तवन घर चेतिहे रे भाई

तवन घर चेतिहे रे भाई!

अभी आपने सन्त कबीर का सुप्रसिद्ध भजन सुना कि छाओ छाओ हो फकीर गगन में कुटी।; उसकी अन्तिम पंक्ति थी– कहै कबीर अगम गोहरावै, आवागमन की फिकर मिटी।– अर्थात् अगम परमात्मा जब रीझ जाय, बुला ले तभी आवागमन की चिन्ता मिटती है। आवागमन की चिन्ता का मिट जाना अच्छी उपलब्धि है किन्तु अन्तिम उपलब्धि क्या इतनी ही है या उस मुक्त स्थान की कोई विशेषता भी है! चिन्ता तो मिट गयी किन्तु मिला क्या? वहाँ कोई सुविधा भी है? कहीं कोई धोखा तो नहीं है? आवागमन से मुक्त पुरुष के समक्ष व्यवस्था क्या होती है?– इस पर सन्त कबीर का एक भजन इस प्रकार है–

तवन घर चेतिहे रे भाई! तोहरा आवागमन मिटि जाई।।

तवन घर….तोहरा आवागमन…..।।

जाकी सेवा स्वर्ग उठि धावे, सेवा में सुख पाई।

उलटा सींचे जड़ा मूल को, साखा पत्र अघाई।।

तवन घर….तोहरा आवागमन…..।।

इंगला पिंगला काम न आवे, सुखमन रहे समाई।

मंतर तंतर वहि घर नाहीं, एक नाम लौ लाई।।

तवन घर….तोहरा आवागमन…..।।

जा घर लक्ष्मी झाड़ू देत हैं, शंभु करैं कोतवाली।

ता घर ब्रह्मा बने टहलुआ, विष्णु करैं रखवाली।।

तवन घर….तोहरा आवागमन…..।।

चल हो हंसा वहि घर चलहू, जहँ आवागमन न होई।

कहै कबीर सुनो भाई साधो! अचरज कहलो न जाई।।

तवन घर….तोहरा आवागमन…..।।

उस घर के लिये चेत करो जिसमें निवास के पश्चात् आपका आवागमन, जन्म-मृत्यु का बन्धन ही समाप्त हो जायेगा। घर के लिए चिन्ता तो सभी करते हैं। कभी-कभी बड़े शहरों में दंगों की चर्चा सुनाई पड़ती है तो लोग वहाँ से भागकर घर पहुँचते हैं, बाहर-भीतर के सभी दरवाजे बन्द कर लेते हैं, सोफे में बैठकर निश्चिन्त होने का प्रयास करते हैं, अकस्मात् मकान ही विस्फोट से उड़ जाता है। कभी रक्षक ही भक्षक हो जाते हैं। सृष्टि में ऐसा कोई निवास नहीं जो आवागमन से मुक्त हो। यहाँ तक कि देवलोक भी जन्म-मृत्यु की परिधि के अन्तर्गत ही है–

आब्रह्म स्तम्बपर्यन्तं सर्वं मायामयं जगत्।

सत्यं सत्यं पुन: सत्यं हरेर्नामैव केवलम्।।

आदिशास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता का उद्घोष है–

आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।

सृष्टि निर्माता विधाता और उनसे उत्पन्न सारा जगत्, चौदहों भुवन जो अलौकिक शोभासम्पन्न हैं, सब मृग मरीचिका है, धोखा है; सभी दृश्य मायामय है, जादू-सा दिखता है, अन्त में होता कुछ भी नहीं। यह सृष्टि ऐसे ही एक दिखावा है, इसमें सत्य केवल एक हरि हैं, हरि का नाम है; अन्य कुछ भी नहीं।

विश्वविजय की महत्वाकांक्षा वाले महान् सम्राट सिकन्दर ने एक सन्त के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। उसने मन ही मन उन सन्त का दर्शन करने का निश्चय कर रखा था। युद्ध अभियान का मार्ग उन सन्त की कुटिया के समीप ही था। मंत्री ने सिकन्दर से कहा– यह धूप में बैठे महात्मा वही प्रसिद्ध सन्त हैं। सिकन्दर ने उन्हें प्रणाम किया। उन महात्मा ने सिकन्दर का परिचय पूछा। मंत्री ने बताया– यह महान् सम्राट सिकन्दर हैं।

