सन्तो! जागत नींद न कीजै।
काल न खाय कलप नहिं व्यापै, देह जरा नहिं छीजै।।
सन्तो…
उलटी गंग समुद्रहिं सोखै, ससि अउ सूरहिं गरासै।
नव ग्रह मारि रोगिया बैठे, जल में बिंब प्रकासै।।
सन्तो…
बिनु चरनन को दहुँ दिसि धावै, बिनु लोचन जग सूझै।
ससा उलटि सिंह को ग्रासे, ई अचरज कोइ बूझै।।
सन्तो…
अउँधे घड़ा नहिं जल भरिया, सूधे सो जल भरिया।
जेहिं कारन नर भिन्न भिन्न करै, गुरु प्रसाद सो तरिया।।
सन्तो…
बैठि गुफा में सब जग देखे, बाहर किछउ न सूझै।
उलटा बान पारधिहिं लागे, सूरा होय सो जूझै।।
सन्तो…
गायन कहै कबहुँ नहिं गावै, अनबोला नित गावै।
नट वट बाजा पेखनि पेखै, अनहद हेत बढ़ावै।।
सन्तो…
कथनी बदनी निजुकै जोवै, ई सब अकथ कहानी।
धरती उलटि अकासहिं बेधे, ई पुरुषन की बानी।।
सन्तो…
बिना पियाला अमृत अँचवै, नदी नीर भरि राखै।
कह कबीर सो जुग जुग जीवे, जो राम सुधारस चाखै।।
सन्तो…
इस भजन में सन्त कबीर ने साधकों को सचेत किया है कि ‘सन्तो! जागत नींद न कीजै’। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है–
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा।
देखिअ सपन अनेक प्रकारा।। (रामचरितमानस, २/१२/२)
मोहरूपी रात्रि में सब अचेत पड़े हैं। वे जो कुछ रात-दिन दौड़-धूप करते हैं, मात्र स्वप्न देखते हैं। चराचर जगत् सोया हुआ है। उसमें केवल एक प्राणी मनुष्य तब जागता है–
जानिअ तबहिं जीव जग जागा।
जब सब बिषय बिलास बिरागा।। (रामचरितमानस, २/१२/४)
इस जीव को जगा हुआ तब जानना चाहिए जब सम्पूर्ण विषयों से वैराग्य हो जाय। काम, क्रोध, राग, द्वेष कोई विकार या रूप, रस, शब्द, स्पर्श और गन्ध इत्यादि किसी प्रकार का विषय उसे आकर्षित न कर सके; इनसे भली प्रकार वैराग्य हो जाय किन्तु अधिकांश साधक विकारों से इतना अलग नहीं हो पाते। उन्हीं को सम्बोधित करते हुए सन्त कबीर कहते हैं– संतो! जग तो गये हो, ईश्वर-पथ पर चल तो दिये हो किन्तु ‘नींद न कीजै’– असावधान मत रहना।
नींद की नहीं जाती, बलात् आ जाती है। जो जगता है, स्वाभाविक रूप से सोता भी है। किन्तु भजन की जागृति के पश्चात् एक निद्रा ऐसी है जो की जाती है। साधन-पथ पर कुछ दूरी तय करने के बाद कोई साधक मान-सम्मान में फँस जाता है तो कोई कुटी बनाने में लग जाता है, कोई ऋद्धियों-सिद्धियों में उलझ जाता है। वह जग तो गया था किन्तु यह निद्रा उसने स्वयं की है, स्वयं अपने को उधर झुकाया है। यदि वह सचेत है, भली प्रकार आज्ञापालन में सुदृढ़ है तो इन विघ्न-बाधाओं की निद्रा से वह बच जायेगा। इसलिए ऐसा कुछ न कर लें कि पुन: मोह-निशा की निद्रा अचेत बनाकर निगल जाय।
मान लें किसी ने निद्रा नहीं किया तो उससे लाभ क्या होगा? कबीर कहते हैं– उससे आपको मुक्ति मिलेगी, स्थिति मिलेगी। वह स्थिति कैसी है? ‘काल न खाय कलप नहिं व्यापै’। सतत् जागरण का परिणाम होगा ‘काल न खाय’। काल बड़ा दुर्धर्ष है। काल ने किसी को नहीं छोड़ा–
अग जग जीव नाग नर देवा।
नाथ सकल जग काल कलेवा।। (रामचरितमानस, ७/९३/७)
