सन्तो! भगती सदगुरु आनी।
(अमृतवाणी के इस चरण में परम आदरणीय पूज्य गुरुदेव स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी महाराज ने अत्यन्त ममस्पर्शी शब्दों में महापुरुष कबीर के पद की आध्यात्मिक व्याख्या कर भक्ति के स्रोत पर प्रकाश डाला है।)
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– अर्जुन! तू किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के पास जाकर भली प्रकार दण्ड-प्रणाम कर निष्कपट भाव से सेवा करके, प्रश्न करके उस ज्ञान को प्राप्त कर। भगवान राम कहते हैं– ‘भगति मोरि।’ इसी क्रम में बौद्ध कहते हैं– ‘बुद्धं शरणं गच्छामि।’ जैन-दर्शन कहता है– ‘सम्यकदर्शन ज्ञान चरित्राणि।’ सिख कहते हैं– ‘वाहे गुरु।’ इस्लाम कहता है– ‘मुहम्मद साहब अल्लाह के रसूल हैं।’ ईसा कहते हैं– ‘संसार के भार से दबे लोगो! मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।’ परमपूज्य परमहंस जी महाराज कहते थे– ‘हो, हम भगवान के दूत हैं। मुझसे मिले बिना कोई भगवान से नहीं मिल सकता।’ प्रत्येक महापुरुष ने यही कहा कि भक्ति तो सद्गुरु की देन है।
अयोध्या, वृन्दावन इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थलियों में मूर्तिपूजा को ही भक्ति कहते हैं। मूर्तिपूजा को सगुण उपासना भी कहते हैं। भक्ति की शुरुआत के लिए मूर्तिपूजा उपयोगी माध्यम है किन्तु भक्ति की प्रौढ़ अवस्था में एकान्त देश का सेवन, विरह-वैराग्य, भगवान के लिए तड़फन नितान्त आवश्यक है–
हँसि हँसि कन्त न पाइयाँ, जिन्ह पाया तिन रोय।
हँसी खुशी जो पिउ मिले, कौन दुहागिन होय।।
हँस-हँसकर किसी ने परमात्मा को नहीं पाया। जब कभी किसी ने परमात्मा को पाया, रुदन करके पाया है, विलाप करके पाया है। यदि हँसी-खुशी में भगवान मिल जाते तो विरहिणी जैसी दीन-हीन दशा कोई क्यों सहता? तपस्वी शान्त एकान्त में क्यों कष्ट झेलते हैं। राम के विरह में भरत की दशा को हनुमान ने देखा–
बैठे देखि कुसासन, जटा मुकुट कृस गात।
राम राम रघुपति जपत, स्रवत नयन जल जात।।
भरत की आँखों से अश्रुपात, जिह्वा पर राम का नाम और गात कृश हो चला था।
राम नाम जिनु भीजिया, झीना पिंजर तास।
नैन न आवे नींदड़ी, अंग न जामें मांस।।
राम नाम में जिसकी सचमुच लौ लग गयी, उसके शरीर पर मांस नहीं बढ़ता, न ही रात में भरपूर नींद आती है। पूज्य गुरु महाराज कहते थे– अच्छे साधक को कुकुर-निंदिया सोना चाहिए। पत्ता खड़कते ही कुत्ता उठकर भौं-भौं करने लगता है। साधु को ऐसे ही सोना चाहिए।
एक महात्मा रात्रि में जगकर चिन्तन कर रहे थे। उनका एक भक्त आया। वह बोला– अरे महाराज! कुटिया में आप अकेले हैं, कुछ है भी नहीं कि चोरों का भय हो। आप खड़े होकर जग क्यों रहे हैं? उन महात्मा ने कहा– भाई! बाहरी चोरों का हमें लेशमात्र भी भय नहीं है; किन्तु हमारे हृदय में ही कुछ चोर ऐसे हैं कि जहाँ मैं असावधान हुआ, वे हमला कर देंगे। काम-क्रोध, लोभ-मोह, राग-द्वेष वासनाओं की तरंगें हैं। चित्त भजन से हटते ही उन तरंगों का स्पर्श करने लगता है, यह विश्राम करता ही नहीं! इसलिए मैं जग रहा हूँ।
गुरु महाराज कहते थे– साधक को चार घण्टे से अधिक नहीं सोना चाहिए। उचित सोना और जागना साधक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। योगी का आसन दृढ़, आहार दृढ़ और निद्रा दृढ़ होनी चाहिए अर्थात् आसन, आहार और निद्रा पर विजय होनी चाहिए। चोरी, नारी, मिथ्या और इच्छा– यह चारों साधु के लिए खतरा है। अस्तु, भजन के आरम्भ से पूर्तिपर्यन्त युक्ताहार विहार के साथ विरह नितान्त आवश्यक है, जैसा भरत में था।