महात्मा ने कहा, ‘‘ओह! यह एक महीने से छकड़े, अस्त्र-शस्त्र, युद्ध सामग्रियाँ लदकर जा रही हैं, सब तुम्हारी हैं?’’ सिकन्दर ने कहा, ‘‘जी, हाँ!’’ महात्मा ने कहा, ‘‘अभी पीछे और भी है क्या?’’ सिकन्दर ने कहा, ‘‘अभी सारा सैन्य बल पीछे ही है।’’ महात्मा ने पूछा, ‘‘किस देश पर आक्रमण कर रहे हो?’’ सिकन्दर ने बताया– ‘‘अभी तो टर्की, उसके पश्चात् ईरान, अफगानिस्तान, हिन्दुस्तान और इस क्रम में सम्पूर्ण विश्व!’’ महात्मा ने पूछा, ‘‘इसके पश्चात् किसे जीतोगे?’’ सिकन्दर को कोई उत्तर न सूझ पड़ा। वह चुपचाप उन महात्मा की ओर देखता रहा।

उन महात्मा ने कहा, ‘‘क्यों कर रहे हो इतना पाप? इस कुटी में तुम्हारे लिए भी स्थान है, दो रोटी का प्रबन्ध है। आओ, शान्तिपूर्वक बैठकर यहीं चिन्तन करें!’’ सिकन्दर ने सविनय कहा, ‘‘प्रभो! अब तो मैं अभियान पर निकल पड़ा हूँ। लौटकर मैं आपके ही पास आऊँगा।’’ महात्मा ने कहा, ‘‘इतना तुम्हारे पास समय कहाँ है? यदि न लौट पाये तो क्या होगा?’’

सिकन्दर चल पड़ा, कई एक देश जीते किन्तु हिन्दुस्तान में प्रबल प्रतिरोध हुआ। विषयुक्त तीर लगने से वह ज्वराक्रान्त हो गया। विश्वविजय अभियान स्थगित कर वह यूनान की ओर लौट पड़ा। एक घुड़सवार से उसने उन महात्मा को प्रणाम-निवेदन कर कहलाया कि मैं सीधा आपके ही पास आ रहा था, मुझे महलों में नहीं जाना था; किन्तु प्रतीत होता है कि आपके दर्शनों का सौभाग्य नहीं पा सकूँगा। मार्ग में मिस्र देश में ही सिकन्दर का देहान्त हो गया। ऐसी गाथाएँ जनमानस में प्रचलित हैं–

कहाँ गये वह दारा सिकन्दर, कहाँ वह बारहदरी गयी।

चले गये सब अजर के मुख में, ना खुश्की ना तरी रही।।

बड़े-बड़े विजेताओं की यह दशा! आसपास योद्धा खड़े, सभी बजावें गाल। मंझ महल से ले चला, ऐसा काल कराल।।– आसपास योद्धाओं की कतारें लगी हुई थीं फिर भी बीच महल से, सुविधाओं के सुरक्षा कवच के भीतर से काल जीव को उठा ले जाता है। यह है आवागमन – आना और जाना। आयु का कोई भरोसा नहीं है। इस आवागमन से बचने का एक स्थान, एक घर कबीर ने खोज निकाला जो अनादिकाल से ऋषियों का चिन्तन रहा है। तवन घर चेतिहे रे भाई– उस घर के लिए चेत करो, तुम्हारा जन्म और मृत्यु का बन्धन छूट जायेगा। तुम और तुम्हारा धाम सदैव रहेगा। प्रश्न है उस घर में यदि पहुँच ही गये तो उसकी व्यवस्था क्या है?

