (प्रात:-सायं) थोड़ा मेरा स्वरूप अपने मन में देख लिया करो।’’

हर महापुरुष ने यही कहा। भगवान महावीर ने कहा–

णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आयरियाणं।

णमो उवज्झायाणं। णमो लोए सव्वसाहूणं।

एसो पंचनमुक्कारो, सव्वपावप्पणासणो।

मंगलाणं च सब्वेसिं, पदमं हवइ मंगलं।।

उन्होंने महापुरुष की पाँच विशेषताओं का वर्णन किया कि अरिहन्तों को नमस्कार है, सिद्धों को नमस्कार है, आर्यों को नमस्कार है, उपाध्यायों को नमस्कार है, साधुजनों को नमस्कार है। यह पाँच नमस्कार सब पापों का नाश करने वाला और सब मंगलों में प्रथम मंगल है। उन महापुरुषों की शरण जाओ, उनके प्रति समर्पित हो जाओ। यही पूज्य महाराजश्री का निर्देश था। इस प्रकार महापुरुष वाणी से तभी तक उपदेश करते हैं जब तक वह हृदय से जागृत नहीं हो जाते। इसके पश्चात् वह वाणी से बहुत कम, यदा-कदा, असावधान होने पर, बहुत आवश्यक होने पर कुछ कहते हैं किन्तु हृदय से निरन्तर निर्देश देते रहते हैं। इसके बाद भी कमी है तो साधक के चलने में है, साधक के पकड़ की है अन्यथा ईश्वर-पथ में कोई कमी नहीं है। जब से अन्त:करण में सद्गुरु की जागृति होती है, जिस स्तर पर हम हैं, जिस परमात्मा की हमें चाह है उसी स्तर पर उतर कर आत्मा से जागृत होकर रिले होता है, प्रसारित होता है, अपना उपदेश देने लगता है, उसी दिन से भजन आरम्भ होता है। उन निर्देशों के सहारे, जिसे कबीर ने शब्द की संज्ञा दी है, चलने वाला वास्तव में पथिक है।

सन्त कबीर कहते हैं कि आप आवागमन की भूलभूलैया में भटक रहे हैं–

यह धरती की चार दिशा हैं, काया  भेद  लखावै।

बिनसे धरती बिनसे काया, तब जिव कहाँ समावै।।

इस धरती की चार दिशाएँ हैं। धड़ धरती का एकै लेखा। जो बाहर सो भीतर देखा।’- धरती कहते हैं इस पृथ्वी को, धड़ कहते हैं शरीर को! जो कुछ सृष्टि में बाहर है, सारी व्यवस्था आपके मन में है– मन महँ तथा लीन नाना तन, प्रगटत अवसर पाये।’, ‘सरग, नरक, चर अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे।– स्वर्ग-नरक चराचर जगत् इस मन के अन्तराल में अवस्थित है। जब जिसका क्रम आता है, यह मन उसे पिण्डरूप में बाहर फेंकता रहता है। इस प्रकार धड़ और धरती समरूप हैं। मन में सूक्ष्म परमाणु है तो धरती स्थूल। इस शरीररूपी धरती की चार दिशाएँ हैं– अण्डज, पिण्डज, उष्मज (स्वेदज) और उद्भिज्ज (स्थावर, वनस्पतियाँ इत्यादि)। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में– चार खानि जग जीव अपारा– चार खानों में जीवों की अपार शृंखला है, चार ही प्रकार की सृष्टि है। जीव की अन्य कोई पाँचवीं दिशा या दशा नहीं है। काया भेद बतावै– काया पिण्ड-परिवर्तन का भेद बताती है, विविध प्रकार के कलेवरों का ढाँचा बनाती है। बिनसे धरती बिनसे काया– धरती नश्वर और काया का परिवर्तन भी नश्वर है। जब यह नष्ट ही होना है, तब जिव कहाँ समावै– तब जीव भला कहाँ शरण लेगा? इसलिए शब्द से प्रीति करो। प्रीति करें तो कैसे करें? इस पर कहते हैं–

स्वाँसा सुमिरे घड़ी विचारे, लगन शब्द में राखे।

श्वास का जप करें। जप के चार क्रमोन्नत सोपान हैं। नाम वही है, केवल नाम जपने का स्तर उठता जाता है। आरम्भ में बैखरी, उससे मध्यमा, पश्यन्ती और परा। बैखरी में नाम का स्पष्ट उच्चारण किया जाता है। कुछ दिनों के सतत् अभ्यास से मन नाम में डूबने लगता है, स्वर मन्द पड़ जाता है, जप चलता रहता है, इसे मध्यमा कहते हैं। क्रमश: नाम सूक्ष्म होकर श्वास में ढल गया तो पश्यन्ती और धारा-प्रवाह होने पर परा कहा जाता है। इस वाणी को परा इसलिए कहते हैं कि यह परम में प्रवेश दिला देने की क्षमता वाली है। पश्यन्ती और परा के जप का उतार-चढ़ाव श्वास पर है इसलिए श्वास से सुमिरण करो और घड़ी विचारो– प्रत्येक घड़ी (घटी) विचार करो। घटी, पल समय-माप के पैमाने हैं। घड़ी का आशय है कि समय का विचार करो–