वनवासकाल में भगवान राम दण्डकारण्य में आये तो महर्षि अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण उन्हें समीप आया सुनकर अधीर हो उठे–
हे बिधि दीनबन्धु रघुराया।
मो से सठ पर करिहहिं दाया।। (रामचरितमानस, ३/९/४)
क्या दीन-वत्सल भगवान मेरे जैसे मूर्ख पर भी दया करेंगे? क्योंकि–
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं।
भगति बिरति न ज्ञान मन माहीं।।
नहिं सतसंग जोग जप जागा।
नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।। (रामचरितमानस, ३/९/६-७)
मेरे मन में दृढ़ विश्वास भी नहीं है, न सत्संग है, न योग है, न जप-यज्ञ इत्यादि हैं। उनके चरणों में दृढ़ अनुराग भी नहीं है। आशा की केवल एक किरण है–
एक बानि करुनानिधान की।
सो प्रिय जाके गति न आन की।। (रामचरितमानस, ३/९/८)
प्रभु की विरुदावली में उनका एक स्वभाव है कि उन्हें वह प्यारा होता है जिसे उनके अतिरिक्त अन्य किसी का भरोसा न हो। किञ्चित् भरोसा देवी में, कुछ देवताओं में है तो सफलता नहीं मिलेगी। ‘सो प्रिय जाके गति न आनी की।’– जिसे अन्य किसी का सहारा नहीं, केवल प्रभु का आश्रय है, वही उन्हें प्रिय होता है। इसलिए,
होइहैं सुफल आजु मम लोचन।
देखि बदन पंकज भव मोचन।। (रामचरितमानस, ३/९/९)
अवश्य मेरे नेत्र सफल होंगे। वह ‘मन क्रम वचन राम पद सेवक।’ थे। इतना ही नहीं, ‘सपनेहु आन भरोस न देवक।’– उन्हें स्वप्न में भी किसी अन्य देवता से कोई अपेक्षा नहीं थी। यदि अन्य-अन्य स्थलों पर साधक की श्रद्धा बिखर गयी तो सिद्ध है कि अभी उसको साधना में भ्रम है, न कि वह भजन करता है। जब सुतीक्ष्ण जी को विश्वास हुआ कि प्रभु अवश्य कृपा करेंगे तो,
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा।
को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।। (रामचरितमानस, ३/९/११)
उन्हें पूरब-पश्चिम इत्यादि दिशाओं का भान नहीं रहा। मन ध्यान में केन्द्रित था–
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई।
कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।। (रामचरितमानस, ३/९/१२)
कभाr वह पीछे घूम जाते थे, कभी आगे बढ़ जाते थे, कभी नृत्य करने लगते थे तो कभी प्रभु का गुणगान। भगवान ओट में छिपकर यह सब देख रहे थे। अन्तत:,
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा।
प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।। (रामचरितमानस, ३/९/१४)
उनका अपने प्रति अविरल प्रेम देख भवरोग का हरण करने के लिए भगवान उनके हृदय में प्रकट हो गये। उस समय–
मुनि मग माझ अचल होइ वैसा।
पुलक सरीर पनस फल जैसा।। (रामचरितमानस, ३/९/१५)
बीच रास्ते में मुनि बैठ गये। वह किसी पगडण्डी अथवा किसी सड़क के मध्य नहीं बैठे थे। वस्तुत: भक्ति स्वयं में एक पथ है, मार्ग है। इस मार्ग पर चलते-चलते जब भगवान का स्वरूप हृदय में आया, साधक अचल स्थिर बैठ जाता है। ‘पुलक सरीर’– शरीर में रोमाञ्च हो आया, कण्ठ अवरुद्ध है; ठीक वही दशा जो भरत की थी। भगवान राम उनके समीप आ गये, उन्हें सचेत करने लगे–
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा।
जाग न ध्यानजनित सुख पावा।। (रामचरितमानस, ३/९/१६)
भगवान ने मुनि को जगाने के लिए अनेक प्रयास किया किन्तु मुनि जग ही नहीं रहे थे। उन्हें ध्यानजनित सुख जो मिल रहा था। ध्यान यम-नियमादिक साधना का परिणाम है जिसका अभ्यास आज से ही करना है; लेकिन जब ध्यान भली प्रकार लग ही जायेगा तो उसके परिणाम में निकल आयेंगे भगवान!