जाकी सेवा स्वर्ग उठि धावे– जो भी साधक उस आवागमन से मुक्त स्थल पर पहुँचता है उसकी सेवा में पूरा स्वर्ग दौड़ पड़ता है। देवराज इन्द्र, उसके गुरु वृहस्पति, वरुण, कुबेर समेत सम्पूर्ण देवलोक उसकी सेवा के लिए होड़ लगा देते हैं। क्यों? किसलिए? सेवा में सुख पाई– सेवा से ही उनको शाश्वत सुख की प्राप्ति है। ऐसे महापुरुष की सेवा ही उनकी मुक्ति का स्रोत है। उन्हीं की सेवा से शाश्वत शान्ति और परम सुखप्राप्ति की आशा है इसलिए वे सेवा में सुख पाई

रामचरितमानस में प्रसंग आता है कि देवताओं ने राम की सेवा की किन्तु समय-समय पर वे असुरों की सेवा में संलग्न मिले–

कर जोरें सुर दिसिप बिनीता।

भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।

(रामचरितमानस, ५/१९/७)

रावण के दरबार में सम्पूर्ण देवता हाथ जोड़े खड़े थे। वे सतर्क रहते थे कि सेवा में कहीं देर न हो जाय। सभी विनीत भाव से खड़े थे। अग्निदेव पाकशाला की देखरेख कर रहे थे तो वायुदेव सफाईकर्मी नियुक्त थे। सेवा में देवगण अवश्य थे किन्तु वे सभीत थे, बड़ी दयनीय दशा थी। वे रात-दिन कराह रहे थे कि प्रभु कृपा करें। इस खल की दासता से हमें मुक्ति दिला दें किन्तु सन्त सत्पुरुषों की सेवा में स्वर्ग दौड़ पड़ता है और सेवा में सुख पाई– सेवा में उनको सुख मिलता है। यह स्थिति कब मिलती है?– इस पर कहते हैं–

उलटा सींचे जड़ा मूल को, साखा पत्र अघाई।

तवन घर चेतिहे रे भाई!

आवागमनरहित स्थिति तभी सम्भव है जब आप प्रकृति से उलटकर मूल को सीचें, जड़ को सींचे! हर व्यक्ति जड़ में पानी देता है। धान हो किंवा कोई भी वनस्पति, सभी मूल को ही सींचते हैं, सींचना भी चाहिए किन्तु हमारा-आपका, संसार का मूल क्या है? भगवान श्रीकृष्ण आदिशास्त्र को पुनर्प्रकाशित करते हुए गीता में कहते हैं–

ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।१५/१।।

अर्जुन! ऊपर परमात्मा ही जिसका मूल है, नीचे कीट-पतंगपर्यन्त प्रकृति ही जिसकी शाखा-प्रशाखा है, संसार ऐसा ही वृक्ष है। हम उन पत्तियों को सींचते हैं जहाँ हम खड़े हैं। हम जिस वंश में हैं उस परम्परा को सींचते हैं, प्रथाओं को सींचते हैं, इससे कल्याण कदापि नहीं होगा। भला पत्तियों को सींचने से कल्याण कैसे होगा? पत्ते तो वहीं झड़ जायेंगे। उसके साथ आपका भी अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। इसलिए परमतत्त्व परमात्मा ही मूल है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! त्रिगुणमयी प्रकृति ही गर्भ को धारण करने वाली माता है और मैं ही मूल बीजरूप से पिता हूँ। इसी मूल को सींचने के लिए सन्त कबीर कहते हैं– उस मूल परमात्मा की साधना करें, उसमें चित्त लगायें। चित्त लगाने का परिणाम है- शाखा पत्र अघाई– शाखा-प्रशाखा अर्थात् अनन्त योनियों के संस्कार- सब शान्त हो जायेंगे। यह सब प्रकृति उस तत्त्व में विलीन हो जायेगी। परमात्मा ही शेष बचेगा। अघाई अर्थात् फिर कभी आप अतृप्त और असंतुष्ट नहीं होंगे। उस घर में भजन का स्तर कैसा रहेगा?– इस पंक्ति में प्रकाश डालते हैं–