चराचर जगत् काल का कलेवा है, जलपान सामग्री मात्र है। काल से परे केवल परमात्मा है। गीता में भगवान कहते हैं– मैं काल से परे, काल से अतीत हूँ। सतत् जागृत अवस्था में रहेंगे तो काल से परे अकाल पुरुष को प्राप्त कर लेंगे। ‘कलप नहीं व्यापै’– कल्प-कल्पान्तर तक उस रहनी में कोई परिवर्तन नहीं आयेगा, स्थिति में उतार-चढ़ाव, भला-बुरा परिवर्तन नहीं आयेगा और ‘देह जरा नहिं छीजै’– शरीर जरा-जीर्ण नहीं होगा, सदैव किशोरावस्था रहेगी, वह कभी क्षीण नहीं होगा। काल से परे, परिवर्तन से परे आत्मदर्शन, स्पर्श और स्थिति है। वह निज स्वरूप है। इसलिए सन्तो! यदि जग ही गये हो तो कहीं निद्रा को आमंत्रित न कर लेना, कहीं उसके वशीभूत न हो जाना।
सदैव सचेतावस्था में रहने पर ‘उलटी गंग समुद्रहिं सोखै’। अनन्त काल से गंगा इत्यादिक हजारों नदियाँ समुद्र में समाहित होती चली जाती हैं; किन्तु भजन-पथ में कोई ऐसी गंगा है जो समुद्र को ही सुखा डालती है। वस्तुत: ज्ञान ही गंगा है–
गंगा जमुना खूब नहाये, गया न मन का मैल।
एक गंगा तो नदी है जिसमें लोग स्नान करते हैं, किन्तु अध्यात्म में ज्ञान ही गंगा है। ज्ञान परम पवित्र करनेवाला है– ‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।’ (गीता, ४/३८)। इसके समान पवित्र करनेवाला नि:सन्देह कुछ भी नहीं है। कुछ याद कर लेना ज्ञान नहीं है। ईश्वर-दर्शन के साथ मिलनेवाली प्रत्यक्ष जानकारी, अनुभूति ज्ञान है और उस जानकारी के साथ ‘जेहि जानें जग जाइ हेराई।’ (रामचरितमानस, १/१११/२)– उन प्रभु को जान लेने पर जगत् सदा के लिए खो जाता है। ‘नाम लेत भव सिंधु सुखाहीं’– नाम के प्रभाव से भवसागर सूख जाता है। उस प्रत्यक्ष जानकारी के अन्तराल में समुद्र समाहित हो जाता है। यही है ‘उलटी गंग समुद्रहिं सोखै’; जानकारी के साथ समुद्र सूख जाता है।
‘ससि अउ सूरहिं गरासै।’– यौगिक शब्दकोष में बायें स्वर को इड़ा या इंगला (चन्द्र) और नासिका के दाहिने स्वर को पिंगला या सूर्य कहा जाता है। जिन दिनों पूज्य गुरु महाराज पागलों की तरह अपने चिन्तन में रात-दिन निमग्न निराधार विचरण कर रहे थे, कुछ भाविकों को सन्देह हुआ, ‘यह पागल है अथवा सन्त, क्योंकि इतनी शान्ति पागलों में नहीं देखी जाती।’ एक भक्त ने महाराज जी से एक दोहे का अर्थ पूछा–
एक बार हरि घोड़ा भये, ब्रह्मा भये लगाम।
चाँद सुरुज रबिका भये, चढ़ि गये चतुर सुजान।।
गुरु महाराज ने उन्हें बताया कि हरि अर्थात् परमात्मा! जो सर्वस्व का हरण करनेवाला है इसलिए हरि कहे जाते हैं। हरि से संयुक्त सिमटा हुआ मन ही हरि है। ‘बुद्धि अज’– बुद्धि ब्रह्मा ही लगाम है। ‘चाँद सुरुज रबिका भये’– इंगला और पिंगला, चन्द्र और सूर्य नाड़ी रकाब हैं। इस श्वास-प्रश्वास के यजन के द्वारा चतुर और सुजान लोग इस घोड़े पर चढ़ गये हैं; हरि की अटारी पर, हरि की रहनी में प्रवेश पा गये। श्वास-प्रश्वास का यजन नितान्त आवश्यक है किन्तु ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी हो जाने पर श्वास-प्रश्वास के भजन की अवस्था समाप्त हो जाती है। सुमिरन करके वह अब किसे जानेगा? इसलिए इंगला-पिंगला के चिन्तन की जगह नहीं रह जाती।
नव ग्रह मारि रोगिया बैठे, जल में बिम्ब प्रकासै।