भगवान ने मुनि को समाधि से जागृत करने के लिए एक युक्ति लगाई। उन्होंने मुनि के हृदय में इष्टरूप से विराजमान राम के स्वरूप के स्थान पर अपना चतुर्भुज स्वरूप प्रकट किया। इष्ट से भिन्न स्वरूप देखकर मुनि चौंक पड़े-
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसे।
बिकल हीन मनि फनिबर जैसे।। (रामचरितमानस, ३/९/१९)
मुनि व्यग्र हो उठे, यह कैसा स्वरूप? हमारे भगवान का रूप कहाँ गया? यह कौन बीच में आ गया? मुनि उसी तरह विकल हो गये जैसे कोई मणिधर सर्प मणि खो जाने पर हो जाता है। घबड़ाकर उन्होंने आँखें खोल कर देखा तो भगवान सामने खड़े थे। जब हृदय में प्रभु का रूप आ जाता है तो बाहर भी जहाँ दृष्टि पड़ेगी वहाँ भी प्रभु हैं। ऐसे महापुरुषों ने कहा है कि भगवान सर्वत्र हैं।
सरग नरक अपबरग समाना।
जहँ तहँ देख धरे धनु बाना।। (रामचरितमानस, २/१३०/७)
यही भक्त कवि सूरदास की उक्ति है– ‘बिनु गोपाल ठौर नहिं कतहूँ नरक जात धौं काहे!’ यह भक्ति की चरमोत्कृष्ट अवस्था है किन्तु इसका आरम्भ ‘गदगद गिरा’ (रामचरितमानस, ३/१५/११)– अवरुद्ध कण्ठ, अश्रुपात और विरह से होता है; प्रार्थना से होता है, विनय और समर्पण से होता है। फिर भी पराकाष्ठा की भक्ति कुछ और ही है जिसे रामचरितमानस के कागभुशुण्डि प्रकरण से हृदयंगम किया जा सकता है।
कागभुशुण्डि जी पिछले जन्म में शूद्र तन में थे। शूद्र तन साधना का प्रथम सोपान है, उस तन में थे। भाग्य से उन्हें उज्जैन में गुरु महाराज बहुत ही अच्छे मिल गये। परमार्थ के ज्ञाता वह महापुरुष उन्हें साधनोपयोगी रहस्य समझाने लगे; किन्तु कागभुशुण्डि जी ने अपना संस्मरण बताया कि उस समय मैं बहुत दम्भी था और दम्भी को नीति कब अच्छी लगती है?
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम।
मोहि उपजई अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई।। (रामचरितमानस, ७/१०५-ख)
एक बार भगवान शिव के मन्दिर में बैठकर मैं भजन रहा था, गुरु महाराज पहुँच गये। अभिमानवश मैंने उन्हें उठकर प्रणाम नहीं किया–
एक बार हर मंदिर, जपत रहेउँ सिव नाम।
गुरु आयउ अभिमान तें, उठि नहिं कीन्ह प्रनाम।।
सो दयाल नहिं कहेउ कछु, उर न रोष लवलेस।
अति अघ गुर अपमानता, सहि नहिं सके महेस।। (रामचरितमानस, ७/१०६)
गुरु का अपमान इतना घोर अपराध था कि जिन शंकर जी की मैं उपासना कर रहा था, वही रुष्ट हो गये। आकाशवाणी हुई कि रे हतभाग्य! अज्ञ अर्थात् अज्ञानी! अभिमानी! यद्यपि तुम्हारे गुरु महाराज के मन में तुम्हारे इस आचरण से तनिक भी क्रोध नहीं है, इन्हें वास्तविक बोध है; फिर भी मर्यादा का उल्लंघन हमें अच्छा नहीं लगता। अतएव मैं तुम्हें शाप अवश्य दूँगा–
बैठ रहेसि अजगर इव पापी।
सर्प होहि खल मल मति ब्यापी।। (रामचरितमानस, ७/१०६/७)
तू अजगर की तरह बैठा रह गया! जा, अजगर हो जा! अपराध कितना छोटा था– उठकर गुरु महाराज का अभिवादन नहीं किया था। किन्तु शाप इतना बड़ा कि जा अजगर हो जा! इतना ही नहीं, एक हजार जन्म अधम योनियों में भोग! अब तो शिष्य लगा काँपने। पहले अपने को ज्ञानी समझता था कि अब गुरु महाराज में रखा ही क्या है? जो कुछ भी वह जानते थे, उन्होंने सब बता ही दिया है। मैं वह सब और सजाकर कह भी लेता हूँ। बड़े तार्किक थे कागभुशुण्डि जी। ‘उग्र बुद्धि उर दम्भ बिसाला’ (रामचरितमानस, ७/९६/३); अब सारी बुद्धि चूल्हे में चली गयी, लगे काँपने। गुरु महाराज को दया आ गयी–
हाहाकार कीन्ह गुर, दारुन सुनि सिव साप।
कंपित मोहि बिलोकि अति, उर उपजा परिताप।। (रामचरितमानस, ७/१०७-ग)
प्रभो! यह तो जड़ जीव है। आपकी माया से विवश होकर इसने ऐसा किया है। इसमें इस गरीब का तो कोई दोष है ही नहीं। भगवान शिव ने कहा– विप्रवर! आपकी साधुता देखकर मैं इसे न केवल क्षमा करूँगा, अपितु विशेष कृपा भी करूँगा। पहली कृपा यह होगी कि आपने इसे जो उपदेश दिया है, वह ज्ञान इसके किसी भी जन्म में नहीं मिटेगा और दूसरी कृपा–
जनमत मरत दुसह दुख होई।
एहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई।। (रामचरितमानस, ७/१०८/१०)
जन्म लेने और मरने का दुसह कष्ट इसे नहीं होगा और तीसरा आशीर्वाद दिया कि–
पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें।