इंगला पिंगला काम न आवे, सुखमन रहे समाई।

भजन की मुख्य पूँजी इंगला-पिंगला अर्थात् श्वास-प्रश्वास है। कुछ महापुरुषों ने नियम बना रखा था कि जो श्वास का भजन नहीं जानता, ऐसे साधु को वह अपनी कुटिया में दो रोटी नहीं देते थे; क्योंकि यह स्वयं तो गुमराह है, घूमकर दूसरों को पथभ्रष्ट ही तो करेगा। आरम्भ में नाम पकड़ में नहीं आता तो जिह्वा से जप किया जाता है, क्रमश: उन्नत होने पर माला से जप किया जाता है। इससे उन्नत कण्ठ से जप है और पकड़ काम करने लगी तो श्वास से जपते हैं। इंगला दाहिने स्वर को और पिंगला बायें स्वर को कहते हैं।

इंगला पिंगला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया।।

चित्तरूपी चादर को बीनने के लिए कबीर ने इंगला और पिंगला– श्वास-प्रश्वास को ताना-बाना बना लिया। सन्त कबीर ने श्वास के भजन पर बहुत बल दिया–

श्वास श्वास पर राम कहु, वृथा श्वास जनि खोय।

ना जाने इस श्वास का, आवन होय न होय।।

चित्त को सब ओर से समेटकर श्वास पर ध्यान केन्द्रित करें कि श्वास अन्दर गयी तो क्या कहती है, बाहर निकली तो क्या कहती है! उसे सुनें! महापुरुषों की अनुभूति है कि श्वास नाम के अतिरिक्त कुछ कहती ही नहीं अर्थात् स्वाँस में नाम ढला मिले। जहाँ यह सुनने की क्षमता आ गयी तो रिनक धिनक धुन अपने से उठे। पूज्य महाराज जी कहते थे– श्वास में उठने वाले नाम की ध्वनि स्वत: जागृत हो जायेगी, स्पष्ट होती जायेगी और साधक का मन लव लगाकर उसे श्रवण करने लगेगा। यही इंगला-पिंगला अर्थात् श्वास-प्रश्वास का चिन्तन है।

भजन के लिए इंगला-पिंगला से जप आवश्यक है किन्तु उस घर में जहाँ पूर्ण निवृत्ति है, आवागमन से मुक्ति का स्तर है, वहाँ इतने से काम नहीं चलता। सुखमन रहे समाई– मन सुखपूर्वक श्वास में सहज प्रवाहित हो जाय, यह सुषुम्ना का भजन है। अन्य कहीं मन लगे ही न, सुखपूर्वक जप की धारा चलती रहे, अन्य संकल्प स्फुटित ही न हों।

अनेक साधक क्रमोन्नत साधना न कर सुविधाजनक उपाय चाहते हैं। वे मंत्रों का अभिचार करते हैं, तन्त्र साधना करते हैं। कबीर कहते हैं– ये मायिक क्षेत्र की वस्तुएँ हैं– मंतर तंतर वा घर नाहीं, एक नाम लौ लाई।– उस घर में मंत्र-तंत्र, जादू-टोना का उपयोग नहीं है। केवल एक नाम लौ लाई– एकमात्र नाम में ही लव को लगायें।

जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।

सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।

साधक को चाहिए कि जब तक जगे, सुमिरन करता रहे। जब वह सोने लगे तो पहले भली प्रकार श्वास में लौ लगाये, तब विश्राम करे। जब वह सोकर उठे तो सुरत वहीं लगी मिले, पहला संकल्प इष्ट का रूप आये। यह तार टूटने न पाये। सुमिरन कोई प्रदर्शन नहीं है। यही कारण है कि इस अवस्थावाले महापुरुषों को लोगों ने प्राय: पागल-सनकी समझा और सम्बोधित किया। केवल एक नाम, वह भी जपना न पड़े बल्कि नाम में लौ लग जाये।

साधक नाम जपहिं लय लायें।

होहिं सिद्ध अनिमादिक पायें।।

(रामचरितमानस, १/२१/४)

वे लौ लगाकर नाम जप करते हैं और सभी सिद्धियों समेत परमसिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। इतना ही नहीं, सन्त कबीर बताते हैं–