चराचर जगत् नौ ग्रहों के द्वारा ग्रसित है। किसी को शनि की साढ़े साती है, किसी को राहु-केतु लगा है। कहीं बृहस्पति विपरीत है तो कहीं मंगल अमंगल कर रहा है। दु:खों के मूल में ग्रह कहे जाते हैं; किन्तु ईश्वरीय अनुभूति के साथ संसार-समुद्र सूख गया, उस जानकारी में समाहित हो गया। प्रकृति पुरुषोत्तम में विलीन हो गयी। श्वास-प्रश्वास, चन्द्र नाड़ी-सूर्य नाड़ी का चिन्तन भी उसमें समाहित हो गया। उस अवस्था में ‘नव ग्रह मारि रोगिया बैठे’– जीव जो ग्रहों से ग्रसित और रोगी था, इन ग्रहों के प्रभाव से ऊपर उठ गया। उसके लिए ग्रह हैं ही नहीं। भले ही शनि की साढ़े साती उस पर सदैव बनी रहे, उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है क्योंकि प्राप्तिकाल में ईश्वरीय अनुभूति और स्थिति के साथ योगी के कर्म भी अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं। उन्हें न मंगल लाभकारी है न राहु हानिकारक। आज तक जो इनसे ग्रसित था, रोगी था, वह इन्हें मारकर अलग स्थित हो गया।
‘जल में बिम्ब प्रकासै’– पहले जीव संसार समुद्र के विषय वारि में स्थित था, अब उस जगत् में उसे प्रभु का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है। सर्वत्र वह इष्ट का स्वरूप देखता है– ‘बिनु गोपाल ठौर नहिं कतहूँ नरक जात धौं काहें!’ जहाँ भी दृष्टि पड़ी, अपने इष्ट का स्वरूप देखा। उस तत्त्वदर्शी महापुरुष की रहनी क्या है?–
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:।। (गीता, ५/१८)
जो पण्डित हैं, पूर्ण ज्ञाता हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष जानकारी और स्थिति मिली हैं वे विद्याविनययुक्त ब्राह्मण में, चाण्डाल में, कुत्ते, हाथी और गाय में समान दृष्टिवाले होते हैं। इतना ही नहीं, ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्’ (यजुर्वेद, अध्याय ४०, कण्डिका प्रथम, मंत्र प्रथम)– सर्वत्र ईश्वर का वास है, किञ्चित् भी जगत् है ही नहीं। जिसे जान लेने के बाद जगत् खो गया तो होगा कहाँ से! परिवर्तन हुआ तो क्या हुआ? जहाँ प्रकृति थी, वहाँ परमात्मा का संचार दिखायी पड़ा। यही है जल में (विश्व में) उस प्रभु का प्रतिबिम्ब प्रकाशित होना– ‘जल में बिम्ब प्रकासै। सन्तो! जागत नींद न कीजै।’
जग तो गये, अब कहीं निद्रा का आवाहन मत कर लेना नहीं तो धोखा हो जायेगा क्योंकि यह निद्रा होती नहीं, की जाती है– ‘अपने हाथे बर के रसरिया, अपनी गटइया के फाँसा।’। जो आदेश-पालन में दृढ़ है, प्रण (टेक) का पक्का है उसे निद्रा कैसे आयेगी? प्रकृति का आवरण कैसे स्पर्श करेगा?
अचेत पर ही हमला होता है। उस समय साधक किस स्थिति में रहता है? इस पर कहते हैं–
बिनु चरननि को दहुँ दिसि धावै, बिनु लोचन जग सूझै।
सर्वत्र भगवान का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ने के पश्चात् वह महापुरुष हाथ-पाँव का प्रयोग किये बिना भी सर्वत्र कार्य करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। पूज्य गुरु महाराज जी को जब स्वरूप मिला उनमें भी यह क्षमता देखी गयी। क्रमश: महाराज जी की सेवा में कई शिष्य आ गये। एक शिष्य ने कहा, ‘‘भगवन्! हुकुम होता तो मैं इस जंगल में रहता।’’ महाराज जी ने कहा, ‘‘हूँ! पन्द्रह दिनों से देख रहा हूँ, तुम लोग दोपहर में जंगल में आ-जा रहे हो। मैं जानता था कोई न कोई खुराफात तुम लोग जरूर कर रहे हो। कोई झोपड़ी बनाया है क्या?’’ शिष्य ने कहा, ‘‘जी, महाराज!’’ महाराज जी ने कहा, ‘‘ठीक है! जाओ रहो। सात दिन में एक दिन आकर मोर दर्शन कर लिया कर। जा कर भजन!’’