राम भगति उपजिहि उर तोरें।। (रामचरितमानस, ७/१०८/१०)
एक तो तुम्हारा अयोध्या में जन्म हुआ, उस पुरी का प्रभाव और दूसरी मेरी कृपा– इससे राम की अविरल भक्ति तुम्हारे हृदय में रहेगी। भक्ति का वरदान कागभुशुण्डि जी पा गये।
क्रमश: एक हजार जन्मों के पश्चात् उन्हें मनुष्य का शरीर मिला। वह सन्त-महात्माओं की तलाश में निकल पड़े–
जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ।
आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।। (रामचरितमानस, ७/१०९/१०)
हर जगह हरि के गुणगान पर चर्चा होती रही किन्तु उन्हें सन्तोष कहीं नहीं हुआ। इसी क्रम में वह महर्षि लोमश के आश्रम में पहुँचे। लोमश ऋषि ने पहले तो उन्हें श्राप दिया– कौवे की तरह काँव-काँव करता है, चाण्डाल पक्षी कौवा हो जा। वह कौवा हो भी गये, ‘हर्षित चलेउँ उड़ाय’– प्रसन्न मन वहाँ से उड़ चले। मुनि ने देखा, इसमें तो महान शील है। लगता है यह भगवान का समर्पित भक्त है। हमसे भूल हुई क्या? उन्हें वापस बुला लिया, आशीर्वाद दिया।
राम भगति अबिरल उर तोरें।
बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें।। (रामचरितमानस, ७/११२/१६)
राम की अविरल भक्ति मेरी कृपा से तुम्हारे हृदय में सदैव निवास करेगी। भक्ति का दूसरा वरदान लोमश जी से मिला। वह भजन में लग गये तो परमात्मा मिल गये। भगवान राम ने कहा– कागभुशुण्डि ज्ञान माँगो, वैराग्य माँगो, ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ-बैकुण्ठ जो भी चाहो माँग लो। वह विचार करने लगे कि भगवान सबकुछ देने के लिए कह रहे हैं किन्तु भक्ति का तो नाम ही नहीं ले रहे हैं–
प्रभु कह देन सकल सुख सही।
भगति आपनी देन न कही।।
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे।
लवन बिना बहु बिंजन जैसे।। (रामचरितमानस, ७/८३/५)
विविध प्रकार के व्यंजन बना लें, केवल नमक न डालें तो सब एक जैसे, कोई स्वाद ही नहीं। भक्ति नहीं है तो सभी सुख और गुण ऐसे ही हैं। अन्त में भुशुण्डि जी ने कहा– प्रभो! यदि आप प्रसन्न ही हैं तो–
जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू।
मोपर करहु कृपा अरु नेहू।।
मन भावत बर मागउँ स्वामी।
तुम्ह उदार उर अन्तरजामी।।
अबिरल भगति बिशुद्ध तव, श्रुति पुरान जो गाव।
जेहि खोजत जोगीस मुनि, प्रभु प्रसाद कोउ पाव।। (रामचरितमानस, ७/८४-क)
‘अबिरल भगति’– जो एक बार जागृत हो जाय तो फिर कभी उसका स्रोत न टूटे, निश्चय ही मोक्ष देकर ही दम ले; जिसके लिए मुनि लोग यत्न करते हैं, योगी जिसे खोजते हैं, आपकी कृपा से जिसे कोई विरला ही पाता है, आपके चरणों में ऐसी भक्ति हो जाय!
विचारणीय है कि भक्ति ही दी थी भगवान शिव ने, भक्ति ही दी थी गुरु महाराज लोमश ने; और भक्ति का परिणाम है कि भगवान मिल जायँ। आज भगवान मिल भी गये तब भी भक्ति ही माँग रहे हैं! भक्ति के द्वारा भगवान से भी आगे किसे ढू़ँढेंगे वह? अन्तत: भक्ति है क्या?
वस्तुत: विभक्त का अर्थ है अलगाव और भक्ति का अर्थ है मिलन! भगवान अलग, हम अलग खड़े हैं तब तो अभी आप भक्ति की चरम सीमा तक नहीं पहुँचे। भगवान ने कोई वस्तु अलग से दे ही दिया तब तो सिद्ध है कि भगवान अलग हैं, इसलिए उन्होंने भगवान से भक्ति माँगा। भक्ति की चरम उत्कृष्ट सीमा है कि साधक प्रभु में समाहित हो जाय। ‘भग इति स भक्ति’– त्रिगुणमयी प्रकृति से अतीत होना भक्ति की पराकाष्ठा है। उन्होंने प्रभु से माँगा कि हमें कुछ नहीं, केवल भक्ति चाहिए। राम प्रसन्न हुए और उन्हें अपने में समाहित कर लिया। यही है भक्ति! इसी पर सन्त कबीर का एक भजन है–
सन्तो! भगती सदगुरु आनी।
नारी एक पुरुष दुइ जाये, बूझो पंडित ज्ञानी।
सन्तो…….।।
पाहन फोरि गंग इक निकसी, चहुँ दिसि पानी पानी।
तेहिं पानी दुइ पर्वत बूड़े, दरिया लहर समानी।
सन्तो…….।।
उड़ि माखी तरुवर को लागी, बोले एकै बानी।
ता माखी को माखा नाहीं, गर्भ रहा बिनु पानी।
सन्तो…….।।
नारी सकल पुरुषवै खाये, ताते रहत अकेला।
कह कबीर जो अबकी बूझै, सोई गुरु हम चेला।
सन्तो…….।।
वनवासकाल में भगवान राम दण्डकारण्य में निवास कर रहे थे। एक बार उन्हें प्रसन्न देखकर लक्ष्मण ने जिज्ञासा की– प्रभो! ज्ञान क्या है? वैराग्य क्या है? ईश्वर क्या है? जीव क्या है? भक्ति क्या है?