जा घर लक्ष्मी झाड़ू देत हैं, शंभु करै कोतवाली।

उस घर की यह महिमा है कि जो भी उसमें प्रवेश पाता है, उस परमात्मा के ही तद्रूप हो जाता है इसलिए लक्ष्मी झाड़ू देती हैं। अब लक्ष्मी को झाड़ू लगाने की क्या आवश्यकता है? किसी के पास लक्ष्मी आ जाय तो टूटी-फूटी झोपड़ी के स्थान पर महल की व्यवस्था हो जायेगी। उसकी कुछ अधिक कृपा हो गयी तो सवारी साधन, बाग-बगीचा सब कुछ हो जायेगा, माली लग जायेंगे, टी.वी. ब्लैक एण्ड ह्वाइट है तो रंगीन हो जायेगा। सब कुछ स्वत: चमकने लगेगा, झाड़ू लगाने की आवश्यकता ही समाप्त! किन्तु उस घर में प्रवेश के पश्चात् लक्ष्मी सब ओर से सिमटकर सेवा में लग जाती हैं।

दत्तात्रेय एक अच्छे महापुरुष थे। चिन्तन में सदैव लीन रहने के कारण भोजन, वस्त्र, शरीर तक का उन्हें भान ही नहीं रहता था। लोग पागल मानकर उनसे दूर ही रहते थे। एक समय ऐसा आया कि उनके चारों ओर भीड़ लगने लगी। उन्होंने भगवान से पूछा– प्रभो! हमें तो कोई पूछता भी न था, आजकल यह भीड़ क्यों लग रही है? भगवान ने बताया– लक्ष्मी जी तुम्हारी सेवा करना चाहती हैं। दत्तात्रेय ने कहा– लक्ष्मी जी को मैंने तो कभी पुकारा ही नहीं! वह हमारी सेवा क्यों करना चाहती हैं? भगवान ने कहा– तुम्हारे हृदय में अब मैं आ गया हूँ इसलिए लक्ष्मी जी सेवा करना चाहती हैं। दत्तात्रेय ने कहा– भगवन्! आप हृदय में बने रहें, केवल लक्ष्मी जी को भगा दें; भीड़-भाड़ से भजन में व्यवधान होता है। भगवान ने कहा– मेरा चरण छोड़कर लक्ष्मी को अन्यत्र कहीं ठौर ही नहीं है इसलिए वह तो रहेंगी।

दत्तात्रेय उलझन में पड़ गये। उन्होंने वह स्थान छोड़ दिया किन्तु जहाँ भी गये, वैसी ही व्यवस्था मिलती गयी। इस प्रकार लक्ष्मी को पीछा करते देख उन महात्मा ने संकल्प के विपरीत जाने का प्रयास किया। वे पूरब जाने की सोचते, लक्ष्मी वहाँ व्यवस्था कर रही होतीं कि दत्तात्रेय पश्चिम निकल जाते किन्तु एक-दो दिन पश्चात् वहाँ भी वही भीड़-भाड़!

भगवान ने एक दिन कहा– ‘‘भागो मत, कहीं बैठ जाओ!’’ उन विचरणशील महात्मा को एक उत्तुंग पर्वत शिखर दिखायी पड़ा। उन्होंने पर्वत पर चढ़ना आरम्भ किया, चढ़ भी गये। उन्हें एक झरना दिखायी पड़ा, वहीं पर बैठ गये। उन्होंने विचार किया– देखें, अब लक्ष्मी कैसे सेवा कर लेती हैं! बब्बर शेरों से भरे इस पहाड़ की चोटी पर आदमी यदा-कदा ही पहुँच पायेगा।