घोर जंगल में अकेले रहना। झोपड़ी भी जहाँ बनी थी, शेरों का रास्ता था। एक दिन भगवान ने उन शिष्य (श्री ब्रह्मचारी जी) से कहा– ‘आज सोना मत।’ झोपड़ी के बाहर बैठने के लिए एक मचान बना लिया गया था। चार मोटी लकड़ियाँ गाड़कर उनके ऊपर आड़ी-तिरछी लकड़ियाँ डालकर जमीन से सात फीट ऊपर तखत जैसा मचान था। उसी पर बैठकर ब्रह्मचारी जी रात में भजन करते और आवश्यकता पड़ने पर सो भी लेते थे।
उस दिन जब गुरु महाराज ने आदेश दिया कि ‘आज सोना मत’, ब्रह्मचारी जी बैठकर भजन करते रहे। रात्रि के एक बज गये। उन्होंने विचार किया सोना तो है नहीं, लेटकर थोड़ा कमर सीधा कर लूँ। ज्यों कमर सीधा किया, लकड़ी के पटरे में पीठ का स्पर्श हुआ, तत्काल नींद आ गयी। इतने में मचान के नीचे शेर आ गया। वह अपने शरीर का पिछला भाग पृथ्वी पर रखकर अगले पंजे से यों बैठा था जैसे कुत्ते बैठते हैं। वह ऊपर की ओर मुँह कर कुछ सूँघ रहा था कि ऊपर माल-पानी कितना है? भोजन के लिए पर्याप्त है भी या नहीं? वह मचान पर उछलने का उपक्रम कर रहा था।
इतने में गुरु महाराज की आवाज गूँजी, ‘‘सुतत है! कहा था, सोना मत।’’ ब्रह्मचारी जी को लगा जैसे महाराज ने अपने हाथ से पखौड़े के पास पकड़कर लगभग एक फीट ऊपर खींच दिया, सिर लकड़ियों से एक फीट ऊपर आ गया। ब्रह्मचारी जी जजक के उठे। वह हड़बड़ी में देखने लगे, गुरु महाराज आ गये क्या? नीचे दृष्टि पड़ी तो काली-काली छाया दिखाई पड़ी। उन्होंने टार्च जलाया तो शेर का मुँह दिखाई पड़ा। शेर धीरे से उठा और झाड़ी की ओट में हो गया। झाड़ी अर्थात् मचान से दस फीट मात्र! शेर रात भर स्वाँस रोककर वहीं खड़ा रहा। ब्रह्मचारी जी चुपचाप बैठे रह गये। पाँच बजते ही शेर ने दौड़ लगायी, मंदाकिनी गंगा पार किया और थोड़ी ही देर में मृगों की चीख सुनाई पड़ी। ब्रह्मचारी जी ने समझ लिया कि शेर अपने भोजन की जगह पहुँच गया।
चरणों से गुरु महाराज तो अपने आसन पर थे किन्तु किस पर कहाँ क्या संकट आनेवाला है, ‘बिनु नयनन जग सूझे’– भक्त कहीं पुकारेगा, गुरु महाराज कहते थे कि मैं हाजिर मिलूँगा। गुरु महाराज शरीर से तो नहीं गये, किन्तु स्वरूप से पहुँच गये, आवाज भी दिया, उठा भी दिया। यही है ‘बिनु चरनन ते दहुँ दिसि धावै।’
‘ससा उलटि के सिंह को ग्रासे।’– उनके संरक्षण में ससा अर्थात् खरगोश की तरह भयाक्रान्त संशययुक्त साधक उलटकर सिंह को ही पकड़ने की क्षमता पा जाता है। सिंह प्रकृति का ही भयावह पहलू है–
सिंहनादं विनद्योच्चै: शंखं दध्मौ प्रतापवान्। (गीता, १/१२)
भीष्म पितामह ने सिंहनाद की तरह शंख बजाया। भ्रम ही भीष्म है। भ्रम जब जागृत होता है तो और भी भयावह दृश्य खड़ा कर देता है। साधक जब गुरुदेव की शरण में आता है, निरीह और कातर होता है; किन्तु सद्गुरु की कृपा होते ही वह प्रकृति के भयावह पहलू से ऊपर चला जाता है, वह शूरवीर हो जाता है। किन्तु ‘यह अचरज कोइ बूझै’– जिसके हृदय में यह घटित होता है वही जानता है; जो जग गया है। अहर्निश जो लगा है, वह निद्रा के वशीभूत नहीं है। यदि साधक कुछ देर गप्प हाँकने लगे, लोगों से परामर्श करने लगे तो वह मोह-निशा, अचेतावस्था की ओर बढ़ रहा है। यही साधक का सोना है।
अउँधे घड़ा नहिं जल भरिया, सीधे से घट भरिया।
घड़ा यदि उलटा है तो जल नहीं भरता, सीधे घड़े में जल भरता है। आपका शरीर भी एक घट है। इसका रूख सीधा कीजिए। प्रभु क्या कहते हैं उसे समझिये और तुरन्त धारण कीजिए; जैसा आपको चलने को कहते हैं वैसा आचरण कीजिए। इसका परिणाम होगा, ‘जेहिं कारण नर भिन्न भिन्न कर’, प्रभु अलग हम अलग जिस माया के कारण हैं–