सबका समाधान करते हुए भगवान ने बताया–
भगति तात अनुपम सुख मूला।
मिलइ जो सन्त होइँ अनुकूला।। (रामचरितमानस, ३/१५/४)
तात! अनुपम सुख की मूल भक्ति है किन्तु वह मिलेगी तभी जब सन्त सद्गुरु अनुकूल हों। आदिशास्त्र गीता में है– ‘उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन:।’ (४/३४)। सन्त कबीर पढ़े-लिखे तो नहीं थे किन्तु वह गीता ही पढ़ रहे होते हैं जब कहते हैं– ‘सन्तो! भगती सदगुरु आनी।’– भक्ति तो सद्गुरु की देन है!।।
जे जन भीजे राम रस, विकसित कबहुँ न रूख।
अनभव भाव न दरसिये , तेहि नर सुख न दूख।।
जो कोई भी जन राम के रस में भींग गया, उससे आप्लावित हो गया, वह सदा विकसित रहता है। वह कभी उदास होता ही नहीं। लेकिन ‘अनभव भाव न दरसिये’– यदि उसे अनुभव जागृत नहीं हुआ है तो ‘तेहि नर सुख न दूख’– उसके लिये न सुख है न दु:ख है। वह जपा करे राम-नाम! अभी वह भजन की प्रवेशिका के लिए प्रयत्न मात्र कर रहा है। उसके पास है कुछ नहीं; और उस अनुभव की जागृति सद्गुरु के द्वारा है।
गुरु महाराज जी कहते थे– ‘‘हो! सब बात सब कोई जानत हैं। दो-दो पैसे में वेदान्त बिकत है। (उन दिनों गीता की पुस्तक गीताप्रेस गोरखपुर से दो पैसे में मिलती थी) लोग पढ़त हैं और सार लिखतौ जात हैं। न जाने का लिखत हैं! किन्तु साधन ही एक ऐसी वस्तु है जो वाणी से कहने या लिखने में आती ही नहीं। यह किसी अनुभवी सद्गुरु के द्वारा किसी-किसी अधिकारी विरही पथिक के हृदय में जागृत कर दिया जाता है।’’ इसी आशय का कबीर का भजन है– ‘सन्तो! भगति सदगुरु आनी।’। भक्ति न तो पोथियों में मिलेगी, न तीर्थों में मिलेगी और न ही षोडश प्रकार की पूजा-पद्धतियों में मिलेगी। भक्ति जब मिलेगी सद्गुरु के द्वारा मिलेगी। उसे सद्गुरु तुम्हारे हृदय में जागृत कर देंगे। इसे पाने का अन्य कोई उपाय नहीं है।
भक्ति नारी-संज्ञक है इसलिए कबीर कहते हैं– नारी एक पुरुष दुइ जाये।
रामचरितमानस में है–
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ।
नारि बर्ग जानइ सब कोऊ।। (रामचरितमानस, ७/११५/३)
दोनों ही स्त्रीलिंग शब्द हैं; किन्तु–
पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी।
माया खलु नर्तकी बिचारी।। (रामचरितमानस, ७/११५/४)
यह माया तो नृत्य करनेवाली नटी के सदृश है। प्रभु को भक्ति प्यारी है। अस्तु, भक्तिरूपी नारी! इस भक्ति का आरम्भ कहाँ से है? ‘पुरुष दुइ जाये’– इस भक्तिरूपी नारी ने विवेक और वैराग्य– इन दो पुरुषों को जन्म दिया।
ग्यान बिराग जोग बिग्याना।
ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना।।
पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती।
अबला अबल सहज जड़ जाती।। (रामचरितमानस, ७/११४/१५-१६)
इस प्रकार भक्ति ने विवेक, वैराग्य– इन दो पुरुषों को जन्म दिया। देखी और सुनी हुई वस्तुओं में जो लगाव है, उसका त्याग ही वैराग्य है। जब इससे उदासीन हो गये तो विवेक का अभ्यास कि सत्य क्या है? अनित्य क्या है? शाश्वत क्या है? नश्वर क्या है?– इसकी छानबीन करना विवेक है। सत्य एकमात्र आत्मा है। उस आत्मपथ पर आरूढ़ रहने की क्षमता का नाम विवेक है फिर वह लक्ष्य से कभी विचलित नहीं होता। इसी का दूसरा नाम अभ्यास है– ‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।’ (गीता, ६/३५)। अयुक्त मन भी अभ्यास और वैराग्य के द्वारा भली प्रकार स्थित हो जाता है। भक्ति ने इन दो पुरुषों को जन्म दिया। ‘बूझो पण्डित ज्ञानी’– कोई पण्डित हों, ज्ञाता हों तो इसे समझें। यह सबके समझने की क्षमता वाली वार्ता है ही नहीं। कबीर जानते थे कि मैं जिस स्तर की बात कहता हूँ उसे समझने की क्षमता किनमें हैं? अत: कहा कि कोई ज्ञानी हों, पण्डित हो तो समझें। अग्रेतर पंक्ति में कहते हैं–