पर्वत की तलहटी में बसे लोगों को स्वप्न दिखायी देने लगा कि शिखर पर कोई महापुरुष बैठे हैं। दूसरे ने कहा– उनके सामने त्रिशूल गड़ा है। किसी ने उन्हें साक्षात् शिव-स्वरूप में देखा। जब सबके स्वप्न एक-जैसे होने लगे तो कुतूहलवश श्रद्धालुजन पर्वत शिखर पर चढ़ गये। उन्होंने देखा, एक महापुरुष ऊपर बैठे हैं। वे सेवा में लग गये। ग्यारह हजार सीढ़ियाँ बनाकर पूरा समाज ऊपर दर्शन करने लगा। महोरगढ़ के राजा ने ताम्रपत्र पर लिखकर अपना राज्य उनकी धूनी पर चढ़ा दिया। दत्त महाराज ने कहा– हम स्टेट लेकर क्या करेंगे? राजा ने कहा– भगवन्! अब तो हमने संकल्प कर दिया, वापस नहीं ले सकता। दत्त महाराज ने कहा– मैं कुछ माँगूँ, दोगे! उस राजा ने कहा– यह शीश आपके चरणों में अर्पित कर सकता हूँ। उन महापुरुष ने कहा– शीश दे दोगे तो सेवा कौन करेगा! आज से तुम मेरे राज्य का दीवान बनकर राजकाज का संचालन करो। राजा दीवान की तरह राज्य का कार्य देखते रहे। उसके सन्तोष के लिए दत्त भगवान दो-एक बार दस-पाँच मिनट के लिए उसकी गद्दी पर बैठ, ठोक-ठाँक कर आशीर्वाद देकर चले आये।

इसी प्रकार अनुसुइया के घनघोर जंगल में वर्षा के चार-चार महीने मनुष्यों का आवागमन दुर्लभ था। पूज्य गुरुदेव उस शान्त एकान्त में निर्द्वन्द्व बैठे रहते। क्रमश: कुछेक भाविक आने-जाने लगे किन्तु एक समय ऐसा आया कि महाराज जी को एक अनुभव दिखायी पड़ा। महाराज जी की कोठरी के दरवाजे पर एक महिला ने महाराज जी को रोका– ‘‘अभी आप इस कोठरी में न जायँ!’’ महाराज जी थोड़ा रुक गये, विचार करने लगे– हमारी कोठरी और हम ही भीतर न जायँ! उन्होंने प्रश्न की मुद्रा में महिला की ओर देखा तो वह बोली– ‘‘भीतर लक्ष्मी जी चरण-सेवा कर रही हैं।’’ महाराज जी ने विचार किया– ‘‘कौन है भाई हमारी कोठरी में जिसकी सेवा लक्ष्मी जी कर रही हैं!’’ कोठरी के भीतर प्रकाश था। दरवाजे की सन्धि से महाराज जी ने भीतर की ओर झाँका तो पाया– मैं ही आसन पर लेटा हूँ और लक्ष्मी जी मेरा ही पैर दबा रही हैं और यह देवी मुझे ही भीतर जाने से रोक रही है।

हमने पूज्य गुरुदेव से जानना चाहा कि यह कैसा अनुभव था? महाराज जी ने बताया, ‘‘इसका अर्थ यह था कि मेरे स्वरूप की सेवा लक्ष्मी जी कर रही हैं और मेरे स्थूल शरीर को उसका बोध कराया जा रहा है।’’ उस दिन से आश्रम की व्यवस्था ही बदल गयी। अयाचित आकाशवृत्ति से अनुकूल व्यवस्थाएँ बरसने लगीं। चित्रकूट में तो यह चर्चा का विषय ही बन गया कि परमहंस जी का खर्च कौन वहन करता है? कुछ ने अटकल लगाया, कदाचित् सोना बनाते हैं! किसी ने उड़ाया– नोट छापते होंगे। शिकायतों पर कुछ अधिकारी भी जाँच में आये। महाराज जी कहते थे– ‘‘हो! सब मेरे भीतर ही है, बाहर कहीं कुछ नहीं है बेटा! सारी मशीन मोरे भीतर है।’’ यही रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास की भी उक्ति है–

सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं।

अन्तकाल रघुपति पुर जाहीं।।

(रामचरितमानस, ७/१४/४)