श्वास श्वास पर राम कहु, वृथा श्वास जनि खोय।

ना जाने  इस श्वास काआवन  होय  न होय।।

पल-पल, हर घड़ी विचार कीजिए। एक भी श्वास व्यर्थ न जाने पाये और लगन शब्द में राखे’- जप करते समय आपकी दृष्टि शब्द पर टिकी रहे कि प्रभु ने हमारा जप स्वीकार किया या नहीं? किया तो कितना किया? आगे उनका क्या निर्देश है? क्या आदेश है? उनके शब्द पर सदा दृष्टि रखें! कदाचित् ऐसा नहीं करेंगे तब क्या होगा?

जब जियरा के काल गरासे, कौन नाम कहि बाँचे।

जब जीवात्मा को काल ग्रसेगा, ऐसा कौन नाम है जिसका आश्रय लेकर आप काल से बच पाओगे? प्रश्न उठता है कि इस शब्द का प्रीतिकर्त्ता ध्यान कैसे धरें? तो–

त्रिकुटी मध्ये ध्यान लगावै, अजपा जाप जपावै।

साधना के आरम्भ में दोनों भौंहों के मध्य त्रिकुटी में ध्यान लगाने का विधान पाया जाता है किन्तु वास्तविक त्रिकुटी तब है जब सत्-रज-तम– तीनों गुण कूटस्थ हो जायँ। न सात्त्विक तरंग मन में उठे, न राजसी, न तामसी संकल्प उठें। इन तीनों से रिक्त होकर सुरत लगायें। तीनों को कूटस्थ (पर्वत की तरह अचल, अडिग) कर ध्यान लगायें। आप ध्यान में लगें और मन में कोई सात्त्विक तरंग उठ गयी कि उस शास्त्र में ऐसा क्यों लिखा है?– हमारा मन तो बहक गया। अब ध्यान की गुंजाइश नहीं रह गयी। ध्यान के लिए महर्षि पतञ्जलि कहते हैं–

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।। (पातञ्जल योगदर्शन, ३/२)

वहाँ वृत्ति का एकतार चलना, क्रम न टूटना ध्यान है। इसलिए तीनों गुणों को कूटस्थ करके इनसे अलग होकर ध्यान लगायें। अजपा जाप जपावै’- जप का आशय है जपें, अजप का आशय है मत जपें। प्रयास करके न जपना पड़े किन्तु जप साथ न छोड़े। आरम्भ में प्रयत्न करने पर भी मन साधना छोड़कर वासनाओं की ओर भाग जाता है। क्रमश: अभ्यास से जप इतना सूक्ष्म हो जाता है कि बिना लगाये ही नाम श्वास में ढल जायेगा, भजन धारावाहिक होने लगेगा। इस स्तर के भजन का नाम है अजपा! इस अजपा जाप का परिणाम क्या होगा? इस पर कहते हैं–

सुरत समानी अधाधुन्ध में, बिनु जाने का जावै।

शब्द सो प्रीति….

इसके पश्चात् आपकी सुरत अधाधुन्ध है, अखण्ड है, अपार है, अनन्त है। कबीर ने अपनी सधुक्कड़ी भाषा में इस स्थिति को अधाधुन्ध कहा। जिसका आर-पार नहीं है, वह शाश्वत सत्य एक परब्रह्म परमात्मा है, अविनाशी धाम है। इस अजपा के फलस्वरूप आपकी सुरत अधाधुन्ध में, अखण्ड-अपार परमात्मा में समा जाती है। जब तक सुरत समाहित नहीं हो जाती, जब तक  वह अखण्ड-अपार परमात्मा जानने में नहीं आता तब तक उसे जाने बिना का जावै– क्यों भाग रहा है, क्यों पीठ दिखा रहा है? साधना छोड़नी नहीं चाहिए। साहस, शौर्य के साथ लगें। यह काँटों भरा रास्ता है। महापुरुषों ने इस पथ को युद्ध की संज्ञा दी है, इसमें पीछे हटना नहीं चाहिए। अग्रेतर कहते हैं–