मैं अरु मोर तोर तैं माया।
जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।। (रामचरितमानस, ३/१४/२)
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ।
बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।।
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा।
जा बस जीव पड़ा भवकूपा।। (रामचरितमानस, ३/१४/४-५)
जिस अविद्या माया के कारण नर भिन्न-भिन्न कहता है, ‘गुरु प्रसाद सो तरिया’– गुरु के कृपा-प्रसाद से उस माया को पार कर जाता है। आपका दायित्व केवल इतना ही है कि घट को सीधा रखें।
पाछे लागा जाइथा, लोक वेद के साथ।
मारग में सतगुरु मिल्या, दीपक दीन्हा हाथ।।
सामाजिक व्यवस्था के संचालन के लिए संसार में अनेकों विधि-विधान प्रचलित हैं। कोई कहता है– कुलरीति सनातन है। अपनी समझ से वह कल्याण का ही पथ पकड़े हुए है। बहुत से लोग वेद-रीति से सकाम अनुष्ठानों में लगे हैं। सन्त कबीर कहते हैं– दोनों ही धोखा है। इन रीति-रिवाजों का कभी अन्त नहीं होता। ‘मारग में सतगुरु मिल्या, दीपक दीन्हा हाथ।’– ईश्वर-पथ में जब कुछ पुण्य जागृत हुआ, पकड़ काम करने लगी तो सद्गुरु मिल गये। उन्होंने हाथ में दीपक दे दिया कि दीपक के आलोक में देखता जा और चलता जा।
दीपक दीन्हा हाथ में, वस्तू दई लखाय।
कोटि जनम का पन्थ था, पल में पहुँचा आय।।
सद्गुरु पर सबने बल दिया। परमात्मा राम ने कहा, ‘मो ते अधिक सन्त कर लेखा।’, ‘तुम ते अधिक गुरुहि जिय जानी।’– सद्गुरु को मुझसे अधिक समझो। जिस माया के कारण लोग अपने और परमात्मा को भिन्न समझते थे, ‘गुरु प्रसाद सो तरिया’– केवल घट को सीधा रखें; प्रभु क्या कहते हैं, समझें, लगें और चलते भर जायँ। लगने का तरीका घट से मिलनेवाला निर्देश है, बाहर कुछ करने से कुछ भी नहीं होगा। जब कभी किसी ने पाया है, हृदय-देश में पाया है। इसी की ओर सम्बोधित करते हैं–
बैठि गुफा में सब जग देखे, बाहर कछू न सूझै।
हृदय को महापुरुषों ने गुफा की उपमा दी है। किसी ने इसी को किला कहा, ‘किले में उलटि लड़े सो सूर!’ विविध तरीकों से समझाया है क्योंकि जब कभी किसी ने पाया तो हृदय-देश में पाया। चित्त को सब ओर से समेट कर जब हृदय-देश में आपका मन स्थिर हो गया, बैठ गया तो ‘सब जग देखे’। कैसा है भगवान? क्या है संसार?– यह पकड़ में आ जाता है। वह सब कुछ जान लेगा। यदि साधक बहिर्मुखी है तो कुछ भी दिखाई नहीं देगा। इसलिए एकान्त-देश का सेवन करते हुए चित्त को सब ओर से समेटकर हृदय-देश में निरुद्ध करें जिससे श्वास बाँस की तरह खड़ी हो जाय। दूसरे संकल्प अवरोध न उत्पन्न करें। मन को इष्ट के चरणों में लगायें। चिन्तन में सद्गुरु का स्वरूप क्रमश: ऐसा दिखाई देने लगता है जैसे दर्पण में अपना मुँह दिखाई देता है। रामचरितमानस में इसका अच्छा उल्लेख है–
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती।
सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती।। (रामचरितमानस, बालकाण्ड, सोरठा ५/५)
गुरु महाराज के पद-नख की ज्योति मणि और माणिक्य के तुल्य है जिसके सुमिरण से हृदय में दिव्यदृष्टि का संचार होता है। ‘बड़े भाग उर आवइ जासू।’ (रामचरितमानस, १/५/६), किसी ने प्रयास किया, चरण हृदय में आ गये तो लाभ क्या?