देवताओं को भी जो अति दुर्लभ है, वह सुख भी वहाँ सुलभ है। किसे? जिसे भगवान पुकार लें, आवागमन से मुक्ति का जिसे प्रमाणपत्र दे दें। इस प्रकार लक्ष्मी झाड़ू देती हैं, सहज सेवा में लग जाती हैं और शम्भु करे कोतवाली– शम्भु अर्थात् स्वयंभू स्वस्वरूप- जिसमें वह महापुरुष स्थित है वह स्वरूप स्वत: कोतवाली करता है। कोतवाल का कार्य है नियन्त्रण रखना, व्यवस्था कायम रखना। महापुरुष के पास हर तरह के लोग आते हैं। कोई दु:ख लेकर आता है तो कोई उच्छृंखल भी चला आता है। शेर और बकरी सभी आते हैं। वह दरबार ही ऐसा है, किसी के लिए प्रतिबन्ध नहीं रहता। ऐसी परिस्थिति में महापुरुष का सहज स्वरूप स्वत: उनका निर्णय लेता है। जिसकी योग्यता जैसी है, उसी के अनुरूप फल प्रदान करता है, सबकी प्रार्थनाएँ स्वीकार करता है। वह जानता है कि प्रार्थना हृदय से है या मात्र प्रदर्शन है। उसका भाव कैसा है? जैसी उसकी सेवा है, वैसा ही पुरस्कार उसे प्रदान करता है। पूज्य महाराज जी कहते थे– ‘‘हो! मोरे रूप से लोग का-का पा जात हैं, मैंहूँ नहीं जानत!’’ यह है शम्भु की कोतवाली! इसीलिए ऋषि आश्रम में मन से भी पाप नहीं करना चाहिए, दण्ड मिल जाता है।

जा घर ब्रह्मा भये टहलुआ

उस घर में ब्रह्मा ही सेवा में नियुक्त हैं। अहंकार सिव बुद्धि अज(रामचरितमानस, ६/१५ क)- बुद्धि ही ब्रह्मा है। बुद्धि तो सबके पास है, यह व्यष्टिगत बुद्धि ब्रह्मा नहीं है। समष्टिगत बुद्धि अर्थात् ब्रह्मपद की चार अवस्थाएँ हैं– प्रथम ‘ब्रह्मविद्’ अर्थात् ब्रह्म की विद्या से युक्त, द्वितीय ‘ब्रह्मविद्वर’ अर्थात् उस ब्रह्मविद्या में श्रेष्ठता प्राप्त कर ले, तृतीय ‘ब्रह्म विदुर्यान’ अर्थात् ब्रह्मविद्या की वह अवस्था जिस पर उस महापुरुष को अधिकार हो और जो दूसरों को वह ब्रह्मविद्या प्रदान भी कर सकता हो और चौथी श्रेणी है ‘ब्रह्म विद्वरिष्ट’- ब्रह्मविद्या का वह स्तर जिसमें इष्ट प्रवाहित है, परमात्मा स्वयं प्रसारित है, ऐसी बुद्धि ही ब्रह्मा है। परमात्मा उस बुद्धि में जब जितना प्रसारण करता है, यह बुद्धि उसको ग्रहण करती और तदनुरूप कार्य करती है। उस घर में ब्रह्मा सेवा करता है। महापुरुष बुद्धि से नहीं सोचता कि क्या करें, क्या न करें! उनके पास स्वत: परमात्मा द्वारा सोचा हुआ आता है। महापुरुष को उसकी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रहती।

विष्णु करे रखवाली

विश्व के अणु-अणु, कण-कण में व्याप्त सत्ता जो सबका पालन करने वाली प्रशक्ति है, परमात्मा की वह प्रशक्ति यहाँ स्वयं रखवाली करती है। योगक्षेमं वहाम्यहम् (गीता, ९/२२)- उसके योगक्षेम की व्यवस्था, उसकी सुरक्षा का भार स्वयं परमात्मा वहन करते हैं। इसलिए सन्त कबीर कहते हैं– तवन घर चेतिहे रे भाई।– उस घर के लिए चेत करो। सारे के सारे जीव अचेत हैं। इस पद द्वारा सन्त कबीर उन्हें सचेत करते हैं। आदिशास्त्र गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। (गीता, २/६९)

इस जगत्रूपी रात्रि में सभी प्राणी अचेत, निश्चेष्ट पड़े हुए हैं। लोग रात-दिन जो दौड़-धूप करते हैं, मात्र स्वप्न देखते हैं। इनमें से केवल संयमी पुरुष जग जाता है। संयम मात्र एक ईश्वर में होता है। ईश्वर के प्रति समर्पण के साथ संयम आरम्भ होता है। इसलिए चेत करो उस घर के लिए। यहाँ तो आप केवल स्वप्न देख रहे हैं, इसमें धोखा है। अन्त में सन्त कबीर कहते हैं–