पाहन फोरि गंग इक निकसी, चहुँ दिसि पानी पानी।
हमारा हृदय जड़ हो गया है, मल-आवरण-विक्षेप के द्वारा चट्टान जैसा हो गया है इसीलिए इसमें भगवान नहीं दिखायी देते। उस विवेक और वैराग्य के सतत् अभ्यास का परिणाम अगले स्तर में यह मिला कि हृदय की जड़ता को तोड़कर ज्ञानरूपी गंगा का संचार हो गया।
गंगा जमुना खूब नहाये, गया न मन का मैल।
आठ पहर जूझत ही बीता, जस कोल्हू का बैल।।
चोलिया काहे न धुलाई, सुन्दर बाँके जोगिया।
चोलिया….।।
गंगा-जमुना जैसी पवित्र नदियों में बहुत स्नान किया किन्तु मन का मैल दूर नहीं होता। इन आरम्भिक प्रयासों से पुण्य की वृद्धि तो होती है लेकिन स्नान के पश्चात् जब हम आप बाहर निकलते हैं, अनेक नवीन पापों का सृजन कर लेते हैं किन्तु ज्ञान एक ऐसी गंगा है जब उसमें एक बार अवगाहन कर पवित्र हो गये तब पुन: आत्मा में कोई दाग लगता ही नहीं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– ‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।’– ज्ञान के समान सृष्टि में पवित्र करनेवाला नि:सन्देह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को पायें कहाँ?
तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दन्ति। (गीता, ४/३८)
उसको तू स्वयं (परिश्रम तुम्हें ही करना होगा) योग के आरम्भकाल में नहीं, योग के मध्य में नहीं बल्कि योग की सिद्धिकाल में अपनी आत्मा के अन्दर देखेगा। ज्ञान कुछ भी याद करने का नाम नहीं है। ज्ञान आत्मदर्शन के साथ मिलनेवाली स्थिति है, भगवान की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है। बाह्य गंगा उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में बहती है किन्तु यह हृदयवाली गंगा सर्वत्र फैल जाती है– ‘चहुँ दिसि पानी पानी’।
सरगु नरकु अपबरगु समाना।
जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। (रामचरितमानस, २/१३०/७)
न तो स्वर्ग स्वर्ग के रूप में रह गया जिसकी अब कामना करें, और न नर्क नर्क के रूप में रह गया जिससे हम भयभीत हों। जहाँ भी दृष्टि पड़ी, अपने आराध्य देव का स्वरूप देखा, ईश्वरीय अनुभूति देखा– इसी का नाम ज्ञान है जिसका प्रसार सर्वत्र हो गया।
‘तेहि पानी दुई पर्वत बूड़े’– दुई अर्थात् द्वैत! हम अलग हैं, प्रभु अलग हैं– यही द्वैत की विशाल चोटी है। यही भक्त और भगवान के बीच विभाजक रेखा है। इसी मान ने प्रभु से अलगाव बना रखा है। ज्ञान की पराकाष्ठा में द्वैत का शिखर डूब गया। प्रभु अलग हम अलग– यह भेद समाप्त हो गया, अभेद स्थिति मिल गयी तो ‘दरिया लहर समानी’– हृदय-देश में ज्ञान की परिपक्वता आते ही असीम आनन्द की लहर समा जाती है। लोग कहते हैं– परमात्मा में असीम आनन्द है, अनन्त सुख है; आज कहने के लिए है किन्तु यह उस क्षण की बात है जब हृदय में द्वैत की जो दो चोटियाँ हैं, वह आप्लावित हो जायँ और वहाँ भी ईश्वर का वास हो जाय; वहाँ ज्ञान छा जाय, वह ज्ञानरूपी गंगा में डूब जाय। जो योगी इस स्थिति को प्राप्त करता है वही कहता है कि परमात्मा में असीम आनन्द और शाश्वत सुख है। यह भक्ति का परिणाम है जिसकी प्राप्ति का स्रोत बताते हैं– ‘भगति सदगुरु आनी’। सद्गुरु ने लाकर प्रदान कर दिया। भक्ति उनके क्षेत्र की वस्तु है, जिसमें चाहें जागृत कर दें। इस भक्ति में होता क्या है, इस पर कहते हैं–
उड़ि माखी तरुवर को लागी, बोले एकै बानी।
मनरूपी मक्खी! यही विषय विकाररूपी हैजा को फैलानेवाली है–