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के।
मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।। (रामचरितमानस, बालकाण्ड, सोरठा ५/७)
भव-रजनी के दु:ख-दोष मिट जायेंगे। इतना ही नहीं, ‘सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।’ (रामचरितमानस, बालकाण्ड, सोरठा ५/८)– रामचरितमानस के प्रति सूझ पैदा हो जायेगी कि इसमें लिखा क्या है? पुस्तक पढ़ने का अर्थ यह नहीं कि हम उसे रट डालें या कण्ठस्थ कर लें। रामचरितमानस पढ़ने का विशुद्ध तरीका है कि गुरु का चरण हृदय में स्थायित्व ले ले। इससे वह रामचरित जो गुप्त है, लिखने में नहीं आ सका अथवा ‘जो जेहिं खानिक’– उन पारब्रह्म परमात्मा के अन्तराल में जो भी रहस्य छिपा है, वह भी प्रकट हो जायेगा।
जथा सुअंजन अंजि दृग, साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन, भूतल भूरि निधान।। (रामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १)
वह सारा कौतुक एक जगह बैठे-बैठे देख लेंगे। परमात्मा का स्वरूप हृदय में देखने में आता है, अन्य कोई तरीका ही नहीं है। साधक चित्त को हृदय-देश में स्थिर कर ‘सब जग देखे’– प्रभु की सारी लीलाएँ देख लेगा और जब तक बाहर भटक रहा है तो कुछ भी नहीं है। इस लीला-दर्शन का परिणाम?
उलटा बान पारधिहिं लागे, सूरा होय सो जूझै।
सन्तो! जागत नींद न कीजै।।
परावाणी ही बाण है, ध्यान ही धनुष है। जब परावाणी पराकाष्ठा पर पहुँची तो बाण उलटकर पारधी अर्थात् शिकारी को ही, उस भजनकर्ता को ही लग जाता है, सेवक सदा के लिए खो जायेगा और स्वामी ही शेष बचेगा। ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होहि जाई।’– उसे जानकर साधक भी वही हो जायेगा। सेवक सदा के लिए शान्त हो जायेगा। जीव की संज्ञा मिट जायेगी, परमात्मा का सहज स्वरूप ही बचेगा किन्तु यह कायरों का रास्ता नहीं है। ‘शूरा होय सो जूझै’– जो शूरवीर होते हैं वही इसमें जूझ पाते हैं अन्यथा कोई काम से मरता है, कोई क्रोध से, कोई लोभ से तो कोई मोह से। जो अपनी टेक का, प्रण का पक्का है वही इस युद्ध में सफलता प्राप्त करता है। जूझने का यह अर्थ नहीं कि वह वीरगति को प्राप्त होता है बल्कि वह प्रभु की प्रभुता पा जाता है। इसीलिए महापुरुषों ने ईश्वर-पथ को शूरवीरों का पथ माना है। सम्पूर्ण रामायण राम-रावण का विकराल युद्ध, महाभारत युद्ध-काव्य, गीता का युद्ध अन्त:करण की लड़ाई है। इसमें जो एक बार विजय पा गया तो शाश्वत विजय है। कबीर इसी पर बल देते हैं कि शूर ही इस पथ पर चल पाता है और जहाँ वह जूझा, आत्मस्वरूप को पा गया।
‘गायन कहे कबहुँ नहिं गावे’– लगनशील साधक स्वल्प अभ्यास के उपरान्त जिह्वा से राम-राम या ओम्-ओम् नहीं कहता; वाणी से तो नहीं कहता किन्तु हृदय से, श्वास से, सुरत से निरन्तर जपता रहता है। ईश्वरीय ध्वनि हर समय प्रसारित रहती है– ‘अनबोला नित गावै’।
हृदयाकाश में तरह-तरह के दृश्य दिखाई देते हैं, ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं। एक अन्य पद में सन्त कबीर कहते हैं–
रस गगन गुफा में अजर झरै।
बिनु बाजा झंकार उठे तहँ, समुझि परै जब ध्यान धरै।
सन्त कबीर के समय में कलावन्त नट हुआ करते थे जो तरह-तरह के स्वांग, दृश्य उपस्थित करते, मनमोहक वाद्य प्रस्तुत करते थे। आश्चर्यजनक दृश्यों, ध्वनियों को भी जनसमाज नटों के करतब मानकर आनन्द लेता था। इसी तरह साधक इन दृश्यों, ध्वनियों को ‘नटवट बाजा पेखनि पेखै’– हृदयाकाश के पेखनि अर्थात् दृश्यों और बाजा अर्थात् ध्वनियों को सुनता है तथा ‘अनहद हेत बढ़ावै’। हद कहते हैं सीमा को। आज आप भजन में दो घण्टा, दस घण्टा, बारह घण्टा– जितना भी समय देते हैं एक नियत सीमा के अन्तर्गत है। उन्नत अवस्था में एक समय ऐसा आता है कि–