चलहु हंसा वहि घर चलहू, जहँ आवागमन न होई।

संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार।

(रामचरितमानस, १/६)

सन्त सत्पुरुष, श्रद्धालु साधक हंस कहे जाते हैं। वे विकाररूपी जल का त्याग कर ईश्वरीय गुणरूपी दूध को ग्रहण कर लेते हैं। मछली को जल से बाहर रखें, वह जी पायेगी क्या? शेर को घास खिलाकर जिलायें, जी सकेगा? ऐसे ही हंस हैं जो दूध के अतिरिक्त अन्य किसी का आश्रय नहीं लेते। उनमें नीर-क्षीर विवेक होता है। हंस की तरह संत भी हैं। ईश्वरीय गुणरूपी दूध ही उनका जीवन है। ऐसे सन्तों, विवेकी पुरुषों का आह्वान करते हुए सन्त कबीर कहते हैं कि उस घर के लिए प्रस्थान करो जहाँ आवागमन नहीं होता। वह स्थान है कैसा?

कहत कबीर सुनो भाई साधो!’– लगभग पंचानबे प्रतिशत कबीर के पद सन्तों को उद्देश्य बनाकर कहे गये हैं। वह जानते थे कि जिस वैदिक तथ्य को गोपनीय बनाकर मैं कह रहा हूँ, इसे समझने की क्षमता सबमें नहीं है किन्तु संसार के इतने बड़े जनसमूह में जिनमें वह क्षमता पायी गयी वह थे सन्त! साधना में प्रवृत्त, एकाध सीढ़ी पार किये हुए कहत कबीर सुनो भाई साधो– पहले वे साधु समझें, फिर उनके द्वारा सब समझें।

अचरज कहलो न जाई– उस स्थल के बारे में सन्त कबीर कहते हैं– सन्तों समझो! वह एक आश्चर्य है, वाणी का विषय नहीं है। वह अगोचर है, अचिन्त्य है– चित्त का विषय नहीं है। उस धाम की रहनी कहने में नहीं आती।

जिन देखा तिन कहा नहिं, कहा सो देखा नाहिं।

रहिमन अगम बात के, कहन सुनन को नाहिं।।

जिन्होंने उस परमतत्त्व को देखा उन्होंने कहा ही नहीं और जो कहता है उस बेचारे ने अभी देखा नहीं। तुलसीदास कहते हैं– नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी।। (रामचरितमानस, १/२०/७)- नाम और रूप दोनों अनिर्वचनीय हैं। कबीर ने स्थान-स्थान पर इसका संकेत किया है– कह कबीर गूँगे की शक्कर, खाई सोई पै जानै।– गूँगा शक्कर खाता है, शिर हिलाता है; लेकिन व्यक्त नहीं कर सकता। ऐसा है आवागमन से मुक्त यह धाम!

सारांशत: परमात्मा पुकारे! जहाँ उन्होंने बुलाया, स्थिति मिल जाती है, स्वरूप की उपलब्धि हो जाती है। इस ईश्वर-भाव की प्राप्ति का उपाय है नाम में लौ लगाना। और नाम कैसे जागृत होता है?– इस पर कहते हैं–

सेवक को सदगुरु मिले, रहे कुछ न तवाही।

कह कबीर निज घर चलो, जहँ काल न जाई।।

सेवक को सद्गुरु की प्राप्ति के पश्चात् कोई अभाव नहीं रह जाता। जहाँ सद्गुरु से शिक्षा मिली तो निज घर चलो– उसी के सहारे साधना आरम्भ करें और लक्ष्य तक पहुँच लें– जहाँ काल न जाई– जहाँ काल का आना-जाना नहीं होता। वह अकाल है, काल से अतीत है, उसी का नाम है आवागमन से मुक्ति! लेकिन एक नाम लौ लाई– हर हालत में साधना का आरम्भ नाम से है और अन्त भी नाम की सुखमना अवस्था से है।

!! बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-1से उद्धृत)

Q & A
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