साधु वही जो सेवा जीते, सेवा सदगुरु पावै।

साधु वही है। यह अजपा का जप, श्वास का सुमिरन, शब्द की जागृति उन संतों के लिये संभव है जो सेवा को जीत लें। सभी सेवा कर नहीं पाते। आरम्भ में सेवा का उत्साह रहता है किन्तु शीघ्र ही लोग बगल झाँकने लगते हैं। सिर भरि जाउँ उचित अस मोरा। सबु ते सेवक धरम कठोरा।।– रामचरितमानस में भरत की उक्ति है कि सेवक धर्म बड़ा कठोर है। कितना ही कठोर हो, साधु वही है जो सेवा को जीत ले। सेवा किसकी करें? लोग कहते हैं देश-सेवा, लोक-सेवा, ज्ञान-सेवा और इनके नाम पर अपनी गोट लाल करके महल बना लेते हैं। लोगों ने सेवा को एक जीविका बना रखा है किन्तु सन्त कबीर के अनुसार सेवा सदगुरु पावे– सेवा सद्गुरु की करें। अब कौन से सद्गुरु की सेवा करें? सद्गुरु की पहचान क्या है? सद्गुरु की सेवा से लाभ क्या है?– इस पर सन्त कबीर कहते हैं–

बलिहारी वा सत्य गुरु की, जो वह गुफा लखावै।

उस सद्गुरु पर मैं बलिहारी हूँ जो वह गुफा लखावै– जो वह गुफा दिखा दे जहाँ से शब्द जागृत होता है, प्रस्फुटित होता है। उस आवाज की जागृति, उसे सुनना और समझना सद्गुरु के द्वारा सम्भव है। जो उसमें रमण करता है वही अन्य में जागृत कर सकता है, अन्य कोई मार्ग नहीं है। इसलिए मैं ऐसे सद्गुरु की बलिहारी लेता हूँ, समर्पित हूँ। जिस परमात्मा की हमें चाह है, वह उसी सतह पर उतर आये जिस पर हम हैं, मार्गदर्शन करने लगे। यही है शब्द! यही है आसमानी आवाज! कबीर कहते हैं–

जो कुछ कहूँ अकह से न्यारा, ताहि देखि लव लावै।

मैं जो वाणी से कह रहा हूँ, जो कहने में आ रहा है तथा जो कहने में नहीं आ रहा है, मन में महसूस करता हूँ– इन दोनों से वह शब्द न्यारा है, अलग है। उस शब्द को देखा जाता है। ‘ऋषय: मंत्र: द्रष्टार:’- ऋषिगण मंत्रद्रष्टा थे। मंत्र को उन्होंने देखा था। वही सन्त कबीर कहते हैं– शब्द कह-अकह दोनों के परे है। उसे देखते जाओ, लव लगाते जाओ।

कह कबीर एहि गति के योगी, बहुरि न भव जल आवै।

शब्द सो प्रीति….।।

सन्त कबीर कहते हैं– इस जागृति को प्राप्त योगी लौटकर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते। वह निश्चय ही मुक्ति प्राप्त करते हैं। भवसागर में वे जन्म नहीं लेते, आवागमन के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। उस अविनाशी पद को प्राप्त कर लेते हैं जिस पर भगवान श्रीकृष्ण ने बल दिया–

ईश्वरसर्वभूतानां  हृद्देशेऽर्जुन  तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।

(गीता, १८/६१)

तमेव   शरणं   गच्छ     सर्वभावेन    भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।

(गीता, १८/६२)

अर्जुन! हृदयस्थित उस ईश्वर की शरण जाओ। सर्वभावेन– सम्पूर्ण भावों से जाओ। मान लें हमने सारी मान्यताएँ तोड़ीं और एक ईश्वर की शरण गये तो उससे लाभ क्या? भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– तत्प्रसादात्परां शान्तिं– उसके कृपा-प्रसाद से तुम परम शान्ति को प्राप्त कर लोगे और स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्– उस स्थान को पा जाओगे जो शाश्वत है। सदा तुम रहोगे और तुम्हारा धाम रहेगा।

अत: उस परम धाम की प्राप्ति के लिए जीते-खाते, समस्त क्रियाकलाप यथापूर्व करते रहें। किसी भी कार्य को बन्द करने की जरूरत नहीं है। केवल एक नया काम और जोड़ लें– उस परमात्मा में केवल डोरी लगा लें, श्रद्धा स्थिर कर लें। परमात्मा के परिचायक किसी एक नाम का जप आरम्भ करें। ओम् अथवा राम जो भी आपको अभिमत हो, जपें। साथ ही किसी अच्छे महापुरुष, कैसे भी सन्त हों, उनकी सेवा करें और यदि सद्गुरु मिल जाते हैं तो सोने में सुगन्ध ही है। मूलत: कबीर, महावीर, बुद्ध, नानक, आद्योपान्त सम्पूर्ण महापुरुषों के अनुसार यदि सद्गुरु उपलब्ध नहीं है तो भजन की जागृति नहीं होती। सन्त कबीर का यह भजन इसी आशय को व्यक्त करता है।

!! बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-1से उद्धृत)

Q & A
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