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।
सुरत डोर लागी रहे, तार टूटि ना जाय।।
जब तक जग रहे हैं, सुमिरन करते रहें। सोने के पहले चरणों में लव लग जाय तभी निद्रालाभ करें। सोकर उठें तो सुरत वहीं लगी मिले। जब संकल्प आये तो नाम का, और दृश्य आयें तो गुरु महाराज के चरण दिखाई पड़ें। इस प्रकार भजन मापतौल से ऊपर उठ जाने को अनहद कहते हैं, अब उस भजन की हद नहीं है। ‘अनहद हेत बढ़ावै’– जब तक प्राप्ति न हो जाय इस अनहद से प्रीति बढ़ायें। अनहद की यह प्रीति अनहद, अनन्त परमात्मा से मिला देगी।
‘कथनी बदनी निजुकै जोहे’– जो कुछ कथनी करते हैं, अपनी करें। अपने मन का ही निरीक्षण-अध्ययन करना चाहिए कि मैंने कल कितना भजन किया, आज कितना हुआ? कल की अपेक्षा आज भजन कम तो नहीं हुआ? मेरी दृष्टि कहाँ फिसल गयी? सचेतावस्था का विस्मरण कितना हुआ? इसका आकलन करते रहें। दूसरों की कथनी-करनी कैसी है, इसे न देखें। दिनभर किसी बुरे व्यक्ति की बुराई का चिन्तन करते-करते आप स्वयं बुरे हो जायेंगे। आपका मन उसकी बुराई रटता रहेगा और आपमें बुराइयों के संकल्पों की रील बनती जायेगी। संभव है कि उन कुसंस्कारों को काटने में आपको हफ्तों, महीनों लग जायँ। इसलिए साधक का दायित्व है कि ‘कथनी और बदनी’, ‘निजुकै जोहे’– अपनी ही करे और अपनी ही देखे कि अपने कृत्यों में मैं खरा तो हूँ! कहीं दाहिने-बायें कोई गुंजाइश तो नहीं निकाल लिया! जैसा आदेश वैसा पालन हुआ कि नहीं! यह देखते बन गया तो ‘यह सब अकथ कहानी’– यह कैसे देखा जाता है? किस तुला पर तौला जाता है? यह सब अनुभवगम्य है, अकथ कहानी है। यह वाणी का विषय नहीं है। जिसके हृदय में सद्गुरु जागृत हैं, वह जानता है। केवल उन्हें देखते रहें, आदेश का पालन करते रहें।
धरती उलटि अकासहिं बेधे।
‘धड़ धरती का एकै लेखा, जो बाहर सो भीतर देखा।’– धड़ कहते हैं शरीर को और धरती इस पृथ्वी को कहते हैं। दोनों की एक ही प्रकृति है इसलिए जो बाहर दृष्टिगोचर होता है, सब इस शरीर के भीतर भी दिखाई पड़ता है–
विटप मध्य पुतरिका सूत महँ कंचुकि बिनहिं बनाये।
मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रकटत अवसर पाये।। (विनयपत्रिका, १२४)
चराचर जगत् विधाता की सृष्टि मन के अन्तराल में है इसलिए ‘धरती उलटि’– चित्त को सब ओर से समेटकर जो हृदय-देश में स्थायित्व ले लेता है; ‘अकासहिं बेधे’– आकाश कहते हैं शून्य को! चित्त इतना निरुद्ध हुआ कि यह संकल्प-विकल्प से रहित हो शून्य में टिकने की क्षमता पा गया। यही आकाश को बेधना है। हृदय के अन्दर चित्त को नहीं समेटेंगे तो यह आकाश को कभी नहीं बेधेगा। ‘जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।’– एक इच्छा की पूर्ति होते ही मन अनन्त इच्छाओं का सृजन कर ले जायेगा इसलिए चित्त का निरोध ही श्रेयस्कर है। ‘यह पुरुषन की बानी’– यह पुरुषत्व प्राप्त करा देनेवाली सत्पुरुषों की वाणी है। इसलिए संतो! यदि जग गये हो तो निद्रा का प्रमाद न कर लेना। जगत् ही रात्रि है– ‘या निशा सर्वभूतानां’; इसके किसी पहलू का स्पर्श न कर लेना। अब संयम में भूल न कर लेना।
मान लें, किसी ने धरती को उलटा, आकाश को बेधा, कथनी-बदनी अपनी किया, पारधीवाला बाण लगा, स्वयं जूझ गया – उससे लाभ? इस पर सन्त कबीर कहते हैं–