मन ही आपै जगत बना के, ऊँच नीच तन पाया।
मन ही सरग नरक भुगतावे, मन से आया जाया।
सन्तो! मन सबको भरमाया।।
मन ही स्वर्ग का भोग करता है, मन नरक भोगवाता है, मन से ही संसार में आना-जाना है, जन्मना और मरना लगा है। सारे अनर्थों की जड़ मन है। यह मनरूपी मक्खी उत्थान होते-होते ‘तरुवर को लागी’– उस मूल परमात्मा में जा लगी। जैसा भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अध्याय १५ के प्रथम श्लोक में संसार को एक वृक्ष की संज्ञा देते हुए कहा–
ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।। (गीता, १५/१)
ऊपर परमात्मा जिसका मूल है, नीचे कीट-पतंगपर्यन्त प्रकृति जिसकी शाखा-प्रशााखा है, संसार अश्वत्थ का ऐसा एक वृक्ष है। वेद इस वृक्ष के पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को मूलसहित जानता है वह वेदवित् है, वेदज्ञ है।
सन्त कबीर कहते हैं– मनरूपी मक्खी उत्थान करते-करते मूल परमात्मा अर्थात् अपने उद्गम का स्पर्श किया तो ‘बोले एकै बानी’। इस लक्ष्य की प्राप्तिवाला महापुरुष समाज में कभी दरार नहीं डाल सकता कि आपका भगवान काला है हमारा गोरा, हमारा बड़ा या दाढ़ीवाला– ऐसा कभी नहीं कह सकता। यदि वह समाज में ऐसी दरार डालता है तो उस गरीब बिचारे ने अभी कुछ पाया ही नहीं है। प्राप्तिवाले सभी महापुरुष एक ही वाणी बोलते हैं कि परमात्मा एक है। उसके स्पर्श के साथ वह उसी भाव को प्राप्त हो जाता है।
ता माखी को माखा नाहीं, गरभ रहा बिनु पानी।
सन्तो! भगती सदगुरु आनी।।
जहाँ मनरूपी मक्खी ने उस मूल का स्पर्श किया तो ‘जानत तुम्हहिं तुम्हइ होइ जाई।’– उन्हें जानकर वह भी वही हो गया। ‘तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई।’– प्रभु! आपकी कृपा से कोई-कोई विरला ही पाता है। वह आपको किस रूप में प्राप्त करता है कि आपको जानकर आपका स्वरूप ही हो जाता है। सेवक सदा के लिए खो जाता है, स्वामी ही शेष बचता है। अलग से कोई स्वामी नहीं रहा इसलिए ‘गरभ रहा बिनु पानी’– ईश्वर-प्राप्ति का गर्व शेष रहता है कि अहं ब्रह्मास्मि, एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति, प्रज्ञानम् ब्रह्म! इसी स्थिति को अन्यत्र कहते हैं– ‘कोई अपने में देखा, साईं सन्त अतीत।’ वह अपने स्वरूप में ही अपने को देखता है। यही है गर्भ! वह शुद्ध स्वरूप की स्थितिवाला हो गया।
अब जिसे पाना था, पा ही लिया; आगे कोई सत्ता बची ही नहीं तो भजन करके ढूँढ़े किसे? वह भजन करता ही रहेगा या अन्त में कभी इससे छुट्टी भी मिलती है? इस पर कहते हैं–
नारी सकल पुरुषवै खाये, ताते रहत अकेला।
वैराग्य, विवेक इत्यादि जिन जिनको भक्ति ने आरम्भ में जन्म दिया था, उनके द्वारा हृदय की जड़ता दूर हुई, ज्ञानरूपी गंगा का स्रोत मिल गया, द्वैत का विशाल शिखर डूब गया। मनरूपी मक्खी मूल तक की दूरी तय कर मूल भाव को प्राप्त हो गया। अब कोई सत्ता बची नहीं जिसकी वह शोध करे, इसलिए विवेक और वैराग्य की अब कोई आवश्यकता ही नहीं रहती। राग है ही नहीं तो वैराग्य किसके लिये करे? स्वरूप में स्थित है तो विवेक द्वारा किस आत्मा को देखे? इसलिए भक्ति की अधिकतम सीमा तब है जब ज्ञान, विवेक, वैराग्य– इनकी आवश्यकता न रह जाय। ‘नारी सकल पुरुषवै खाये’, ‘ताते रहत अकेला’– इसलिए वह अकेला है, स्वयम् की स्थिति में है।
कह कबीर जो अबकी बूझै, सोई गुरु हम चेला।
सन्तो! भगती सदगुरु आनी।।