बिना पियाला अमृत अँचवै, नदी नीर भरि राखै।
वह बिना किसी सहयोग के अमृतपान करता है। अमृत कोई घोल पदार्थ नहीं होता। मृत कहते है नाशवान् को, मरणधर्मा को। अमृत वह है जो शाश्वत है, अजर-अमर है, सहज है, अनन्त सुख की राशि है। मृत्यु से परे वह सत्ता केवल परमात्मा है। जहाँ चित्त का निरोध हुआ, साधक ब्रह्म-पीयूष की धारा पा जाता है। वह ‘अमृत अँचवे’– स्वयं छक जाता है, परिपूर्ण हो जाता है। इतना ही नहीं, ‘नदी नीर भरि राखै’– अमृत को नदी की धारा की तरह भरकर रखता है कि कोई प्यासा आवे तो उसे भी पिला सके। जल सीमित रहने पर वितरण में संकोच हो सकता है किन्तु प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष के पास भगवत्ता का अक्षय स्रोत होता है जिसे लाखों व्यक्तियों में एक साथ वितरित कर भी वह परिपूर्ण ही रहता है। इसी को उपनिषदों में कहा गया है– ‘ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।’ पूर्ण में से पूर्ण दान देने पर भी पूर्ण ही शेष बच रहता है जैसे शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य ही बच रहता है– ‘खाय न खूँटे चोर न लूटै, दिन दिन बढ़त सवायो।’। लाखों आदमी एक महापुरुष से कुछ माँगे, स्तर के अनुसार एक साथ सबकी पूर्ति और एक साथ ही सबको अमृत का संचार मिलता है।
कह कबीर वह जुग जुग जीवै।
सन्त कबीर कहते हैं, वह युग-युगान्तरों तक जीवित रहेगा अर्थात् अनन्त जीवन प्राप्त कर लेगा। कौन?- जो ‘नाम सुधारस चाखै’। गुरुनानक भी कहते हैं–
राम नाम उर में गयो, ताके सम नहिं कोय।
जा सुमिरत संकट मिटे, दरस तिहारो होय।।
परमात्मा ही अविनाशी अमृत है, मृत्यु से परे है और उसके दर्शन की कुंजी नाम है। ‘नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं। करहु विचार सुजन मन माहीं।।’ (रामचरितमानस, १/२४/४)– नाम के प्रभाव से भव-समुद्र सुख जाता है। जहाँ भवसागर सूख गया, आवागमन का कारण मिट गया, जिसमें विषयरूपी विष था समाप्त हो गया, तो परमात्मा, जो अमृत तत्त्व है, वही शेष बच रहता है अर्थात् उस अविनाशी अकाल पुरुष को प्राप्त करने का सूत्र नाम है।
नाम पर सन्त कबीर ने बार-बार बल दिया है। नाम अमृत रस का प्याला है–
पिवत नाम रस प्याला मन मोर भयो मतवाला।
बिन कर चले जपे बिन जिह्वा, ऐसी अजपा माला।।
हरदम दमदम तार न टूटे, पिवत बंक करि नाला।
मन मोर भयो मतवाला।।
नाम रसायन जिसने भी पिया, वह मतवाला हो जाता है। प्राय: लोग नाम जपते हैं तो हाथ से माला जपते हैं अथवा जिह्वा से उच्चारण करते हैं किन्तु अमृत रस का प्याला जिसमें झरता है वह नाम न तो माला और न जिह्वा से जपा जाता है। वह ‘बंक नाल’– स्वाँस की टेढ़ी नली पर निर्भर करता है। उसे पीने का समय क्या है? ‘हरदम’- पल-पल ‘तार न टूटै’– सुरत उसमें लगी रहे, जैसे नयी ब्यायी गाय को कोई जंगल में बलात् ले जाय, दिनभर वह रँभाती रहेगी, उसकी दृष्टि अपने बछड़े पर रहेगी; इसी प्रकार दृष्टि आराध्य पर लगी रहे तो उसी का सत्परिणाम है कि वह उस अमृतत्व को प्राप्त कर लेगा। इसलिए सन्तो! यदि जग गये हैं तो निद्रा का प्रबन्ध न कर लेना क्योंकि साधक से भूल होते ही माया ‘शृंगी की भृंगी करि डारी, पारासर के उदर विदार।’। हर महापुरुष के समक्ष यह समस्या आयी है, बन्धन छूटने के समय माया विघ्न करती ही है। सदैव सचेत रहना जागरण है, विस्मृत होना सोना है इसलिए साधक को सदैव विचारयुक्त होना चाहिए।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-2’ से उद्धृत)