कबीर कहते हैं अब जो स्थिति है इसको जो समझे, जो परख ले, देख ले वह गुरु है। गुरु एक पद है, एक स्थिति है। तब की नहीं जब गुरु की शरण गये थे, विवेक-वैराग्य आरम्भ किया था। शनै: शनै: हृदय की जड़ता टूटी, ज्ञान का संचार हुआ, मूल का स्पर्श कर लिया; आगे कोई सत्ता बची ही नहीं जिसके लिए शोध जारी रखें। अस्तु, विवेक-वैराग्य की भी आवश्यकता नहीं रही। अब जो स्थिति-विशेष है उसे जो पहचान ले, बूझ ले, प्राप्त कर ले वही गुरु है। इस स्तरवाले स्वयं तो सद्गुरु होते ही हैं, दूसरों को भी तारने की क्षमता रखते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– इस कर्म को किये बिना न कोई पाया है और न भविष्य में कोई प्राप्त कर सकेगा; इसलिए अर्जुन! तू इस नियत कर्म को कर। इस कर्म का परिणाम बताते हैं– जहाँ आत्मा विदित हो गयी, आत्मा में ओत-प्रोत और स्थित है, तृप्त है उस पुरुष के लिए कर्म करने से न कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि; फिर भी वह पीछेवालों के हित के लिए क्रिया में बरतते हैं जबकि स्वयं उनके लिए कोई लाभ-हानि नहीं है। (गीता, अध्याय ३)
यही सन्त कबीर का सन्देश है कि भजन के आरम्भ में विवेक-वैराग्य का अनुसंधान आवश्यक था किन्तु पूर्णता में ‘नारी सकल पुरुषवै खाये’– जिन-जिन को भक्ति ने जन्म दिया था, उन्हें अपने में समाहित कर लिया। ‘ताते रहत अकेला’– शोध के लिए कोई अन्य बचा ही नहीं। अब जो स्थिति-विशेष है, उसे जो प्राप्त कर ले वह गुरु है। इसी स्तरवाले पूर्णपुरुष सद्गुरु कहलाते हैं। इसी लक्ष्य को विदित करनेवाला ही यह कहने का दावा कर सकता है कि मैं शिष्य हूँ। अन्यथा–
हाट के गुरु बाट के चेला। दोऊ नरक में ठेलम ठेला।।
कल का मुड़िया आज अकेला।।
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शिष्य शिष्य सबही कहे, शिष्य भया ना कोय।
पलटू गुरु की वस्तु को, लखे शिष्य तब होय।।
सब शिष्य ही तो बनते हैं कि मैं महाराजजी का चेला हूँ, उन महापुरुष का शिष्य हूँ किन्तु सच्चे अर्थों में कोई शिष्य नहीं बन पाया। सन्त पलटू कहते हैं कि गुरु की वस्तु भक्ति को जो प्राप्त कर ले, उसके अनुसार साधना करे, साधना के परिणाम में मूल का दर्शन कर ले, वह रहनी पा जाय– यह सब गुरु की वस्तु है, जो इसे प्राप्त कर ले वही शिष्य है। अन्य न कोई गुरु है, न शिष्य।
सारांशत: ‘भगति सदगुरु आनी’– भग इति स भक्ति! भग कहते हैं त्रिगुणमयी प्रकृति को। इसका अन्त कर देनेवाली जो प्रक्रिया विशेष है, वह सद्गुरु के द्वारा ही प्राप्त होती है। इसे पाने का कोई अन्य उपाय नहीं है।
हमारे अनुसुइया आश्रम (मध्य प्रदेश, भारत) में कई साधक साधना के आरम्भिक दिनों में दो-दो महीने तक घनघोर भजन करते। पूज्य महाराज जी उनसे पूछते थे– ‘‘बोल, ध्यान धरता है?’’ साधक धीरे से कहते– ‘‘हूँ!’’ तो महाराज कहते– ‘‘सरवा कहत है ‘हूँ’! अरे मोर रूपवा कुच्छौ पकड़त तो मोरेहु भीतर खुटकत। हमें तो बिलकुल सन्नाटा दिखाई पड़त है।’’ कोई साधक गुरु महाराज का स्वरूप दो-ढाई महीने में पकड़ पाया तो किसी ने चार महीने बाद स्वरूप पकड़ा। जब उसने गुरु महाराज का स्वरूप पकड़ लिया, तत्काल अनुभव जागृत हो जाता था। गुरु महाराज कहते, ‘‘बस बेटा! भजन जागृत हो गया, राम-रावण युद्ध शुरू हो गया। अब जब रावण मारा जायेगा, राम का राज्याभिषेक हो जायेगा तभी यह युद्ध बन्द होगा। बीच में कभी नहीं बन्द होगा। अब, जा कर भजन!’’
भक्ति की एक निश्चित दिशा है, कुछ भी कर गुजरने का नाम भक्ति नहीं है। इसमें सद्गुरु के हाथ का यन्त्र बनकर चलना पड़ता है। केवल चार आँसू रो लेना ही भक्ति नहीं है। हाँ, यह प्रवेशिका के लिए प्रयास अवश्य है।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-2’ से उद्धृत)